भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विषयभोगोंको दुःखरूप ही समझो । मनुष्यो ! ये मानव-देह वायुके झोंकेसे चञ्चल हुई पीपलवृक्षकी ऊपरी शाखाके पत्तोंपर स्थित ओसकी बूँदोंके सदृश क्षणभङ्गुर हैं अतः तुमलोग इन अन्धकारपूर्ण गर्भशय्याओंपर शयन मत करो । आदि-अन्तरहित पारमार्थिक ब्रह्ममात्रमें लगातार शान्तभावसे स्थित रहो । द्रष्टा-दृश्य आदि विरुद्ध स्वभावरूपी दोषसे अपना पतन मत कर डालो । यह संसार तो अज्ञानीकी ही दृष्टिमें सत्य है । वास्तवमें तो इसमें कुछ भी सत्य नहीं है । 'यह मैं हूँ और यह मेरा है' इस प्रकारके अभिमानरूपी भ्रान्तिकी सर्वथा शान्ति ही मुक्ति है और वह मुक्ति जिस-किसी भी प्रकारसे स्थित योगीकी अपने स्वरूपकी सत्ता ही है ।

रघुकुलतिलक राम ! जो संसार-मार्गमें चलते-चलते थकावटसे चूर हो गया है, उस पथिकके लिये निर्वाणता, वासनाशून्यता, त्रिविध तापशून्यता और उत्कृष्ट ज्ञान—ये शान्ति प्रदान करनेवाले विश्रामस्थान हैं । यह जगत्रूपी पदार्थ परस्पर अनिर्वचनीय है । इसे तत्त्वज्ञानी जैसा समझता है, वैसा मूर्ख नहीं जानते और जैसा मूर्ख जानता है, वैसा तत्त्वज्ञानी नहीं समझते अर्थात् अज्ञानीके लिये यह दुःखमय है और ज्ञानीके लिये आनन्दमय ब्रह्म है । जीवन्मुक्त ज्ञानीके लिये भ्रान्तिकी शान्ति हो जानेपर जगत्‌का स्वरूप भी नष्ट हो जाता है । उसकी दृष्टिमें तो एकमात्र परब्रह्म परमात्मा ही विद्यमान दीखता है । जैसे खूब जले हुए घास-फूसोंकी भस्मराशि वायुके वेगसे उड़कर न जाने कहाँकी कहाँ चली जाती है, वैसे ही सत्पुरुषोंकी संगतिसे आत्मस्वरूपमें विश्राम प्राप्त हो जानेपर इस जगत्‌का अस्तित्व न जाने कहाँ विलीन हो जाता है । क्योंकि जो समस्त प्राणियोंकी रात्रिके समान है, उस परमानन्दमें संयमी पुरुष जागता रहता है और जिस संसारमें प्राणी जागते रहते हैं, वह तत्त्वद्रष्टा ज्ञानीके लिये रात्रिके समान है । जैसे जन्मान्धको रूपका अनुभव नहीं होता, वैसे ही ज्ञानीको जगत्‌का अनुभव नहीं होता और यदि कदाचित् होता भी है तो वह भ्रम-तुल्य एवं असद्रूप ही होता है । अज्ञानियोंके लिये दुःखरूपसे प्रसिद्ध जो तीनों लोक हैं, वे अज्ञानियोंकी ही दृष्टिमें हैं, तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें उनका अस्तित्व नहीं है; क्योंकि वे सत् नहीं हैं ।

श्रीराम ! जैसे नदियोंका जल जबतक समुद्रमें नहीं मिल जाता तबतक नदी, प्रवाह आदि सैकड़ों नाम-रूपोंमें व्यवहृत होता है, किंतु जब वह समुद्रमें मिलकर एकाकार हो जाता है, तब एकमात्र जल ही कहलाता है, वैसे ही बाह्य और आभ्यन्तररूपमें जो अर्थों एवं अनर्थोंका समुदाय संकल्पसे प्रतीत होता है, वह व्यापक मन ही है; क्योंकि उसीसे अर्थोंकी प्रतीति होती है । जैसे जल और उसकी तरङ्गमें कोई भेद नहीं है, वैसे ही मन और सांसारिक पदार्थोंमें भिन्नता नहीं है ।

संसारके सभी पदार्थ संकल्परूप ही हैं, इसलिये विवेकी पुरुष उनकी कामना नहीं करते । मन भी संकल्प-रूप है, इसी कारण सम्यक् ज्ञान हो जानेसे मन और पदार्थ दोनोंकी शान्ति हो जाती है । जैसे मिट्टीकी मूर्तिमें कोई पुरुष अज्ञानवश शत्रुताकी कल्पना कर लेता है, किंतु ज्यों ही विवेकसे उसे ज्ञात होता है कि यह मिट्टी है त्यों ही उसकी शत्रुता और भय—दोनों उस मूर्तिसे निकल जाते हैं, वैसे ही ज्ञानीके ये अर्थ और मन—दोनों ही स्वतः नष्ट हो जाते हैं । जैसे पास ही सोये हुए पुरुषका स्वप्न और डरपोक बच्चेके सामने दीखनेवाला पिशाच असत् है, उसी तरह प्रारब्धानुसार प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखादि भोगोंका साधनभूत जगत्, संसारकाल दैवकृत जन्मादि विकार, उसका भोक्ता अज्ञानी और अज्ञानीके शब्दादि विषय—ये सभी असत् हैं । जैसे धीर-वीर पुरुषकी दृष्टिमें पिशाचबुद्धिका अस्तित्व नहीं रहता, वैसे ही ज्ञानीकी दृष्टिमें अज्ञानीके जगत्‌की सत्ता नहीं रहती । अज्ञानी तो चिरकालतक ज्ञानीको भी अज्ञ ही समझता है; क्योंकि उसकी दृष्टिमें तो वन्ध्या भी पुत्र-पौत्रोंके विस्तारद्वारा बढ़ती है, जो सर्वथा असम्भव है ।

रामभद्र ! यह संसार तो मनसे ही उत्पन्न होता है