भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * स्वप्नजगत्‌की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन * ५७३

स्वप्नजगत्‌की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा-मुने ! मुख, जीभ आदि अवयवोंसे रहित एकमात्र संकल्परूप देहसे आपका उस स्त्रीके साथ सम्भाषण आदि व्यवहार कैसे हुआ ? उस दशामें आपने क च ट त प आदि वर्णोंका कैसे उच्चारण किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! चिदाकाशस्वरूप तत्त्वज्ञानियोंके संकल्पमय देहवाले मुखसे क च ट त प आदि वर्णोंका किसी कालमें भी वैसे ही उच्चारण नहीं होता, जैसे मृतकोंके मुखसे कोई अक्षर नहीं निकलता है । ( स्वप्नकी भाँति ही वहाँ भी हुआ । )

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा- भगवन् ! जब यह जगत् स्वप्नरूप ही है, तब जाग्रत्-रूपसे कैसे स्थित है ? तथा असत्य होकर ही यह सत्य-सा कैसे हो गया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा- श्रीराम ! यह सब जगत् कैसे स्वप्नमय ही है, यह सुनो- स्वप्नके समान ही ये जगत् न तो आत्मासे भिन्नरूप हैं, न आत्माके समान सत्यरूप हैं और न स्थिर ही हैं । ये सब-के-सब एकमात्र अनिर्वचनीय आत्मसत्तासे स्थित हैं । वे सब जगत् एक-दूसरेको किंचिन्मात्र भी नहीं देख पाते तथा कोठीके भीतर रखे गये जड बीजोंकी एक राशिकी तरह भीतर-ही-भीतर सड़-गलकर नष्ट भी हो जाते हैं । नष्ट होकर भी वे चेतन-रूप ही रहते हैं, सर्वथा शून्य नहीं हो जाते । वे आपसमें एक-दूसरेको नहीं जानते । अज्ञानसे उनका चेतना-रूप ढक जानेके कारण निरन्तर सोये हुएके सदृश स्वप्नका अनुभव करते हैं । सोये हुए स्वप्नरूप जगज्जालकी व्यवस्थाके अनुसार व्यवहार करनेवाले जो राक्षस स्वप्नमें स्वप्नगत देवताओंद्वारा मारे गये, वे अब भी उसी स्वप्नमें स्थित हैं । श्रीराम ! बताओ तो सही, इस तरह जो स्वप्नमें मारे गये, वे क्या करते हैं ? अज्ञानके कारण मुक्त नहीं हुए तथा चेतन होनेके कारण पत्थरके सदृश भी स्थित न रहे । वे लोग पर्वत, सागर, पृथ्वी तथा अनेक जीव-जन्तुओंसे भरे इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको चिरकाल-तक उसी तरह अनुभव करते हैं जैसे हमलोग ( इसीलिये उनका अपना-अपना स्वप्न चिरकालकी अनुवृत्तिसे हमलोगोंके अनुभवकी तरह जाग्रदवस्थारूप ही हो जाता है । ) उनके कल्प और जगत्की स्थिति भी वैसी ही है, जैसी हमलोगोंकी है और हमलोगोंके जगत्की स्थिति भी वैसी ही है जैसी उन लोगोंकी है । उनके स्वप्नके वे पुरुष अपने तथा अन्य पुरुषके भी अनुभवसे सत्य ही हैं; क्योंकि अपनी तथा दूसरेकी सत्ताका निमित्तभूत जो अधिष्ठानस्वरूप चेतन है, वह सर्वव्यापी होनेके कारण सत्य एवं सम है । जैसे आत्मामें वे स्वप्नके पुरुष सत्य हैं, वैसे ही दूसरे पुरुष भी, जिनका प्रत्येक स्वप्नमें मुझे अनुभव होता है, वे सत्य ही हैं । तुमने अपने स्वप्नमें जो अनेक नगर तथा नागरिक देखे थे, वे सब वैसे ही अब भी स्थित हैं; क्योंकि सर्वव्यापी ब्रह्म सर्वस्वरूप है । भीतमें, आकाशमें, पाषाणमें, जलमें और स्थलमें सर्वत्र भिन्न-भिन्न पदार्थोंके अंदर चिन्मात्र परमात्मा ही विराजमान है । वही सम्पूर्ण विश्वरूपसे स्थित है; अतः चिन्मात्र परमात्माके सर्वव्यापी होनेसे जहाँ तहाँ सर्वत्र ही जगत् हैं । इनकी संख्या यहाँ कैसे बतलायी जा सकती है ! तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टिमें वह सारा जगत् परब्रह्म ही हैं; परंतु अज्ञानियोंके मनमें दृश्य-प्रपञ्चरूपसे स्थित हैं ।

( सर्ग ६३ )