संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
| ५७२ | * अविच्छिन्नश्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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रहनेवाला चिन्मयाकाशरूप ईश्वर ही अपने स्वरूपमें सृष्टि-रूपसे स्फुरित हो रहा है। उसका स्वभाव ही सृष्टिके नामसे विख्यात है। अतः चिन्मय होनेके कारण यह सृष्टि चैतन्यरूप ही है। सृष्टिके आरम्भमें विषयज्ञानशून्य जो शुद्ध एक अजन्मा अव्यय आदि और अन्तसे शून्य परब्रह्म स्थित था, वही हमारे समक्ष सृष्टिरूपसे विराजमान है। वास्तवमें यहाँ सृष्टि नामकी कोई वस्तु है ही नहीं और न ये भूगोल तथा खगोल आदि ही हैं। सब कुछ शान्त, अवलम्बनशून्य, ब्रह्ममात्र ही है और ब्रह्ममें ही स्थित है। भाव्य, भावक और भाव आदिकी जो निरन्तर उत्पत्ति प्रतीत होती है, वह सब स्वच्छ चिन्मयाकाश ही स्वयं अपने आपमें स्थित है। ऐसी अवस्थामें कहाँसे सृष्टि हुई, कहाँसे अविद्या आयी और कहाँ अज्ञता एवं अहंकार आदिकी स्थिति है? सब शान्त, चिद्घन ब्रह्म ही तो है। इस प्रकार मैने तुमसे अहंकारकी शान्तिका उपाय बताया है। अहंभावको यदि अच्छी तरह जान लिया जाय तो बालकल्पित पिशाचकी भाँति वह स्वतः शान्त हो जाता है।
समस्त सृष्टियाँ ब्रह्ममें ही कल्पित हैं—इस दृष्टिसे परमात्मा ब्रह्मका कोई अणु अंश भी ऐसा नहीं है, जो सृष्टियोंसे ठसाठस भरा हुआ न हो। परंतु वे सृष्टियाँ भी वास्तवमें कहीं उपलब्ध नहीं होती हैं। वह सब कुछ परब्रह्म-रूप आकाश ही है। सृष्टियोंमें कोई सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग भी ऐसा नहीं है, जो सदा ब्रह्मस्वरूप न हो। इसलिये ब्रह्म और सृष्टि इन नामोंमें ही उच्चारणमात्रका भेद है, इनसे प्रतिपादित होनेवाली वस्तुमें नहीं। सृष्टि ही परब्रह्म है और परब्रह्म ही सृष्टि है। अग्नि और सूर्यकी उष्णताओंके समान इनमें तनिक भी भेद नहीं है। श्रीराम! व्यवहारमें लगे हुए ज्ञानीके लिये भी यह सब कुछ शान्त, एक, अनादि, अनन्त, स्वच्छ, निर्विकार, शिलाके सदृश अत्यन्त घन और मौन ब्रह्मरूप ही है। (सर्ग ५७-५८)
समाधिकालमें वसिष्ठजीके द्वारा अनन्त चेतनाकाशमें असंख्य ब्रह्माण्डोंका अवलोकन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र! तदनन्तर, (सौ वर्षोंके पश्चात्) मैं ध्यानसे जगा—समाधिसे विरत हुआ। उस समय वहाँ मुझे एक मधुर ध्वनि सुनायी दी, जो बडी मनोरम थी; परंतु उसके पद और अक्षर अधिक स्पष्ट नहीं थे। वह ध्वनि पदार्थ और वाक्यार्थ-का बोध करानेमें समर्थ नहीं थी। किसी नारीके कण्ठसे निकली हुई वाणीके समान उसमें स्वाभाविक कोमलता और मधुरता थी, स्वरमें काफी लोच था, उच्चस्वरसे उच्चारित न होनेके कारण उस ध्वनिमें गम्भीरता (दूरसे सुनायी देनेकी योग्यता) नहीं थी। इस प्रकार उसके विषयमें मैने कुछ कालतक तर्क-वितर्क किया, वह आवाज ऐसी लगती थी, मानो भ्रमरोंका गुंजारव हो रहा हो, तन्त्रीके तार झंकृत होने लगे हों। वह न तो किसी बालकका रोदन था और न द्विजबालकके वेदाध्ययनका स्वर ही। कमलकोषमें गुंजारव करनेवाले भ्रमरकी ध्वनि-से वह आवाज मिलती-जुलती थी। उस शब्दको सुन-कर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मै दसों दिशाओंमें दृष्टि फैलाकर वह शब्द करनेवाले प्राणियोंका अन्वेषण करने लगा। उस समय वहाँ मेरे हृदयमें यह विचार उत्पन्न हुआ—'अहो! आकाशका यह भाग लाखों योजनकी दूरी लाँघकर बहुत ऊँचाईपर स्थित है। जिन मागोंसे सिद्ध पुरुष ही विचरण करते हैं, उनसे भी शून्य यह प्रदेश है। इसलिये इस एकान्त स्थानमें ऐसे शब्दकी उत्पत्ति कहाँसे हो रही है? मै यत्नपूर्वक दृष्टिपात करने-पर भी शब्द करनेवालेको नहीं देख रहा हूँ। मेरे सामने यह जो अनन्त निर्मल आकाश है, सब ओरसे सूना-ही-सूना दीख रहा है। प्रयत्नपूर्वक देखनेपर भी यहाँ मुझे कोई प्राणी नहीं दीखता है। अच्छा तो मै अपने इस देहाकाशको ध्यानके द्वारा यहीं ज्यों-का-त्यों स्थापित करके चेतनाकाशस्वरूप होकर अव्याकृत आकाशके
४७- पाषाण-जगत्के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्में जानेके लिये प्रेरित करना
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन * ५३३
साथ उसी तरह एक हो जाता हूँ, जैसे जलबिंदु साधारण जलके साथ मिलकर एकरूप बन जाता है।' यों सोचकर मैं इस शरीरका त्याग करनेके लिये पद्मासनसे बैठ गया और समाधि लगानेके लिये मैंने पुनः अपनी आँखें बंद कर लीं। तदनन्तर इन्द्रिय-सम्बन्धी बाह्य विषयोंका तथा आन्तरिक विषयोंका भी स्पर्श त्याग-कर मैं एकमात्र संकल्परूप चित्ताकाश बन गया । इसके बाद क्रमशः उस चित्ताकाशको भी त्यागकर मैं बुद्धितत्त्वके स्थानमें पहुँच गया। फिर उसे भी छोड़कर चेतनाकाशमय अपने वास्तविक स्वरूपमें पहुँच गया।
फिर तो चैतन्यमय महाकाशके साथ एक होकर मैं असीम और सर्वव्यापी बन गया। निराकार और निराधार रहकर समस्त पदार्थोंका आधार बन गया। तब वहाँ मुझे झुंड-के-झुंड त्रैलोक्य, सैकड़ों संसार तथा लाखों या असंख्य ब्रह्माण्ड दिखायी देने लगे। वे सब ब्रह्माण्ड मायामय निर्मल आकाशमात्र रूपवाले थे। अतः वे परस्पर एक दूसरेकी दृष्टिमें नहीं आते थे। वे नाना प्रकारके आचार-विचारोंसे सम्पन्न थे; परंतु एक दूसरेके लिये शून्यरूप ही थे। परम चेतन आकाशके कोषमें स्थित हुए वे सब लोक शून्यतारूप ही थे, सत्य नहीं थे। कबसे उनकी सृष्टि हुई थी, यह किसीको ज्ञात नहीं था। वे सब-के-सब अज्ञानरूप दोषसे युक्त चिन्मय परमात्मामें अनादिकालसे ही कल्पित थे। चैतन्यके चमत्कारसे चमत्कृत चेतनाकाशमें सैकड़ों समुद्र, सूर्य, आकाश तथा मेरु आदि पर्वतोंसे युक्त खम्भेके समान वे लोक भासित होते थे तथा रजोगुण और तमोगुणसे कलुषित जान पड़ते थे। गन्धर्वनगरमें कारणादिके न होनेसे कारणरहित पृथ्वी आदिका अनुभव तो भ्रममात्र ही था। अतः ब्रह्मरूप अधिष्ठानकी सत्ता लेकर ही वे सब जगत् विद्यमान थे। उस अधिष्ठान सत्ताको न लेकर तो वे स्वरूपतः विद्यमान नहीं ही थे। मृगतृष्णाके जल-प्रवाह तथा आकाशकी नीलिमाके समान वे केवल भ्रमरूप अनुभवसे ही उत्पन्न हुए थे। अतः स्वरूपतः सत्य नहीं थे। परंतु सत्यरूप अधिष्ठानकी सत्तासे सत्य जान पड़ते थे। परब्रह्मरूपी गूलरके वृक्षमें भाँति-भाँति-विचित्र रसोंसे परिपूर्ण ब्रह्माण्डरूपी फल लगे थे, जो हवाके झोंकोंसे झूम रहे थे। देवता, असुर और मनुष्य आदि प्राणी उन फलोंके भीतर जन्तुओंके समान प्रतीत होते थे। तुम, मैं और यह आदि अभिमानपूर्ण बुद्धिके द्वारा अत्यन्त दृढ़ बनाये गये वे सब लोक गीली मिट्टीद्वारा बने हुए उन खिलौनोंके समान जान पड़ते थे, जो सूर्यकी किरणोंसे सूखकर कड़े हो गये हों।
वास्तवमें वे जगत् परमार्थ चैतन्यरूप ही थे, तथापि उससे भिन्नके समान प्रतीत होते थे। उन्मत्त होनेपर भी प्राप्त-से जान पड़ते थे तथा सदा असत् होकर भी सद्रूप-से भासित होते थे। परमात्मारूपी मूँगेके तिनकेके भीतर वे केवल आभासरूप थे और वायुके स्पन्दनकी भाँति स्वतः उत्पन्न हुए थे। श्रीराम ! उस समाधिकालमें मैंने अनन्त चेतनाकाशके भीतर अकारण ही उत्पन्न एवं विनष्ट होनेवाले बहुत-से लोक देखे, जो तिमिर रोग (रतौंधी) से युक्त आँखोंवाले पुरुषके द्वारा देखे गये भ्रममात्र ही सिद्ध होते थे। (सर्ग ५९)
श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन और उनकी उपेक्षा करके अनेक विचित्र जगत्का दर्शन करना तथा महाप्रलयके समय सब जीवोंके प्रकृति-लीन हो जानेपर पुनः किसको सृष्टिका ज्ञान होता है, श्रीरामके इस प्रश्नका उत्तर देना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उपर्युक्त रूपसे पूर्वोक्त शब्दके कारणका विचार करता हुआ मैं आवरणरहित चेतनाकाशरूप होकर थोड़ी देर तक इधर-उधर भ्रमण करता रहा। इसके बाद देखा कि
सं० यो० व० अं० २०—
४८- पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके सङ्कल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन
५७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ध्वनिके समान वह शब्द मेरे कानोंमें पडा। क्रमशः उसके पद स्पष्ट होने लगे। फिर मुझे यह मालूम हुआ कि किसीके द्वारा आर्या छन्दका पद गाया जा रहा है। फिर जहाँसे वह शब्द प्रकट हो रहा था उस स्थानपर दृष्टि पडी। वहाँ मुझे एक स्त्री दिखायी दी, जो दूर नहीं थी। वह सुवर्ण-द्रवके समान गौरकान्तिसे आकाशमण्डलको प्रकाशित कर रही थी। उसके गलेके हार तथा शरीरके वस्त्र कुछ-कुछ हिल रहे थे। उसके नेत्रप्रान्त अलकावलियोसे किंचित् आवृत्त हो रहे थे। उसे देखकर ऐसा जान पडता था मानो दूसरी लक्ष्मी आ गयी हो। उसका मुखमण्डल पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था। वह जब हँसती थी, तब फूलोंके ढेर-से झरते जान पड़ते थे। आकाशका कोश ही उसके रहनेका घर था। उसका सौन्दर्य चन्द्रमाकी किरणोंको लज्जित कर रहा था। वह ऐसी जान पडती थी मानो मोतियोंके समूहसे उसका निर्माण हुआ हो। वह कमनीय कान्तिमती नारी मेरा अनुसरण करनेके लिये उद्यत जान पड़ती थी। मेरे पास खडी हो मधुर मुस्कान और उत्तम भाव-विलास-से सुशोभित वह मनोहारिणी स्त्री मधुर स्वरसे कोमल वाणीमें इस आर्या छन्दका पाठ करने लगी,—
असदुचितरिक्तचेतन-
संसृतिसरिति प्रमुह्यमानानाम्।
अवलम्बनतटविटपिन-
मभिनौमि भवन्तमेव मुने॥
‘मुने! आपका अन्तःकरण उन राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि दोषोंसे सर्वथा शून्य है, जो असत्पुरुषोंके ही हृदयमें रहने योग्य हैं। आप संसार-सरितामें डूबकर मोहित होनेवाले प्राणियोंके आश्रयभूत तटवर्ती वृक्ष हैं; अतः मै सब ओरसे आपकी ही स्तुति करती हूँ।’
श्रीराम! यह सुनकर मैने उस मनोहर मुख एवं मधुर स्वरवाली स्त्रीकी ओर देखा और यह सोचकर कि ‘यह तो स्त्री है, इससे मेरा क्या प्रयोजन है?’ उसकी अवहेलना करके मै आगे बढ़ गया। तदनन्तर लोकसमूहोंसे युक्त माया दिखायी दी, उसे देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ। फिर उसका भी अनादर करके मै आकाशमें विचरण करनेको उद्यत हुआ। इसके बाद मैने आकाशमें स्थित हुई जगन्मायाका निरीक्षण करनेके लिये चिन्मयाकाशरूपसे ज्यों ही चेष्टा की, त्यों.ही वे सारे-के-सारे उग्र जगत् उसी तरह शून्यरूप हो गये जैसे स्वप्न, संकल्प (मनोराज्य) तथा कहानीमें वर्णित जगत् शून्यरूप होते हैं। इस प्रकार बताये गये वे सभी लोक होनेवाले प्रलयकालके दृश्यको वैसे ही नहीं जान पाते हैं, जैसे एक ही घरमें सोये हुए अनेक पुरुष एक दूसरेके स्वप्नमें होनेवाले रण-कोलाहलको नहीं सुनते हैं। श्रीराम! चेतनमें ही सब कुछ है, चेतनसे ही सब कुछ है, चेतन ही सब कुछ है और चारो ओरसे चेतन-ही-चेतन है। सारी सत्ता चिन्मय तथा सद् रूप ही है। यही मैने वहाँ पूर्णरूपसे देखा।* यह जो दृश्योंका दर्शन होता है, वह भ्रममात्र
* चिति सर्वं चितः सर्वं चित्सर्वं सर्वतश्च चित्।
चित्सर्वात्मिकेत्येतद् दृष्टं तत्र मयाखिलम्॥
(नि० प्र० उ० ६०। २३)
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * वसिष्ठजीद्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अभिन्नताका कथन * ५३०
है। आकाशमें प्रतीत होनेवाले वृक्षकी मञ्जरी है। सब कुछ चेतनाकाशका स्वरूप ही है। इस बातका मुझे वहाँ अनुभव हुआ। समष्टि बुद्धिरूप आकाशके साथ एकरूप होकर व्यापक, अनन्त एवं बोधरूप हुए मैंने इसका अनुभव किया। सम्पूर्ण जगत्का यह मायाजाल ब्रह्माकाशरूप ही है, दसों दिशाएँ ब्रह्माकाश ही हैं तथा काल, कला, देश, द्रव्य और क्रिया आदि भी ब्रह्माकाशरूप ही हैं। जो सब प्रकारके नाम और रूपसे रहित, पाषाणकी प्रतिमाके समान मौन और ज्योति-स्वरूप है, वही परब्रह्म परमात्मा यत्किंचित् नाम-रूपात्मक होकर जगत् कहलाता है। वहाँ समाधि-कालमें ऐसे लाखों जगत् भी अनुभवमें आये थे, जिनमें चन्द्रमण्डल भी उष्ण थे और सूर्य भी शीतलताकी मूर्ति जान पड़ते थे। श्रीराम ! कोई जगत् गिर रहे थे, कितने ही आकाशमें उड़ रहे थे और बहुतेरे सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रान्तिपूर्ण पदोंमें प्रतिष्ठित थे। इस तरह चैतन्य समुद्रके चञ्चल बुद्बुदोंके रूपमें दिखायी देनेवाले उन असंख्य लोकोंमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो मैंने न देखी हो।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! महाकल्पके विनाशकालमें जब समस्त भूतोंका समुदाय मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाता है, तब पुनः किसको किस तरह सृष्टिका ज्ञान होता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीरामभद्र ! महाप्रलय-कालमें पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश—इन सम्पूर्ण विशेष पदार्थोंका विनाश हो जानेपर ब्रह्मासे लेकर स्थावरतकके सभी जीव-जगत् जब मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाते हैं, तब पुनः जिस प्रकार इस जगत्का अनुभव होता है, वह बताता हूँ, सुनो। महाप्रलयके पश्चात् जो द्रष्टा शेष रहता है, वह शब्दादि व्यवहारमें प्रयोग करने योग्य नहीं होता। उसे मुनिजन परमार्थ चिन्मयघन कहते हैं। यह जगत् उसका हृदय है। अतः उससे भिन्न नहीं है। वही परमात्मदेव यह संकल्प करता है कि जगत् मेरा अपना स्वभाव और हृदय है। जगन्निश्चयरूपसे वह जगत्की सत्ता नहीं मानता है। इस प्रकार जब हम विचार करते हैं, तब जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं रहती। फिर क्या नष्ट होता है और क्या उत्पन्न। जैसे परम कारण परमात्मा अविनाशी है, वैसे ही उसका हृदय भी। महाकल्प आदि भी उसके अवयव ही हैं। अतः वे भी परमात्मासे भिन्न नहीं हैं। केवल अज्ञान ही यहाँ जगत् और परमात्मामें भेदकी प्रतीति कराता है, परंतु विचारपूर्वक देखा जाय तो उस अज्ञानका भी कहीं पता नहीं लगता है। अतः एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सदा और सर्वत्र विराजमान हैं। जगत्, उसकी उत्पत्ति तथा विनाश सर्वथा मिथ्या कल्पना हैं। इसलिए कभी कहीं किसीका कुछ भी न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है। यह जो दृश्य जगत् है, वह सदा शान्त, अजन्मा, ब्रह्मरूपसे ही स्थित है। यह अनादि जगत्रूप कभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यहाँ इस जगत्के रूपमें केवल ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही हैं। इस प्रकार विचारदृष्टिसे देखनेपर भ्रष्ट निर्धनोंके तुच्छ ऐश्वर्य भी तृणके समान निःसार ही सिद्ध होता है। ऐसा जानने-वाला अधिकारी पुरुष अपनेमें ब्रह्मभावका निश्चय करके अपने आत्मामें ही पूर्ण संतुष्ट रहता है। (सर्ग ६०-६१)
वसिष्ठजीके द्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अपनेसे अभिन्नताका कथन, आशंका दूर करनेवाली स्त्रीके कार्य तथा सम्भाषण आदिके विषयमें श्रीरामके प्रश्न और वसिष्ठजीके उत्तरका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! उस समय आपने पक्षियोंकी भाँति आकाशमें उड़ते हुए जो जगत्-समूहका अवलोकन किया था, वह क्या देखने योग्य भिन्न होता हुआ देखा था या सम्पूर्ण चिन्मयाकाशमात्र द्वैतरूपत्वसे ?
४९- ब्रह्मा और जगत्की एकताका स्थापन तथा द्वादश सूर्योंके उदयसे जगत्के प्रलयका रोमाञ्चकारी वर्णन
५७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! उस समय तो मैं सर्वव्यापी, अनन्तात्मा चिन्मयाकाशरूप हो गया था, उस अवस्थामें मेरा कहीं आना-जाना कैसे सम्भव हो सकता था ? न तो एक स्थानपर खड़े हुए पुरुषकी भाँति ही स्थित था और न गतिशील ही था, इस प्रकार परमात्म-स्वरूप चिदाकाशमें ही रहकर मैने अपने इस व्यापक शरीरके द्वारा यह सारा जगत्समूह देखा था । जैसे शरीरा-भिमानीके रूपमें स्थित होनेपर मै पैरसे लेकर मस्तक तकके अपने सभी अङ्गोंको देखता हूँ, उसी प्रकार मैंने इन चर्मचक्षुओंके बिना भी चिन्मय नेत्रसे सारे जगत्समुदाय-का अवलोकन किया था। इस विषयमें तुम्हारे लिये प्रमाण है, सपनेमें देखा हुआ संसार-विभ्रम; क्योंकि स्वप्नमें जो दृश्य अनुभूत होता है, वह चेतनाकाशरूप ही है, उसके सिवा दूसरा कुछ नहीं है । जैसे वृक्ष अपने पत्र, पुष्प और फल आदिको देखता है, वैसे ही मैंने भी अपने ज्ञानरूपी नेत्रसे सारे जगत्को देखा था । जैसे अवयवी अपने अवयवोंको अपनेमें ही अभिन्नरूपसे देखता है, उसी प्रकार मैंने इन समस्त सर्गोंको अपनेसे अभिन्न ही देखा और समझा था । श्रीराम ! बोधस्वरूप परमात्माके साथ एकताको प्राप्त हुआ मैं आज इस समय भी उन विविध सर्गोंको शरीर, आकाश, पर्वत, जल और स्थलको भी उसी तरह देख रहा हूँ ।
श्रीरामजीने पूछा-ब्रह्मन् ! कमलनयन ! आप जब इस प्रकार अनुभव कर रहे थे, तब आर्याछन्दका पाठ करने-वाली उस कान्तिमती नारीने क्या किया ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वह भी चिन्मयाकाशरूप-से ही आकाशमें मेरे समीप विनयपूर्वक खड़ी थी और उसी आर्याछन्दका पाठ कर रही थी । उस समय वह देवाङ्गना-सी जान पड़ती थी। जैसे मेरा शरीर चिन्मयाकाशमय था, उसी प्रकार उसका भी था । मैंने उस पूर्वशरीरसे वैसी ललना कभी नहीं देखी थी । मेरा शरीर चेतन-आकाश-मात्र था, वह भी चेतनाकाशमय रूप धारण किये हुए थी और सारा जगज्जाल भी उस समय वहाँ चिन्मयाकाशरूप-से ही स्थित था ।
श्रीरामजीने पूछा-भगवन् ! शरीरमें स्थित जीभ, तालु, ओठ तथा प्राणोंके प्रयत्नोंसे उत्पन्न हुए वर्णोंद्वारा जो वाक्य सम्पन्न होता है, वह आकाश-शरीरधारिणी उस स्त्रीके मुखसे कैसे प्रकट हुआ ? विशुद्ध चेतनाकाशरूप आत्माओंको रूपका दर्शन और आभ्यन्तर मनका अनुभव होना कैसे सम्भव है ? उस समय आपने जो जगत्के दर्शन और सम्भाषण आदि व्यवहार किये थे, उनकी सङ्गति कैसे लगती है ? आप इस विषयमें अपना यथार्थ निश्चय बताइये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे स्वप्नमें चिन्मयाकाश आत्मा ही बाह्य तथा आभ्यन्तर पदार्थोंके रूपसे प्रकट होता है वैसे ही मेरे उस समाधिकालमें भी यह सारा दृश्य प्रपञ्च चिन्मयाकाशरूपसे ही स्थित था। केवल वही दृश्य चिन्मयाकाशरूप रहा हो, ऐसी बात नहीं है, किंतु ये जितने पदार्थ हमलोगोंकी बुद्धिके विषय हैं, ये सब-के-सब तथा यह सारा संसार भी स्वच्छ चिन्मयाकाशरूप ही है । हमारे लिये जैसा वह था, वैसा ही सारा जगत् है । जैसे स्वप्नमें पृथ्वीपर खेती आदिके रास्तोंपर आने-जाने-के तथा पर्वत-प्रासाद आदिके ऊपर शयन आदिके जो व्यवहार होते हैं, वे सब चिदाकाशरूप ही हैं, उसी तरह उस समय 'मैं', 'तुम', 'वह स्त्री' तथा 'वह' और 'यह' सब कुछ चिदाकाशरूप ही था । रघुनन्दन ! तदनन्तर जैसे स्वप्नमें स्वप्नगत मनुष्योंके साथ व्यवहारकार्य चलता है, उस समय उस स्त्रीके साथ मेरा वार्तालाप-व्यवहार भी उसी तरह आरम्भ हुआ । जैसे वह स्वप्न-सदृश व्यवहार चिदाकाशरूप ही था, उसी प्रकार तुम मुझको, इस आत्माको तथा जगत्को भी चिदाकाशरूप ही समझो ।
( सर्ग ६२ )
[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * स्वप्नजगत्की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन * ५७३
स्वप्नजगत्की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा-मुने ! मुख, जीभ आदि अवयवोंसे रहित एकमात्र संकल्परूप देहसे आपका उस स्त्रीके साथ सम्भाषण आदि व्यवहार कैसे हुआ ? उस दशामें आपने क च ट त प आदि वर्णोंका कैसे उच्चारण किया ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! चिदाकाशस्वरूप तत्त्वज्ञानियोंके संकल्पमय देहवाले मुखसे क च ट त प आदि वर्णोंका किसी कालमें भी वैसे ही उच्चारण नहीं होता, जैसे मृतकोंके मुखसे कोई अक्षर नहीं निकलता है । ( स्वप्नकी भाँति ही वहाँ भी हुआ । )
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा- भगवन् ! जब यह जगत् स्वप्नरूप ही है, तब जाग्रत्-रूपसे कैसे स्थित है ? तथा असत्य होकर ही यह सत्य-सा कैसे हो गया ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! यह सब जगत् कैसे स्वप्नमय ही है, यह सुनो- स्वप्नके समान ही ये जगत् न तो आत्मासे भिन्नरूप हैं, न आत्माके समान सत्यरूप हैं और न स्थिर ही हैं । ये सब-के-सब एकमात्र अनिर्वचनीय आत्मसत्तासे स्थित हैं । वे सब जगत् एक-दूसरेको किंचिन्मात्र भी नहीं देख पाते तथा कोठीके भीतर रखे गये जड बीजोंकी एक राशिकी तरह भीतर-ही-भीतर सड़-गलकर नष्ट भी हो जाते हैं । नष्ट होकर भी वे चेतन-रूप ही रहते हैं, सर्वथा शून्य नहीं हो जाते । वे आपसमें एक-दूसरेको नहीं जानते । अज्ञानसे उनका चेतना-रूप ढक जानेके कारण निरन्तर सोये हुएके सदृश स्वप्नका अनुभव करते हैं । सोये हुए स्वप्नरूप जगज्जालकी व्यवस्थाके अनुसार व्यवहार करनेवाले जो राक्षस स्वप्नमें स्वप्नगत देवताओंद्वारा मारे गये, वे अब भी उसी स्वप्नमें स्थित हैं । श्रीराम ! बताओ तो सही, इस तरह जो स्वप्नमें मारे गये, वे क्या करते हैं ? अज्ञानके कारण मुक्त नहीं हुए तथा चेतन होनेके कारण पत्थरके सदृश भी स्थित न रहे । वे लोग पर्वत, सागर, पृथ्वी तथा अनेक जीव-जन्तुओंसे भरे इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको चिरकाल-तक उसी तरह अनुभव करते हैं जैसे हमलोग ( इसीलिये उनका अपना-अपना स्वप्न चिरकालकी अनुवृत्तिसे हमलोगोंके अनुभवकी तरह जाग्रदवस्थारूप ही हो जाता है । ) उनके कल्प और जगत्की स्थिति भी वैसी ही है, जैसी हमलोगोंकी है और हमलोगोंके जगत्की स्थिति भी वैसी ही है जैसी उन लोगोंकी है । उनके स्वप्नके वे पुरुष अपने तथा अन्य पुरुषके भी अनुभवसे सत्य ही हैं; क्योंकि अपनी तथा दूसरेकी सत्ताका निमित्तभूत जो अधिष्ठानस्वरूप चेतन है, वह सर्वव्यापी होनेके कारण सत्य एवं सम है । जैसे आत्मामें वे स्वप्नके पुरुष सत्य हैं, वैसे ही दूसरे पुरुष भी, जिनका प्रत्येक स्वप्नमें मुझे अनुभव होता है, वे सत्य ही हैं । तुमने अपने स्वप्नमें जो अनेक नगर तथा नागरिक देखे थे, वे सब वैसे ही अब भी स्थित हैं; क्योंकि सर्वव्यापी ब्रह्म सर्वस्वरूप है । भीतमें, आकाशमें, पाषाणमें, जलमें और स्थलमें सर्वत्र भिन्न-भिन्न पदार्थोंके अंदर चिन्मात्र परमात्मा ही विराजमान है । वही सम्पूर्ण विश्वरूपसे स्थित है; अतः चिन्मात्र परमात्माके सर्वव्यापी होनेसे जहाँ तहाँ सर्वत्र ही जगत् हैं । इनकी संख्या यहाँ कैसे बतलायी जा सकती है ! तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टिमें वह सारा जगत् परब्रह्म ही हैं; परंतु अज्ञानियोंके मनमें दृश्य-प्रपञ्चरूपसे स्थित हैं ।
( सर्ग ६३ )
५०- प्रलयकालके मेघोंद्वारा भयानक वृष्टि होनेसे एकार्णवकी वृद्धि तथा प्रलयाग्निका बुझ जाना
५७८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन, अपनी युवावस्थाके व्यर्थ बीतनेका उल्लेख
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर मैंने उस सुन्दरी ललनासे, जिसके नेत्र नील कमल-से विकसित, खिले हुए मालती-पुष्पके समान शोभा पाते थे, उसकी ओर देखकर कौतुकपूर्वक पूछा—'कमलपुष्पके भीतरी भाग—केसरकी-सी सुनहरी कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो ? मेरे पास किसलिये आयी हो ? किसकी पुत्री या पत्नी हो ? क्या चाहती हो ? कहाँ गयी थी ? और कहाँकी रहनेवाली हो ?'
विद्याधरीने कहा—मुने ! मैं अपना वृत्तान्त ठीक-ठीक बतला रही हूँ, सुनिये । यद्यपि परायी स्त्रीके साथ एकान्तमें वार्तालाप करना उचित नहीं है तथापि मैं बड़े कष्टमें हूँ और संकटसे छुटकारा पानेके हेतु प्रार्थना करनेके लिये आयी हूँ; अतः आप करुणावश मुझसे बिना किसी हिचकके मेरा समाचार पूछ सकते हैं। महर्षे ! परमोत्कृष्ट चिन्मय आकाशके किसी छोटे-से कोनेमें आपका यह आश्रमरूपी विलक्षण संसार बसा हुआ है । इसमें पाताल, भूतल और स्वर्ग—ये तीन प्रकोष्ठ ( बड़े-बड़े आँगन ) हैं । वहाँ हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आकारमें स्थित हुई मायाने कल्पना नामक एक कुमारी-( गृह-स्वामिनी ) का निर्माण किया है। इन तीनोंमें जो भूतल है, वह कंगनकी-सी आकृतिवाले द्वीपों और समुद्रोंसे घिरा हुआ है; अतः उनके रंगोंसे अनुरञ्जित हो ताम्रवर्णका दिखायी देता है; साथ ही कुछ ऊँचा भी है । इस प्रकार यह भूतल उपर्युक्त कंगनसे विभूषित जगल्लक्ष्मीकी कलाईके समान जान पड़ता है । द्वीपों और समुद्रोंके अन्तमें चारों ओरसे दस हजार योजनोंतक सुवर्णमयी भूमि स्थित है । उसके अन्तिम छोरपर लोकालोक नामसे विख्यात पर्वत है, जो जगल्लक्ष्मीकी ऊँची कलाईके समान शोभा पानेवाले इस भूपीठको कंगनके समान चारों ओरसे घेरे हुए है । उस लोकालोक पर्वतके शिखरोंपर रत्नमयी बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जो आकाशके समान निर्मल हैं । उन शिलाओंके बीचमें लोकालोक पर्वतके उत्तर भागमें उसके पूर्ववर्ती शिखरकी जो एक शिला है, उसके भीतर मैं निवास करती हूँ । उस शिलाका त्वचा-भाग कभी क्षीण न होनेवाले वज्रसार मणिके समान कठोर है। विधाताने मुझे वहाँ बाँध रखा है और इस प्रकार विवश होकर मैं उस प्रस्तर-यन्त्रमें वास कर रही हूँ । मुने ! मैं समझती हूँ कि उस शिलामें रहते हुए मेरे असंख्य युग बीत गये । केवल मैं ही नहीं बँधी हूँ, मेरे पतिदेव भी उसके भीतर वैसे
५१- बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन .. ५७१
ही बँधे हैं, जैसे सायंकालिक कमलकोशमें भ्रमर बँध जाता है। उस शिलाके कोटरमें, उसके संकीर्ण स्थानमें पतिके साथ रहकर मैने दीर्घकालतक सुख-दुःखका अनुभव किया है और इस अनुभवमें मेरे असंख्य वर्ष-समूह बीत गये हैं; किंतु अभीतक हम दोनों अपने एकमात्र दोष (कामना) के कारण मोक्ष नहीं पा रहे हैं। उसी तरह परस्पर ममता बाँधे हम दीर्घकालसे वहीं रहते हैं।
मुनीश्वर ! उस पाषाणके संकटमें केवल हमीं दोनों नहीं बँधे हैं, हमारा सारा परिवार भी वहीं बँधा पड़ा है। उसमें बँधे हुए मेरे पति ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुए हैं और प्राचीन कालके वृद्ध पुरुष हैं। यद्यपि वे सैकड़ों वर्षोंसे जी रहे हैं तथापि एक स्थानसे दूसरे स्थानतक चल नहीं सकते। वे बचपनसे ही ब्रह्मचारी हैं। वेदाध्ययनमें तत्पर रहते और छात्रोंको पढ़ाते हैं, किंतु आलसी हैं। एकान्त स्थानमें अकेले ही बैठे रहते हैं। उनके बर्तावमें कुटिलता नहीं है। वे चपलतासे कोसों दूर रहते हैं। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! मैं उन्हींकी भार्या हूँ; किंतु मुझमे एक व्यसन है। मैं उन पतिदेवके बिना पलभर भी देह धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ। ब्रह्मन् ! मेरे पतिने मुझे पत्नीरूपमें किस प्रकार प्राप्त किया और हम दोनोंका यह स्वाभाविक स्नेह परस्पर किस प्रकार बढ़ा, यह बताती हूँ, सुनिये।
पहलेकी बात है, मेरे पतिने जन्मके पश्चात् बाल्यावस्थामें ही किंचित् ज्ञान प्राप्त कर लिया और एक सत्पुरुषकी भाँति अपने निर्मल गृहमें वे रहने लगे। उन दिनों उन्होंने विचार किया कि मैं वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाला ब्राह्मण हूँ। मुझे अपने ही अनुरूप ऐसी भार्या कहाँसे प्राप्त हो सकती है, जो उत्तम जन्मके कारण शोभा पा रही हो ? इस प्रकार चिरकालतक चिन्तन करके उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और स्वयं ही मेरे नाथने अनिन्द्य सौन्दर्यसे युक्त अङ्गवाली मुझ नारीको मान्त्रिक संकल्पसे प्रकट किया। मानो चन्द्रदेवने निर्मल चाँदनी प्रकट की हो। मनसे उत्पन्न होनेके कारण मैं उनकी मानसी भार्या हुई और जैसे वसंत ऋतुमें मन्दार वृक्षकी उत्तम एवं सुन्दरी मञ्जरी बढ़ती है, उसी प्रकार मैं भी बढ़ने लगी। मैं निरन्तर लीला-विलासमें ही निरत रहने लगी। मेरे नेत्र लीला-पूर्ण तिरछी चितवनसे देखने लगे। मुझे सदा गाना-बजाना ही प्रिय लगने लगा। भोगोंसे कभी मुझे तृप्ति नहीं होती थी। मेरा दिनोदिन भोगोंमें अनुराग बढ़ता गया। आदरणीय महर्षे ! मेरे पतिदेव दीर्घसूत्री और स्वाध्यायशील होनेके कारण तपस्यामें ही लगे रहे। उन्होंने किसी तरहकी भी अपेक्षा मनमें लेकर मेरे साथ अबतक विवाह नहीं किया। इसलिये यौवनसम्पन्न तरुणी भी मैं उन्हें प्राप्त न कर सकनेके कारण व्यसनकी आगसे उसी प्रकार जलने लगी, जैसे कोई कमलिनी आगसे झुलस रही हो। फूलोंकी वर्षासे हरी-भरी सारी उद्यान-भूमियाँ मेरे लिये तपी हुई बालुकाराशिसे आच्छादित सूनी मरुभूमियोंकी भाँति दाहक प्रतीत होने लगीं। जो पदार्थ सुन्दर, उचित, स्वादु और मनोहर हैं, उन्हें देखकर मेरी ये आँखें आँसुओंसे भर आतीं। मैं रमणीय स्थानमें रोती। जो स्थान न रम्य है न अरम्य—मध्यम कोटिका है, वहाँ मैं सौम्य हो जाती और जो असुन्दर स्थान है वहाँ मैं प्रसन्न रहती। न जाने मुझ दीना नारीकी ऐसी अवस्था कैसे हो गयी ? भगवन् ! इस प्रकार मेरे नवीन यौवनके बहुत-से दिन व्यर्थ बीत गये।
(सर्ग ६४)
५८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विद्याधरीका वैराग्य और अपने तथा पतिके लिये तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेके हेतु उसकी वसिष्ठ मुनिसे प्रार्थना
विद्याधरी बोली— मुने ! तदनन्तर जैसे शरत्काल बीतनेपर रसहीन हुए पल्लवोंकी लाली मिट जाती है, उसी प्रकार दीर्घकालके पश्चात् मेरा वह अनुराग वैराग्यके रूपमें परिणत हो गया। मैं सोचने लगी—'मेरा स्वामी बूढ़ा होनेके कारण एकान्तवासका रसिक, नीरस और स्नेहशून्य हो गया। यद्यपि उसकी बुद्धिमें कुटिलता नहीं है, तो भी वह मेरी ओरसे सदा मौन ही रहता है; अतः मैं समझती हूँ कि मेरे जीवनका कोई फल नहीं है, इसलिये अब इसे रखनेसे क्या लाभ। बचपनसे ही विधवा हो जाना अच्छा है, मर जाना भी अच्छा है अथवा रोगोंका आक्रमण तथा दूसरी-दूसरी विपत्तियोंका टूट पड़ना भी अच्छा है; परंतु जिसका स्वभाव मनके अनुकूल न हो, ऐसे पतिका मिलना अच्छा नहीं। उसी स्त्रीका जीवन सफल है, जिसका पति सदा उसके अनुकूल चलता हो; वही धन-सम्पत्ति सार्थक है, जिसका साधु-पुरुष उपयोग करते हैं तथा वही बुद्धि, वही साधुता और वही समदर्शिता उत्तम है, जो मधुर एवं उदार है। यदि पति और पत्नी एक-दूसरेके प्रति पूर्ण अनुराग रखते हों तो उनके मनको आधि-व्याधियाँ, विपत्ति-समूह तथा दुर्भिक्ष लानेवाले उपद्रव भी कष्ट नहीं पहुँचा सकते। जिन स्त्रियोंके पति प्रतिकूल स्वभाववाले हों अथवा जो स्त्रियाँ विधवा हो गयी हों, उनके लिये फूलोंसे भरी हुई पुष्प-वाटिकाएँ तथा नन्दनवनकी भूमियाँ भी मरुभूमिके समान दुःखद हो जाती हैं। संसारके सारे पदार्थ स्त्रियोंद्वारा स्वेच्छानुसार त्याग दिये जाते हैं, परंतु वे किसी भी दशामें पतिको नहीं त्याग सकतीं।
मुनीश्वर ! अब मेरा वह पतिविषयक अनुराग वैसे ही विरागरूपमें परिणत हो गया है, जैसे पालेकी मारी या जलायी कमलिनीका राग क्रमशः नीरस हो जाता है। मुने ! अब मुझे समस्त पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो गया है, इसलिये मैं इस समय आपके उपदेशसे अपनी मुक्ति चाहती हूँ। जिन्हें मनोवाञ्छित वस्तुओंकी प्राप्ति नहीं हुई, जिनकी बुद्धि परमात्मपदमें विश्राम न पा सकी तथा जो मरणतुल्य दुःखोंके प्रवाहमें बहे जा रहे हैं, ऐसे लोगोंके लिये जीनेकी अपेक्षा मर जाना अच्छा है। मेरे पतिदेव भी अब मोक्ष पानेके लिये ही दिन-रात चेष्टा करते रहते हैं। जैसे राजा किसी राजाकी सहायतासे दूसरे राजापर विजय पानेके लिये सचेष्ट होता है, इसी प्रकार मेरे पति भी मनके द्वारा ही मनको जीतनेके प्रयत्नमें सावधानीके साथ लगे हुए हैं। महान् ! आप मेरे उन पतिका और मेरा भी अज्ञान दूर करनेके लिये न्याययुक्त वाणीद्वारा उपदेश देकर आत्मतत्त्वका ज्ञान कराइये। जब मेरे पति मेरी उपेक्षा करके ही परमात्म-तत्त्वके चिन्तनमें लग गये, तब वैराग्यने मेरे लिये संसारकी स्थितिमें नीरसता पैदा कर दी।
मैं संसारकी वासनाके आवेशसे शून्य हूँ, इसलिये आकाशमें विचरनेकी शक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाली खेचरी मुद्रानामक तीव्र एवं अभीष्ट धारणाको बाँधकर सुस्थिरचित्त हो गयी हूँ। उक्त धारणाके द्वारा आकाशमें विचरनेकी शक्ति पाकर मैने पुनः दूसरी धारणाका अभ्यास किया, जो सिद्ध पुरुषोंका सङ्ग एवं उनके साथ सम्भाषणरूप फल देनेवाली है। (इसीलिये आज यहाँ आकर आपके साथ वार्तालाप करनेका सौभाग्य प्राप्त कर सकी।) तत्पश्चात् मैं अपने निवासभूत ब्रह्माण्डके
५२- ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण, अहंकाराभिमानी रुद्रदेवका आविर्भाव, उनके अवयवों तथा आयुधका विवेचन, उनके द्वारा एकार्णवके जलका पान तथा शून्य ब्रह्माण्डकी चेतनाकाशरूपताका प्रतिपादन
निर्वाण-प्रकरण उ०] ❖ श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोकपर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना ❖ ५८१
पूर्वापर भागघटित (नीचे-ऊपरके सम्पूर्ण) आकारको भलीभाँति देखनेकी इच्छासे तदाकार भावनामयी धारणा बाँधकर स्थित हुई। वह धारणा भी मेरे लिये सिद्ध हो गयी। फिर मैं अपने उस ब्रह्माण्डके अंदरकी सभी वस्तुओंको देखकर जब बाहर निकली, तब वह लोकालोक पर्वतकी स्थूल शिला मुझे दिखायी दी। मेरे पतिदेव केवल शुद्ध वेदार्थके एकान्तचिन्तनमें ही लगे रहते हैं। उनकी सारी एषणाएँ दूर हो चुकी हैं। वे न तो किसीका आना जानते हैं न जाना—उन्हें न तो भूतकालका पता रहता है, न वर्तमान और भविष्यका ही। अहो ! उनकी कैसी अद्भुत स्थिति है ? परन्तु वे मेरे पति विद्वान् होते हुए भी अबतक परमपदको प्राप्त न कर सके। अब वे और मैं दोनों ही परमपदको पानेकी इच्छा रखते हैं। ब्रह्मन् ! आपको हमारी यह प्रार्थना सफल करनी चाहिये; क्योंकि महापुरुषोंके पास आये हुए कोई भी याचक कभी विफलमनोरथ नहीं होते। दूसरोंको मान देनेवाले महर्षे ! मैं आकाशमण्डलमें सिद्ध-समूहोंके बीच सदा घूमती रहती हूँ; परंतु यहाँ आपके सिवा दूसरे किसी ऐसे महात्माको नहीं देखती जो अज्ञानके गहन वनको दग्ध करनेके लिये दावानलके तुल्य हो। ब्रह्मन् ! करुणासागर ! संत-महात्मा अकारण ही प्रार्थीजनोंकी मनोवाञ्छा पूर्ण किया करते हैं, इसलिये आपकी शरणमें आयी हुई मुझ अबलाका आप तिरस्कार न करें। तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर मुझे और मेरे पतिको कृतार्थ करें।
(सर्ग ६५)
श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोकपर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना, उस शिलामें उन्हें विद्याधरीकी बतायी हुई सृष्टिका दर्शन न होना, विद्याधरीका इसमें उनके अभ्यासाभावको कारण बताकर अभ्यासकी महिमाका वर्णन करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! ब्रह्माण्डके पूर्ववर्णित ऊर्ध्व आकाशमें संकल्पद्वारा कल्पित आसनपर बैठे हुए मैने, उसी आकाशमें कल्पित आसनपर स्थित हुई वह नारी जब मेरे पूछनेपर उपर्युक्त बातें कह चुकी, तब पुनः उससे प्रश्न किया—'बाले ! शिलाके पेटमें तुम-जैसे देहधारियोंकी स्थिति कैसे हो सकती है ? उसमें हिलना-डुलना कैसे होता होगा ? तथा तुमने वहाँ किस लिये घर बनाया ?'
विद्याधरी बोली—मुने ! जैसे आपलोगोंका यह संसार बहुत ही विस्तृतरूपसे प्रकाशित हो रहा है, उसी प्रकार उस शिलाके उदरमें सृष्टि और संसारसे युक्त हम-लोगोंका जगत् भी स्थित है। वहाँ भी यहाँकी भाँति ही देवता, असुर, गन्धर्व, पृथ्वी, पर्वत, पाताल, समुद्र, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब वस्तुएँ हैं।
मुने ! यदि आप मेरी बातको असम्भव समझते हों तो आइये, उस सृष्टिको अच्छी तरह देख लीजिये, मेरे साथ चलनेके लिये कृपा कीजिये; क्योंकि बड़े लोगोंको आश्चर्ययुक्त वस्तुएँ देखनेके लिये बड़ा कौतूहल होता है। रघुनन्दन ! तब मैने 'बहुत अच्छा' कहकर उसकी बात मान ली और शून्य (आकाश)-रूप हो, शून्यरूपधारिणी उस नारीके साथ शून्य आकाशमें उसी तरह उड़ना आरम्भ किया, जैसे आँधी या ववंडरके साथ फूलोंकी सुगन्ध उड़ती है। तदनन्तर दूरतकका रास्ता तय करनेके बाद आकाशकी शून्यताको लाँघकर मैं उस नारीके साथ
५८२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आकाशवर्ती भूतसमुदायके पास जा पहुँचा। चिरकालके बाद आकाशमें प्राणियोंके संचारमार्गको पारकर मैं लोकालोक पर्वतके शिखरके ऊपर आकाशभागमें पहुँच गया, उस शिखरके पूर्वोत्तर भागमें स्थित चन्द्रतुल्य उज्ज्वल बादलके पीठभागसे नीचे उतरकर वह नारी मुझे उस ऊँची शिलाके पास ले गयी, जो तपाये हुए सुवर्णकी बनी जान पड़ती थी। मैंने उस शुभ्र शिलाको जब अच्छी तरह देखना आरम्भ किया, तब उसमें वह जगत् मुझे नहीं दिखायी दिया। केवल वह सुवर्णमयी शिला ही अग्निलोक (सुमेरु) के उच्चतम तटकी भाँति दृष्टिगोचर हुई। तब मैंने उस कान्तिमती नारीसे पूछा—'तुम्हारी वह सृष्टिभूमि कहाँ है? उस लोकके रुद्र, सूर्य, अग्नि और तारे आदि कहाँ हैं तथा भूर्भुवः आदि सातों भिन्न-भिन्न लोक कहाँ हैं? समुद्र, आकाश और दिशाएँ कहाँ हैं? प्राणियोंके जन्म और नाश कहाँ हो रहे हैं? बड़े-बड़े मेघोंकी घटाएँ कहाँ घिरी हुई हैं? ताराओंकी तड़क-भड़कसे युक्त आकाश यहाँ कहाँ दिखायी देता है? कहाँ हैं शैलशिखरोंकी वे श्रेणियाँ? कहाँ है महासागरोंकी पङ्क्तियाँ? कहाँ हैं मण्डलाकार सातों द्वीप और कहाँ है तपाये हुए सुवर्णके सदृश वह भूमि? कार्य और कारणकी कल्पनाएँ कहाँ हैं? भूतों और उनके भवनोंका भ्रम कहाँ हो रहा है? कहाँ हैं विद्याधर और गन्धर्व? कहाँ हैं मनुष्य, देवता और दानव तथा कहाँ हैं ऋषि, राजा और मुनि? नीति-अनीतिकी रीतियाँ कहाँ चलती हैं? हेमन्त ऋतुकी पाँच पहरवाली रातें यहाँ कहाँ हो रही हैं? स्वर्ग और नरकके भ्रम कहाँ हैं? पुण्य और पापकी गणना कहाँ हो रही है? कल्प और कालकी क्रीड़ाएँ कहाँ होती हैं? देवताओं और असुरोंमें कहाँ वैर देखे जाते हैं तथा द्वेष और स्नेहकी रीतियाँ कहाँ उपलब्ध होती हैं?' मेरे इस प्रकार पूछनेपर निर्मल नेत्रवाली उस सुन्दरीने आश्चर्यचकित दृष्टिसे मेरी ओर देखकर इस प्रकार कहा।
विद्याधरी बोली—सर्वस्वरूप ब्रह्मर्षे! मैं भी अब पहलेकी भाँति अपने उस सम्पूर्ण जगत्को तो इस शिलाके भीतर नहीं देख रही हूँ; परंतु मैंने जिन मनुष्य, गन्धर्व आदिका पहले वर्णन किया है, उन सबको दर्पणमें स्थित प्रतिबिम्बकी भाँति इस शिलामें प्रतिबिम्बित देखती हूँ। इस समय जो कुछ दीखता है, वह पहले देखे गये नगरसे भिन्न-सा है। मुने! मुझे जो उस जगत्का कुछ-कुछ दर्शन हो रहा है, उसमें नित्यका मेरा अनुभव ही कारण है। आपको यह अनुभव नहीं है, इसीलिये आपको उसका दर्शन नहीं हो रहा है। इसके सिवा चिरकालतक हमलोगोंमें जो यह एक अद्वैतकी चर्चा चलती रही है, उससे विशुद्ध आतिवाहिक (सूक्ष्म मनोमय) देहका विस्मरण हो गया है। इसके कारण भी आपको वह जगत् नहीं दीखता और मुझको स्फुटरूपसे उसका दर्शन होता है। मैंने चिरकालसे जिसका अत्यन्त अभ्यास किया था, मेरा वह जगत् भी आकाश-लताके समान अदृश्य हो गया है; क्योंकि मैं स्पष्टरूपसे उसे नहीं देख पा रही हूँ। जो संसार पहले मेरे लिये अत्यन्त प्रकट था, उसीको इस समय मैं दर्पणमें प्रतिबिम्बितकी भाँति अस्पष्टरूपसे देख रही हूँ। नाथ! हम दोनोंमें परस्पर दीर्घकालतक जो सम्भाषण हुआ, उससे अपने अत्यन्त विशुद्ध एवं व्यापक स्वास्थ्य
५३- रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन
[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोक पर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना * ५८३
( धारणाभ्यास-जनित मनोमयदेहरूपता ) का विस्मरण हो गया। प्रभो ! जो अभ्यासजनित संस्कार शुद्ध चेतन आकाशके रससे उद्बुद्ध होकर प्रकाशित होता है, उसीके आकारका आन्तरिक चित्त भी हो जाता है। बाल्यावस्थासे लेकर अबतक वही वस्तुस्थिति देखी जाती है। भगवन् ! यह जो आपके साथ संवाद हुआ है, इसने अपने जगत्के निरन्तर अभ्यासके कारण पूर्व जगत्के भ्रमसे युक्त हुई मुझको निश्चय ही वशमें कर लिया। इसीलिये वह संस्कार लुप्त-सा हो गया। भूत और वर्तमानकालके दो धर्मोंमेंसे वर्तमानकालका भ्रम ही बलवान् होनेके कारण विजयी हुआ।
मैं एक पाषाण-शिलामें निवास करनेवाली अबला हूँ, बाला एवं आपकी शिष्या हूँ; फिर भी मैं तो इस शिलाके भीतर स्थित हुई सृष्टिको देखती हूँ और आप सर्वज्ञ होकर भी नहीं देखते। देखिये, यह अभ्यासका विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है। अभ्याससे अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी चूर्ण हो जाता है और बाण अपने महान् लक्ष्यको भी वेध डालता है। देखिये, यह अभ्यासकी प्रबलता कैसी है ? मुने ! अभ्याससे कटु पदार्थ भी मनको प्रिय लगने लगता है—अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्याससे ही किसीको नीम अच्छा लगता है और किसीको मधु। निकट रहनेका अभ्यास होनेपर जो भाई-बन्धु नहीं है, वह भी भाई-बन्धु ( आत्मीय ) बन जाता है और दूर रहनेके कारण बारंबार मिलनेका अभ्यास न होनेसे भाई-बन्धुओंका स्नेह भी घट जाता है। भावनाके अभ्याससे ही यह आतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणाके अभ्यासकी भावनासे पक्षियोंके समान आकाशमें उड़नेकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिये, अभ्यासकी कैसी महिमा है ! निरन्तर अभ्यास करनेसे दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध ( सुलभ ) हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने इष्ट वस्तुके लिये अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्योंमें अधम है। वह कभी उस वस्तुको नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वन्ध्या स्त्री अपने गर्भसे पुत्र नहीं पाती। जो नराधम अपनी अभीष्ट वस्तुके लिये अभ्यास ( बारंबार प्रयत्न ) नहीं करता, वह अनिष्ट वस्तुमें ही रत रहता है; इसलिये वह अनिष्टको ही प्राप्त होता है और एक नरकसे दूसरे नरकमें गिरता रहता है। जिससे संसार असार बन जाता है। पर विवेकका सेवन करनेवाले जो श्रेष्ठ पुरुष आत्म-विचार नामक अभ्यासको नहीं छोड़ते, वे निश्चय ही इस बढ़ी-चढ़ी विस्तृत माया-नदीको पार कर जाते हैं। इष्ट वस्तुके लिये किया गया चिरकालिक अभ्यासरूपी सूर्य प्रजाजनोंके समक्ष ऐसा प्रकाश फैलाता है, जिससे वे देहरूपी भूतलपर रहकर जन्म-मरण आदि सहस्रों अनर्थोंको पैदा करनेवाली इन्द्रियरूपिणी रात्रिको नहीं देखते। बारंबार किये जानेवाले प्रयत्नको अभ्यास कहते हैं, उसीका नाम पुरुषार्थ है। उसके बिना यहाँ कोई गति नहीं है। अपने विवेकसे उत्पन्न हुए दृढ़ अभ्यास नामक अपने कर्मको यत्न कहते हैं। उसीसे यहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, और किसी उपायसे नहीं। इन्द्रियोंपर विजय पानेमें समर्थ वीरपुरुषके लिये अभ्यास-
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रूपी सूर्यके तपते रहनेपर भूमिमें, जलमें और आकाशमें भी ऐसी कोई अभिलषित वस्तु नहीं है, जो सिद्ध नहीं हो सकती। भूमण्डलमें तथा पर्वतकी समस्त निर्जन गुफाओंमें जितने भयके कारण हैं, वे सब अभ्यासशाली पुरुषके लिये अभयदायक बन जाते हैं।
(सर्ग ६६-६७)
श्रीवसिष्ठजीके द्वारा आतिवाहिक शरीरमें आधिभौतिकताके भ्रमका निराकरण
विद्याधरीने कहा—अतः मुने! अब हम दोनों निर्मल परमात्मामें सर्वबोधानुकूल समाधिरूप धारणा-द्वारा अपने प्राचीन आतिवाहिक भावका पुनः अभ्यास करें। ऐसा करनेसे ही इस शिलाके भीतरका जगत् प्रकट होगा।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! उस पर्वतपर विद्याधरीने जब यह युक्तियुक्त बात कही, तब मैं पद्मासन लगाकर बैठ गया और समाधिमें स्थित हो गया। उस समय सम्पूर्ण बाह्य पदार्थोंकी भावनाका त्याग हो जानेपर चिन्मात्रस्वरूप होकर मैंने उस पूर्वके अर्थकी—आधिभौतिक देहादिकी भावना एवं उसके संस्कार-मलका भी सर्वथा त्याग कर दिया। तत्पश्चात् चेतनाकाशरूपताको प्राप्त हो मैंने उसी तरह उत्तम दृष्टि प्राप्त कर ली, जैसे शरत्काल आनेपर आकाश निर्मलताको धारण कर लेता है। तदनन्तर सत्यस्वरूप परमात्माके शुद्ध ध्यानाभ्याससे मेरी देहमें आधिभौतिकताकी भ्रान्ति निश्चय ही दूर हो गयी तथा तत्काल ही उदय एवं अस्तसे रहित होनेपर भी नित्य उदित रहनेवाली और अत्यन्त निर्मल महाचेतनाकाशरूपता प्रकट-सी हो गयी। इसके बाद जब मैं साक्षीरूप अपने ही निर्मल तेजसे देखने लगा, तब वास्तवमें मुझे न तो वह आकाश दीख पड़ा और न वह पाषाणशिला ही कहीं दिखायी दी। सब कुछ केवल परमतत्त्वमय ही दृष्टिगोचर हुआ। मैंने स्वरूपबोधके पहले कभी जिसकी आकृति शिलामयी देखी थी, बोधके पश्चात् उसे स्वच्छ चिद्घन ब्रह्माकाशरूप ही देखा, पृथ्वी आदि विकारोंके रूपमें उस सद्-वस्तुको कहीं नहीं देखा। प्रिय श्रीराम! यह जो वर्तमान-कालका दृश्य-प्रपञ्च मनको प्रत्यक्ष दिखायी दे रहा है, यह आधिभौतिक देह आदिकी कल्पनाद्वारा अत्यन्त असद्रूपसे ही प्रकट हुआ है। अतः इसे तुम प्रत्यक्ष ही असत् समझो और उस योगिप्रत्यक्षको ही मुख्य प्रत्यक्ष जानो; क्योंकि उसमें सद्रूप परमात्माके यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार होता है। अहो! परमेश्वरकी माया कैसी विचित्र है, जिससे प्राक्-प्रत्यक्षमें (अर्थात् पहलेसे ही जो प्रत्यक्ष है, उस साक्षी चेतनमें) तो परोक्षताका निश्चय हो रहा है और इस परोक्ष मनमें प्रत्यक्षभावकी कल्पना आ गयी है। यद्यपि सुवर्णसे कड़ा बनता है—इसका सभीको अनुभव है, तथापि यह निश्चय है कि सुवर्ण कड़ा नहीं है। उसी प्रकार सूक्ष्मशरीरमें आधिभौतिकता नहीं है। यह जीव विचार न करनेके कारण भ्रमको यथार्थ और यथार्थको भ्रम समझ रहा है। अहो! यह कैसी मूढ़ता है। जै
५४- रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन
[निर्वाण-प्रकरण उ०] * विद्याधरीका पाषाण-जगत्के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना * ७८५
सीपीमें चाँदी, मृगतृष्णामें जल और एक चन्द्रमामें दो चन्द्रमाकी बुद्धि मिथ्या ही है, उसी प्रकार आतिवाहिक (सूक्ष्म) शरीरमें आधिभौतिकता (स्थूल-रूपता) की बुद्धि भी मायासे ही हो रही है, वह वास्तविक नहीं है। जो असत् है, उसे सत्य मान लिया गया है और जो सत्य है, उसे असत् समझ लिया गया है। अहो! जीवके अविचारसे उत्पन्न हुए इस मोहकी कैसी महिमा है! जो आदि प्रत्यक्ष (सूक्ष्मशरीर) को छोड़कर इस वर्तमान प्रत्यक्ष (स्थूलशरीर) में ही सत्यबुद्धि करके स्थित है। वह मानो मृगतृष्णाका जल पीकर तृप्तिका अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक बैठा है।
विषयोंका जो सुख है, वह क्षणभङ्गुर है, इसका सबको बारंबार अनुभव होता है। इसलिये उस सुख-को दुःखरूप ही कहा गया है तथा जो नित्य, अनादि और अनन्त आत्मसुख है, उसीको वास्तविक सुख बताया गया है। अज्ञानीकी दृष्टिमे यह जगद्रूप भ्रान्ति ही सत्यरूपताको प्राप्त हो गयी है। मदिरा पीकर मतवाले हुए पुरुषको ये सुस्थिर वृक्ष और पर्वत ही नाचते-से प्रतीत होते है। जो योगियोंके प्रत्यक्ष अनुभवमें आये हुए, सर्वत्र अप्रतिहत, अद्वैत बोधरूप, पूर्णानन्दैकरस चित्-स्वरूप ब्रह्मकी सत्ता प्रत्यक्ष होनेपर भी दूसरे तुच्छ प्रत्यक्ष नेत्र आदि इन्द्रियोंसे दीखनेवाले रूप आदि विषयको सत्य मानकर उसका आश्रय लेते हैं, वे महान् मूर्ख हैं। अपने-आपको ही धोखा देनेवाले उस तृणतुल्य अधम पुरुषोंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है।
(सर्ग ६८)
विद्याधरीका पाषाण-जगत्के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना और उन्हें समाधिसे जगाना, उनके और देवतादिके द्वारा वसिष्ठजीका स्वागत-सत्कार, वसिष्ठजीके पूछनेपर ब्रह्माजीका उन्हें अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना और उस कुमारी नारीको वासनाकी देवी बताना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! तदनन्तर अबाध चेष्टावाली वह विद्याधरी उस शिलाके भीतर स्थित हुई सृष्टिमें प्रविष्ट हुई। फिर मैं भी उसके साथ संकल्परूप होकर वहाँ जा पहुँचा। वह उद्यमशील तथा उत्कृष्ट शोभासे युक्त नारी उस जगत्के ब्रह्मलोकमें पहुँचकर ब्रह्माजीके सामने बैठ गयी और बोली—'मुनिश्रेष्ठ! यही मेरे पति हैं, जो मेरा पालन करते हैं। इन्होंने पूर्वकालमें मेरे साथ विवाह करनेके लिये अपने मनके द्वारा मुझे उत्पन्न किया था। ये पुरातन पुरुष हैं और मैं भी अब जरावस्थाको आ पहुँची हूँ। इन्होंने आजतक मेरे साथ विवाह नहीं किया; इसलिये मैं विरक्त हो गयी हूँ। इनको भी वैराग्य हो गया है। ये उस परम पदको प्राप्त करना चाहते हैं, जहाँ न कोई द्रष्टा है, न दृश्य है और न शून्य ही है। इसलिये मुनीश्वर! आप मुझको और इनको भी तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर उस परब्रह्म परमात्माके पथमें लगा दीजिये, जो वैज्ञानिक प्रपञ्चनरूप रहनेवाली सारी सृष्टियोके मूल कारण हैं।'
मुझसे ऐसा कहकर वह उन ब्रह्माजीको जगानेके लिये इस प्रकार बोली—'नाथ! ये मुनिनाथ वसिष्ठजी आज इस घरमें पधारे हैं। ये मुनि दूसरे ब्रह्माण्ड-रूपी घरमें रहनेवाले ब्रह्माजीके पुत्र हैं। प्रभो! गृहस्थके घरपर आये हुए अतिथिके योग्य पूजाद्वारा आप इन गृहागत महर्षिका पूजन कीजिये। समाधिसे उठिये और अर्घ्य, पाद्य देकर इन मुनीश्वरकी पूजा कीजिये; क्योंकि आप-जैसे महात्माओंको महापुरुषोंकी पूजासे प्राप्त होनेवाला महान् फल ही रुचता है।'
श्रीराम! उस विद्याधरीके ऐसा कहनेपर वे परम बुद्धिमान् ब्रह्माजी समाधिसे जाग उठे। नीतिके ज्ञाता उन विद्वान् ब्रह्माने धीरेसे अपनी आँखें खोलीं। मानो शिशिर ऋतुकी समाप्ति होनेपर वसन्त ऋतुने पृथ्वीपर
५५- शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन
| ५८६ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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उत्पन्न हुए दो फूलोंको विकसित कर दिया हो। उनके वे विभिन्न अङ्ग धीरे-धीरे अपनी-अपनी सजगता (ज्ञानयुक्त चेष्टा) प्रकट करने लगे, मानो वसन्त ऋतुके नूतन पल्लव नूतन रसकी अभिव्यक्ति कर रहे हों। तदनन्तर देवताओ, सिद्धो और अप्सराओके समुदाय चारो ओरसे वहाँ उसी तरह आ पहुँचे, जैसे प्रातःकाल विकसित कमलोंसे सुशोभित सरोवरमें झुंड-के-झुंड हंस आ गये हों। ब्रह्माजीने सामने खड़े हुए मुझको और उस विलासशालिनी विद्याधरीको देखा। देखकर वे प्रणवपूर्वक स्वरसहित उच्चरित होनेवाली सुन्दर वेदवाणीके समान मधुर वचन बोले—
उस दूसरे संसारके ब्रह्माजीने कहा—मुने ! आपने हाथपर रखे हुए आँवलेके समान इस असार संसारके सारतत्त्वको देख और जान लिया है। आप ज्ञानरूपी अमृतकी वर्षा करनेवाले महामेघ हैं। आपका स्वागत है। महर्षे ! इस समय आप इस अत्यन्त दूरवर्ती मार्गपर आ पहुँचे हैं। बहुत दूरका रास्ता तै करनेके कारण आप बहुत थक गये होगे। यह आसन है, इसपर बैठिये।
उनके ऐसा कहनेपर मैं बोला—'भगवन् ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।' ऐसा कहता हुआ मैं उनकी दृष्टिके संकेतसे दिखाये गये एक 'मणिमय पीठपर बैठ गया। फिर तो देवता, ऋषि, गन्धर्व, मुनि और विद्याधरोंद्वारा मेरी स्तुति की जाने लगी। इसके बाद पूजा, नमस्कार तथा अन्य समुचित नीतियुक्त व्यवहार सम्पादित हुए। दो घड़ीमें जब सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा किया गया प्रणाम-समारोह शान्त हुआ, तब उन ब्रह्माजीसे मैने कहा—'भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी ब्रह्मदेव ! यह क्या बात है कि यह नारी मेरे पास गयी और कहने लगी कि 'आप अपने ज्ञानोपदेशसे प्रयत्नपूर्वक हमें बोधकी प्राप्ति कराइये' देव ! आप तो सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा समस्त ज्ञानोंमें पारंगत हैं। जगत्पते ! बताइये, यह काममूढा स्त्री आपके विषयमें क्या कहती है । देव ! जब आपने इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ही उत्पन्न किया था तब फिर इसे उस पदपर क्यों नहीं प्रतिष्ठित किया, इसको वैराग्यकी ओर आप क्यों ले गये ?'
दूसरे जगत्के ब्रह्माजी बोले—मुने ! सुनिये, जैसी बात है, उसे आपके सामने ठीक-ठीक बता रहा हूँ; क्योंकि सत्पुरुषोंके सामने सब बातें यथार्थ और पूर्णरूपसे कहनी चाहिये। मुने ! वह जो शान्त, अजन्मा, अजर एवं अनिर्वचनीय परमार्थ सद्रूप ब्रह्म है, उसीको चेतन अथवा चित्त्तत्त्व कहते हैं। चैतन्य ही उसका एकमात्र स्वरूप है। उसी परमात्माने अपने स्वरूपभूत चैतन्यसे मुझे प्रकट किया है। मैं चिदाकाशरूप ही हूँ और सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता हूँ, जब सृष्टि उत्पन्न होकर यथावत् रूपसे स्थित हो जाती है, तब मेरा व्यावहारिक नाम स्वयम्भू होता है। वास्तवमें न तो मैं उत्पन्न होता हूँ और न कुछ देखता ही हूँ। मैं समस्त आवरणोंसे मुक्त रहकर चेतनाकाशरूप हो चेतनाकाशमें ही स्थित हूँ। यह जो आप मेरे सामने हैं और मैं आपके सामने हूँ तथा हमलोगोंमें जो यह परस्पर सम्भाषण हो रहा है, यह वैसा ही है, जैसे समुद्रमें एक तरङ्गके आगे दूसरी तरङ्ग हो और स्वयं समुद्र ही उन तरङ्गोके घात-प्रतिघातके रूपमें शब्द कर रहा हो। इस विषयमें मेरी ऐसी ही मान्यता है। इस प्रकार समुद्रसे तरङ्गोंकी कल्पनाके समान जिसने अपनी और दूसरेकी दृष्टिसे देखे जानेवाले भेदकी किंचित् कल्पना कर ली है तथा कालवशात् अपने स्वरूपको भी किंचित् भुला देनेके कारण जिसकी आकृति कुछ मलिन-सी हो गयी है, वह मैं चिदाभासमात्र ही हूँ। ऐसे रूपवाले मुझ ब्रह्माके अन्तःकरणमें जो ममता और अहंताकी वासना
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * पाषाण-जगत्के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखताका वर्णन * ५८७
उदित हुई है, वह उस कुमारी स्त्रीसे भिन्न जो आप हैं, आपको अन्य-सी प्रतीत होती है और मुझे अनन्य-सी जान पड़ती है। वह वासना हम दोनोंकी दृष्टिसे उदित (प्रकट) भी है और अनुदित (अप्रकट) भी। वस्तुतः मैं अविनाशिनी सत्तावाला हूँ; क्योंकि कभी मेरी उत्पत्ति नहीं हुई है। मैं आत्मरूपसे अपने आपमें ही स्थित हूँ। स्वभावसे ही मैं अच्युत, अपने आत्मामें रमण करनेवाला तथा स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हूँ। यह कुमारी स्त्रीके रूपमें जो सामने खड़ी है, वासनाकी अधिष्ठात्री देवी ही है। यह न तो मेरी गृहिणी हैं और न गृहिणी बनानेके निमित्त मैंने इसका सङ्कल्प ही किया है। अपनी वासनाके आवेशवश इसके मनमें यह भाव उत्पन्न हो गया कि 'मैं ब्रह्माजीकी पत्नी हूँ।' इस भावनाको लेकर यह स्वयं ही अत्यन्त दुःख उठा रही है और वह भी व्यर्थ। यही सारे जगत्के भीतर वासना बनकर बैठी हुई हैं। (सर्ग ६९)
पाषाण-जगत्के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्में जानेके लिये प्रेरित करना
अन्य जगत्के ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! (मैने अपने संकल्पसे कल्पित दो परार्ध वर्षोंकी आयु बिता दी) अब चिदाकाशरूप मैं निरतिशयानन्दरूप, ब्रह्माकाशमयी परम कैवल्यरूपा स्थितिको प्राप्त करना चाहता हूँ, इसीसे यहाँ मेरी वासनाद्वारा रचे गये इस संसारमें नित्य, नैमित्तिक, दैनन्दिन और आत्यन्तिक ये चारो प्रकारके प्रलय उपस्थित हो गये हैं। मुनीश्वर ! इस महाप्रलयकालमें अब मैने इसे त्याग देने—इस वासनाका मूलोच्छेद करके इसे अपनी सत्तासे गिरा देनेके उद्योग- का निश्चित रूपसे आरम्भ कर दिया है, इसीसे यह विरसताको प्राप्त अर्थात् विनाशोन्मुख हो गयी है। जब मैं चित्ताकाशरूपताको त्यागकर आदि चेतनाकाशरूप महाकाश होने जा रहा हूँ, तब यहाँ महाप्रलयका आना और वासनाका विनाश होना अवश्यम्भावी है। यही कारण है कि यह विरस होकर मेरे मार्गकी ओर दौड रही है। भद्र, ऐसा कौन उदारबुद्धि प्राणी है, जो अपने जन्मदाताका अनुसरण न करता हो ? आज यहाँ चारो युगोंका विनाश उपस्थित है, अन्तिम कल्प, अन्तिम मन्वन्तर तथा अन्तिम कलियुगकी समाप्तिका समय आ गया है, इसलिये आज ही प्रजा, मनु, इन्द्र तथा देवताओंका यह अन्तकाल आ पहुँचा है। आज ही यह कल्पका अन्त, महाकल्पका अन्त, मेरी वासनाका अन्त और मेरे देहाकाश- का भी अन्त होनेवाला है। ब्रह्मन् ! इसीलिये यह वासना अब क्षीण होनेको उद्यत है, जब कमलोंसे भरा हुआ सरोवर ही सूख रहा हो, तब गन्धलेश कहाँ ठहर सकती है ? केवल अभिमान ही जिसका शरीर है, ऐसी इस वासनाको स्वभावतः स्वयं ही आत्मदर्शनकी इच्छा होती है। आत्मसाक्षात्कारके लिये किये गये धारणाभ्यास- रूप योगसे इसने अन्य ब्रह्माण्डमें जाकर वहाँ आपके जगत्का दर्शन किया, जहाँ धर्म आदि चारो वर्गोंके अनुष्ठानमें लगी हुई स्वतन्त्र प्रजा निवास करती है। आकाशमें विचरती हुई इस विद्याधरीने उसी सिद्धिकी सामर्थ्यसे लोकालोक पर्वतके शिखरकी शिला देखी, जो इसके अपने जगत्की आधारभूत है तथा हमारी दृष्टिमें केवल आकाशरूप ही है। जिस जगत्रूपी पर्वतपर यह जगत् है और जिसमे उसकी शिलारूपता है, उस तथा हमारे जगद्रूप पदार्थोंमें ऐसे-ऐसे अनेक दूसरे जगत् भी हैं। यह जगत्रूपी भ्रान्ति जिनकी समझमें आ गयी अर्थात् जिनकी दृष्टिमें यह चेतनाकाशके साथ एकरूपताको प्राप्त हो गयी, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते
५६- प्रकृतिरूपा कालरात्रिके परमतत्त्व शिवमें लीन होनेका वर्णन
| ५८८ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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हैं और शेष जितने लोग हैं, वे भ्रमके ही भागी होते हैं।
मुने ! इस विद्याधरीको वैराग्यके कारण उत्पन्न अपने मनोरथको सिद्ध करनेकी इच्छा हुई। इसीलिये इसने अन्य बहुत-सी धारणाओंका अभ्यास करके उनके प्रभावसे आपका दर्शन प्राप्त किया। आदि-अन्तसे रहित एवं अनामय विद्यारूपा ब्रह्मकी चिन्मयी मायाशक्ति सब ओर व्याप्त है। इस जगत्में कोई भी कार्य न तो कभी उत्पन्न होते हैं और न नष्ट ही होते हैं। केवल चित् ही द्रव्य, काल और क्रियाके रूपमें प्रकाशित हो तप रही है। ये जो देश, काल, क्रिया, द्रव्य, मन और बुद्धि आदि हैं, सब-के-सब चेतनरूपी शिलाकी मूर्तियाँ हैं। इनका न कभी उदय होता है और न अस्त ही। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। यह चिच्छक्ति ही शिलाका आकार धारण करके स्थित है। जैसे स्पन्दन वायुका स्वरूप है, उसी प्रकार सारा जगत्-समुदाय इस चिच्छक्तिका अभिन्न अङ्ग है। यह जो चितिरूपा शिवा है, आदि-अन्तसे रहित है। किंतु भ्रमसे सादि और सान्त बन जाती है। निराकार होती हुई भी साकार हो जगतूरूप अङ्गोंसे युक्त बनकर स्थित हो जाती है। जैसे महाकाशके भीतर दूसरे-दूसरे आकाश (घटाकाश, मठाकाश आदि) महाकाशकी सत्तासे ही विद्यमान हैं, अपना पृथक् अस्तित्व नहीं रखते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् शून्यरूप होते हुए भी शान्तस्वरूप सर्वव्यापी चेतनाकाश परमात्मामें उसीकी सत्तासे सर्वत्र विद्यमान है। परंतु वे अपनी पृथक् सत्ता नहीं रखते हैं, इस दृष्टिसे उनके विषयमें 'हैं' और 'नहीं हैं'—ये दोनों बातें कही जा सकती हैं। मुनिवर वसिष्ठ ! अब आप यहाँसे अपने जगत्को जाइये और इस समय अपने पूर्व-कल्पित एकान्तवर्ती आसनपर समाधि लगाकर परम शान्तिका अनुभव कीजिये। मेरे जो कल्पित बुद्धि आदि जागतिक पदार्थ हैं, वे प्रलयको प्राप्त हो परम अव्यक्त तत्त्वमें मिल जायँ; क्योंकि इस समय हम परब्रह्म परमात्मपदको प्राप्त हो रहे हैं। (सर्ग ७०)
पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके संकल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा कहकर वे भगवान् ब्रह्मा सम्पूर्ण ब्रह्मलोकवासियोंके साथ पद्मासन लगाकर बैठ गये और फिर कभी न टूटनेवाली समाधिमें स्थित हो गये। उन्हींका अनुसरण करती हुई वह वासनाकी अधिष्ठात्री देवी सती-साध्वी कुमारी विद्याधरी भी उन्हींकी भाँति ध्यानमग्न हो शान्त हो गयी। उसका कोई भी अंश (स्मृति-बीजभेद) शेष नहीं रह गया। वह आकाशरूपिणी (शून्यत्वमात्रा) हो गयी। ब्रह्माजीका संकल्प धीरे-धीरे विरस होने लगा। जिस समय उनके संकल्पमें विरसता आयी, उसी क्षणसे तुरंत ही पर्वत, द्वीप और समुद्रोंसहित पृथ्वीकी तृण, गुल्म, लता और धान आदिको उत्पन्न करनेकी सारी शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होने लगी। जैसे हमलोगोंके अङ्ग संवेदनशक्तिके क्षीण होनेपर नीरस हो जाते हैं, उसी प्रकार ब्रह्माजीकी अङ्गभूता पृथ्वीकी संवेदनशक्तिका उपसंहार होनेसे वह नीरसताको प्राप्त हो गयी। ब्रह्माजीके द्वारा उपेक्षित होनेपर पृथ्वी आदि तथा असुर आदि—ये दो तरहके महाभूत सब ओरसे क्षुब्ध हो उठे। चन्द्रमा, सूर्य, वायु, इन्द्र, अग्नि और यम—ये सब-के-सब महाप्रलयके कोलाहलसे व्याकुल हो गये। उनका अधिकार एवं प्रभाव ब्रह्मलोकमें मिल गया। वे अपने स्थानसे नीचे गिरने लगे। भूकम्पोंके कारण बड़े-बड़े पर्वत जोर-जोरसे झूमने और झोंके खाने लगे, मानो वे झूला झूलनेके सुखका अनुभव कर रहे हों। उनके ऊपरकी वृक्षश्रेणियाँ
निर्वाण-प्रकरण उ०] * पाषाण-शिलाके भीतर धंसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन * ५८९
फट्फट शब्दके साथ टूट-टूटकर गिरने लगीं। भूकम्पके कारण कैलास, मेरु और मन्दराचलकी कन्दराएँ हिलने लगीं, और कल्पवृक्षोंसे टूटकर लाल रंगके पुष्पगुच्छोंकी वर्षा होने लगी। रघुनन्दन ! लोकान्तर-पर्वत, नगर, समुद्र और वनपर्यन्त सारा जगत् कल्पान्तकालकी उत्पात-वायुके झोकेसे परस्पर टकराकर हताहत होते हुए प्राणियोंके कोलाहलसे व्याप्त एवं जीर्ण-शीर्ण हो गया, मानो रुद्रदेवके बाणोंसे दग्ध हुआ त्रिपुर-नगर भरे हुए समुद्रमें गिर रहा हो।
रघुनन्दन ! जब विराट्रूप स्वयम्भू ब्रह्माने अपने प्राणोंका आकर्षण एवं निरोध किया, तब वातस्कन्धनामसे स्थित आकाशजन्मा वायुने अपनी मर्यादा (ग्रह, नक्षत्र आदिको धारण करनेकी जिम्मेदारी) छोड़ दी। ब्रह्माजीने जब प्राणवायुरूप वातस्कन्धका अपने भीतर उपसंहार करना आरम्भ किया, तब पूर्वोक्त मर्यादाको त्यागकर साम्यावस्थाको पहुँचनेके लिये वायुमें क्षोभ उत्पन्न हुआ और उस क्षोभ-के कारण निराधार होकर आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर वैसे ही भूमिपर गिरने लगे, जैसे कहीं आग लगनेपर यदि जोरसे हवा चलती हो तो बड़े-बड़े लुआठे उड़ने और गिरने लगते हैं। उस समय आकाशसे भूतलपर गिरते हुए तारे वृक्षसे झड़ते हुए फूलोंके समान जान पड़ते थे। ब्रह्माजीका संकल्परूप ईंधन जब प्रलयोन्मुख हो गया, तब जैसे जलती हुई लपटें बुझ जाती हैं, वैसे ही सिद्धोंकी गतियाँ भी शान्त हो गयीं, अपनी शक्तिका नाश हो जानेपर प्रलय-वायुके वेगसे पतली रुईके समान आकाशमें उड़ते और भटकते हुए सिद्धसमुदाय मूक होकर नीचे गिरने लगे। भूकम्पसे चञ्चल हुए देवगिरि सुमेरुके शिखर, इन्द्रादि देवताओंके नगरों तथा कल्पवृक्षोंके समूहोंसहित धड़ाधड़ धराशायी होने लगे।
रघुनन्दन ! पहले न तो कोई असत् वस्तु थी और न सत् ही; किंतु सभी विकारोंसे रहित एकमात्र चिन्मय परमाकाश ही था; जो अकेला ही सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त था। उसी परमाकाशने अपने स्वरूपका परित्याग न करके निर्विकार रहते हुए ही अपनी आकाशताको अपनेसे भिन्न वस्तुके रूपमें कल्पना की। उसे अपनेसे पृथक् चेत्यके रूपमें जाना, चिद्रूप होनेसे वह चेतन कहा गया है। जैसे लोग संकल्प-नगरको शून्यरूप होते हुए भी साकार देखते हैं, वैसे ही अजन्मा परमात्मा शून्यरूप आकाशको ही देहरूप देखने लगा। आकाशमें आकाशको ही अपना शरीर मानने लगा। श्रीराम ! इस प्रकार विचार करनेसे सिद्ध होता है कि ये जो ब्रह्मा हैं, वे ही यह वर्तमान जगत् बनकर स्थित हैं। विराट् ब्रह्माका जो देह है, वही यह जगत् है। संकल्पाकाररूप ब्रह्माजीको जो भ्रम हुआ है, वही इस जगत्-के रूपमें भासित हो रहा है और उसीको ब्रह्माण्ड कहा गया है। संकल्पसे ही जिसकी कल्पना हुई है, वह यह सारा जगत् आकाशरूप ही है। वास्तवमें न तो जगत् है और न कहीं त्वत्ता-मत्ता ('तुम' और 'मैं' के भाव) ही हैं। चिन्मात्र परब्रह्म परमात्मा स्वयं ही अद्वैत आत्मा-काशमें जगत् आदिरूप प्रकाशसे प्रकाशित हो आह्लाद या अनुभवका विषय हो रहा है। जैसे वायु अपनी गति-शीलताके कारण अनुभवमें आती रहती है। यह जगत् अद्वैतको छोड़ देनेपर कुछ है, ऐसा जान पड़ता है और द्वैतको त्याग देनेपर कुछ भी नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है। वास्तवमें जगत् द्वैत और अद्वैत—दोनोंसे रहित, शून्य, निर्मल और निरामय चेतनाकाशरूप ही समझो। राघवेन्द्र ! अनादि, नित्यानुभवरूप जो एकमात्र साक्षी चेतन है, वही दृश्य बनकर स्थित है। उसमें भिन्न दूसरी कोई दृश्य नामक वस्तु नहीं है। सत्यसुन्दर-रूप परमात्मामें जो अनेक प्रकारके अज्ञान प्रतीत होते हैं, वे ही विचित्र भ्रम पैदा करके सुविस्तृत दृश्य जगद्रूप महान् दृश्य उपस्थित करते हैं। (सर्ग ७१-७२)
५८- श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त हुए अनुभवका उल्लेख
५९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ब्रह्मा और जगत्की एकताका स्थापन तथा द्वादश सूर्योंके उदयसे जगत्के प्रलयका रोमाञ्चकारी वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र ! ये विराटरूपधारी विधाता समष्टि मनरूप होनेके कारण स्वयं ही मन हैं, अतः इनके लिये दूसरे मनकी आवश्यकता नहीं है। यही नहीं, ये विराट् पुरुष स्वयं ही इन्द्रियाँ हैं। अतः इन्हें दूसरी इन्द्रियोंके उपभोगकी आवश्यकता नहीं होती। इन्होंने ही तो अन्य सब शरीरोंमें इन्द्रियोंकी सृष्टि की है। इन्द्रियसमुदाय इनकी कल्पनामात्र ही है। इन्द्रिय और चित्तमे अवयवावयवी-भाव सम्बन्ध है। इन्द्रियाँ अवयव हैं और चित्त अवयवी--इन दोनोंका शरीर एक है, अतः इनमें थोडा-सा भी भेद नहीं है। पूर्णतः एकता है। संसारके जो कोई भी कार्य हैं, वे सब-के-सब उस विराट् पुरुषके ही हैं। क्योंकि ब्रह्माके संकल्प ही विभिन्न व्यष्टि वृत्तिसे अपनेमें भेदका आरोप करके जगद्-व्यवहारके रूपमें चल रहे हैं। उसीकी सत्तासे अनन्ताकार जगत्की सत्ता है और उसके संकल्पके उपसंहारसे ही जगत्का संहार है। वायु और उसकी चेष्टामें जैसी एकता है, वैसी ही एकता या एकसत्ता ब्रह्मा और जगत्की भी है। जगत्, ब्रह्मा और विराट्—ये तीनों पर्यायवाची शब्द हैं। जगत् और ब्रह्मा शुद्ध चेतनाकाशरूप परमात्माके संकल्पमात्र ही हैं।
रघुनन्दन ! मेरे सामने ब्रह्मलोक था। ब्रह्माजी ध्यानमग्न हो गये थे। मैंने धीरे-धीरे सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टि डाली। उस समय अपने सम्मुख देखा, मध्याह्न कालमें तपते हुए सूर्यके अतिरिक्त पश्चिम दिशामें भी एक दूसरा सूर्य प्रकट हुआ, जो स्पष्ट दिखायी देता था वह पश्चिम दिशाके मध्यभागमें दाह-सा उत्पन्न कर रहा था, मानो किसी पर्वतके ऊपर वहाँकी वनस्थलीमें दावानल प्रज्वलित हो उठा हो। आकाशमें अग्निलोक प्रकट हो गया हो अथवा महासागरमें बड़वाग्नि उद्दीप्त हो उठी हो। फिर तो क्रमशः नैर्ऋत्यकोण, दक्षिण दिशा, अग्निकोण, पूर्वदिशा, ईशान कोण, उत्तर दिशा, वायव्यकोण तथा पश्चिम दिशामें भी एक-एक सूर्य प्रकाशित हो उठा। उन सबको देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं विधाताकी प्रतिकूलतापर विचार करने लगा। इतनेमें ही भूतलसे भी शीघ्र ही एक सूर्य प्रकट हुआ, मानो समुद्रसे बड़वानल ऊपरको उठ गया हो। फिर दिशाओंके मध्यवर्ती आकाशमें ग्यारहवाँ सूर्य उदित हुआ। दिशाओके मध्यवर्ती सूर्यको ग्यारहवाँ कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि उसके ऊपर भी बारहवाँ सूर्य प्रकट हो चुका था। इस प्रकार एक भूतलपर, एक मध्य आकाशमें और एक उससे भी ऊपर—तीन सूर्य एकके ऊपर एकके क्रमसे दिखायी देते थे। इस तरह कुल मिलाकर बारह सूर्य प्रकट हुए थे। इनमें ग्यारहवाँ सूर्य भगवान् रुद्रका ही शरीर था और उसके भीतर तीन सूर्योंके रूपमें मानो तीन नेत्र प्रकट हो गये थे। वह अकेला ही बारह सूर्योंके बराबर देदीप्यमान था। वह बारह सूर्योंका समुदाय-सा जान पड़ता था, जो सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रचण्ड दाह उत्पन्न कर रहा था। जैसे दावानल सूखे वनको जला देता है, वैसे ही वह समस्त जगत्को दग्ध करने लगा। इन सूर्योंके उदय होनेसे समस्त ब्रह्माण्डमण्डलको सुखा देनेवाला ग्रीष्म ऋतुका भीषण दिन प्रकट हो गया था। कहीं भी उल्मुको (लुआठो) के समूह नहीं दिखायी देते थे। बिना अग्निके ही अग्निदाह हो रहा था (अर्थात् सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे ही सब कुछ स्वाहा हो रहा था, लौकिक अग्नि नहीं दिखायी देती थी)। कमलनयन श्रीराम ! बिना अग्निके ही होनेवाले उस अग्निदाहसे मेरे सारे अङ्ग दावानलसे झुलसे हुएकी भाँति व्यथित हो उठे। तब मैं उस प्रदेशको छोड़कर बहुत दूर चला आया।
१. पश्चिम दिशामें सूर्यके प्रकट होनेका जो पहले वर्णन आ गया है, उसका यहाँ अनुवादमात्र है। तात्पर्य यह कि अबतक आठों दिशाओं तथा मध्याह्नकालिक सूर्यको लेकर नौ सूर्य वसिष्ठजीके दृष्टिपथमें आ गये थे।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * ब्रह्म और जगत्की एकताका स्थापन * ५९१
राघवेन्द्र ! वहाँसे मैने दसो दिशाओंमें उदित हो तपते हुए बारह सूर्योंके समुदायको देखा, जिसके प्रचण्ड तेजसे सातों विशाल महासागर काढ़ेकी भाँति खौल रहे थे और उनसे महान् खन्-खन् शब्द प्रकट हो रहा था। समस्त लोकों और नगरोंके भीतरी भाग प्रचण्ड ज्वालाओ तथा अंगारोंसे भर गये थे। आगकी लपटें लाल रंगके गाढ़े कपड़ोंके समूहकी भाँति दिखायी देती थीं, जिन्होने सारे पर्वतोंको सिन्दूरी-रंगका बना दिया था। लोकपालो-के जलते हुए बड़े-बड़े घरोंमें ज्वालाव्याप्त दिशारूपी वस्त्र सुस्थिर विद्युत्की भाँति दीप्तिमान् दिखायी देते थे। नगरोंके समूह कटकट और चटचट शब्दके कोलाहलसे परिपूर्ण हो रहे थे। भूतलसे शिलाके समान घनीभूत दण्डाकार धूम प्रकट करके वे बारह सूर्य समस्त भुवनोंके निवासमण्डपको मानो सहस्रों काँचके खम्भोंसे सुशोभित कर रहे थे। प्राणियोंके निवासभूत नगरोंके धराशायी होने और फटनेसे भयानक चटचट शब्द हो रहे थे। तारे टूट-टूटकर गिर रहे थे। सभी स्थानोंमें अपने-अपने घरोंके भीतर तापसे जलते हुए जन-समुदाय इधर-उधर भाग रहे थे। चीखने-चिल्लानेके साथ मरे-पचे प्राणियोंके दग्ध शरीरोंसे सम्पूर्ण दिशाओंमें दुर्गन्ध फैल रही थी। समुद्रकी तपी हुई जलराशिमें राँधे जाते हुए जलचरोंके समुदाय छटपटा रहे थे। सम्पूर्ण दिशाओंमें फैली हुई आगसे गाँवों और नगरोंका सब कुछ स्वाहा हो गया था। वहाँ कोई रोनेवाला भी नहीं रह गया था। दिग्गजोंके शरीर दग्ध होकर फट गये थे। वे अपने दाँतोंसे दिगन्त पर्वतोंको उठाये हुए ही जल गये थे। पर्वतोंकी गुफाओंमें भरे हुए धूममण्डल उन सूर्योंके कुण्डलोसे जान पडते थे। धराशायी होते हुए पर्वतोंसे पिसकर कितने ही नगरोंके समुदाय चूर-चूर हो गये थे। गिरिराजोंपर निवास करनेवाले गजराजोंको वे सूर्यमण्डल पच-पचकी आवाजके साथ पका रहे थे। संतापसे तप्त होकर उछलते हुए प्राणियोंको देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो उनके निवासभूत समुद्रों और पर्वतोंको भी ज्वर आ गया हो। उन सूर्योंके तापसे हृदय फट जानेके कारण नि स्सार हुए त्रिदशर और उनकी अङ्गनाएँ नीचे गिर रही थीं। दुष्ट लोग जोर-जोरसे रोने-चिल्लानेके कारण थक गये थे और कुछ योगी लोग ब्रह्मरन्ध्रको फोड़कर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हो अमर पद (मोक्ष) में प्रतिष्ठित हो चुके थे। स्वर्गलोकमें जलती हुई ज्वालाओद्गार भूतलसे लेकर पातालतकका भाग खूब तप रहा था। सूखते हुए समुद्रमे निरन्तर पकते हुए भयंकर जलचर उछलते और छटपटाते दिखायी देते थे। जलरूपी इन्धन न मिलनेसे मानो वडवानल उछलकर आकाशमें चला गया था और वहाँ सहस्रो रूप धारण करके मानो गगनाङ्गनाओको पकड़कर नृत्य कर रहा था। महाप्रलयकालका प्रचण्ड अनल ज्वालारूपी पलाश-पुष्पके समान लाल रंगवाले वस्त्रसे सुशोभित हो नटराजकी भाँति ताण्डव नृत्य-सा करनेके लिये उद्यत हुआ था। उन्मुक्त ही मानो उसके लिये पुष्पहार थे। वेगसे फटने हुए बाँस आदिके फट-फट शब्द मानो उसके पैरोंकी धमक थे। वह उद्भट भटकी भाँति वीरोचित शब्द करता हुआ कालरूपी भुजाओको ऊपर उठाये, धूमरूपी केश छिटकाये, जगतरूपी जीर्ण कुटीमें नृत्य कर रहा था। उस समय वनोंके समूह, ग्राम, नगर, मण्डल, द्वीप, दुर्ग, जंगल, स्थल, पृथ्वीके समस्त छिद्र, उसके ऊपरका महान् आकाश, दसों दिशाएँ, द्युलोक तथा उसके ऊपरका भाग-ये सब-के-सब जल रहे थे। गड्ढे, रहट, बाजार. हाट. अट्टालिका और नगरसमूहमे सुशोभित दिशाओंके तटप्रान्त, पर्वतोंके शिखर, सिद्धोंके समूह, पर्वत, मगर, सरोवर, तालाब, तलैया, नदी, देवता, असुर, मनुष्य, सर्प तथा पुरुष-समूह रुद्रदेवके नेत्रोंकी सनसनाती हुई ज्वालाओसे दग्ध हो रहे थे।
अनेक सूर्योंके उदय और अस्त आदिसे विन्ध्याचल भी व्यथित हो उठा था । आकाश अग्निरूपी कमलोसे सुशोभित सरोवरके समान दिखायी देता था ।