भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! उस समय तो मैं सर्वव्यापी, अनन्तात्मा चिन्मयाकाशरूप हो गया था, उस अवस्थामें मेरा कहीं आना-जाना कैसे सम्भव हो सकता था ? न तो एक स्थानपर खड़े हुए पुरुषकी भाँति ही स्थित था और न गतिशील ही था, इस प्रकार परमात्म-स्वरूप चिदाकाशमें ही रहकर मैने अपने इस व्यापक शरीरके द्वारा यह सारा जगत्समूह देखा था । जैसे शरीरा-भिमानीके रूपमें स्थित होनेपर मै पैरसे लेकर मस्तक तकके अपने सभी अङ्गोंको देखता हूँ, उसी प्रकार मैंने इन चर्मचक्षुओंके बिना भी चिन्मय नेत्रसे सारे जगत्समुदाय-का अवलोकन किया था। इस विषयमें तुम्हारे लिये प्रमाण है, सपनेमें देखा हुआ संसार-विभ्रम; क्योंकि स्वप्नमें जो दृश्य अनुभूत होता है, वह चेतनाकाशरूप ही है, उसके सिवा दूसरा कुछ नहीं है । जैसे वृक्ष अपने पत्र, पुष्प और फल आदिको देखता है, वैसे ही मैंने भी अपने ज्ञानरूपी नेत्रसे सारे जगत्‌को देखा था । जैसे अवयवी अपने अवयवोंको अपनेमें ही अभिन्नरूपसे देखता है, उसी प्रकार मैंने इन समस्त सर्गोंको अपनेसे अभिन्न ही देखा और समझा था । श्रीराम ! बोधस्वरूप परमात्माके साथ एकताको प्राप्त हुआ मैं आज इस समय भी उन विविध सर्गोंको शरीर, आकाश, पर्वत, जल और स्थलको भी उसी तरह देख रहा हूँ ।

श्रीरामजीने पूछा-ब्रह्मन् ! कमलनयन ! आप जब इस प्रकार अनुभव कर रहे थे, तब आर्याछन्दका पाठ करने-वाली उस कान्तिमती नारीने क्या किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वह भी चिन्मयाकाशरूप-से ही आकाशमें मेरे समीप विनयपूर्वक खड़ी थी और उसी आर्याछन्दका पाठ कर रही थी । उस समय वह देवाङ्गना-सी जान पड़ती थी। जैसे मेरा शरीर चिन्मयाकाशमय था, उसी प्रकार उसका भी था । मैंने उस पूर्वशरीरसे वैसी ललना कभी नहीं देखी थी । मेरा शरीर चेतन-आकाश-मात्र था, वह भी चेतनाकाशमय रूप धारण किये हुए थी और सारा जगज्जाल भी उस समय वहाँ चिन्मयाकाशरूप-से ही स्थित था ।

श्रीरामजीने पूछा-भगवन् ! शरीरमें स्थित जीभ, तालु, ओठ तथा प्राणोंके प्रयत्नोंसे उत्पन्न हुए वर्णोंद्वारा जो वाक्य सम्पन्न होता है, वह आकाश-शरीरधारिणी उस स्त्रीके मुखसे कैसे प्रकट हुआ ? विशुद्ध चेतनाकाशरूप आत्माओंको रूपका दर्शन और आभ्यन्तर मनका अनुभव होना कैसे सम्भव है ? उस समय आपने जो जगत्‌के दर्शन और सम्भाषण आदि व्यवहार किये थे, उनकी सङ्गति कैसे लगती है ? आप इस विषयमें अपना यथार्थ निश्चय बताइये ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जैसे स्वप्नमें चिन्मयाकाश आत्मा ही बाह्य तथा आभ्यन्तर पदार्थोंके रूपसे प्रकट होता है वैसे ही मेरे उस समाधिकालमें भी यह सारा दृश्य प्रपञ्च चिन्मयाकाशरूपसे ही स्थित था। केवल वही दृश्य चिन्मयाकाशरूप रहा हो, ऐसी बात नहीं है, किंतु ये जितने पदार्थ हमलोगोंकी बुद्धिके विषय हैं, ये सब-के-सब तथा यह सारा संसार भी स्वच्छ चिन्मयाकाशरूप ही है । हमारे लिये जैसा वह था, वैसा ही सारा जगत् है । जैसे स्वप्नमें पृथ्वीपर खेती आदिके रास्तोंपर आने-जाने-के तथा पर्वत-प्रासाद आदिके ऊपर शयन आदिके जो व्यवहार होते हैं, वे सब चिदाकाशरूप ही हैं, उसी तरह उस समय 'मैं', 'तुम', 'वह स्त्री' तथा 'वह' और 'यह' सब कुछ चिदाकाशरूप ही था । रघुनन्दन ! तदनन्तर जैसे स्वप्नमें स्वप्नगत मनुष्योंके साथ व्यवहारकार्य चलता है, उस समय उस स्त्रीके साथ मेरा वार्तालाप-व्यवहार भी उसी तरह आरम्भ हुआ । जैसे वह स्वप्न-सदृश व्यवहार चिदाकाशरूप ही था, उसी प्रकार तुम मुझको, इस आत्माको तथा जगत्‌को भी चिदाकाशरूप ही समझो ।

( सर्ग ६२ )