भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५७२* अविच्छिन्नश्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रहनेवाला चिन्मयाकाशरूप ईश्वर ही अपने स्वरूपमें सृष्टि-रूपसे स्फुरित हो रहा है। उसका स्वभाव ही सृष्टिके नामसे विख्यात है। अतः चिन्मय होनेके कारण यह सृष्टि चैतन्यरूप ही है। सृष्टिके आरम्भमें विषयज्ञानशून्य जो शुद्ध एक अजन्मा अव्यय आदि और अन्तसे शून्य परब्रह्म स्थित था, वही हमारे समक्ष सृष्टिरूपसे विराजमान है। वास्तवमें यहाँ सृष्टि नामकी कोई वस्तु है ही नहीं और न ये भूगोल तथा खगोल आदि ही हैं। सब कुछ शान्त, अवलम्बनशून्य, ब्रह्ममात्र ही है और ब्रह्ममें ही स्थित है। भाव्य, भावक और भाव आदिकी जो निरन्तर उत्पत्ति प्रतीत होती है, वह सब स्वच्छ चिन्मयाकाश ही स्वयं अपने आपमें स्थित है। ऐसी अवस्थामें कहाँसे सृष्टि हुई, कहाँसे अविद्या आयी और कहाँ अज्ञता एवं अहंकार आदिकी स्थिति है? सब शान्त, चिद्घन ब्रह्म ही तो है। इस प्रकार मैने तुमसे अहंकारकी शान्तिका उपाय बताया है। अहंभावको यदि अच्छी तरह जान लिया जाय तो बालकल्पित पिशाचकी भाँति वह स्वतः शान्त हो जाता है।

समस्त सृष्टियाँ ब्रह्ममें ही कल्पित हैं—इस दृष्टिसे परमात्मा ब्रह्मका कोई अणु अंश भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टियोंसे ठसाठस भरा हुआ न हो। परंतु वे सृष्टियाँ भी वास्तवमें कहीं उपलब्ध नहीं होती हैं। वह सब कुछ परब्रह्म-रूप आकाश ही है। सृष्टियोंमें कोई सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग भी ऐसा नहीं है, जो सदा ब्रह्मस्वरूप न हो। इसलिये ब्रह्म और सृष्टि इन नामोंमें ही उच्चारणमात्रका भेद है, इनसे प्रतिपादित होनेवाली वस्तुमें नहीं। सृष्टि ही परब्रह्म है और परब्रह्म ही सृष्टि है। अग्नि और सूर्यकी उष्णताओंके समान इनमें तनिक भी भेद नहीं है। श्रीराम! व्यवहारमें लगे हुए ज्ञानीके लिये भी यह सब कुछ शान्त, एक, अनादि, अनन्त, स्वच्छ, निर्विकार, शिलाके सदृश अत्यन्त घन और मौन ब्रह्मरूप ही है। (सर्ग ५७-५८)


समाधिकालमें वसिष्ठजीके द्वारा अनन्त चेतनाकाशमें असंख्य ब्रह्माण्डोंका अवलोकन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र! तदनन्तर, (सौ वर्षोंके पश्चात्) मैं ध्यानसे जगा—समाधिसे विरत हुआ। उस समय वहाँ मुझे एक मधुर ध्वनि सुनायी दी, जो बडी मनोरम थी; परंतु उसके पद और अक्षर अधिक स्पष्ट नहीं थे। वह ध्वनि पदार्थ और वाक्यार्थ-का बोध करानेमें समर्थ नहीं थी। किसी नारीके कण्ठसे निकली हुई वाणीके समान उसमें स्वाभाविक कोमलता और मधुरता थी, स्वरमें काफी लोच था, उच्चस्वरसे उच्चारित न होनेके कारण उस ध्वनिमें गम्भीरता (दूरसे सुनायी देनेकी योग्यता) नहीं थी। इस प्रकार उसके विषयमें मैने कुछ कालतक तर्क-वितर्क किया, वह आवाज ऐसी लगती थी, मानो भ्रमरोंका गुंजारव हो रहा हो, तन्त्रीके तार झंकृत होने लगे हों। वह न तो किसी बालकका रोदन था और न द्विजबालकके वेदाध्ययनका स्वर ही। कमलकोषमें गुंजारव करनेवाले भ्रमरकी ध्वनि-से वह आवाज मिलती-जुलती थी। उस शब्दको सुन-कर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मै दसों दिशाओंमें दृष्टि फैलाकर वह शब्द करनेवाले प्राणियोंका अन्वेषण करने लगा। उस समय वहाँ मेरे हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ—'अहो! आकाशका यह भाग लाखों योजनकी दूरी लाँघकर बहुत ऊँचाईपर स्थित है। जिन मागोंसे सिद्ध पुरुष ही विचरण करते हैं, उनसे भी शून्य यह प्रदेश है। इसलिये इस एकान्त स्थानमें ऐसे शब्दकी उत्पत्ति कहाँसे हो रही है? मै यत्नपूर्वक दृष्टिपात करने-पर भी शब्द करनेवालेको नहीं देख रहा हूँ। मेरे सामने यह जो अनन्त निर्मल आकाश है, सब ओरसे सूना-ही-सूना दीख रहा है। प्रयत्नपूर्वक देखनेपर भी यहाँ मुझे कोई प्राणी नहीं दीखता है। अच्छा तो मै अपने इस देहाकाशको ध्यानके द्वारा यहीं ज्यों-का-त्यों स्थापित करके चेतनाकाशस्वरूप होकर अव्याकृत आकाशके