संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जाता है, तब वह वैसे ही विश्राम-सुखका अनुभव करता है जैसे रातके अंधकार और शीतसे पीड़ित प्राणीको सूर्योदय होनेपर आनन्द प्राप्त होता है।
श्रोताओ ! आत्मज्ञानसे शून्य मूर्खलोग ताली, तमाल और मौलसिरीके वृक्ष-गुल्मोंमें बने हुए विश्रामस्थानोंमें प्रचुर पुष्पोंके विलासरूपी हासोंके समान तुच्छ अनित्य भोगमें फँसे रहनेके कारण जिस निरतिशयानन्दका नाम भी नहीं जान पाते, उस मोक्ष नामक परम आनन्दको तुमलोगोंक अपना मनरूपी मृग इस समाधि-वृक्षके नीचे आनेसे प्राप्त कर सकता है। (सर्ग ४४)
जीवात्माके ध्यान-वृक्षपर चढ़नेका और वास्तविक सुखकी प्राप्तिका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—शत्रुमर्दन राम ! इस प्रकार जब इस मनोमृगको उस समाधि-वृक्षकी छायामें विश्राम-सुखका अनुभव होने लगता है, तब वह उसीसे प्रेम करने लगता है; और किसी वृक्षके नीचे नहीं जाता। तदनन्तर इतने समयके बाद वह विवेकपूर्ण समाधिवृक्ष पारमार्थिक आत्मस्वरूपभूत मोक्षफलको पूर्णरूपसे प्रकट करता है। तब उस उत्तम वृक्षके नीचे बैठा हुआ अपना यह मनोमृग उस ध्यानद्रुमकी शाखाओंके अग्रभागमें लटकते हुए मोक्ष-रूपी पावन फलको देखता है। उस फलका आस्वादन करनेके लिये विशाल अध्यवसायसे युक्त तथा जड दृश्यवर्गका अत्यन्त अभाव कर देनेवाला विरक्त पुरुष ही उस वृक्षपर चढ़ता है। उस उत्तम फलको प्राप्त करनेकी इच्छासे विवेकपूर्ण ध्यान-वृक्षपर चढ़ा हुआ पुरुष पुरानी केंचुलका परित्याग करनेवाले साँपकी तरह अपने प्राक्तन संस्कारोंका त्याग कर देता है। वह अपनेको उस ऊँचे स्थानपर चढ़ा हुआ देखकर अट्टहास करने लगता है और विचारता है—'ओह ! इतने समयतक मैं कैसा दीन बना रहा।' उस समय वह करुणा* आदि जिनका स्वरूप है, ऐसी उस वृक्षकी शाखाओंके मध्यमें भ्रमण करता हुआ लोभरूपी सर्पको वशमें करके सम्राट्की तरह सुशोभित होता है। न तो वह प्राप्तवस्तुकी उपेक्षा करता है और न अप्राप्तकी
* आदिपदसे यहाँ—
'अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।'
(गीता १६। १–३ में वर्णित)
दैवीसम्पत्तियोंका ग्रहण है।
इच्छा; बल्कि सम्पूर्ण वृत्तियोंमें उसका अन्तःकरण चन्द्रमाकी भाँति सौम्य एवं शीतल हो जाता है। वह उसकी दृष्टिमें स्त्री, पुत्र, मित्र और धन-सम्पत्ति आदि सारे पदार्थ स्वप्नमें उत्पन्न हुएके समान लगने लगते हैं। उन्मत्तकी चेष्टाके समान जिसका आकार है तथा जं तरंगोंकी तरह क्षणभङ्गुर आधारवाली है, ऐसी संसाररूपी नदीकी चालोंको अपने सामने उपस्थित देखकर वह हँसता है। उसमें लोकैषणा, दारैषणा, वित्तैषणा आदिक कोई भी एषणा नहीं रहती। पूर्णपदमे विश्रान्त होनेके कारण वह जीता हुआ ही मृतक-तुल्य हो जाता है। उसकी दृष्टि केवल शुद्ध-बोधस्वरूप सर्वोत्कृष्ट उस परमात्म ज्ञानरूप फलपर ही लगी. रहती है, जिससे वह परमोच्च स्थानपर आरूढ़ हो जाता है। संतोपरूपी अमृतसे परिपुष्ट हुआ वह पुरुष अपनी पूर्वदशाका वारंवार स्मरण करके अनर्थस्वरूप अर्थोंके (धनोंके) नाश हो जानेपर भी परम् संतुष्ट ही रहता है।
रघुनन्दन ! इस प्रकार परमार्थरूप फल प्रदान करनेवाली उस महापदवीपर गमन करता हुआ वह ज्ञानी पुरुष वाणीके अगोचर भूमिका—जीवन्मुक्त स्थितिको प्राप्त हो जाता है। दैववश बिना प्रयत्न किये ही कहींसे अकस्मात् भोगोंके प्राप्त हो जानेपर भी वह उनसे विरक्त ही रहता है। वह मौनी पुरुष सांसारिक वृत्तियोंसे उपराम, परम आनन्दयुक्त और अंदरमें परिपूर्ण मनवाला होकर किसी अनिर्वचनीय स्थितिको प्राप्त हो जाता है। वह योगी पुरुष आकाशकी तरह समतायुक्त होकर सम्पूर्ण