संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ०] * ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका वर्णन * ५६१
दृश्य बुद्धिका परित्याग करके निरतिशयानन्द ब्रह्मभावरूप फलको ग्रहण करता है और उसीसे परितृप्त होता है। इस प्रकार जो लोकैषणासे विरक्त हो गया है, दारैषणाका त्याग कर चुका है और धनैषणासे पूर्णतया मुक्त हो गया है, वही उस परमपदमें विश्राम पाता है। जिस पुरुषकी दृश्य पदार्थोंमें आत्यन्तिकी विरक्ति देखी जाती है, वही वास्तवमें तत्त्वज्ञानी है; क्योंकि अज्ञानीमें दृश्यका त्याग करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है। परमात्मनिष्ठ होनेके कारण जो तृष्णासे रहित हो गया है तथा तीनो एषणाओका परित्याग कर चुका है, उस ज्ञानीका ध्यान इच्छा न रहते हुए भी अपने-आप होता रहता है।
रघुवीर ! विषयोंसे जो आत्यन्तिक विरक्ति है, वही समाधि कहलाती है। जिसने उसका सम्पादन कर लिया, वह निश्चय ही मनुष्यरूपमें परब्रह्म है, उसे हमारा प्रणाम है। जिसकी विषय-विरक्ति अत्यन्त सुदृढ़ हो गयी है, निस्संदेह उसके ध्यानको इन्द्रसहित देवता और असुर भङ्ग करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। बुद्धिमानो ! विश्व शब्दका अर्थ तो मूर्खोंके लिये ही है, वह पण्डितोंका विषय नहीं है; इसलिये जिस परमानन्द ब्रह्ममें तत्त्वज्ञानी और मूर्ख तथा विश्व और विश्वेशका अभेदरूपसे भान होता है, उसीमें तुमलोग भी विश्राम करो; क्योंकि इस जगत्में मनन आदि भूमिकाओंमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले विवेकियों अथवा परमपदकी भूमिकामें आरूढ़ हुए सिद्धों—सभीने यह निर्णय किया है कि पदार्थोंमें परमात्मासे अतिरिक्त सत्ता-असत्ता अथवा द्वैत-अद्वैत नहीं है। इस निर्वाणकी प्राप्तिके लिये तीन मुख्य उपाय हैं—एक शास्त्रार्थचिन्तन, दूसरा सत्सङ्गियोंकी संगति और तीसरा ध्यान। इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है। यद्यपि जगद्-भ्रान्ति निर्मूल है, तथापि जिस मौक्तिक ज्ञानसे उसका शीघ्र ही विनाश नहीं हो जाता, उस ज्ञानसे मनुष्यका अज्ञान उसी प्रकार नहीं दूर होता, जैसे चित्रलिखित अग्निसे सर्दी नहीं मिटती। जैसे अज्ञानीके अज्ञानके कारण जगद्-भ्रम बढ़ता जाता है, वैसे ही तत्त्वज्ञानीके ज्ञानके प्रभावसे वह भ्रम नष्ट हो जाता है। तत्त्वज्ञानीके चित्तमें जगत्की स्थिति संकल्पमात्र ही है; क्योंकि बोध हो जानेपर उसकी दृष्टिमें निस्संदेह न तो अहंकार रह जाता है और न जगत्की स्थिति ही रहती है। उसको तो दृग्-प्रकाशस्वरूप जगत्की कोई अपूर्व ही स्थिति भासती है; परंतु जो पूर्ण ज्ञानी नहीं है, उसका चित्त सूखे और गीले काष्ठकी भाँति बोध और अबोध—दोनोंसे संयुक्त रहता है। इन दोनों ज्ञान और अज्ञानमें जैसे-जैसे प्रवृत्त होता है, वह तद्रूप होकर ही रहता है; किंतु तत्त्वज्ञानी ब्रह्मके सिवा जगत्के भाव-अभावको सर्वथा ही बिल्कुल नहीं मानता। (सर्ग ४५)
ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका तथा मुक्तिके विभिन्न साधनोंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब परमार्थरूप फलका ज्ञान हो जाता है और मुक्तिकी स्थिति दृढ़ हो जाती है, तब बोध भी शान्त हो जाता है और अनन्त परमात्मस्वरूपका प्रकाश करनेवाली परमार्थ-दशा ही शेष रह जाती है। मनस्ता—मननस्वभावता न मालूम कहाँ विलीन हो जाती है और निर्वाय, विभागरहित, सर्वव्यापक, पूर्ण, विशुद्ध, सद्रूपिणी परमानन्दमयता ही रह जाती है। उस समय जीवात्माके परमार्थस्वरूपताको प्राप्त हो जानेपर मन, वासना, कर्म, हर्ष, अमर्ष आदि भी कहाँ चले जाते हैं—इसका कुछ भी पता नहीं लगता। जिसे सम्पूर्ण भोगोंसे विरक्ति हो गयी है, जिसकी इन्द्रिय-वृत्तियाँ पूर्णतया शान्त हो गयी हैं, सम्पूर्ण दृश्य जिसके लिये नीरस हो गया है, जो अपने आपमें ही रमण करनेवाला है, जिसकी मनोवृत्तियाँ शान्त हो चुकी गयी हैं तथा जो बिना प्रयासके ही विश्रान्ति प्राप्त कर चुका है, ऐसे योगीकी मनकी स्वतः ही निद्रा हो