संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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हैं और शेष जितने लोग हैं, वे भ्रमके ही भागी होते हैं।
मुने ! इस विद्याधरीको वैराग्यके कारण उत्पन्न अपने मनोरथको सिद्ध करनेकी इच्छा हुई। इसीलिये इसने अन्य बहुत-सी धारणाओंका अभ्यास करके उनके प्रभावसे आपका दर्शन प्राप्त किया। आदि-अन्तसे रहित एवं अनामय विद्यारूपा ब्रह्मकी चिन्मयी मायाशक्ति सब ओर व्याप्त है। इस जगत्में कोई भी कार्य न तो कभी उत्पन्न होते हैं और न नष्ट ही होते हैं। केवल चित् ही द्रव्य, काल और क्रियाके रूपमें प्रकाशित हो तप रही है। ये जो देश, काल, क्रिया, द्रव्य, मन और बुद्धि आदि हैं, सब-के-सब चेतनरूपी शिलाकी मूर्तियाँ हैं। इनका न कभी उदय होता है और न अस्त ही। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। यह चिच्छक्ति ही शिलाका आकार धारण करके स्थित है। जैसे स्पन्दन वायुका स्वरूप है, उसी प्रकार सारा जगत्-समुदाय इस चिच्छक्तिका अभिन्न अङ्ग है। यह जो चितिरूपा शिवा है, आदि-अन्तसे रहित है। किंतु भ्रमसे सादि और सान्त बन जाती है। निराकार होती हुई भी साकार हो जगतूरूप अङ्गोंसे युक्त बनकर स्थित हो जाती है। जैसे महाकाशके भीतर दूसरे-दूसरे आकाश (घटाकाश, मठाकाश आदि) महाकाशकी सत्तासे ही विद्यमान हैं, अपना पृथक् अस्तित्व नहीं रखते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् शून्यरूप होते हुए भी शान्तस्वरूप सर्वव्यापी चेतनाकाश परमात्मामें उसीकी सत्तासे सर्वत्र विद्यमान है। परंतु वे अपनी पृथक् सत्ता नहीं रखते हैं, इस दृष्टिसे उनके विषयमें 'हैं' और 'नहीं हैं'—ये दोनों बातें कही जा सकती हैं। मुनिवर वसिष्ठ ! अब आप यहाँसे अपने जगत्को जाइये और इस समय अपने पूर्व-कल्पित एकान्तवर्ती आसनपर समाधि लगाकर परम शान्तिका अनुभव कीजिये। मेरे जो कल्पित बुद्धि आदि जागतिक पदार्थ हैं, वे प्रलयको प्राप्त हो परम अव्यक्त तत्त्वमें मिल जायँ; क्योंकि इस समय हम परब्रह्म परमात्मपदको प्राप्त हो रहे हैं। (सर्ग ७०)
पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके संकल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा कहकर वे भगवान् ब्रह्मा सम्पूर्ण ब्रह्मलोकवासियोंके साथ पद्मासन लगाकर बैठ गये और फिर कभी न टूटनेवाली समाधिमें स्थित हो गये। उन्हींका अनुसरण करती हुई वह वासनाकी अधिष्ठात्री देवी सती-साध्वी कुमारी विद्याधरी भी उन्हींकी भाँति ध्यानमग्न हो शान्त हो गयी। उसका कोई भी अंश (स्मृति-बीजभेद) शेष नहीं रह गया। वह आकाशरूपिणी (शून्यत्वमात्रा) हो गयी। ब्रह्माजीका संकल्प धीरे-धीरे विरस होने लगा। जिस समय उनके संकल्पमें विरसता आयी, उसी क्षणसे तुरंत ही पर्वत, द्वीप और समुद्रोंसहित पृथ्वीकी तृण, गुल्म, लता और धान आदिको उत्पन्न करनेकी सारी शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होने लगी। जैसे हमलोगोंके अङ्ग संवेदनशक्तिके क्षीण होनेपर नीरस हो जाते हैं, उसी प्रकार ब्रह्माजीकी अङ्गभूता पृथ्वीकी संवेदनशक्तिका उपसंहार होनेसे वह नीरसताको प्राप्त हो गयी। ब्रह्माजीके द्वारा उपेक्षित होनेपर पृथ्वी आदि तथा असुर आदि—ये दो तरहके महाभूत सब ओरसे क्षुब्ध हो उठे। चन्द्रमा, सूर्य, वायु, इन्द्र, अग्नि और यम—ये सब-के-सब महाप्रलयके कोलाहलसे व्याकुल हो गये। उनका अधिकार एवं प्रभाव ब्रह्मलोकमें मिल गया। वे अपने स्थानसे नीचे गिरने लगे। भूकम्पोंके कारण बड़े-बड़े पर्वत जोर-जोरसे झूमने और झोंके खाने लगे, मानो वे झूला झूलनेके सुखका अनुभव कर रहे हों। उनके ऊपरकी वृक्षश्रेणियाँ