संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन, अपनी युवावस्थाके व्यर्थ बीतनेका उल्लेख
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तदनन्तर मैंने उस सुन्दरी ललनासे, जिसके नेत्र नील कमल-से विकसित, खिले हुए मालती-पुष्पके समान शोभा पाते थे, उसकी ओर देखकर कौतुकपूर्वक पूछा—'कमलपुष्पके भीतरी भाग—केसरकी-सी सुनहरी कान्तिवाली सुन्दरी ! तुम कौन हो ? मेरे पास किसलिये आयी हो ? किसकी पुत्री या पत्नी हो ? क्या चाहती हो ? कहाँ गयी थी ? और कहाँकी रहनेवाली हो ?'
विद्याधरीने कहा—मुने ! मैं अपना वृत्तान्त ठीक-ठीक बतला रही हूँ, सुनिये । यद्यपि परायी स्त्रीके साथ एकान्तमें वार्तालाप करना उचित नहीं है तथापि मैं बड़े कष्टमें हूँ और संकटसे छुटकारा पानेके हेतु प्रार्थना करनेके लिये आयी हूँ; अतः आप करुणावश मुझसे बिना किसी हिचकके मेरा समाचार पूछ सकते हैं। महर्षे ! परमोत्कृष्ट चिन्मय आकाशके किसी छोटे-से कोनेमें आपका यह आश्रमरूपी विलक्षण संसार बसा हुआ है । इसमें पाताल, भूतल और स्वर्ग—ये तीन प्रकोष्ठ ( बड़े-बड़े आँगन ) हैं । वहाँ हिरण्यगर्भ ब्रह्माके आकारमें स्थित हुई मायाने कल्पना नामक एक कुमारी-( गृह-स्वामिनी ) का निर्माण किया है। इन तीनोंमें जो भूतल है, वह कंगनकी-सी आकृतिवाले द्वीपों और समुद्रोंसे घिरा हुआ है; अतः उनके रंगोंसे अनुरञ्जित हो ताम्रवर्णका दिखायी देता है; साथ ही कुछ ऊँचा भी है । इस प्रकार यह भूतल उपर्युक्त कंगनसे विभूषित जगल्लक्ष्मीकी कलाईके समान जान पड़ता है । द्वीपों और समुद्रोंके अन्तमें चारों ओरसे दस हजार योजनोंतक सुवर्णमयी भूमि स्थित है । उसके अन्तिम छोरपर लोकालोक नामसे विख्यात पर्वत है, जो जगल्लक्ष्मीकी ऊँची कलाईके समान शोभा पानेवाले इस भूपीठको कंगनके समान चारों ओरसे घेरे हुए है । उस लोकालोक पर्वतके शिखरोंपर रत्नमयी बड़ी-बड़ी शिलाएँ हैं, जो आकाशके समान निर्मल हैं । उन शिलाओंके बीचमें लोकालोक पर्वतके उत्तर भागमें उसके पूर्ववर्ती शिखरकी जो एक शिला है, उसके भीतर मैं निवास करती हूँ । उस शिलाका त्वचा-भाग कभी क्षीण न होनेवाले वज्रसार मणिके समान कठोर है। विधाताने मुझे वहाँ बाँध रखा है और इस प्रकार विवश होकर मैं उस प्रस्तर-यन्त्रमें वास कर रही हूँ । मुने ! मैं समझती हूँ कि उस शिलामें रहते हुए मेरे असंख्य युग बीत गये । केवल मैं ही नहीं बँधी हूँ, मेरे पतिदेव भी उसके भीतर वैसे