भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 750 में से

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५५८ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

लिये उसपर तरङ्गोंके समान चञ्चल एवं विनाशी सम्पत्तिरूपी नारियों तथा दुष्कृतरूपी मेघोंद्वारा प्रेरित वज्र टूटे पड़ते हैं, इसलिये धैर्य, औदार्य, दया आदि मन्त्रों तथा जप, स्नान, तप और दम आदिके सहयोगसे प्रणवार्थ-चिन्तनरूपी त्रिशूलके द्वारा उनका निवारण कर देना चाहिये। इस प्रकार जब उस ध्यान-बीजकी भलीभाँति रक्षा की जाती है, तब उससे विवेक नामक नवीन अङ्कुर उत्पन्न होता है, जो जन्मसे ही उन्नति-शील और सौन्दर्यशाली होता है।

राघव ! तदनन्तर उस अङ्कुरसे अपने-आप दो पत्ते निकलते हैं, जिनमें एक है 'शास्त्र-चिन्तन' और दूसरा है 'सत्पुरुषोंका सङ्ग'। आगे चलकर जब यह सन्तोषरूपी त्वचासे वेष्टित और वैराग्यरूप रससे अनुरञ्जित होता है, तब यह तना, दृढ़मूलता और समुन्नतिको धारण करता है। इस प्रकार शास्त्र-चिन्तनरूपी वर्षाके जलसे आप्लावित होकर जब इसका हृदय वैराग्यरूपी रससे परिपुष्ट हो जाता है, तब यह अपनी आयुके थोडे ही समयमें परमोत्कृष्ट उन्नतिको प्राप्त हो जाता है। धीरे-धीरे शास्त्रार्थचिन्तन, सत्पुरुष-समागम और वैराग्यरूप रससे जब वह अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट हो जाता है, तब राग-द्वेषरूपी बंदरोंद्वारा क्षुब्ध किये जानेपर वह जरा-सा भी कम्पित नहीं होता। तदनन्तर विज्ञानसे अलंकृत आकारवाले उस वृक्षसे आत्मरससे सुशोभित तथा दूर देशतक विस्तार करनेवाली ये स्फुटता ( आत्मतत्त्वका स्पष्ट आविर्भाव ), सत्यता, सत्ता ( आत्मरूपसे स्थिति ), धीरता, निर्विकल्पता, समता, शान्तता, मैत्री, करुणा, कीर्ति और आर्यता आदि लताएँ ( शाखा-प्रशाखाएँ ) उत्पन्न होती हैं। यों गुण-रूपी पत्तों तथा यशरूपी पुष्पोंसे लदी हुई इन लताओंसे समृद्ध हुआ वह ध्यान-समाधि-वृक्ष संन्यासी ( अहंकार-त्यागी ) के लिये कल्पवृक्षका काम करता है।

रामभद्र ! इस प्रकार जब वह उत्तम ज्ञानरूपी ( समाधिरूपी ) वृक्ष लता, पल्लव और पुष्पोंसे विभूषित हो जाता है, यशरूपी पुष्पगुच्छोंसे उसकी अद्भुत छटा दीखने लगती है, उसमें गुणरूपी पल्लव लहलहाने लगते हैं और उसकी आकृति प्रज्ञारूपी मञ्जरियोंसे सुशोभित हो जाती है, तब वैराग्य-रसको टपकानेवाला वह वृक्ष दिन-पर-दिन आगामी ( मूलाज्ञानके उच्छेदक ब्रह्मसाक्षात्काररूपी ) ज्ञानका प्रदाता होता है। उस समय वह वर्षाकालीन मेघकी तरह सारी दिशाओंको शीतल कर देता है और सम्पूर्ण सांसारिक तापको वैसे ही शान्त कर देता है, जैसे दिनमें प्रकट हुए सूर्यके तापको रातमें चन्द्रमा शान्त कर देता है, जैसे मेघोंकी घटा छाया पैदा कर देती है, वैसे ही वह वृक्ष उपशमरूपी छायाका विस्तार करता है। वह उपशम चित्तको ऐसा सुदृढ़ बनाता है, जैसे पूर्वी हवा बादलोंको घना कर देती है, वह परमात्मज्ञानके मूलबन्धको वैसे ही अपने-आप सुदृढ़ कर लेता है, जैसे कुलपर्वत अपने मूलको। तथा वह अपने ऊपर कैवल्य नामक फलके उत्पन्न होनेमें सहायक शान्ति आदि माङ्गलिक पुष्पगुच्छों-की रचना करता है। पुरुषके हृदय-काननमें जब प्रति-दिन छायावितानसे संयुक्त विवेकरूपी कल्पवृक्ष वृद्धिंगत होता रहता है, तब भूतलके त्रिविध तापोंका हरण करनेवाली बुद्धिरूपी लता उल्लसित हो उठती है और उससे मनोहर शीतलता प्रकट होती है। उसी छायामें मनरूपी मृग, जो अनेक जन्मोंमें भटकनेवाला प्राचीन बटोही है और मार्गमें नानावादियोंके कोलाहलसे व्यग्र हो गया है, संसाराटवीमें भटकते-भटकते थककर—यहाँ विश्राम पाकर सुखकी साँस लेता है।

राघवेन्द्र ! सत्तामात्र ही जिसका आत्मा है, ऐसे पुरुषरूपी चमड़ेका अपहरण करनेके लिये काम आदि छः शत्रु उसके पीछे पड़े हैं और वह नाना प्रकारके असार शरीरादिरूप कँटीली झाड़ियोंमें अपनेको छिपाता फिरता है, जिससे उसका मुख छिन्न-भिन्न हो गया है।

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