भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन * ५३३

साथ उसी तरह एक हो जाता हूँ, जैसे जलबिंदु साधारण जलके साथ मिलकर एकरूप बन जाता है।' यों सोचकर मैं इस शरीरका त्याग करनेके लिये पद्मासनसे बैठ गया और समाधि लगानेके लिये मैंने पुनः अपनी आँखें बंद कर लीं। तदनन्तर इन्द्रिय-सम्बन्धी बाह्य विषयोंका तथा आन्तरिक विषयोंका भी स्पर्श त्याग-कर मैं एकमात्र संकल्परूप चित्ताकाश बन गया । इसके बाद क्रमशः उस चित्ताकाशको भी त्यागकर मैं बुद्धितत्त्वके स्थानमें पहुँच गया। फिर उसे भी छोड़कर चेतनाकाशमय अपने वास्तविक स्वरूपमें पहुँच गया।

फिर तो चैतन्यमय महाकाशके साथ एक होकर मैं असीम और सर्वव्यापी बन गया। निराकार और निराधार रहकर समस्त पदार्थोंका आधार बन गया। तब वहाँ मुझे झुंड-के-झुंड त्रैलोक्य, सैकड़ों संसार तथा लाखों या असंख्य ब्रह्माण्ड दिखायी देने लगे। वे सब ब्रह्माण्ड मायामय निर्मल आकाशमात्र रूपवाले थे। अतः वे परस्पर एक दूसरेकी दृष्टिमें नहीं आते थे। वे नाना प्रकारके आचार-विचारोंसे सम्पन्न थे; परंतु एक दूसरेके लिये शून्यरूप ही थे। परम चेतन आकाशके कोषमें स्थित हुए वे सब लोक शून्यतारूप ही थे, सत्य नहीं थे। कबसे उनकी सृष्टि हुई थी, यह किसीको ज्ञात नहीं था। वे सब-के-सब अज्ञानरूप दोषसे युक्त चिन्मय परमात्मामें अनादिकालसे ही कल्पित थे। चैतन्यके चमत्कारसे चमत्कृत चेतनाकाशमें सैकड़ों समुद्र, सूर्य, आकाश तथा मेरु आदि पर्वतोंसे युक्त खम्भेके समान वे लोक भासित होते थे तथा रजोगुण और तमोगुणसे कलुषित जान पड़ते थे। गन्धर्वनगरमें कारणादिके न होनेसे कारणरहित पृथ्वी आदिका अनुभव तो भ्रममात्र ही था। अतः ब्रह्मरूप अधिष्ठानकी सत्ता लेकर ही वे सब जगत् विद्यमान थे। उस अधिष्ठान सत्ताको न लेकर तो वे स्वरूपतः विद्यमान नहीं ही थे। मृगतृष्णाके जल-प्रवाह तथा आकाशकी नीलिमाके समान वे केवल भ्रमरूप अनुभवसे ही उत्पन्न हुए थे। अतः स्वरूपतः सत्य नहीं थे। परंतु सत्यरूप अधिष्ठानकी सत्तासे सत्य जान पड़ते थे। परब्रह्मरूपी गूलरके वृक्षमें भाँति-भाँति-विचित्र रसोंसे परिपूर्ण ब्रह्माण्डरूपी फल लगे थे, जो हवाके झोंकोंसे झूम रहे थे। देवता, असुर और मनुष्य आदि प्राणी उन फलोंके भीतर जन्तुओंके समान प्रतीत होते थे। तुम, मैं और यह आदि अभिमानपूर्ण बुद्धिके द्वारा अत्यन्त दृढ़ बनाये गये वे सब लोक गीली मिट्टीद्वारा बने हुए उन खिलौनोंके समान जान पड़ते थे, जो सूर्यकी किरणोंसे सूखकर कड़े हो गये हों।

वास्तवमें वे जगत् परमार्थ चैतन्यरूप ही थे, तथापि उससे भिन्नके समान प्रतीत होते थे। उन्मत्त होनेपर भी प्राप्त-से जान पड़ते थे तथा सदा असत् होकर भी सद्रूप-से भासित होते थे। परमात्मारूपी मूँगेके तिनकेके भीतर वे केवल आभासरूप थे और वायुके स्पन्दनकी भाँति स्वतः उत्पन्न हुए थे। श्रीराम ! उस समाधिकालमें मैंने अनन्त चेतनाकाशके भीतर अकारण ही उत्पन्न एवं विनष्ट होनेवाले बहुत-से लोक देखे, जो तिमिर रोग (रतौंधी) से युक्त आँखोंवाले पुरुषके द्वारा देखे गये भ्रममात्र ही सिद्ध होते थे। (सर्ग ५९)


श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन और उनकी उपेक्षा करके अनेक विचित्र जगत्का दर्शन करना तथा महाप्रलयके समय सब जीवोंके प्रकृति-लीन हो जानेपर पुनः किसको सृष्टिका ज्ञान होता है, श्रीरामके इस प्रश्नका उत्तर देना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उपर्युक्त रूपसे पूर्वोक्त शब्दके कारणका विचार करता हुआ मैं आवरणरहित चेतनाकाशरूप होकर थोड़ी देर तक इधर-उधर भ्रमण करता रहा। इसके बाद देखा कि

सं० यो० व० अं० २०—