भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 602, कुल 750 में से

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] ❖ मनरूपी मृगके विश्रामके लिये समाधिरूपी कल्पद्रुमकी उपयोगिता ❖ [ ९०३


और परमात्मज्ञानसे शान्त हो जाता है, परंतु मनुष्य सीपीमें चाँदीके भ्रमकी भाँति संसारभ्रममें पड़कर व्यर्थ ही कष्ट उठाता है। संसारके अभाव और परब्रह्म परमात्माके वास्तविक स्वरूपको यथार्थ जान लेना ही ज्ञान है। निर्वाणसे भिन्न 'अहम्' इत्याकारक भ्रमरूप जो सत्ता है, वह तो दुःखका ही कारण होती है। इस अहंकारका स्वरूप मृगतृष्णाके जलके सदृश असत् एवं शून्य है—ऐसा ब्रह्मज्ञान हो जानेपर अहंकार पूर्णतया शान्त हो जाता है। बोधस्वरूप ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान न होनेसे यह अज्ञानी जीवात्मा देश-काल आदि सामग्रीके बिना ही जगद्रूपताको प्राप्त हो जाता है। वस्तुतः तो वह परमात्मा एक ही है। यद्यपि शुद्ध चिदात्मामें अज्ञान आदि किंचिज्ज्ञ होना सम्भव नहीं है, तथापि अज्ञानावस्थामें उस सम्बन्धके बोधनके लिये उसमें उसकी कल्पना कर ली जाती है। अतः तत्त्वज्ञानके द्वारा मूलाज्ञानका उपशम हो जानेपर जब मनुष्योंका अभिमान नष्ट हो जाता है, तब वे सम्यक्-रूपसे परमात्मामें लीन हो जाते हैं। उन्हें नित्यनिजानन्दकी प्राप्ति हो जाती है, जिससे वे शान्त एवं विक्षेपरहित होकर निरन्तर सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही समाविष्ट रहते हैं।

(सर्ग ९३)


प्राणियोंके श्रान्त हुए मनरूपी मृगके विश्रामके लिये समाधिरूपी कल्पद्रुमकी उपयोगिताका वर्णन

**श्रीरामजीने कहा—**मुनिवर ! अब आप समाधिरूपी वृक्षके स्वरूपका, जो विवेकी पुरुषोंके जीवनोपयोगी फलोंसे सुशोभित, लताओंसे परिवेष्टित, पुष्पोंसे सुरभित और मनरूपी मृगको विश्राम देनेवाला है, क्रमशः वर्णन कीजिये।

**श्रीवसिष्ठजी बोले—**रघुनन्दन ! मैं उस समाधिरूपी वृक्षका वर्णन कर रहा हूँ, सुनो। वह विवेकी पुरुषरूपी वनमें उत्पन्न हुआ है और ऊपरको बढ़ता ही जा रहा है। पत्रों, पुष्पों और फलोंसे लदा हुआ वह वृक्ष ज्ञानी जनोंको सर्वथा जीवन प्रदान करनेवाला है। विद्वानोंका कहना है कि दुःखके कारण अथवा स्वयं ही—जिस-किसी भी प्रकारसे इस संसाररूपी वनसे उत्पन्न हुआ जो परम वैराग्य है, वही उस समाधिरूपी वृक्षका बीज है और चित्त उस बीजके उगनेके लिये उत्तम क्षेत्र है, जो शुभकर्म-समूहरूपी हलसे जोता गया है, रात-दिन शान्ति आदि जलसे सींचा गया है और प्राणायामरूपी जल-प्रवाहसे युक्त है। जब विवेकी जनरूपी काननमें चित्तरूपी भूमि विवेकद्वारा परिष्कृत हो जाती है, तब संसारसे वैराग्यरूप समाधि-वृक्षका बीज स्वयं ही जाकर उस भूमिमें गिरता है। उस समय दृढ़ बुद्धिवाले पुरुषको चाहिये कि अपने चित्तरूपी भूमिमें गिरे हुए उस ध्यान-समाधिवीजको खेदरहित होकर यत्नपूर्वक सींचता रहे तथा कायिक, वाचिक और मानसिक तप एवं दानसे, अमानित्व आदि गुणोंसे और तीर्थाटनाश्रम-निवास्यरूपी शान्तिमयी वृत्तिसे उस बीजकी यत्न-पूर्वक रक्षा करता रहे। इस प्रकार सिंचन आदिके पश्चात् जब उस बीजमें अङ्कुर निकल आये, तब उसकी रक्षाके लिये रखवाली करनेमें अत्यन्त निपुण सन्तोष नामक पुरुषको उसकी प्रियरूपी मुदिताके साथ रक्षरूपमें नियुक्त कर देना चाहिये। पश्चात् उस अङ्कुरका विनाश कर डालनेके लिये टूट पड़नेवाली दुष्ट वासनाओंमें स्थित आशारूपी ढिगों, पुत्र-कलत्रादि-अनुरागरूपी पक्षियों और कामनारूप आदि कौंचोंको उस रक्षकके द्वारा भगा देना चाहिये। फिर उस अङ्कुरके खेतसे अत्यन्त कोमल सत्कर्मरूपी तृणोंको उखाड़कर तथा अचिन्त्य ब्रह्मरूपी अप्रमेय प्रभाव जगानेवाले ज्ञानरूपी सूर्यकी धूपसे तमोगुणरूप अन्धकारको नष्ट कर देना चाहिये। इस अङ्कुरका विनाश न होने देकर

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