संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * जगत्की असारताका और तत्त्वज्ञानसे उसके नाशका वर्णन *
विषाद, ईर्ष्या, सुख और दुःखपर समानरूपसे विजय प्राप्त करे।
राघव ! जैसे संकल्पकी शान्ति हो जानेपर संकल्प-नगर सदाके लिये शान्त हो जाता है तथा जैसे जाग्रत् पुरुषके लिये स्वप्न नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्म-ज्ञानीकी दृष्टिमें यह सारा जगत् सदाके लिये अस्त-सा दीख पड़ता है। यदि कोई पुरुष अविद्या-स्वरूप जिस-किसी काल्पनिक उपदेशसे 'मैं कृतार्थ हो गया हूँ' यों अपनेको मानने लगता है तो अज्ञानी होनेके कारण वह वास्तवमें अकृतार्थ ही है। मूर्खतासे विमोहित होनेके कारण ही वह अपनेको कृतार्थ मानने लगा है, परंतु दूसरे ही क्षण जब उसे नाना प्रकारके कष्ट आ घेरते हैं, तब उसे अपनी अकृतार्थताका ज्ञान होता है। विद्वानोंका मत है कि जो काल्पनिक उपशम है, वह क्षणभरमें ही भाव, अभाव और इच्छाके विविध विलाससे दुःखदायी हो जाता है; अतः यह निर्दोष उपाय नहीं है। जगद्भ्रमका पूर्णतया ज्ञान हो जानेपर जो वासनारहित स्थिति प्राप्त होती है, उसीको निर्वाण कहा जाता है। उसके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण विषय स्वतः ही नीरस हो जाते हैं। (सर्ग ४०-४२)
जगत्की असारताका निरूपण करके तत्त्वज्ञानसे उसके विनाशका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुवीर ! जो अज्ञानरूपी ज्वरसे मुक्त हो गया है और जिसका आत्मा ज्ञान-प्राप्ति-से शान्त हो गया है, उसका यही लक्षण है कि उसे फिर भोगरूपी जल रुचिकर नहीं लगता। जैसे स्वप्नमें दृष्टिगोचर हुए पदार्थ जाग जानेपर उस स्वप्नद्रष्टाको न तो किसी प्रकारका आनन्द देते हैं और न उसकी दृष्टिमें उनकी सत्ता ही रहती है, उसी तरह 'यह मैं हूँ, यह जगत् है' इत्याकारक भ्रमसे प्रतीत हुए पदार्थ तत्त्वज्ञानीके लिये न तो आनन्ददायक होते हैं और न अपना अस्तित्व ही रखते हैं। जैसे विभ्रमस्वरूप यक्षनगर वास्तवमें मिथ्या हैं, वैसे ही अहंता और जगत् भ्रमरूप ही हैं। वस्तुतः तो वे मिथ्या ही हैं। जैसे आवरणशून्य होनेके कारण विभ्रमरूपी यक्ष जंगलमें प्रतीत होते हैं, वैसे ही ये चौदह भुवन भी प्रतीत होते हैं। सत्ताकी उत्पत्तिसे शून्य यह विस्तृत दृश्य-प्रपञ्च द्रष्टाके संकल्पसे होनेवाला होनेसे द्रष्टाका स्वरूप ही है अथवा कुछ भी नहीं है; क्योंकि परमार्थ चिद्रूप सत् क्या कहीं तुच्छ दृश्यरूपसे स्थापित किया जा सकता है ? अर्थात् कदापि नहीं। जैसे वसन्तऋतुका रसप्रवाह वृक्ष और लताओंके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, वैसे ही अपने स्वरूपमात्रसे परिपूर्ण कर देनेवाली आत्मचेतनता ही सृष्टिके रूपमें परिणत हुई है।
रघूद्वह ! यह जो जगत्का आभास है, वह विशुद्ध चिन्मात्रका आभासरूप ही है; फिर इसमें एकत्व और द्वित्वकी कल्पना कैसे हो सकती है। सज्जनो ! तुमलोग चिन्मय आकाशरूप हो जाओ, परम रम्य निरतिशयानन्दका पान करो और निर्वाणानन्दस्वरूप नन्दनवनमें निःशङ्क होकर निवास करो। अरे भ्रान्तबुद्धि मनुष्यो ! तुमलोग संसाररूपी काननकी इन अत्यन्त शून्य मरुस्थलियोंमें मृगमरीचिकाके पीछे भागे हुए हिरणोंकी तरह क्यों भटक रहे हो ? तुमलोगोंकी बुद्धि त्रिलोकीरूपी मृगतृष्णाके जलकी चकाचौंधमें पड़कर अंधी हो गयी है और तुम्हारे हृदयको अज्ञाने अन्धा कर दिया है, अतः तुमलोग व्याघ्र होकर तृष्णाके पीछे मत दौड़ो। बाह्य और आन्तरिक भोगरूपी मृगतृष्णाके जलका पान करनेवाले हिरणरूपी जीवो ! तुमलोग व्यर्थ ही परिश्रम करके अपनी आयु मत गँवाओ, मत गँवाओ। यह जगत् गन्धर्वनगरके समान है। इसमें चित्तका अपहरण करनेवाले महान् अहंकारसे युक्त होकर तुमलोग अपना विनाश मत करो। इन सुखरूप दीखनेवाले भोगोंकी श...