संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] मनरूपी मृगके विश्रामके लिये समाधिरूपी कल्पद्रुमकी उपयोगिता ७५१
वासनारूपी वायुसे प्रेरित होकर संसाराटवीमें भटकता हुआ यह मनोमृग अहंतारूपी मृगमरीचिकाकी ओर सर्वदा दौड़ते रहनेसे अन्तःकरणकी तृष्णारूपी विषके दाहसे अत्यन्त व्याकुल हो गया है। बडे-बडे भोगोंमें यह आदरबुद्धि रखनेवाला है। इसी कारण दूर देशमें उत्पन्न हुए हरे-हरे तृणरूपी विषय-भोगोंके लिये दौड़ते रहनेसे इसका शरीर जर्जर हो गया है और पुत्र-पौत्रके पालनकी व्यग्रतासे संतप्त होकर यह अनर्धरूपी गड्ढेमें जा गिरा है। सम्पत्तिरूपी लतामें फँसकर जब यह लड़खड़ाकर गिर पड़ता है, उस समय प्राप्त हुए सङ्कटोंसे इसका शरीर घायल हो जाता है और जब यह ताप-शान्तिके लिये तृष्णारूपी सुहावनी सरिताके निकट जाता है, तब हर्ष-शोक आदि तरङ्गोंसे आहत होकर दूर जा पड़ता है। फिर वह व्याधिरूपी दुष्ट व्याधोंके भयसे भाग छूटनेमें ही लग जाता है। उस समय उसे दैव-प्रारब्धकी कुछ भी सम्भावना नहीं रहती, जिससे वह मानो व्याध आ पहुँचा है—इस प्रकारके भयसे अपने आकारको संकुचित कर लेता है।
राजकुमार ! यह मनोमृग ज्ञानेन्द्रियोंके आस्वादके विषयभूत स्थानोंसे उत्पन्न दुःखरूपी बाणोंसे भयभीत, काम-क्रोधादि शत्रुओंके आक्रमणसे व्यग्र और पत्थरके प्रहारके सदृश दुःखानुभवके संस्कारोंसे युक्त है। स्वर्ग-नरकरूपी ऊँचे-नीचे स्थानोंमें बारंबार चढ़ने और गिरनेसे यह अत्यन्त व्याकुल हो गया है। काम-क्रोधादि विकार-रूपी पत्थरोंकी निरन्तर चोट लगनेसे इसका शरीर चूर-चूर हो गया है। तृष्णारूपी सुन्दर लताकुञ्जोंमें प्रवेश करते-करते इसकी देह क्षत-विक्षत हो गयी है। इसे परमात्माकी मायाका कुछ भी ज्ञान नहीं है, इसलिये इसने अपनी बुद्धिसे नाना प्रकारके मिथ्या व्यवहारोंकी कल्पना कर ली है। जिसे काबूमें लाना अत्यन्त कठिन है, ऐसे कामरूपी गजेन्द्रकी गर्जनासे यह भयभीत हो गया है और इन्द्रियसमूहरूपी गाँवमें पहुँचकर पुनः उनके मारे भागनेमें ही तत्पर है। विषयरूपी अजगरोंके अत्यन्त विषैले फुंकारोंसे इसे मूर्च्छा आ गयी है। यह कामुक कामिनीरूपी भूमिमें पहुंचकर प्रायः विषयरससे अत्यन्त मर्दित हो गया है। क्रोधरूपी दावानलसे दग्ध हो जानेके कारण इसकी पीठपर छाले पड़ गये हैं, जिसकी गर्मीसे यह छटपटा रहा है और सदा विषयोंमें बारंबार भ्रमण करनेके कारण भीषण दुःखोंकी प्राप्तिसे उसके भीतर भी जलन हो रही है। अपने आत्मामें संत्रस्त नाना प्रकारकी अभिलाषाएँ ही मानो मच्छर हैं, जो इसे डंक मारनेके लिये इसके पीछे पड़ गये हैं। भोगोंके लोभसे उत्पन्न मनोहर प्रमोदरूपी सियार बहुत दिनोंसे इसके पीछे दौड़ रहा है। एक तो यह यों ही अपने कर्म और कर्तृत्वके चक्करमें पड़कर उद्भ्रान्त हो गया है, ऊपरसे दरिद्रतारूपी सिंह इसका पीछा कर रहा है। यह पुत्र-कलत्रादिमें आसक्तिरूपी व्यामोहके कुहासेमें अंधा हो गया है, जिससे इसका शरीर गण्डगण्ड पर्वत-शिखरसे लुढ़ककर गड्ढेमें गिर रहा है। मलरूपी सिंहकी दहाड़से इसका हृदय काँप उठा है, जिससे यह भयभीत हो गया है और प्रसिद्ध मृत्युरूपी व्याघ्रके प्रहार करनेपर अगस्त्य-पुष्पकी तरह सुखपूर्वक विदीर्ण करनेयोग्य दीख रहा है। निर्जन वनमें गर्वरूपी अजगर इसे शीघ्र ही निगल जानेके लिये ताक लगाये बैठा है। अनेकविध कामनाओंकी सिद्धिके लिये यह जहाँ-तहाँ अपने रन्ध्र-तुल्य दोषोंको छिपाता फिर रहा है अर्थात् दीनता प्रकट कर रहा है। युवावस्थारूपी प्रियतमा पत्नीने इसका किञ्चित्सा आलिङ्गन करके इसका परित्याग कर दिया है तथा झंझावात-सदृश कुपित हुई इन्द्रियोंने इसे नानाविध दुर्गम स्थानोंमें ले जाकर डाल दिया है। इस प्रकार यह मनोमृग जब जन्मान्तरार्जित पुञ्जीभूत उत्कृष्ट कर्मों अर्थात् साधनसे युक्त होकर इस पूर्वोक्त सन्निपातके अंतमें ॐ