संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * वसिष्ठजीद्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अभिन्नताका कथन * ५३०
है। आकाशमें प्रतीत होनेवाले वृक्षकी मञ्जरी है। सब कुछ चेतनाकाशका स्वरूप ही है। इस बातका मुझे वहाँ अनुभव हुआ। समष्टि बुद्धिरूप आकाशके साथ एकरूप होकर व्यापक, अनन्त एवं बोधरूप हुए मैंने इसका अनुभव किया। सम्पूर्ण जगत्का यह मायाजाल ब्रह्माकाशरूप ही है, दसों दिशाएँ ब्रह्माकाश ही हैं तथा काल, कला, देश, द्रव्य और क्रिया आदि भी ब्रह्माकाशरूप ही हैं। जो सब प्रकारके नाम और रूपसे रहित, पाषाणकी प्रतिमाके समान मौन और ज्योति-स्वरूप है, वही परब्रह्म परमात्मा यत्किंचित् नाम-रूपात्मक होकर जगत् कहलाता है। वहाँ समाधि-कालमें ऐसे लाखों जगत् भी अनुभवमें आये थे, जिनमें चन्द्रमण्डल भी उष्ण थे और सूर्य भी शीतलताकी मूर्ति जान पड़ते थे। श्रीराम ! कोई जगत् गिर रहे थे, कितने ही आकाशमें उड़ रहे थे और बहुतेरे सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रान्तिपूर्ण पदोंमें प्रतिष्ठित थे। इस तरह चैतन्य समुद्रके चञ्चल बुद्बुदोंके रूपमें दिखायी देनेवाले उन असंख्य लोकोंमें ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो मैंने न देखी हो।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! महाकल्पके विनाशकालमें जब समस्त भूतोंका समुदाय मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाता है, तब पुनः किसको किस तरह सृष्टिका ज्ञान होता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीरामभद्र ! महाप्रलय-कालमें पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश—इन सम्पूर्ण विशेष पदार्थोंका विनाश हो जानेपर ब्रह्मासे लेकर स्थावरतकके सभी जीव-जगत् जब मूलप्रकृतिमें विलीन हो जाते हैं, तब पुनः जिस प्रकार इस जगत्का अनुभव होता है, वह बताता हूँ, सुनो। महाप्रलयके पश्चात् जो द्रष्टा शेष रहता है, वह शब्दादि व्यवहारमें प्रयोग करने योग्य नहीं होता। उसे मुनिजन परमार्थ चिन्मयघन कहते हैं। यह जगत् उसका हृदय है। अतः उससे भिन्न नहीं है। वही परमात्मदेव यह संकल्प करता है कि जगत् मेरा अपना स्वभाव और हृदय है। जगन्निश्चयरूपसे वह जगत्की सत्ता नहीं मानता है। इस प्रकार जब हम विचार करते हैं, तब जगत् नामकी कोई वस्तु नहीं रहती। फिर क्या नष्ट होता है और क्या उत्पन्न। जैसे परम कारण परमात्मा अविनाशी है, वैसे ही उसका हृदय भी। महाकल्प आदि भी उसके अवयव ही हैं। अतः वे भी परमात्मासे भिन्न नहीं हैं। केवल अज्ञान ही यहाँ जगत् और परमात्मामें भेदकी प्रतीति कराता है, परंतु विचारपूर्वक देखा जाय तो उस अज्ञानका भी कहीं पता नहीं लगता है। अतः एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही सदा और सर्वत्र विराजमान हैं। जगत्, उसकी उत्पत्ति तथा विनाश सर्वथा मिथ्या कल्पना हैं। इसलिए कभी कहीं किसीका कुछ भी न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है। यह जो दृश्य जगत् है, वह सदा शान्त, अजन्मा, ब्रह्मरूपसे ही स्थित है। यह अनादि जगत्रूप कभी उत्पन्न नहीं हुआ है। यहाँ इस जगत्के रूपमें केवल ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही हैं। इस प्रकार विचारदृष्टिसे देखनेपर भ्रष्ट निर्धनोंके तुच्छ ऐश्वर्य भी तृणके समान निःसार ही सिद्ध होता है। ऐसा जानने-वाला अधिकारी पुरुष अपनेमें ब्रह्मभावका निश्चय करके अपने आत्मामें ही पूर्ण संतुष्ट रहता है। (सर्ग ६०-६१)
वसिष्ठजीके द्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगत्तोंकी अपनेसे अभिन्नताका कथन, आशंका दूर करनेवाली स्त्रीके कार्य तथा सम्भाषण आदिके विषयमें श्रीरामके प्रश्न और वसिष्ठजीके उत्तरका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! उस समय आपने पक्षियोंकी भाँति आकाशमें उड़ते हुए जो जगत्-समूहका अवलोकन किया था, वह क्या देखने योग्य भिन्न होता हुआ देखा था या सम्पूर्ण चिन्मयाकाशमात्र द्वैतरूपत्वसे ?