भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ०] * पाषाण-शिलाके भीतर धंसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन * ५८९


फट्फट शब्दके साथ टूट-टूटकर गिरने लगीं। भूकम्पके कारण कैलास, मेरु और मन्दराचलकी कन्दराएँ हिलने लगीं, और कल्पवृक्षोंसे टूटकर लाल रंगके पुष्पगुच्छोंकी वर्षा होने लगी। रघुनन्दन ! लोकान्तर-पर्वत, नगर, समुद्र और वनपर्यन्त सारा जगत् कल्पान्तकालकी उत्पात-वायुके झोकेसे परस्पर टकराकर हताहत होते हुए प्राणियोंके कोलाहलसे व्याप्त एवं जीर्ण-शीर्ण हो गया, मानो रुद्रदेवके बाणोंसे दग्ध हुआ त्रिपुर-नगर भरे हुए समुद्रमें गिर रहा हो।

रघुनन्दन ! जब विराट्रूप स्वयम्भू ब्रह्माने अपने प्राणोंका आकर्षण एवं निरोध किया, तब वातस्कन्धनामसे स्थित आकाशजन्मा वायुने अपनी मर्यादा (ग्रह, नक्षत्र आदिको धारण करनेकी जिम्मेदारी) छोड़ दी। ब्रह्माजीने जब प्राणवायुरूप वातस्कन्धका अपने भीतर उपसंहार करना आरम्भ किया, तब पूर्वोक्त मर्यादाको त्यागकर साम्यावस्थाको पहुँचनेके लिये वायुमें क्षोभ उत्पन्न हुआ और उस क्षोभ-के कारण निराधार होकर आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर वैसे ही भूमिपर गिरने लगे, जैसे कहीं आग लगनेपर यदि जोरसे हवा चलती हो तो बड़े-बड़े लुआठे उड़ने और गिरने लगते हैं। उस समय आकाशसे भूतलपर गिरते हुए तारे वृक्षसे झड़ते हुए फूलोंके समान जान पड़ते थे। ब्रह्माजीका संकल्परूप ईंधन जब प्रलयोन्मुख हो गया, तब जैसे जलती हुई लपटें बुझ जाती हैं, वैसे ही सिद्धोंकी गतियाँ भी शान्त हो गयीं, अपनी शक्तिका नाश हो जानेपर प्रलय-वायुके वेगसे पतली रुईके समान आकाशमें उड़ते और भटकते हुए सिद्धसमुदाय मूक होकर नीचे गिरने लगे। भूकम्पसे चञ्चल हुए देवगिरि सुमेरुके शिखर, इन्द्रादि देवताओंके नगरों तथा कल्पवृक्षोंके समूहोंसहित धड़ाधड़ धराशायी होने लगे।

रघुनन्दन ! पहले न तो कोई असत् वस्तु थी और न सत् ही; किंतु सभी विकारोंसे रहित एकमात्र चिन्मय परमाकाश ही था; जो अकेला ही सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त था। उसी परमाकाशने अपने स्वरूपका परित्याग न करके निर्विकार रहते हुए ही अपनी आकाशताको अपनेसे भिन्न वस्तुके रूपमें कल्पना की। उसे अपनेसे पृथक् चेत्यके रूपमें जाना, चिद्रूप होनेसे वह चेतन कहा गया है। जैसे लोग संकल्प-नगरको शून्यरूप होते हुए भी साकार देखते हैं, वैसे ही अजन्मा परमात्मा शून्यरूप आकाशको ही देहरूप देखने लगा। आकाशमें आकाशको ही अपना शरीर मानने लगा। श्रीराम ! इस प्रकार विचार करनेसे सिद्ध होता है कि ये जो ब्रह्मा हैं, वे ही यह वर्तमान जगत् बनकर स्थित हैं। विराट् ब्रह्माका जो देह है, वही यह जगत् है। संकल्पाकाररूप ब्रह्माजीको जो भ्रम हुआ है, वही इस जगत्-के रूपमें भासित हो रहा है और उसीको ब्रह्माण्ड कहा गया है। संकल्पसे ही जिसकी कल्पना हुई है, वह यह सारा जगत् आकाशरूप ही है। वास्तवमें न तो जगत् है और न कहीं त्वत्ता-मत्ता ('तुम' और 'मैं' के भाव) ही हैं। चिन्मात्र परब्रह्म परमात्मा स्वयं ही अद्वैत आत्मा-काशमें जगत् आदिरूप प्रकाशसे प्रकाशित हो आह्लाद या अनुभवका विषय हो रहा है। जैसे वायु अपनी गति-शीलताके कारण अनुभवमें आती रहती है। यह जगत् अद्वैतको छोड़ देनेपर कुछ है, ऐसा जान पड़ता है और द्वैतको त्याग देनेपर कुछ भी नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है। वास्तवमें जगत् द्वैत और अद्वैत—दोनोंसे रहित, शून्य, निर्मल और निरामय चेतनाकाशरूप ही समझो। राघवेन्द्र ! अनादि, नित्यानुभवरूप जो एकमात्र साक्षी चेतन है, वही दृश्य बनकर स्थित है। उसमें भिन्न दूसरी कोई दृश्य नामक वस्तु नहीं है। सत्यसुन्दर-रूप परमात्मामें जो अनेक प्रकारके अज्ञान प्रतीत होते हैं, वे ही विचित्र भ्रम पैदा करके सुविस्तृत दृश्य जगद्रूप महान् दृश्य उपस्थित करते हैं। (सर्ग ७१-७२)