भारतकोश
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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

निर्वाण-प्रकरण उ०] * ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका वर्णन * ५६१


दृश्य बुद्धिका परित्याग करके निरतिशयानन्द ब्रह्मभावरूप फलको ग्रहण करता है और उसीसे परितृप्त होता है। इस प्रकार जो लोकैषणासे विरक्त हो गया है, दारैषणाका त्याग कर चुका है और धनैषणासे पूर्णतया मुक्त हो गया है, वही उस परमपदमें विश्राम पाता है। जिस पुरुषकी दृश्य पदार्थोंमें आत्यन्तिकी विरक्ति देखी जाती है, वही वास्तवमें तत्त्वज्ञानी है; क्योंकि अज्ञानीमें दृश्यका त्याग करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है। परमात्मनिष्ठ होनेके कारण जो तृष्णासे रहित हो गया है तथा तीनो एषणाओका परित्याग कर चुका है, उस ज्ञानीका ध्यान इच्छा न रहते हुए भी अपने-आप होता रहता है।

रघुवीर ! विषयोंसे जो आत्यन्तिक विरक्ति है, वही समाधि कहलाती है। जिसने उसका सम्पादन कर लिया, वह निश्चय ही मनुष्यरूपमें परब्रह्म है, उसे हमारा प्रणाम है। जिसकी विषय-विरक्ति अत्यन्त सुदृढ़ हो गयी है, निस्संदेह उसके ध्यानको इन्द्रसहित देवता और असुर भङ्ग करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। बुद्धिमानो ! विश्व शब्दका अर्थ तो मूर्खोंके लिये ही है, वह पण्डितोंका विषय नहीं है; इसलिये जिस परमानन्द ब्रह्ममें तत्त्वज्ञानी और मूर्ख तथा विश्व और विश्वेशका अभेदरूपसे भान होता है, उसीमें तुमलोग भी विश्राम करो; क्योंकि इस जगत्में मनन आदि भूमिकाओंमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले विवेकियों अथवा परमपदकी भूमिकामें आरूढ़ हुए सिद्धों—सभीने यह निर्णय किया है कि पदार्थोंमें परमात्मासे अतिरिक्त सत्ता-असत्ता अथवा द्वैत-अद्वैत नहीं है। इस निर्वाणकी प्राप्तिके लिये तीन मुख्य उपाय हैं—एक शास्त्रार्थचिन्तन, दूसरा सत्सङ्गियोंकी संगति और तीसरा ध्यान। इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है। यद्यपि जगद्-भ्रान्ति निर्मूल है, तथापि जिस मौक्तिक ज्ञानसे उसका शीघ्र ही विनाश नहीं हो जाता, उस ज्ञानसे मनुष्यका अज्ञान उसी प्रकार नहीं दूर होता, जैसे चित्रलिखित अग्निसे सर्दी नहीं मिटती। जैसे अज्ञानीके अज्ञानके कारण जगद्-भ्रम बढ़ता जाता है, वैसे ही तत्त्वज्ञानीके ज्ञानके प्रभावसे वह भ्रम नष्ट हो जाता है। तत्त्वज्ञानीके चित्तमें जगत्‌की स्थिति संकल्पमात्र ही है; क्योंकि बोध हो जानेपर उसकी दृष्टिमें निस्संदेह न तो अहंकार रह जाता है और न जगत्‌की स्थिति ही रहती है। उसको तो दृग्-प्रकाशस्वरूप जगत्‌की कोई अपूर्व ही स्थिति भासती है; परंतु जो पूर्ण ज्ञानी नहीं है, उसका चित्त सूखे और गीले काष्ठकी भाँति बोध और अबोध—दोनोंसे संयुक्त रहता है। इन दोनों ज्ञान और अज्ञानमें जैसे-जैसे प्रवृत्त होता है, वह तद्रूप होकर ही रहता है; किंतु तत्त्वज्ञानी ब्रह्मके सिवा जगत्‌के भाव-अभावको सर्वथा ही बिल्कुल नहीं मानता। (सर्ग ४५)


ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका तथा मुक्तिके विभिन्न साधनोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब परमार्थरूप फलका ज्ञान हो जाता है और मुक्तिकी स्थिति दृढ़ हो जाती है, तब बोध भी शान्त हो जाता है और अनन्त परमात्मस्वरूपका प्रकाश करनेवाली परमार्थ-दशा ही शेष रह जाती है। मनस्ता—मननस्वभावता न मालूम कहाँ विलीन हो जाती है और निर्वाय, विभागरहित, सर्वव्यापक, पूर्ण, विशुद्ध, सद्‌रूपिणी परमानन्दमयता ही रह जाती है। उस समय जीवात्माके परमार्थस्वरूपताको प्राप्त हो जानेपर मन, वासना, कर्म, हर्ष, अमर्ष आदि भी कहाँ चले जाते हैं—इसका कुछ भी पता नहीं लगता। जिसे सम्पूर्ण भोगोंसे विरक्ति हो गयी है, जिसकी इन्द्रिय-वृत्तियाँ पूर्णतया शान्त हो गयी हैं, सम्पूर्ण दृश्य जिसके लिये नीरस हो गया है, जो अपने आपमें ही रमण करनेवाला है, जिसकी मनोवृत्तियाँ शान्त हो चुकी गयी हैं तथा जो बिना प्रयासके ही विश्रान्ति प्राप्त कर चुका है, ऐसे योगीकी मनकी स्वतः ही निद्रा हो

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जाती है; फिर इस विषयमें विचार ही कौन करे।

विषयोंसे जो दृढ़ वैराग्य और परम उपरति है, वही ध्यान कहलाता है और वही जब भलीभाँति परिपक्व हो जाता है, तब वज्रके समान सुदृढ़ अर्थात् वज्रध्यान हो जाता है। यह जो भोगोंसे वैराग्य है, यही अङ्कुरित होनेपर परम उपरति होकर, ध्यान कहा जाता है और दृढ़ होनेपर उसीकी समाधि संज्ञा होती है। जो दृश्यप्रपञ्चके स्वादसे मुक्त हो गया है और जिसे यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो चुकी है, उस मुनिकी तो अविराम निर्विकल्प समाधि लगी रहती है। जब भोग अच्छे नहीं लगते, तब यथार्थ ज्ञानका उदय होता है और जिसे विषय-भोग रुचिकर नहीं लगते, वह ज्ञानी कहा जाता है। जिस ज्ञानीको अपने स्वभावमें विश्राम प्राप्त हो चुका है, उसका स्वभाव भोगी कैसे हो सकता है; क्योंकि आत्मविरुद्ध स्वभाव ही भोग है, फिर उस स्वभावके क्षीण हो जानेपर भोगिता कहाँसे और कैसे प्राप्त हो सकती है। श्रीराम! साधकको चाहिये कि वह पहले वेदान्त श्रवण करे, फिर स्वाध्याय करे, तत्पश्चात् प्रणव आदिका जप करे। तदनन्तर ध्यान-समाधिमें लीन हो। समाधिसे विरत होनेपर वह थका हुआ साधक पुनः पूर्ववत् श्रवण, पाठ और जपका ही आश्रय ले।

राघवेन्द्र! जो संसारका भार ढोते-ढोते अत्यन्त थक गया है और संकटोंको झेलते-झेलते जिसका शरीर जर्जर हो गया है, अतएव विश्राम करना चाहता है, उसके उस विश्राम-क्रमको सुनो—जैसे पथिक यज्ञ-यूपोंसे दूर हट जाता है, वैसे ही ऐसा पुरुष अज्ञानियोंको दूरसे ही त्याग देता है और तत्त्वज्ञानियोंका अनुगामी होकर स्नान, दान, तप और यज्ञ आदिका अनुष्ठान करता है तथा सदा परोपकारमें तत्पर रहता है, जिससे 'परप्रज्ञानुग' कहा जाता है। वह सभी जनोंका प्रिय तथा शास्त्रानुकूल पवित्र कर्मोंका रसिक होता है और सभीके साथ सौम्य व्यवहार करता है। ऐसे पुरुषकी नवीन संगति, जो नवनीतके समान स्वच्छ, स्नेहमयी, कोमल, मनोहर और सुखदायु होती है, सम्पर्कमें आनेवाले जनको सुख प्रदान करती है। विवेकी पुरुषके चरित्र, जो चन्द्रमाके किरणसमूहकी तरह अत्यन्त शीतल और पवित्र होते हैं, सुननेवाले मनुष्यको पूर्ण रूपसे शीतल कर देते हैं।

सत्पुरुषोंके सङ्गसे जैसी निर्भय शान्ति प्राप्त होती है, वैसी शान्ति राशि-राशि पुष्पोंसे भरे हुए उद्यानखण्डोंमें भी नहीं मिलती। ज्ञानी पुरुषोंकी संगति मन्दाकिनीके जलकी तरह लोगोंके पापोंका प्रक्षालन करके विशुद्धता प्रदान करती है। संसार-सागरसे पार जानेकी इच्छावाले विरक्त ज्ञानी पुरुषोंके समागमसे मनुष्यका हृदय वैसे ही शीतल हो जाता है, जैसे हिम और पुष्पशरोंसे निर्मित घरोंमें निवास करनेपर होता है। क्रमशः किये गये न्यायोचित निष्काम कर्मसे बुद्धि विशुद्ध हो जाती है और बुद्धिके निर्मल होनेपर जैसे स्वच्छ दर्पण प्रतिबिम्बको तुरन्त धारण कर लेता है, वैसे ही मनुष्य शास्त्रोंके अभिप्रायको अपने अन्तःकरणमें यथार्थरूपसे ग्रहण कर लेता है। फिर विवेकी पुरुषके हृदयमें शास्त्रार्थ-रससे सुशोभित उत्तम प्रज्ञा उन्नतिको प्राप्त होती है। जिसका आत्मा साधु-समागमसे शुद्ध तथा शास्त्रार्थ-चिन्तनसे परिमार्जित हो गया है, वह प्राज्ञ पुरुष परम शोभा पाता है, प्राज्ञ पुरुष शास्त्र और सत्पुरुषोंके सङ्गका ऐसा अनुसरण करता है, जिससे इनमें अत्यन्त आसक्ति होकर इन्हींका अनुभव होता रहता है। क्रमशः सज्जनताको प्राप्त करके वह शास्त्रार्थकी भावनासे पूर्णतया भावित हो जाता है। फिर भोगोंका तिरस्कार करके वह पिंजरेसे छूटे हुए सिंहकी तरह शोभा पाने लगता है। भोगोंके पीछे दौड़ना बहुत बड़ा दुर्भाग्य है, इसलिये दिन-पर-दिन उसका त्याग करनेवाले विवेकी पुरुषके द्वारा उसका कुल उसी प्रकार चमकने लगता है, जैसे चन्द्रमासे तारोंका समूह।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका वर्णन * [ ५६३


राघव ! जिन्होंने तीनों लोकोंको तृण-तुल्य समझ लिया है, उनकी प्रशंसा महात्मालोग वैसे ही करते हैं, जैसे स्वर्गलोकमें स्वर्गवासी कल्पवृक्षका गुण गाते हैं। ऐसा पुरुष भूतलपर उदित हुए चन्द्रमाके समान होता है, अतः जिनके नेत्र विस्मयसे उत्फुल्ल हो गये हैं ऐसे साधु-महात्मा सौहार्दवश उसका दर्शन करनेके लिये आते हैं। भोगोंके प्रति उसकी आदरबुद्धि सदाके लिये नष्ट हो जाती है। इसलिये न्याययुक्त भोगोंके प्राप्त होनेपर भी वह उनका आदर नहीं करता। तदनन्तर जैसे स्वास्थ्य चाहनेवाला व्यक्ति वैद्यका आश्रय ग्रहण करता है, उसी प्रकार सर्वोत्कृष्ट कल्याणकी प्राप्तिके लिये वह स्वयं ही सत्सङ्ग करता है। उस सत्सङ्गके परिणामस्वरूप उसकी बुद्धि परम उदार हो जाती है, जिससे वह अत्यन्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें प्रविष्ट हुए गजराजकी तरह शास्त्रार्थ-चिन्तनमें निमग्न हो जाता है। जैसे सूर्यदेव अन्धकारमग्न प्राणीको अपने निकट आनेपर अपने प्रकाशसे पूर्ण कर देते हैं, वैसे ही सज्जन पुरुष अपने सम्पर्कमें आये हुए मनुष्यको विपत्तियोंसे उबारकर दैवी सम्पत्तियोंसे युक्त कर देता है।

जो विवेकी है, उसकी बुद्धि पहलेसे ही दूसरेका धन ग्रहण करनेसे विरत रहती है; क्योकि उसे प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए अपने ही धनसे संतोष रहता है तथा पर-धनके ग्रहणसे विरत एवं संतोषामृतसे परिपूर्ण हुआ वह क्रमशः अपने स्वार्थोंकी भी उपेक्षा कर देना चाहता है। वह याचकको तृण और शाक आदि जो कुछ अपने पास मौजूद रहता है, वह सब दे देता है। यहाँतक कि उसी अभ्यासयोगसे वह अपना शरीर भी दे डालता है। विवेकी पुरुषको चाहिये कि पहले वह पर-धनके ग्रहणसे यत्नपूर्वक विरत हो जाय। जब इसका पूर्णतया अभ्यास हो जाय, तब उसे विवेकबलसे स्वार्थोंसे आसक्ति हटा लेनी चाहिये।

श्रीराम ! जैसे सरोवर वर्षाके जलसे ही भरता है, उसी तरह मनुष्यका अन्तःकरण संतोषसे ही परिपूर्ण होता है। जैसे वसन्त ऋतुके आगमनसे सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए वृक्षोंसे वन लहलहा उठता है, वैसे ही सन्तुष्ट पुरुष संतोषसे ही गम्भीर, शीतल, मनोहर, प्रसन्न और रसशालिनी ओजस्विताको पाकर शोभित होने लगता है। किंतु जो असन्तुष्ट है और सदा धनके लिये लालायित रहता है, उसकी प्रकृति दीन हो जाती है और वह पादपीठ (खड़ाऊँ या पनही) की रगड़से पिसे हुए कीड़ेकी भाँति चेष्टा करता रहता है तथा एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता रहता है। जो धनके लोभी होते हैं, उनकी आकृति विकृत हो जाती है। उन्हें क्षुब्ध समुद्रमें गिरे हुए तथा लहरोंके धपेड़ोंसे व्याकुल हुए जीवोंकी भाँति कभी स्वस्थ स्थिति प्राप्त नहीं होती। अर्थसम्पत्ति और नारी—ये दोनों ही उत्ताल तरङ्गोंकी तरह क्षणविध्वंसी हैं और सर्पके फनकी छत्रछायाके समान हैं, अतः कौन विद्वान् उनमें मन लगायेगा। धनके उपार्जन और रक्षणमें जो यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं, उन्हें जानता हुआ भी जो मूढ़ धनकी अभिलाषा करता है, वह मनुष्य होते हुए भी पशु-तुल्य है; अतः उसका स्पर्शतक नहीं करना चाहिये।* जो संतोषरूपी हँसुएसे मनके बाह्य इन्द्रिय-व्यापारोंको और आन्तरिक संकल्प आदिको दृढ़तापूर्वक काट डालता है, उसका क्षेम—ज्ञानवैराग्य उत्पत्तिके स्थान हृदय—प्रकाशित हो उठता है। पुरुषको चाहिये कि पहले संसारसे विरक्ति प्राप्त करे। विरक्त हो जानेपर सत्पुरुषोंका सङ्ग और शास्त्रोंका अभ्यास करे। शास्त्रोंके अर्थोंकी दृढ़ भावना उसके अन्तःकरणमें हो। तब वहीं उसे मनोज्ञ सुख होगा और इस प्रकार दृढ़तासे परमार्थतत्त्वकी प्राप्ति होती है। (सर्ग ४६-४७)


* सम्पदः प्रमदाश्चैव तरङ्गोत्तुङ्गभङ्गुराः। कस्तास्वभिरमेत्प्राज्ञः फणिच्छत्रोपमासु च ॥
अर्थोपार्जनरक्षाणां जानन्नपि कदर्यताम्। यः स्पृहयति मूढात्मा नरो नन्वेष न संस्पृशेत् ॥
(नि० प्र० उ० ४७ । ४, ५-६)

५६४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

वैराग्यके दृढ़ हो जानेपर पुरुषकी स्थिति, आत्माद्वारा विवेक नामक दूतका भेजा जाना, विवेक-ज्ञानसम्पन्न पुरुषकी महिमा तथा जीवके सात रूपोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! जब संसारसे विरक्ति सुदृढ़ हो जाती है, सत्पुरुषोंका सङ्ग प्राप्त हो जाता है, बुद्धिद्वारा शास्त्रों—'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थका ज्ञान हो जाता है, भोगोंकी तृष्णा नष्ट हो जाती है, विषय नीरस लगने लगते हैं, श्रेष्ठताका उदय हो जाता है, चिन्मय आत्मा प्रत्यक्ष हो जाता है तथा हृदयमें परमात्मप्राप्तिकी पूर्ण श्रद्धा हो जाती है, उस समय विवेकी पुरुष उसी प्रकार धनकी कामना नहीं करता, जैसे लोग अन्धकारको नहीं चाहते और जो सम्पत्ति उसके पास पहलेसे मौजूद रहती है, उसे वह जूठी पत्तलकी तरह त्याग देता है। यद्यपि इन्द्रियोंके भोगरूपी विषय बारंबार उसकी इन्द्रियोंके सम्पर्कमें आते हैं तथापि उसे उनका अनुभव नहीं होता; क्योंकि उसका मन सर्वथा शान्त हो गया रहता है। अतः विवेकी पुरुष एकान्त स्थानोंमें, दिशाओंके छोरोंमें, सरोवरोंपर, काननोंमें, उद्यानोंमें, पुण्य-प्रदेशोंमें अथवा अपने ही घरोंमें, रुचिर वाटिकाओंमें, आयोजित भोजनादि व्यापारोंमें तथा शास्त्रोंके तर्कपूर्ण विचारोंमें आसक्ति न होनेके कारण वहाँ चिरकालतक स्थित नहीं रहता। यदि कहीं वह उन स्थानोंमें कुछ देरतक ठहर गया तो वहाँ भी वह तत्त्वज्ञका ही अन्वेषण करता है; क्योंकि वह विवेकी, पूर्ण शान्त, इन्द्रिय-निग्रही, स्वात्माराम, मौनी और एकमात्र विज्ञानस्वरूप ब्रह्मका ही कथन करनेवाला होता है। इस प्रकार अभ्यासके बलसे वह शान्त विवेकी पुरुष स्वयं ही परम पदस्वरूप परमात्मामें विश्राम प्राप्त कर लेता है।

राघव ! एकमात्र बोधके साथ अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके कारण जहाँ वस्तुतः न बोधता है, न पदार्थ है और न पदार्थोंका अभाव है, उसे परमपद कहते हैं।

जिन्हें परमात्मतत्त्वसाक्षात्काररूप · परम पदमें विश्राम प्राप्त हो चुका है तथा जो मनोलयकी अवस्थाको पहुँच चुके हैं, ऐसे सज्जनोंको विषय उसी प्रकार नहीं रुचते, जैसे हृदयहीन पत्थरोंको दूधके स्वादका अनुभव नहीं होता। जैसे दीपक अन्धकारका नाश कर देता है, वैसे ही निर्मल परमात्मपदमें स्थित ज्ञानी पुरुष अपने हृदयस्थित अज्ञानरूपी अन्धकारको तथा बाहरी राग, द्वेष, भय आदिको दूर हटा देता है। जिसमें तमोगुणका सर्वथा अभाव है जिसके सम्पूर्ण अंश रजोगुणसे रहित हो गये हैं तथा जो सत्त्वगुणको भी लाँघ चुका है, वह मनुष्यरूपमें सूर्य है; अतः उसे प्रणाम करना चाहिये। ये जितने चराचर जीव तथा भूत-प्राणी हैं, वे सब-के-सब स्वेच्छा-नुसार उपहार-सामग्री प्रदान करके निरन्तर उसी परमात्मा-का पूजन करते हैं। इस प्रकार जब अनेक जन्मोंतक यथाभिमत इच्छासे यह परमात्मा पूजित होता है, तब अपने पुजारीपर प्रसन्न हो जाता है। फिर तो प्रसन्न हुआ स्वयंदेवाधिदेव महेश्वररूप परमात्मा पूजककी शुभ कामना-से उसे ज्ञान प्रदान करनेके लिये अपने पावन दूतको तुरंत प्रेरित करता है।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! परमेश्वररूप परमात्मा किस दूतको प्रेरित करता है और वह दूत किस प्रकार ज्ञानोपदेश करता है—यह मुझे बतलाइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रामभद्र ! परमात्मा जिस दूतको प्रेरित करता है, उसका नाम विवेक है, वह सदा आनन्द देनेवाला है। वह अधिकारी पुरुषके हृदयरूपी गुफामें वैसे ही स्थित हो जाता है, जैसे आकाशमें चन्द्रमा। वही विवेक वासनायुक्त अज्ञानी जीवको ज्ञान प्रदान करता है और धीरे-धीरे इस संसारसागरसे उद्धार कर देता है। यह ज्ञानरूप अन्तरात्मा ही सबसे

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * वैराग्यके दृढ़ हो जानेपर पुरुषकी स्थिति * ५६५

बड़ा परमेश्वर है। वेद-सम्मत जो प्रणव है, वह इसी- का बोधक शुभ नाम है। नर, नाग, सुर, असुर—सभी जप, होम, तप, दान, पाठ, यज्ञ और कर्मकाण्डद्वारा नित्य इसीको प्रसन्न करते हैं। वही परमात्मा सर्वत्र विचरण करता है, जागता है और देखता है। इसलिये इसके आँख, कान, हाथ, पैर सर्वत्र व्याप्त* हैं। यही चिन्मय परमात्मा विवेक-दूतको उद्बुद्ध करके उसके द्वारा चित्तरूपी पिशाचको मारकर जीवको अपनी दिव्य अनिर्वचनीय स्थितितक पहुँचा देता है। इसलिये सम्पूर्ण संकल्प-विकल्पोंको, विचारोंको तथा अर्थसंग्रहोंको छोड़कर अपने पुरुषार्थसे स्वयं ही उस चिन्मय परमात्माको प्रसन्न कर लेना चाहिये; क्योंकि इस संसाररूपी रात्रिके घने अन्धकारमें, जिसमें मनरूपी पिशाच घूम रहा है और अज्ञानरूपी काली घटा छायी हुई है, परमात्मा ही पूर्णिमाके चन्द्रमाकी तरह सर्वत्र प्रकाश करता है।

यह संसार एक भीषण समुद्रके समान है। इसका भीतरी भाग मरणरूपी अगाध भँवरोंके कल्लोलोंसे आकुल हो रहा है। यह तृणारूपी तरंगोंसे चञ्चल हो रहा है। इसे अपना मनरूपी प्रचण्ड वायु उद्वेलित कर रही है। यह चराचर भूतरूप जङ्गमोंसे व्याप्त है और इन्द्रिय- रूपी मकरोंसे भरे रहनेके कारण अत्यन्त गहन है। इस समुद्रको पार करनेके लिये विवेक ही महान् जहाज है। इस प्रकार शास्त्रविहित अभीष्ट पूजनसे प्रसन्न हुआ परमात्मा पहले विवेकरूपी पावन दूत भेजकर सत्सङ्ग, शास्त्राभ्यास और परमार्थ वस्तुके उत्तम ज्ञानद्वारा जीवको अनिन्दनीय, निर्मल एवं सर्वोच्च पदतक पहुँचा देता है। हे भद्र ! जिनका विवेक परिपुष्ट हो गया है और

जिन्होंने वासनारूपी मद्यका परित्याग कर दिया है, उन महात्माओंके अंदर कोई अपूर्व ही महत्ता उत्पन्न होती है। वस्तुतः भ्रान्तिके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे वासना और भ्रान्ति अपने-आप निवृत्त हो जाती है। भला स्वप्नका स्वरूपसे ज्ञान हो जानेपर उसमें सत्यत्वकी भावना किसे हो सकती है। वासनाका अभाव ही संसारका उपशमन है। कामना ही महाकाय पिशाचिनी है, इसलिये बुद्धिमान् लोग इसका विनाश करनेमें तत्पर रहते हैं।

पूर्वाभ्यासवश पुरुषोंकी अज्ञानप्रयुक्त उग्रता जैसे-जैसे उत्पन्न हुई रहती है, वैसे-वैसे ही वह ज्ञानके भलीभाँति अभ्यस्त होनेसे समयानुसार धीरे-धीरे विनष्ट भी हो जाती है। ज्ञानी पुरुष ज्ञानयज्ञमें दीक्षित होकर यमनियमरूपी यूपयज्ञस्तम्भको सुदृढ़रूपसे गाड़ देता है और संसारकी असत्ताके अनुभवद्वारा विश्व-विजय करके सर्वस्वत्यागरूप दक्षिणा देकर सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लेता है। उस समय चाहे अंगारोंकी वृष्टि हो, प्रलयकालकी वायु चलने लगे अथवा भूतरूप उपद्रव आकाशमें मच जाय, परंतु ज्ञानी पुरुष अपने स्वरूपमें ही समभावसे स्थित रहता है। पूर्ण वैराग्यसे जिसका मन सर्वथा शान्त हो गया है और जिसने अपने मनको पूर्णतया निरुद्ध कर लिया है, ऐसा पुरुष सदा वज्र-तुल्य सुदृढ़ समाधिमें ही स्थित रहता है। इसके अतिरिक्त उसकी दूसरी स्थिति नहीं होती; क्योंकि बाह्य पदार्थोंसे अत्यन्त वैराग्य हो जानेसे मन जैसा पूर्णरूपसे शान्त होता है, वैसा शान्त वह मन्त्रजप, शास्त्राभ्यास, उपदेश, तप और इन्द्रियनिग्रह आदिसे नहीं होता।

वासनासे रहित हो जानेपर तो सभी जीव मुक्त हैं, परंतु वासनाकी विषमताके कारण ये सूखे पत्तोंकी तरह उड़-उड़कर विभिन्न योनिरूप गड्ढोंमें गिरते हैं।

श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! जैसे दीपकपर रुई


* सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
( गीता १३ । १३ )
'विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्'
इत्यादि श्रुतियाँ भी ऐसा ही प्रतिपादन करती हैं।

५६६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सातों समुद्रोंमें क्षीर आदिके भेदसे सात प्रकारके जल हैं उसी प्रकार सात प्रकारके रूपोंको धारण करनेवाले जीवोंके भेदको आप वर्णन करनेकी कृपा करें ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! किसी प्राचीन कल्पके किसी जगत्में कहींपर कुछ जीव सुषुप्ति-अवस्था-में स्थित थे । वे अपने प्राणयुक्त शरीरोंके कारण जीवित ही थे । उनमें जो लोग स्वप्न देख रहे थे, उनके स्वप्न-सदृश ही इस जगत्‌को समझना चाहिये और उन्हीं जीवोंको 'स्वप्नजागर' कहा जाता है । उन सोये हुए जीवोंका जो अपने-आप प्रकट हुआ स्वप्न-प्रपञ्च है, वही कभी-कभी जब हमलोगोंका विषय बन जाता है, तब हमलोग उनके 'स्वप्ननर' कहलाते हैं । चिरकाल-के पश्चात् जब उनका वह स्वप्न जाग्रत्-रूप हो जाता है, तब उनके स्वप्नके वे जीव 'स्वप्न-जाग्रत्' कहे जाते हैं । वास्तवमें वे उनके स्वप्नमें ही स्थित हैं । इस स्वप्न-प्रपञ्चके समाप्त होनेपर यदि ज्ञान हो गया, तब तो वे तत्त्वज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाते हैं और यदि ज्ञान न हुआ तो गाढ निद्राके वशीभूत होकर वे सङ्कल्पानुसार उसी प्रकारके दूसरे शरीर धारण कर लेते हैं और उसी तरहका दूसरा कल्पित जगत्कल्प देखते हैं; क्योंकि कल्पनाभासरूपी आकाशकी कहीं निरवकाशता नहीं रहती । चिरकालके अभ्याससे जिन जीवोंका जागराभिमान घनीभूत संकल्परूपमें है तथा जिनके मनकी चेष्टाएँ भी संकल्पमें ही हैं, वे जीव 'संकल्पजागर' कहलाते हैं । वे संकल्परूपका उपशमन हो जानेपर पुनः पूर्ववत् अथवा उससे भी विलक्षण व्यवहार करने लगते हैं, अतः उनके शरीरमें हमलोग 'संकल्प-पुरुष' रूपसे स्थित माने जाते हैं । जो विशाल आत्मावाले प्रधान पुरुष ब्रह्माके रूपसे अवतीर्ण हुए हैं और पहलेके उत्पत्तिकालरूप स्वप्नसे रहित हैं, वे 'केवलजागर' कहे गये हैं । पुनः वे ही जीव जब प्रौढ होकर जन्मान्तरोंमें जन्म धारण करते जाते हैं और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिमें विचरते रहते हैं, तब 'चिरजागर' कहलाते हैं। वे चिरजागर जीव ही जब पापरूप दुष्कर्मोंके आवेशसे जड-स्थावररूपमें प्रकट होते हैं और जाग्रत्-अवस्थामें भी घनीभूत अज्ञानसे परिपूर्ण हो जाते हैं, तब 'घनजागर' कहे जाते हैं । जो शास्त्रार्थचिन्तन और सत्सङ्गके द्वारा उपदेश ग्रहण करके ज्ञानसम्पन्न हो गये हैं और जाग्रत्‌को भी स्वप्न-सरीखे देखते हैं, वे 'जाग्रत्स्वप्न' कहलाते हैं । जिन्हें यथार्थज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है और जो परमपदमें विश्राम कर चुके हैं, तुरीय भूमिकाको प्राप्त हुए वे जीव 'क्षीणजाग्रत्' कहे जाते हैं।

( सर्ग ४८–५० )

दृश्य जगत्‌की असत्ता, सबकी एकमात्र ब्रह्मरूपता तथा तत्त्वज्ञानसे होनेवाले लाभका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टिका वास्तवमें कोई कारण नहीं है, इसीलिये न यह उत्पन्न होती है और न नष्ट । जैसा कारण होता है, वैसा ही कार्य उत्पन्न होता है । परंतु जब सृष्टिका कारण ही कल्पित एवं मिथ्या है, तब उससे होनेवाला सृष्टिरूप कार्य भी कल्पित और मिथ्या ही सिद्ध होता है । जैसे प्रशान्त महासागरके भीतर लहर और भँवर आदि उससे अभिन्न रूपमें ही स्थित हैं, उसी प्रकार क्षोभरहित परब्रह्ममें जगत् और चित्त आदि स्थित हैं, जो इस ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं। जैसे अपने भीतर अनेक बर्तनोंको रखनेवाला मिट्टीका लोंदा एक रूपसे ही स्थित रहता है, उसी प्रकार अपने उदरमें अनेक ब्रह्माण्डभाण्डको धारण करनेवाला सर्वात्मा निर्मल ब्रह्म भी एक ही है । जैसे सुवर्ण अपने भीतर कडा, कुण्डल आदि अनेक नाम-रूपवाले आभूषणोंको धारण करता है और उन सबके रूपमें स्वयं ही स्थित होता है, उसी प्रकार सुवर्णस्थानीय ब्रह्म ही दृश्यजगत्‌के रूपमें स्थित है । ज्ञानी पुरुष स्वप्नकालमें स्वप्नको ही जाग्रतरूप जानते हैं; क्योंकि

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सृष्टिकी असत्यता और एकमात्र अखण्ड ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन * १०६३


उन्होंने वासनाओंसे व्यग्र मनको ग्रहण नहीं किया है और वे जाग्रत्-कालमें जाग्रत्‌को भी स्वप्न समझते हैं; क्योंकि उन्हें सत्यस्वरूप आत्माका बोध हो चुका है।

जैसे पता लगानेपर मृगतृष्णाका जल मिथ्या सिद्ध होता है, उसी प्रकार बारंबार इन्द्रियोंके सम्पर्कमें आनेपर भी यह दृश्य-प्रपञ्च तत्त्वज्ञान होते ही मिथ्या सिद्ध हो जाता है। जैसे प्रज्वलित अग्निमें घी और इन्धन सब विलीन होकर एकरूप हो जाते हैं, वैसे ही विज्ञानकालमें जगत्, मन और द्रष्टा आदि सब एकमात्र ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाते हैं। जाग्रत्‌को स्वप्नवत् मिथ्या समझ लेनेपर वह अपनी दृढ़ताको छोड़ देता है और अत्यन्त कोमल बन जाता है। तात्पर्य यह कि उसके मिथ्यात्वका दृढ़ निश्चय हो जाता है। देश, कालरूप निमित्तके बिना ही जाग्रत् और स्वप्नका निर्माण करके यथास्थित बोधस्वरूप साक्षी चेतन आत्मा ही जगत्‌के रूपमें घनीभावको प्राप्त-सा हुआ है। इस प्रकार विचारके द्वारा जब जाग्रत् भी क्षणभङ्गुर या मिथ्या सिद्ध हो जाता है, तब स्वतः क्षीण होने लगता है और उसके प्रति होनेवाली वासना उसी प्रकार घटने लगती है, जैसे वर्षाका जल शरत्कालमें क्षीण होने लगता है। विवेकी 'पुरुषकी दृष्टिमें अत्यन्त तुच्छताको प्राप्त हुई दृश्य-लक्ष्मी विद्यमान होनेपर भी रुचिकर नहीं लगती। स्वप्नकी भाँति उसे मिथ्या समझ लेनेके कारण वह उसमें रस नहीं लेता है। महामते ! जैसे भ्रम ही से तृष्णार्त पुरुषोंको सामने दिखायी देनेपर भी मृगतृष्णाका मिथ्या जल उनकी प्यास नहीं बुझा सकता, वैसे ही ये असत्य विषय किसी भी ज्ञानी पुरुषके प्रति रुचिकर प्रतीत हो सकते हैं ?

श्रीराम ! जिसे अन्त्य मरण प्राप्त हुआ, उसमें उपादेयबुद्धि कैसे रह सकती है ? भला कौन ऐसा पुरुष है, जो स्वप्नको स्वप्न समझ लेनेपर उसमें प्राप्त हुए सुवर्णको लेनेके लिये दौड़ता हो। जब दृश्य प्रपञ्च स्वप्नके समान मिथ्या समझ लिया गया, तब उसके प्रति होनेवाली आसक्ति दूर हो जाती है तथा द्रष्टा और दृश्यके सम्बन्धमें जो चेतन और जड़ ग्रन्थिरूप क्षोभ प्राप्त हुआ है, उसका उच्छेद हो जाता है। मरुप्रान्तमें जलके समान दीखनेवाला जो भ्रान्तिरूप सम्पूर्ण जगत् है, वह अज्ञानसे ही है। तत्त्वज्ञान होनेपर सब ओर फैले हुए दीपकके प्रकाशके समान यह प्रकाशित हो उठता है और इसकी अन्धकाररूपता दूर हो जाती है। जैसे बादलोंके हट जानेपर केवल स्वच्छ आकाश दिखायी देता है, उसी प्रकार जगत्‌की भ्रान्ति दूर हो जानेपर एक शुद्ध बुद्ध परब्रह्म परमात्माका ही अनुभव हो जाता है।

(सर्ग ५१)


सृष्टिकी असत्यता और एकमात्र अखण्ड ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह जगत् मूढ़ पुरुषकी दृष्टिमें है; इसीलिये उसके मनमें भी है। परंतु जो विवेकी पुरुष है, वह शास्त्रद्वारा निश्चित तथा पूर्वापरसे समन्वित अर्थको ही देखता है और उसीको ग्रहण करता है। शास्त्रनिषिद्ध वस्तु दृष्टिपथमे आ जाय तो भी वह न तो उसकी ओर देखता है और न उसे ग्रहण ही करता है।

सभी प्रकारोंसे युक्त यह जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम जगत् दिखायी देता है, वह सब कल्पके अन्तमें नष्ट हो जाता है। सृष्टिके पहले जो संसारकी सृष्टि नष्ट हो चुकी थी, वही फिर आविर्भूत हुई है—इसका उल्लेख करना असम्भव है; क्योंकि नष्ट हुई वस्तुकी फिर उत्पत्ति कैसे सम्भव हो सकती है। यदि नष्टकी उत्पत्ति होती, तब यह संदेह किया जा सकता कि यह वही है या अन्य ? परंतु हम तो अनुभवपर ध्यान देनेवाले हैं; अतः नष्टकी उत्पत्ति कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?

५६८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त यो.वा.सि०

वस्तु उपलब्ध होकर भी अभाव दशाको प्राप्त हो जाती है, वह नष्ट ही है; क्योंकि उपलब्धका अदर्शन ही नाश है। यदि नाशकी कोई और परिभाषा हो तो वह कैसी है, यह तुम्हीं बताओ। यदि कहें कि नष्ट हुई वस्तु ही फिर उत्पन्न हुई है तो ऐसी प्रतीति किसको होती है ? अतः जो वस्तु उत्पन्न है, उसका नाश अवश्य होता है। और पुनः-पुनः दूसरेकी ही उत्पत्ति या प्रवृत्ति होती है; यही कहना उचित है।

वृक्षके बीच-बीचमे जो स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पुष्प तथा फलादिरूप अवयव हैं, उनमें समस्त वृक्ष-शरीरको व्याप्त करके स्थित एक बीज-सत्ता ही है। जब सर्वत्र एक ही सत्ता है, तब उसमें कार्यकारणभावकी कल्पना कैसे की जा सकती है ? विचार तथा अपने अनुभवरूप प्रमाणसे यह सब शान्त, अनादि, अनन्त और आकाशके समान निर्मल केवल बोधस्वरूप परमात्मा ही है, क्योंकि सब कुछ परमात्माका ही स्वरूप है। वह परमपदरूप परमात्मा वाणीका अविषय, अव्यक्त, इन्द्रियातीत, नाम-रूपसे रहित, सर्व-भूतस्वरूप, शून्यमय है तथा सत् एव असत् भी वही है। वस्तुतः वह न वायु है, न आकाश है, न मन है, न बुद्धि आदि है और न शून्यरूप ही है। वह कुछ न होकर भी सर्वरूप है। कोई और ही (विलक्षण एव अनिर्वचनीय) परम व्योम (चिन्मय आकाशरूप) है। उस परमपदमें स्थित एवं समस्त कल्पनाओंसे मुक्त तत्त्वज्ञानी ही उस परमात्मवस्तुका अनुभव करता है, दूसरे लोग तो केवल अभ्यासमें लाये गये शास्त्रोंके अनुसार ही उसका वर्णन करते हैं। वास्तवमें वह परमात्मा न काल है, न मन है, न जीव है, न सत् है, न असत् है, न देश है, न दिशा है, न इनका मध्य है, न अन्त है, न बोध है और न अबोध ही है।

योगी लोग उस परमात्मपदको सर्वात्मक और समस्त पदार्थोंसे रहित देखते हैं। वह आदि पद ज्ञानयोगी महात्माओंकी दृष्टिमें सर्वरूप, सर्वात्मक, सर्वार्थरहित और सर्वार्थपरिपूर्ण है। जिसका अन्तःकरण स्वच्छ है, जो तत्त्वज्ञ एवं शान्त है और परम प्रकाशस्वरूप परमात्माको प्राप्त है, वही उसके यथार्थ स्वभावको देख या समझ पाता है। जैसे सुवर्ण-पिण्डके भीतर आभूषण तथा मुद्रा आदिका समूह कल्पित है, उसी प्रकार 'यह', 'तुम' और 'मैं' इत्यादिके रूपमें प्रतीत होनेवाला भूत, वर्तमान और भविष्यत्कालके जगत्का भ्रम उस परमात्मामें कल्पनासे ही स्थित है, वास्तवमें नहीं। परब्रह्मरूपी काष्ठ-स्तम्भमें यह त्रिलोकीरूपिणी पुतली यद्यपि खुदी हुई नहीं है तो भी प्रतीत हो रही है, साक्षीरूपी शिल्पीकी दृष्टिमें समायी हुई है। खम्भेमें तो खुदी हुई पुतलियाँ ही दृष्टिगोचर होती हैं। परंतु उस क्षोभरहित परब्रह्म परमात्मारूपी महासागरमें बिना हुए ही ये सृष्टिकी तरंगें दृष्टिगोचर हो रही हैं, नित्य निरतिशयानन्दमय जलसे भरे हुए चैतन्य-रूपी सरोवरमें चिन्मय मेघोंकी अमृतमयी वर्षाके समान ये दृष्टिगत सृष्टियाँ भासित हो रही हैं। वह परमात्मा विभागशून्य—अखण्ड एकरस है तो भी उसमें ये सृष्टि-दृष्टियाँ विभागपूर्वक स्थित प्रतीत होती हैं। ब्रह्म क्षोभ-रहित है तो भी उसमें ये क्षुभित-सी देखी जाती है तथा वह परमात्मा सच्चिदानन्दघन है। उसमें इन दृष्टिगत सृष्टियोंका कहीं पता नहीं है तो भी ये उसके भीतर प्रतीत होती हैं।

(सर्ग ५२)


परमात्मामे सृष्टिभ्रमकी असम्भवता, पूर्ण ब्रह्मके स्वरूपका निरूपण तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उस शुद्ध बुद्ध परमात्मामे सृष्टिके कारणभूत मल, आकार, बीज, माया, मोह और भ्रम आदि किसीका भी होना वास्तवमें सम्भव नहीं है। वह केवल (अद्वितीय), शान्त, अत्यन्त निर्मल

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमात्मामें सृष्टिभ्रमकी असम्भवता * ५६९


और आदि-अन्तसे रहित है। वह इतना सूक्ष्म है कि उसके भीतर आकाश भी प्रस्तरके समान स्थूल कहा जा सकता है। जिसकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है, उस दृश्य-प्रपञ्चकी सत्ता यहाँ कदापि सम्भव नहीं है। तथा जो सदा स्वानुभवैकगम्य नित्य परमात्मवस्तु है, उसकी सत्ताका निराकरण करनेकी शक्ति किसमें है ? संसार ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण चैतन्यमय ही है। इसमें जो जड आकारकी प्रतीति होती है, वह भ्रमसे ही है। इसलिये सब कुछ एक, अजन्मा, शान्त, द्वैताद्वैतसे रहित तथा निरामय ब्रह्म ही है। पूर्ण परब्रह्म परमात्मासे पूर्णका ही विस्तार हो रहा है। पूर्णमें पूर्ण ही विराज रहा है। पूर्णसे पूर्णका ही उदय हुआ है तथा पूर्णमें पूर्ण ही प्रतिष्ठित है। वह पूर्ण ब्रह्म शान्त, सम, उत्पत्ति-विनाशसे रहित, निराकार, अजन्मा, आकाशकी भाँति व्यापक, विशुद्ध और अद्वितीय है। वह सर्वरूप है और सत्-असत् स्वरूप तथा एक होकर ही सदा स्थित रहता है। सबका आदि वही है। मोक्ष उसका अपना ही स्वरूप है तथा वह उत्कृष्ट ज्ञानरूप है।

'तू', 'मैं' और 'यह जगत्'—इत्यादि जो शब्द हैं, इनका अर्थ ब्रह्म ही है और वह ब्रह्ममें ही विद्यमान है। वह ब्रह्म शान्त, सबमें समानरूपसे ही प्रकाशित होनेवाला तथा सत् है। वह पृथक् स्थित न होकर ही अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित है। समुद्र, पर्वत, मेघ, पृथ्वी तथा विस्फोट आदिसे युक्त होकर भी यह जगत् वास्तवमें अजन्मा तथा काष्ठमौनके समान निष्क्रिय ब्रह्मरूप ही है। उस ब्रह्ममें न तो ज्ञातापन है, न कर्त्तापन है, न जडता है और न भोक्तापन है, न शून्यता है, न अर्थरूपता है और न आकाशरूपता ही है। वह सत्य, घन, अद्वितीय, जन्म आदिसे रहित, सर्वव्यापी, सर्वरूप, शान्त, अनादि, अनन्त तथा एक रूप ही है। मरना-जीना, सत्य-असत्य तथा शुभ और अशुभ जो कुछ भी है, वह सब एकमात्र जन्मरहित चेतनाकाश-स्वरूप है। जैसे लहरोंका समुदाय जलरूप ही होता है, उसी प्रकार सब कुछ ब्रह्म ही है। जन्मनेमें भी परम शान्त चेतनाकाशस्वरूप ब्रह्मका ही रूप यह जगत् है, जो आदि और अन्तमें अव्यक्त तथा मध्यकालमें ही इस प्रकार व्यक्त होता है। जैसे जल ही फेन आदिके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगद्रूपमें भासित होता है। जो उत्पन्न होता है और उत्पन्न है, वह कार्यरूप तथा जो उत्पन्न नहीं होता है और उत्पन्न नहीं है, वह कारणरूप भी उस चेतन परमात्मासे भिन्न नहीं है। अतः इस सृष्टिका ब्रह्मसे भिन्न कोई कारण नहीं है। जैसे प्रयत्नपूर्वक खोज करनेपर भी खरगोशके सींगका पता नहीं आ सकता, वैसे ही इस सृष्टिका वास्तविक कोई कारण नहीं उपलब्ध होता।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जैसे वटबीजके भीतर भावी विशाल वृक्ष विद्यमान होता है, वैसे ही ज्ञानमय परमाणु परमात्मामें यह सारी सृष्टि विद्यमान रहती है, ऐसा क्यों न मान लिया जाय !

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जहाँ बीज है, वहाँ वटवृक्षकी विशाल शाखा हो सकती है; क्योंकि वह सहकारी कारणोंसे उत्पन्न होती और फैलती है; परन्तु जब सम्पूर्ण भूतोंका प्रलय हो जाता है, तब कौन-सा बीज शेष रह जाता है और उसका सहकारी कारण भी क्या रहता है; जिसके सहयोगसे जगत्‌की उत्पत्ति हो। जो शान्त परब्रह्म है, उसमें जगत्‌की कल्पना हो सकती है। उसमें तो परमाणुत्वका भी योग नहीं होता, फिर बीजत्व कैसे आ सकता है ? इस प्रकार विचार करनेपर बीजभूत कारणका होना जब सर्वथा असम्भव है, तब जगत्‌की सत्ता किस प्रकार, किस साधनसे, किस निमित्तसे, कहाँ और क्या हो सकती है, इसलिये जो ब्रह्मरूप परमानन्द है, वही अपने स्वरूपभूत संकल्पसे यह जगद् बनकर स्थित

५७० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

है। यहाँ न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है और न उसका नाश ही होता है, जैसे आकाशमें अवकाश और जलमें द्रवत्व है, उसी प्रकार परमात्मामें सृष्टि स्थित है। (सर्ग ५३-५४)


ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना तथा जगत्‌का ब्रह्मसे अभेद, पाषाणोपाख्यानका आरम्भ—वसिष्ठजीका लोकगतिसे विरक्त हो सुदूर एकान्तमें कुटी बनाकर सौ वर्षोंतक समाधि लगाना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उत्पत्ति, विनाश, ग्रहण, त्याग, स्थूल, सूक्ष्म, चर, अचर आदि सभी पदार्थ सृष्टिके आरम्भ-कालमें उत्पन्न नहीं हुए थे; क्योंकि इनकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं था। जैसे नदियोंकी तरङ्ग-रेखा पहलेकी भाँति आज भी बह रही है, वैसे ही चेतनका संकल्प ही कल्पके आदिसे प्रलयपर्यन्त पदार्थोंके स्वभावका व्यवस्थापक है। पदार्थोंकी रचना दृष्टियोंमें ही प्रकट है। उनकी वास्तविक सत्ता नहीं है। जैसे जल-तरङ्गोंकी शोभा ही नदियोंकी रचना बन गयी है, उसी तरह चेतन आकाशमें विद्यमान चैतन्यरूप बीजकी सत्ता ही उसके भीतर सृष्टिरूपताको प्राप्त हो गयी है अर्थात् सृष्टिकी सत्ता चेतन सत्तासे पृथक् नहीं है। सब प्रकारके भेदज्ञानका निवारण हो जानेपर पुरुषमें जो एक शुद्ध ज्ञानका उदय होता है, तद्रूप ही वह बन जाता है। इसीसे वह मुक्त कहा जाता है। इसलिये उसमें बन्धन और मोक्षकी दृष्टियाँ कैसे रह सकती हैं? चेतन आकाशमें जो यह जगत्-नामक मलिनता प्रतीत हो रही है, पूर्वोक्तरूपसे विचार करनेपर यह निष्कलङ्क एवं निर्वाणरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ यह ब्रह्म व्याप्त न हो। यह जगत् अनेक रूप नहीं है, अपितु आकाशमें शून्यत्व तथा समुद्रमें द्रवत्वके समान ब्रह्मसे अभिन्न ही है।

रघुनन्दन ! चिन्मय आकाश परब्रह्म परमात्मामें सर्वत्र और सदा सब कुछ भलीभाँति विद्यमान है। साथ ही वह सर्वथा स्वच्छ है अर्थात् वह अपनी मलिनतासे ब्रह्मको दूषित नहीं करता है। वैसे ही जैसे सम्पूर्ण आकाशमें नीलरूपसे भासित होनेवाली शून्यता अपने मलसे मलिनता पैदा करके उसे दूषित नहीं करती। श्रीराम ! इस विषयमें पाषाणाख्यान सुना रहा हूँ, सुनो—यह अविद्यारूपी रोगको दूर करनेके लिये रसायन है। पूर्वकालमें मैने ही जो कुछ देखा था, उसीका इस आख्यायिकामें वर्णन है। यह विचित्र होनेके साथ ही इस प्रसङ्गके अनुकूल है। एक समयकी बात है, मै जानने योग्य परमात्म-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेनेके कारण पूर्णकाम हो गया था। इसलिये मेरे मनमें यह इच्छा हुई कि घनीभूत भ्रमसे भरे हुए इस लोकव्यवहारको छोड़ दूँ, तब ध्यानमें एकतान होकर धीरे-धीरे दीर्घकालिक विश्रामके लिये सम्पूर्ण चञ्चलताका त्याग करके मैंने एकान्त स्थानमें रहनेकी अभिलाषा की और शीघ्रतापूर्वक शान्तिकी ओर अग्रसर होने लगा। उस समय मै किसी देवताके स्थानमें स्थित था और जगत्‌की विविध एवं क्षणभङ्गुर गतियोंका अवलोकन कर रहा था। इतनेमें ही मै यह सोचने लगा कि इस लोककी अवस्था बड़ी नीरस है। देखनेमें सुन्दर और परिणाममे विनाशशील होनेके कारण आपातक्रमणीय है, इसलिये मै ऐसा मानता हूँ कि यह कहीं किसीको, किसी भी कारणसे और कभी भी सुख नहीं दे सकती। अतः कौन-सा ऐसा प्रदेश होगा, जो बिल्कुल सूना हो और जहाँ रहनेसे इन पाँचो बाह्य विषयोंकी वेदनाएँ अनुभवमें न आवे? मेरे विचारसे तो यह आकाश ही, जो सब ओरसे सूना होनेके कारण विक्षेपके उपकरणोसे रहित है, मेरी समाधिके लिये अधिक उपयोगी होगा।

४६- विद्याधरीका पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना और उन्हें समाधिसे जगाना, उनके और देवतादिके द्वारा वसिष्ठजीका स्वागत-सत्कार, वसिष्ठजीके पूछनेपर ब्रह्माजीका उन्हें अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना और उस कुमारी नारीको वासनाकी देवी बताना

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय * ५७१

मैं इसके किसी दूरवर्ती कोनेमें उत्तम योगयुक्तिका आश्रय लेकर स्थित रहूँगा, आकाशके एक कोनेमें संकल्पसे ही कुटी बनाकर उसके भीतर शुद्ध हो वासनारहित होकर निवास करूँगा।'

ऐसा सोचकर निर्मल आकाशमें ज्यों ही मैं आगे बढ़ा, त्यों ही देखता हूँ कि इस आकाशका भी सारा अन्तःप्रान्त विक्षेपके कारणोंसे व्याप्त है। अनेक प्रकारके भूतगण यहाँ विचर रहे हैं। तब मैं आकाशवर्ती भूतगणोंको त्यागकर वहाँसे दूरतिदूर एकान्त स्थानमें जा पहुँचा, जो अत्यन्त विस्तृत और सूना था। वहाँ बहुत धीमी-धीमी हवा चल रही थी। स्वप्नमें भी भूतगण वहाँ नहीं पहुँच सकते थे। न तो वहाँ मङ्गलसूचक शुभ शकुन होते थे और न उत्पातसूचक अपशकुन। तुम उस स्थानको संसारी पुरुषोंके लिये अलभ्य समझो। उस शून्य प्रदेशमें मैंने अपने संकल्पसे ही एक कुटीका निर्माण किया। उसका भीतरी भाग स्वच्छ एवं विशद था। उसकी दीवारोंमें कहीं छेद नहीं थे। इसलिये वह घनीभूत जान पड़ती थी तथा देखनेमें कमल-कोशके समान सुन्दर लगती थी। फिर मैंने मन-ही-मन यही मन्तव्य स्थिर किया कि यह कुटी समस्त भूतोंके लिये अगम्य हो जाय। तदनन्तर मैं उन सब भूतोंके लिये अगम्य कुटीरमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ पद्मासन लगाकर शान्त-चित्त हो मैंने अत्यन्त मौन धारण कर लिया। साथ ही यह निश्चय किया कि मैं इसके बाद ही मैं इस समाधिसे उठूँगा। इसके बाद मैं निर्विकल्प समाधिमें स्थित हो गया। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो मैंने निद्राकी मुद्रा धारण कर ली हो। मेरी बुद्धिमें समता थी। मैं निर्मल आकाशके समान शुद्धभागमें अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित था। ऐसा लगता था मानो आकाशसे खोदकर मेरी प्रतिमा प्रकट की गयी हो। छ सौ वर्षोंका समय मेरे लिये एक पलके समान व्यतीत हो गया; क्योंकि समाधिमें चित्तको एकाग्र करनेवाले पुरुषोंके लिये बहुत समयतक रहनेवाली कालकी गतियाँ भी थोड़ी प्रतीत होती हैं। तदनन्तर काल्पनिक अहंकाररूपी पिशाच इच्छारूपिणी पत्नीके साथ वहींसे मेरे पास आ धमका। (सर्ग ५५-५६)


अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय—सृष्टिके कारणका अभाव होनेसे उसकी असत्ता तथा चिन्मय ब्रह्मकी ही सृष्टिरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीरामभद्र ! अज्ञानसे अपने अन्तःकरणमें अहंभावरूपी पिशाचकी कल्पना कर ली गयी है, जो वास्तवमें है नहीं। जैसे हाथमें दीपक लेकर ढूँढ़नेवालेको अन्धकारका स्वरूप नहीं दिखायी देता, वैसे ही विचारशील पुरुष यदि देखे तो उसे अज्ञानकी उपलब्धि नहीं हो सकती। अहंता-रूपिणी पिशाचीके स्वरूपपर विचार करते हुए जैसे-जैसे उसकी ओर देखा जाता है, वैसे-ही-वैसे वह छिपती जाती है। सृष्टिकी सत्ता होनेपर ही अविद्याका अस्तित्व सम्भव हो सकता है, और किसी हेतुसे नहीं। परंतु यह सृष्टि तो कभी उत्पन्न हुई ही नहीं। केवल अज्ञानियोंके अनुभवमें आती है। वास्तवमें वह है नहीं। जैसे आकाशमें कभी वृक्ष पैदा नहीं हुआ, उसी प्रकार सृष्टिका कोई कारण न होनेसे वह पूर्वकालमें ही उत्पन्न नहीं हुई थी। मनसहित छः इन्द्रियोंके दृश्य न होने-वाला निराकार परब्रह्म मनसहित छः इन्द्रियोंके विषय-भूत साकार जगत्‌का वस्तुतः कारण कैसे हो सकता है। कहते हैं बीजरूपी कारणसे अङ्कुररूपी कार्य उत्पन्न होता है। परंतु जहाँ बीज भी नहीं है, वहाँ अङ्कुर कैसे हो सकता है ? कारणके बिना कार्यकी उत्पत्ति कदापि सम्भव नहीं है। आकाशमें वृक्ष, जिनके होने-सा कुछ स्पष्टरूपसे देख पा रहा है।

५७२* अविच्छिन्नश्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रहनेवाला चिन्मयाकाशरूप ईश्वर ही अपने स्वरूपमें सृष्टि-रूपसे स्फुरित हो रहा है। उसका स्वभाव ही सृष्टिके नामसे विख्यात है। अतः चिन्मय होनेके कारण यह सृष्टि चैतन्यरूप ही है। सृष्टिके आरम्भमें विषयज्ञानशून्य जो शुद्ध एक अजन्मा अव्यय आदि और अन्तसे शून्य परब्रह्म स्थित था, वही हमारे समक्ष सृष्टिरूपसे विराजमान है। वास्तवमें यहाँ सृष्टि नामकी कोई वस्तु है ही नहीं और न ये भूगोल तथा खगोल आदि ही हैं। सब कुछ शान्त, अवलम्बनशून्य, ब्रह्ममात्र ही है और ब्रह्ममें ही स्थित है। भाव्य, भावक और भाव आदिकी जो निरन्तर उत्पत्ति प्रतीत होती है, वह सब स्वच्छ चिन्मयाकाश ही स्वयं अपने आपमें स्थित है। ऐसी अवस्थामें कहाँसे सृष्टि हुई, कहाँसे अविद्या आयी और कहाँ अज्ञता एवं अहंकार आदिकी स्थिति है? सब शान्त, चिद्घन ब्रह्म ही तो है। इस प्रकार मैने तुमसे अहंकारकी शान्तिका उपाय बताया है। अहंभावको यदि अच्छी तरह जान लिया जाय तो बालकल्पित पिशाचकी भाँति वह स्वतः शान्त हो जाता है।

समस्त सृष्टियाँ ब्रह्ममें ही कल्पित हैं—इस दृष्टिसे परमात्मा ब्रह्मका कोई अणु अंश भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टियोंसे ठसाठस भरा हुआ न हो। परंतु वे सृष्टियाँ भी वास्तवमें कहीं उपलब्ध नहीं होती हैं। वह सब कुछ परब्रह्म-रूप आकाश ही है। सृष्टियोंमें कोई सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग भी ऐसा नहीं है, जो सदा ब्रह्मस्वरूप न हो। इसलिये ब्रह्म और सृष्टि इन नामोंमें ही उच्चारणमात्रका भेद है, इनसे प्रतिपादित होनेवाली वस्तुमें नहीं। सृष्टि ही परब्रह्म है और परब्रह्म ही सृष्टि है। अग्नि और सूर्यकी उष्णताओंके समान इनमें तनिक भी भेद नहीं है। श्रीराम! व्यवहारमें लगे हुए ज्ञानीके लिये भी यह सब कुछ शान्त, एक, अनादि, अनन्त, स्वच्छ, निर्विकार, शिलाके सदृश अत्यन्त घन और मौन ब्रह्मरूप ही है। (सर्ग ५७-५८)


समाधिकालमें वसिष्ठजीके द्वारा अनन्त चेतनाकाशमें असंख्य ब्रह्माण्डोंका अवलोकन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र! तदनन्तर, (सौ वर्षोंके पश्चात्) मैं ध्यानसे जगा—समाधिसे विरत हुआ। उस समय वहाँ मुझे एक मधुर ध्वनि सुनायी दी, जो बडी मनोरम थी; परंतु उसके पद और अक्षर अधिक स्पष्ट नहीं थे। वह ध्वनि पदार्थ और वाक्यार्थ-का बोध करानेमें समर्थ नहीं थी। किसी नारीके कण्ठसे निकली हुई वाणीके समान उसमें स्वाभाविक कोमलता और मधुरता थी, स्वरमें काफी लोच था, उच्चस्वरसे उच्चारित न होनेके कारण उस ध्वनिमें गम्भीरता (दूरसे सुनायी देनेकी योग्यता) नहीं थी। इस प्रकार उसके विषयमें मैने कुछ कालतक तर्क-वितर्क किया, वह आवाज ऐसी लगती थी, मानो भ्रमरोंका गुंजारव हो रहा हो, तन्त्रीके तार झंकृत होने लगे हों। वह न तो किसी बालकका रोदन था और न द्विजबालकके वेदाध्ययनका स्वर ही। कमलकोषमें गुंजारव करनेवाले भ्रमरकी ध्वनि-से वह आवाज मिलती-जुलती थी। उस शब्दको सुन-कर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मै दसों दिशाओंमें दृष्टि फैलाकर वह शब्द करनेवाले प्राणियोंका अन्वेषण करने लगा। उस समय वहाँ मेरे हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ—'अहो! आकाशका यह भाग लाखों योजनकी दूरी लाँघकर बहुत ऊँचाईपर स्थित है। जिन मागोंसे सिद्ध पुरुष ही विचरण करते हैं, उनसे भी शून्य यह प्रदेश है। इसलिये इस एकान्त स्थानमें ऐसे शब्दकी उत्पत्ति कहाँसे हो रही है? मै यत्नपूर्वक दृष्टिपात करने-पर भी शब्द करनेवालेको नहीं देख रहा हूँ। मेरे सामने यह जो अनन्त निर्मल आकाश है, सब ओरसे सूना-ही-सूना दीख रहा है। प्रयत्नपूर्वक देखनेपर भी यहाँ मुझे कोई प्राणी नहीं दीखता है। अच्छा तो मै अपने इस देहाकाशको ध्यानके द्वारा यहीं ज्यों-का-त्यों स्थापित करके चेतनाकाशस्वरूप होकर अव्याकृत आकाशके

४७- पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्‌की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्‌में जानेके लिये प्रेरित करना

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन * ५३३

साथ उसी तरह एक हो जाता हूँ, जैसे जलबिंदु साधारण जलके साथ मिलकर एकरूप बन जाता है।' यों सोचकर मैं इस शरीरका त्याग करनेके लिये पद्मासनसे बैठ गया और समाधि लगानेके लिये मैंने पुनः अपनी आँखें बंद कर लीं। तदनन्तर इन्द्रिय-सम्बन्धी बाह्य विषयोंका तथा आन्तरिक विषयोंका भी स्पर्श त्याग-कर मैं एकमात्र संकल्परूप चित्ताकाश बन गया । इसके बाद क्रमशः उस चित्ताकाशको भी त्यागकर मैं बुद्धितत्त्वके स्थानमें पहुँच गया। फिर उसे भी छोड़कर चेतनाकाशमय अपने वास्तविक स्वरूपमें पहुँच गया।

फिर तो चैतन्यमय महाकाशके साथ एक होकर मैं असीम और सर्वव्यापी बन गया। निराकार और निराधार रहकर समस्त पदार्थोंका आधार बन गया। तब वहाँ मुझे झुंड-के-झुंड त्रैलोक्य, सैकड़ों संसार तथा लाखों या असंख्य ब्रह्माण्ड दिखायी देने लगे। वे सब ब्रह्माण्ड मायामय निर्मल आकाशमात्र रूपवाले थे। अतः वे परस्पर एक दूसरेकी दृष्टिमें नहीं आते थे। वे नाना प्रकारके आचार-विचारोंसे सम्पन्न थे; परंतु एक दूसरेके लिये शून्यरूप ही थे। परम चेतन आकाशके कोषमें स्थित हुए वे सब लोक शून्यतारूप ही थे, सत्य नहीं थे। कबसे उनकी सृष्टि हुई थी, यह किसीको ज्ञात नहीं था। वे सब-के-सब अज्ञानरूप दोषसे युक्त चिन्मय परमात्मामें अनादिकालसे ही कल्पित थे। चैतन्यके चमत्कारसे चमत्कृत चेतनाकाशमें सैकड़ों समुद्र, सूर्य, आकाश तथा मेरु आदि पर्वतोंसे युक्त खम्भेके समान वे लोक भासित होते थे तथा रजोगुण और तमोगुणसे कलुषित जान पड़ते थे। गन्धर्वनगरमें कारणादिके न होनेसे कारणरहित पृथ्वी आदिका अनुभव तो भ्रममात्र ही था। अतः ब्रह्मरूप अधिष्ठानकी सत्ता लेकर ही वे सब जगत् विद्यमान थे। उस अधिष्ठान सत्ताको न लेकर तो वे स्वरूपतः विद्यमान नहीं ही थे। मृगतृष्णाके जल-प्रवाह तथा आकाशकी नीलिमाके समान वे केवल भ्रमरूप अनुभवसे ही उत्पन्न हुए थे। अतः स्वरूपतः सत्य नहीं थे। परंतु सत्यरूप अधिष्ठानकी सत्तासे सत्य जान पड़ते थे। परब्रह्मरूपी गूलरके वृक्षमें भाँति-भाँति-विचित्र रसोंसे परिपूर्ण ब्रह्माण्डरूपी फल लगे थे, जो हवाके झोंकोंसे झूम रहे थे। देवता, असुर और मनुष्य आदि प्राणी उन फलोंके भीतर जन्तुओंके समान प्रतीत होते थे। तुम, मैं और यह आदि अभिमानपूर्ण बुद्धिके द्वारा अत्यन्त दृढ़ बनाये गये वे सब लोक गीली मिट्टीद्वारा बने हुए उन खिलौनोंके समान जान पड़ते थे, जो सूर्यकी किरणोंसे सूखकर कड़े हो गये हों।

वास्तवमें वे जगत् परमार्थ चैतन्यरूप ही थे, तथापि उससे भिन्नके समान प्रतीत होते थे। उन्मत्त होनेपर भी प्राप्त-से जान पड़ते थे तथा सदा असत् होकर भी सद्रूप-से भासित होते थे। परमात्मारूपी मूँगेके तिनकेके भीतर वे केवल आभासरूप थे और वायुके स्पन्दनकी भाँति स्वतः उत्पन्न हुए थे। श्रीराम ! उस समाधिकालमें मैंने अनन्त चेतनाकाशके भीतर अकारण ही उत्पन्न एवं विनष्ट होनेवाले बहुत-से लोक देखे, जो तिमिर रोग (रतौंधी) से युक्त आँखोंवाले पुरुषके द्वारा देखे गये भ्रममात्र ही सिद्ध होते थे। (सर्ग ५९)


श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन और उनकी उपेक्षा करके अनेक विचित्र जगत्का दर्शन करना तथा महाप्रलयके समय सब जीवोंके प्रकृति-लीन हो जानेपर पुनः किसको सृष्टिका ज्ञान होता है, श्रीरामके इस प्रश्नका उत्तर देना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उपर्युक्त रूपसे पूर्वोक्त शब्दके कारणका विचार करता हुआ मैं आवरणरहित चेतनाकाशरूप होकर थोड़ी देर तक इधर-उधर भ्रमण करता रहा। इसके बाद देखा कि

सं० यो० व० अं० २०—

४८- पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके सङ्कल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्‌का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन

५७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

ध्वनिके समान वह शब्द मेरे कानोंमें पडा। क्रमशः उसके पद स्पष्ट होने लगे। फिर मुझे यह मालूम हुआ कि किसीके द्वारा आर्या छन्दका पद गाया जा रहा है। फिर जहाँसे वह शब्द प्रकट हो रहा था उस स्थानपर दृष्टि पडी। वहाँ मुझे एक स्त्री दिखायी दी, जो दूर नहीं थी। वह सुवर्ण-द्रवके समान गौरकान्तिसे आकाशमण्डलको प्रकाशित कर रही थी। उसके गलेके हार तथा शरीरके वस्त्र कुछ-कुछ हिल रहे थे। उसके नेत्रप्रान्त अलकावलियोसे किंचित् आवृत्त हो रहे थे। उसे देखकर ऐसा जान पडता था मानो दूसरी लक्ष्मी आ गयी हो। उसका मुखमण्डल पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था। वह जब हँसती थी, तब फूलोंके ढेर-से झरते जान पड़ते थे। आकाशका कोश ही उसके रहनेका घर था। उसका सौन्दर्य चन्द्रमाकी किरणोंको लज्जित कर रहा था। वह ऐसी जान पडती थी मानो मोतियोंके समूहसे उसका निर्माण हुआ हो। वह कमनीय कान्तिमती नारी मेरा अनुसरण करनेके लिये उद्यत जान पड़ती थी। मेरे पास खडी हो मधुर मुस्कान और उत्तम भाव-विलास-से सुशोभित वह मनोहारिणी स्त्री मधुर स्वरसे कोमल वाणीमें इस आर्या छन्दका पाठ करने लगी,—

असदुचितरिक्तचेतन-
संसृतिसरिति प्रमुह्यमानानाम्।
अवलम्बनतटविटपिन-
मभिनौमि भवन्तमेव मुने॥

‘मुने! आपका अन्तःकरण उन राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दोषोंसे सर्वथा शून्य है, जो असत्पुरुषोंके ही हृदयमें रहने योग्य हैं। आप संसार-सरितामें डूबकर मोहित होनेवाले प्राणियोंके आश्रयभूत तटवर्ती वृक्ष हैं; अतः मै सब ओरसे आपकी ही स्तुति करती हूँ।’

श्रीराम! यह सुनकर मैने उस मनोहर मुख एवं मधुर स्वरवाली स्त्रीकी ओर देखा और यह सोचकर कि ‘यह तो स्त्री है, इससे मेरा क्या प्रयोजन है?’ उसकी अवहेलना करके मै आगे बढ़ गया। तदनन्तर लोकसमूहोंसे युक्त माया दिखायी दी, उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। फिर उसका भी अनादर करके मै आकाशमें विचरण करनेको उद्यत हुआ। इसके बाद मैने आकाशमें स्थित हुई जगन्मायाका निरीक्षण करनेके लिये चिन्मयाकाशरूपसे ज्यों ही चेष्टा की, त्यों.ही वे सारे-के-सारे उग्र जगत् उसी तरह शून्यरूप हो गये जैसे स्वप्न, संकल्प (मनोराज्य) तथा कहानीमें वर्णित जगत् शून्यरूप होते हैं। इस प्रकार बताये गये वे सभी लोक होनेवाले प्रलयकालके दृश्यको वैसे ही नहीं जान पाते हैं, जैसे एक ही घरमें सोये हुए अनेक पुरुष एक दूसरेके स्वप्नमें होनेवाले रण-कोलाहलको नहीं सुनते हैं। श्रीराम! चेतनमें ही सब कुछ है, चेतनसे ही सब कुछ है, चेतन ही सब कुछ है और चारो ओरसे चेतन-ही-चेतन है। सारी सत्ता चिन्मय तथा सद् रूप ही है। यही मैने वहाँ पूर्णरूपसे देखा।* यह जो दृश्योंका दर्शन होता है, वह भ्रममात्र


* चिति सर्वं चितः सर्वं चित्सर्वं सर्वतश्च चित्।
चित्सर्वात्मिकेत्येतद् दृष्टं तत्र मयाखिलम्॥
(नि० प्र० उ० ६०। २३)

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * वसिष्ठजीद्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अभिन्नताका कथन * ५३०


है। आकाशमें प्रतीत होनेवाले वृक्षकी मञ्जरी है। सब कुछ चेतनाकाशका स्वरूप ही है। इस बातका मुझे वहाँ अनुभव हुआ। समष्टि बुद्धिरूप आकाशके साथ एकरूप होकर व्यापक, अनन्त एवं बोधरूप हुए मैंने इसका अनुभव किया। सम्पूर्ण जगत्का यह मायाजाल ब्रह्माकाशरूप ही है, दसों दिशाएँ ब्रह्माकाश ही हैं तथा काल, कला, देश, द्रव्य और क्रिया आदि भी ब्रह्माकाशरूप ही हैं। जो सब प्रकारके नाम और रूपसे रहित, पाषाणकी प्रतिमाके समान मौन और ज्योति-स्वरूप है, वही परब्रह्म परमात्मा यत्किंचित् नाम-रूपात्मक होकर जगत् कहलाता है। वहाँ समाधि-कालमें ऐसे लाखों जगत् भी अनुभवमें आये थे, जिनमें चन्द्रमण्डल भी उष्ण थे और सूर्य भी शीतलताकी मूर्ति जान पड़ते थे। श्रीराम ! कोई जगत् गिर रहे थे, कितने ही आकाशमें उड़ रहे थे और बहुतेरे सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रान्तिपूर्ण पदोंमें प्रतिष्ठित थे। इस तरह चैतन्य समुद्रके चञ्चल बुद्बुदोंके रूपमें दिखायी देनेवाले उन असंख्य लोकोंमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो मैंने न देखी हो।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! महाकल्पके विनाशकालमें जब समस्त भूतोंका समुदाय मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाता है, तब पुनः किसको किस तरह सृष्टिका ज्ञान होता है?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीरामभद्र ! महाप्रलय-कालमें पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश—इन सम्पूर्ण विशेष पदार्थोंका विनाश हो जानेपर ब्रह्मासे लेकर स्थावरतकके सभी जीव-जगत् जब मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाते हैं, तब पुनः जिस प्रकार इस जगत्‌का अनुभव होता है, वह बताता हूँ, सुनो। महाप्रलयके पश्चात् जो द्रष्टा शेष रहता है, वह शब्दादि व्यवहारमें प्रयोग करने योग्य नहीं होता। उसे मुनिजन परमार्थ चिन्मयघन कहते हैं। यह जगत् उसका हृदय है। अतः उससे भिन्न नहीं है। वही परमात्मदेव यह संकल्प करता है कि जगत् मेरा अपना स्वभाव और हृदय है। जगन्निश्चयरूपसे वह जगत्‌की सत्ता नहीं मानता है। इस प्रकार जब हम विचार करते हैं, तब जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं रहती। फिर क्या नष्ट होता है और क्या उत्पन्न। जैसे परम कारण परमात्मा अविनाशी है, वैसे ही उसका हृदय भी। महाकल्प आदि भी उसके अवयव ही हैं। अतः वे भी परमात्मासे भिन्न नहीं हैं। केवल अज्ञान ही यहाँ जगत् और परमात्मामें भेदकी प्रतीति कराता है, परंतु विचारपूर्वक देखा जाय तो उस अज्ञानका भी कहीं पता नहीं लगता है। अतः एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सदा और सर्वत्र विराजमान हैं। जगत्, उसकी उत्पत्ति तथा विनाश सर्वथा मिथ्या कल्पना हैं। इसलिए कभी कहीं किसीका कुछ भी न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है। यह जो दृश्य जगत् है, वह सदा शान्त, अजन्मा, ब्रह्मरूपसे ही स्थित है। यह अनादि जगत्‌रूप कभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यहाँ इस जगत्‌के रूपमें केवल ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही हैं। इस प्रकार विचारदृष्टिसे देखनेपर भ्रष्ट निर्धनोंके तुच्छ ऐश्वर्य भी तृणके समान निःसार ही सिद्ध होता है। ऐसा जानने-वाला अधिकारी पुरुष अपनेमें ब्रह्मभावका निश्चय करके अपने आत्मामें ही पूर्ण संतुष्ट रहता है। (सर्ग ६०-६१)


वसिष्ठजीके द्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अपनेसे अभिन्नताका कथन, आशंका दूर करनेवाली स्त्रीके कार्य तथा सम्भाषण आदिके विषयमें श्रीरामके प्रश्न और वसिष्ठजीके उत्तरका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! उस समय आपने पक्षियोंकी भाँति आकाशमें उड़ते हुए जो जगत्-समूहका अवलोकन किया था, वह क्या देखने योग्य भिन्न होता हुआ देखा था या सम्पूर्ण चिन्मयाकाशमात्र द्वैतरूपत्वसे ?

४९- ब्रह्मा और जगत्‌की एकताका स्थापन तथा द्वादश सूर्योंके उदयसे जगत्‌के प्रलयका रोमाञ्चकारी वर्णन

५७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! उस समय तो मैं सर्वव्यापी, अनन्तात्मा चिन्मयाकाशरूप हो गया था, उस अवस्थामें मेरा कहीं आना-जाना कैसे सम्भव हो सकता था ? न तो एक स्थानपर खड़े हुए पुरुषकी भाँति ही स्थित था और न गतिशील ही था, इस प्रकार परमात्म-स्वरूप चिदाकाशमें ही रहकर मैने अपने इस व्यापक शरीरके द्वारा यह सारा जगत्समूह देखा था । जैसे शरीरा-भिमानीके रूपमें स्थित होनेपर मै पैरसे लेकर मस्तक तकके अपने सभी अङ्गोंको देखता हूँ, उसी प्रकार मैंने इन चर्मचक्षुओंके बिना भी चिन्मय नेत्रसे सारे जगत्समुदाय-का अवलोकन किया था। इस विषयमें तुम्हारे लिये प्रमाण है, सपनेमें देखा हुआ संसार-विभ्रम; क्योंकि स्वप्नमें जो दृश्य अनुभूत होता है, वह चेतनाकाशरूप ही है, उसके सिवा दूसरा कुछ नहीं है । जैसे वृक्ष अपने पत्र, पुष्प और फल आदिको देखता है, वैसे ही मैंने भी अपने ज्ञानरूपी नेत्रसे सारे जगत्‌को देखा था । जैसे अवयवी अपने अवयवोंको अपनेमें ही अभिन्नरूपसे देखता है, उसी प्रकार मैंने इन समस्त सर्गोंको अपनेसे अभिन्न ही देखा और समझा था । श्रीराम ! बोधस्वरूप परमात्माके साथ एकताको प्राप्त हुआ मैं आज इस समय भी उन विविध सर्गोंको शरीर, आकाश, पर्वत, जल और स्थलको भी उसी तरह देख रहा हूँ ।

श्रीरामजीने पूछा-ब्रह्मन् ! कमलनयन ! आप जब इस प्रकार अनुभव कर रहे थे, तब आर्याछन्दका पाठ करने-वाली उस कान्तिमती नारीने क्या किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वह भी चिन्मयाकाशरूप-से ही आकाशमें मेरे समीप विनयपूर्वक खड़ी थी और उसी आर्याछन्दका पाठ कर रही थी । उस समय वह देवाङ्गना-सी जान पड़ती थी। जैसे मेरा शरीर चिन्मयाकाशमय था, उसी प्रकार उसका भी था । मैंने उस पूर्वशरीरसे वैसी ललना कभी नहीं देखी थी । मेरा शरीर चेतन-आकाश-मात्र था, वह भी चेतनाकाशमय रूप धारण किये हुए थी और सारा जगज्जाल भी उस समय वहाँ चिन्मयाकाशरूप-से ही स्थित था ।

श्रीरामजीने पूछा-भगवन् ! शरीरमें स्थित जीभ, तालु, ओठ तथा प्राणोंके प्रयत्नोंसे उत्पन्न हुए वर्णोंद्वारा जो वाक्य सम्पन्न होता है, वह आकाश-शरीरधारिणी उस स्त्रीके मुखसे कैसे प्रकट हुआ ? विशुद्ध चेतनाकाशरूप आत्माओंको रूपका दर्शन और आभ्यन्तर मनका अनुभव होना कैसे सम्भव है ? उस समय आपने जो जगत्‌के दर्शन और सम्भाषण आदि व्यवहार किये थे, उनकी सङ्गति कैसे लगती है ? आप इस विषयमें अपना यथार्थ निश्चय बताइये ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे स्वप्नमें चिन्मयाकाश आत्मा ही बाह्य तथा आभ्यन्तर पदार्थोंके रूपसे प्रकट होता है वैसे ही मेरे उस समाधिकालमें भी यह सारा दृश्य प्रपञ्च चिन्मयाकाशरूपसे ही स्थित था। केवल वही दृश्य चिन्मयाकाशरूप रहा हो, ऐसी बात नहीं है, किंतु ये जितने पदार्थ हमलोगोंकी बुद्धिके विषय हैं, ये सब-के-सब तथा यह सारा संसार भी स्वच्छ चिन्मयाकाशरूप ही है । हमारे लिये जैसा वह था, वैसा ही सारा जगत् है । जैसे स्वप्नमें पृथ्वीपर खेती आदिके रास्तोंपर आने-जाने-के तथा पर्वत-प्रासाद आदिके ऊपर शयन आदिके जो व्यवहार होते हैं, वे सब चिदाकाशरूप ही हैं, उसी तरह उस समय 'मैं', 'तुम', 'वह स्त्री' तथा 'वह' और 'यह' सब कुछ चिदाकाशरूप ही था । रघुनन्दन ! तदनन्तर जैसे स्वप्नमें स्वप्नगत मनुष्योंके साथ व्यवहारकार्य चलता है, उस समय उस स्त्रीके साथ मेरा वार्तालाप-व्यवहार भी उसी तरह आरम्भ हुआ । जैसे वह स्वप्न-सदृश व्यवहार चिदाकाशरूप ही था, उसी प्रकार तुम मुझको, इस आत्माको तथा जगत्‌को भी चिदाकाशरूप ही समझो ।

( सर्ग ६२ )

[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * स्वप्नजगत्‌की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन * ५७३

स्वप्नजगत्‌की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा-मुने ! मुख, जीभ आदि अवयवोंसे रहित एकमात्र संकल्परूप देहसे आपका उस स्त्रीके साथ सम्भाषण आदि व्यवहार कैसे हुआ ? उस दशामें आपने क च ट त प आदि वर्णोंका कैसे उच्चारण किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! चिदाकाशस्वरूप तत्त्वज्ञानियोंके संकल्पमय देहवाले मुखसे क च ट त प आदि वर्णोंका किसी कालमें भी वैसे ही उच्चारण नहीं होता, जैसे मृतकोंके मुखसे कोई अक्षर नहीं निकलता है । ( स्वप्नकी भाँति ही वहाँ भी हुआ । )

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा- भगवन् ! जब यह जगत् स्वप्नरूप ही है, तब जाग्रत्-रूपसे कैसे स्थित है ? तथा असत्य होकर ही यह सत्य-सा कैसे हो गया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! यह सब जगत् कैसे स्वप्नमय ही है, यह सुनो- स्वप्नके समान ही ये जगत् न तो आत्मासे भिन्नरूप हैं, न आत्माके समान सत्यरूप हैं और न स्थिर ही हैं । ये सब-के-सब एकमात्र अनिर्वचनीय आत्मसत्तासे स्थित हैं । वे सब जगत् एक-दूसरेको किंचिन्मात्र भी नहीं देख पाते तथा कोठीके भीतर रखे गये जड बीजोंकी एक राशिकी तरह भीतर-ही-भीतर सड़-गलकर नष्ट भी हो जाते हैं । नष्ट होकर भी वे चेतन-रूप ही रहते हैं, सर्वथा शून्य नहीं हो जाते । वे आपसमें एक-दूसरेको नहीं जानते । अज्ञानसे उनका चेतना-रूप ढक जानेके कारण निरन्तर सोये हुएके सदृश स्वप्नका अनुभव करते हैं । सोये हुए स्वप्नरूप जगज्जालकी व्यवस्थाके अनुसार व्यवहार करनेवाले जो राक्षस स्वप्नमें स्वप्नगत देवताओंद्वारा मारे गये, वे अब भी उसी स्वप्नमें स्थित हैं । श्रीराम ! बताओ तो सही, इस तरह जो स्वप्नमें मारे गये, वे क्या करते हैं ? अज्ञानके कारण मुक्त नहीं हुए तथा चेतन होनेके कारण पत्थरके सदृश भी स्थित न रहे । वे लोग पर्वत, सागर, पृथ्वी तथा अनेक जीव-जन्तुओंसे भरे इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको चिरकाल-तक उसी तरह अनुभव करते हैं जैसे हमलोग ( इसीलिये उनका अपना-अपना स्वप्न चिरकालकी अनुवृत्तिसे हमलोगोंके अनुभवकी तरह जाग्रदवस्थारूप ही हो जाता है । ) उनके कल्प और जगत्की स्थिति भी वैसी ही है, जैसी हमलोगोंकी है और हमलोगोंके जगत्की स्थिति भी वैसी ही है जैसी उन लोगोंकी है । उनके स्वप्नके वे पुरुष अपने तथा अन्य पुरुषके भी अनुभवसे सत्य ही हैं; क्योंकि अपनी तथा दूसरेकी सत्ताका निमित्तभूत जो अधिष्ठानस्वरूप चेतन है, वह सर्वव्यापी होनेके कारण सत्य एवं सम है । जैसे आत्मामें वे स्वप्नके पुरुष सत्य हैं, वैसे ही दूसरे पुरुष भी, जिनका प्रत्येक स्वप्नमें मुझे अनुभव होता है, वे सत्य ही हैं । तुमने अपने स्वप्नमें जो अनेक नगर तथा नागरिक देखे थे, वे सब वैसे ही अब भी स्थित हैं; क्योंकि सर्वव्यापी ब्रह्म सर्वस्वरूप है । भीतमें, आकाशमें, पाषाणमें, जलमें और स्थलमें सर्वत्र भिन्न-भिन्न पदार्थोंके अंदर चिन्मात्र परमात्मा ही विराजमान है । वही सम्पूर्ण विश्वरूपसे स्थित है; अतः चिन्मात्र परमात्माके सर्वव्यापी होनेसे जहाँ तहाँ सर्वत्र ही जगत् हैं । इनकी संख्या यहाँ कैसे बतलायी जा सकती है ! तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टिमें वह सारा जगत् परब्रह्म ही हैं; परंतु अज्ञानियोंके मनमें दृश्य-प्रपञ्चरूपसे स्थित हैं ।

( सर्ग ६३ )


५०- प्रलयकालके मेघोंद्वारा भयानक वृष्टि होनेसे एकार्णवकी वृद्धि तथा प्रलयाग्निका बुझ जाना

५७८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन, अपनी युवावस्थाके व्यर्थ बीतनेका उल्लेख

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर मैंने उस सुन्दरी ललनासे, जिसके नेत्र नील कमल-से विकसित, खिले हुए मालती-पुष्पके समान शोभा पाते थे, उसकी ओर देखकर कौतुकपूर्वक पूछा—'कमलपुष्पके भीतरी भाग—केसरकी-सी सुनहरी कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो ? मेरे पास किसलिये आयी हो ? किसकी पुत्री या पत्नी हो ? क्या चाहती हो ? कहाँ गयी थी ? और कहाँकी रहनेवाली हो ?'

विद्याधरीने कहा—मुने ! मैं अपना वृत्तान्त ठीक-ठीक बतला रही हूँ, सुनिये । यद्यपि परायी स्त्रीके साथ एकान्तमें वार्तालाप करना उचित नहीं है तथापि मैं बड़े कष्टमें हूँ और संकटसे छुटकारा पानेके हेतु प्रार्थना करनेके लिये आयी हूँ; अतः आप करुणावश मुझसे बिना किसी हिचकके मेरा समाचार पूछ सकते हैं। महर्षे ! परमोत्कृष्ट चिन्मय आकाशके किसी छोटे-से कोनेमें आपका यह आश्रमरूपी विलक्षण संसार बसा हुआ है । इसमें पाताल, भूतल और स्वर्ग—ये तीन प्रकोष्ठ ( बड़े-बड़े आँगन ) हैं । वहाँ हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आकारमें स्थित हुई मायाने कल्पना नामक एक कुमारी-( गृह-स्वामिनी ) का निर्माण किया है। इन तीनोंमें जो भूतल है, वह कंगनकी-सी आकृतिवाले द्वीपों और समुद्रोंसे घिरा हुआ है; अतः उनके रंगोंसे अनुरञ्जित हो ताम्रवर्णका दिखायी देता है; साथ ही कुछ ऊँचा भी है । इस प्रकार यह भूतल उपर्युक्त कंगनसे विभूषित जगल्लक्ष्मीकी कलाईके समान जान पड़ता है । द्वीपों और समुद्रोंके अन्तमें चारों ओरसे दस हजार योजनोंतक सुवर्णमयी भूमि स्थित है । उसके अन्तिम छोरपर लोकालोक नामसे विख्यात पर्वत है, जो जगल्लक्ष्मीकी ऊँची कलाईके समान शोभा पानेवाले इस भूपीठको कंगनके समान चारों ओरसे घेरे हुए है । उस लोकालोक पर्वतके शिखरोंपर रत्नमयी बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जो आकाशके समान निर्मल हैं । उन शिलाओंके बीचमें लोकालोक पर्वतके उत्तर भागमें उसके पूर्ववर्ती शिखरकी जो एक शिला है, उसके भीतर मैं निवास करती हूँ । उस शिलाका त्वचा-भाग कभी क्षीण न होनेवाले वज्रसार मणिके समान कठोर है। विधाताने मुझे वहाँ बाँध रखा है और इस प्रकार विवश होकर मैं उस प्रस्तर-यन्त्रमें वास कर रही हूँ । मुने ! मैं समझती हूँ कि उस शिलामें रहते हुए मेरे असंख्य युग बीत गये । केवल मैं ही नहीं बँधी हूँ, मेरे पतिदेव भी उसके भीतर वैसे

५१- बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन .. ५७१


ही बँधे हैं, जैसे सायंकालिक कमलकोशमें भ्रमर बँध जाता है। उस शिलाके कोटरमें, उसके संकीर्ण स्थानमें पतिके साथ रहकर मैने दीर्घकालतक सुख-दुःखका अनुभव किया है और इस अनुभवमें मेरे असंख्य वर्ष-समूह बीत गये हैं; किंतु अभीतक हम दोनों अपने एकमात्र दोष (कामना) के कारण मोक्ष नहीं पा रहे हैं। उसी तरह परस्पर ममता बाँधे हम दीर्घकालसे वहीं रहते हैं।

मुनीश्वर ! उस पाषाणके संकटमें केवल हमीं दोनों नहीं बँधे हैं, हमारा सारा परिवार भी वहीं बँधा पड़ा है। उसमें बँधे हुए मेरे पति ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुए हैं और प्राचीन कालके वृद्ध पुरुष हैं। यद्यपि वे सैकड़ों वर्षोंसे जी रहे हैं तथापि एक स्थानसे दूसरे स्थानतक चल नहीं सकते। वे बचपनसे ही ब्रह्मचारी हैं। वेदाध्ययनमें तत्पर रहते और छात्रोंको पढ़ाते हैं, किंतु आलसी हैं। एकान्त स्थानमें अकेले ही बैठे रहते हैं। उनके बर्तावमें कुटिलता नहीं है। वे चपलतासे कोसों दूर रहते हैं। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! मैं उन्हींकी भार्या हूँ; किंतु मुझमे एक व्यसन है। मैं उन पतिदेवके बिना पलभर भी देह धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ। ब्रह्मन् ! मेरे पतिने मुझे पत्नीरूपमें किस प्रकार प्राप्त किया और हम दोनोंका यह स्वाभाविक स्नेह परस्पर किस प्रकार बढ़ा, यह बताती हूँ, सुनिये।

पहलेकी बात है, मेरे पतिने जन्मके पश्चात् बाल्यावस्थामें ही किंचित् ज्ञान प्राप्त कर लिया और एक सत्पुरुषकी भाँति अपने निर्मल गृहमें वे रहने लगे। उन दिनों उन्होंने विचार किया कि मैं वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाला ब्राह्मण हूँ। मुझे अपने ही अनुरूप ऐसी भार्या कहाँसे प्राप्त हो सकती है, जो उत्तम जन्मके कारण शोभा पा रही हो ? इस प्रकार चिरकालतक चिन्तन करके उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और स्वयं ही मेरे नाथने अनिन्द्य सौन्दर्यसे युक्त अङ्गवाली मुझ नारीको मान्त्रिक संकल्पसे प्रकट किया। मानो चन्द्रदेवने निर्मल चाँदनी प्रकट की हो। मनसे उत्पन्न होनेके कारण मैं उनकी मानसी भार्या हुई और जैसे वसंत ऋतुमें मन्दार वृक्षकी उत्तम एवं सुन्दरी मञ्जरी बढ़ती है, उसी प्रकार मैं भी बढ़ने लगी। मैं निरन्तर लीला-विलासमें ही निरत रहने लगी। मेरे नेत्र लीला-पूर्ण तिरछी चितवनसे देखने लगे। मुझे सदा गाना-बजाना ही प्रिय लगने लगा। भोगोंसे कभी मुझे तृप्ति नहीं होती थी। मेरा दिनोदिन भोगोंमें अनुराग बढ़ता गया। आदरणीय महर्षे ! मेरे पतिदेव दीर्घसूत्री और स्वाध्यायशील होनेके कारण तपस्यामें ही लगे रहे। उन्होंने किसी तरहकी भी अपेक्षा मनमें लेकर मेरे साथ अबतक विवाह नहीं किया। इसलिये यौवनसम्पन्न तरुणी भी मैं उन्हें प्राप्त न कर सकनेके कारण व्यसनकी आगसे उसी प्रकार जलने लगी, जैसे कोई कमलिनी आगसे झुलस रही हो। फूलोंकी वर्षासे हरी-भरी सारी उद्यान-भूमियाँ मेरे लिये तपी हुई बालुकाराशिसे आच्छादित सूनी मरुभूमियोंकी भाँति दाहक प्रतीत होने लगीं। जो पदार्थ सुन्दर, उचित, स्वादु और मनोहर हैं, उन्हें देखकर मेरी ये आँखें आँसुओंसे भर आतीं। मैं रमणीय स्थानमें रोती। जो स्थान न रम्य है न अरम्य—मध्यम कोटिका है, वहाँ मैं सौम्य हो जाती और जो असुन्दर स्थान है वहाँ मैं प्रसन्न रहती। न जाने मुझ दीना नारीकी ऐसी अवस्था कैसे हो गयी ? भगवन् ! इस प्रकार मेरे नवीन यौवनके बहुत-से दिन व्यर्थ बीत गये।

(सर्ग ६४)

५८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विद्याधरीका वैराग्य और अपने तथा पतिके लिये तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेके हेतु उसकी वसिष्ठ मुनिसे प्रार्थना

विद्याधरी बोली— मुने ! तदनन्तर जैसे शरत्काल बीतनेपर रसहीन हुए पल्लवोंकी लाली मिट जाती है, उसी प्रकार दीर्घकालके पश्चात् मेरा वह अनुराग वैराग्यके रूपमें परिणत हो गया। मैं सोचने लगी—'मेरा स्वामी बूढ़ा होनेके कारण एकान्तवासका रसिक, नीरस और स्नेहशून्य हो गया। यद्यपि उसकी बुद्धिमें कुटिलता नहीं है, तो भी वह मेरी ओरसे सदा मौन ही रहता है; अतः मैं समझती हूँ कि मेरे जीवनका कोई फल नहीं है, इसलिये अब इसे रखनेसे क्या लाभ। बचपनसे ही विधवा हो जाना अच्छा है, मर जाना भी अच्छा है अथवा रोगोंका आक्रमण तथा दूसरी-दूसरी विपत्तियोंका टूट पड़ना भी अच्छा है; परंतु जिसका स्वभाव मनके अनुकूल न हो, ऐसे पतिका मिलना अच्छा नहीं। उसी स्त्रीका जीवन सफल है, जिसका पति सदा उसके अनुकूल चलता हो; वही धन-सम्पत्ति सार्थक है, जिसका साधु-पुरुष उपयोग करते हैं तथा वही बुद्धि, वही साधुता और वही समदर्शिता उत्तम है, जो मधुर एवं उदार है। यदि पति और पत्नी एक-दूसरेके प्रति पूर्ण अनुराग रखते हों तो उनके मनको आधि-व्याधियाँ, विपत्ति-समूह तथा दुर्भिक्ष लानेवाले उपद्रव भी कष्ट नहीं पहुँचा सकते। जिन स्त्रियोंके पति प्रतिकूल स्वभाववाले हों अथवा जो स्त्रियाँ विधवा हो गयी हों, उनके लिये फूलोंसे भरी हुई पुष्प-वाटिकाएँ तथा नन्दनवनकी भूमियाँ भी मरुभूमिके समान दुःखद हो जाती हैं। संसारके सारे पदार्थ स्त्रियोंद्वारा स्वेच्छानुसार त्याग दिये जाते हैं, परंतु वे किसी भी दशामें पतिको नहीं त्याग सकतीं।

मुनीश्वर ! अब मेरा वह पतिविषयक अनुराग वैसे ही विरागरूपमें परिणत हो गया है, जैसे पालेकी मारी या जलायी कमलिनीका राग क्रमशः नीरस हो जाता है। मुने ! अब मुझे समस्त पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो गया है, इसलिये मैं इस समय आपके उपदेशसे अपनी मुक्ति चाहती हूँ। जिन्हें मनोवाञ्छित वस्तुओंकी प्राप्ति नहीं हुई, जिनकी बुद्धि परमात्मपदमें विश्राम न पा सकी तथा जो मरणतुल्य दुःखोंके प्रवाहमें बहे जा रहे हैं, ऐसे लोगोंके लिये जीनेकी अपेक्षा मर जाना अच्छा है। मेरे पतिदेव भी अब मोक्ष पानेके लिये ही दिन-रात चेष्टा करते रहते हैं। जैसे राजा किसी राजाकी सहायतासे दूसरे राजापर विजय पानेके लिये सचेष्ट होता है, इसी प्रकार मेरे पति भी मनके द्वारा ही मनको जीतनेके प्रयत्नमें सावधानीके साथ लगे हुए हैं। महान् ! आप मेरे उन पतिका और मेरा भी अज्ञान दूर करनेके लिये न्याययुक्त वाणीद्वारा उपदेश देकर आत्मतत्त्वका ज्ञान कराइये। जब मेरे पति मेरी उपेक्षा करके ही परमात्म-तत्त्वके चिन्तनमें लग गये, तब वैराग्यने मेरे लिये संसारकी स्थितिमें नीरसता पैदा कर दी।

मैं संसारकी वासनाके आवेशसे शून्य हूँ, इसलिये आकाशमें विचरनेकी शक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाली खेचरी मुद्रानामक तीव्र एवं अभीष्ट धारणाको बाँधकर सुस्थिरचित्त हो गयी हूँ। उक्त धारणाके द्वारा आकाशमें विचरनेकी शक्ति पाकर मैने पुनः दूसरी धारणाका अभ्यास किया, जो सिद्ध पुरुषोंका सङ्ग एवं उनके साथ सम्भाषणरूप फल देनेवाली है। (इसीलिये आज यहाँ आकर आपके साथ वार्तालाप करनेका सौभाग्य प्राप्त कर सकी।) तत्पश्चात् मैं अपने निवासभूत ब्रह्माण्डके