भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखताका वर्णन * ५८७

उदित हुई है, वह उस कुमारी स्त्रीसे भिन्न जो आप हैं, आपको अन्य-सी प्रतीत होती है और मुझे अनन्य-सी जान पड़ती है। वह वासना हम दोनोंकी दृष्टिसे उदित (प्रकट) भी है और अनुदित (अप्रकट) भी। वस्तुतः मैं अविनाशिनी सत्तावाला हूँ; क्योंकि कभी मेरी उत्पत्ति नहीं हुई है। मैं आत्मरूपसे अपने आपमें ही स्थित हूँ। स्वभावसे ही मैं अच्युत, अपने आत्मामें रमण करनेवाला तथा स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हूँ। यह कुमारी स्त्रीके रूपमें जो सामने खड़ी है, वासनाकी अधिष्ठात्री देवी ही है। यह न तो मेरी गृहिणी हैं और न गृहिणी बनानेके निमित्त मैंने इसका सङ्कल्प ही किया है। अपनी वासनाके आवेशवश इसके मनमें यह भाव उत्पन्न हो गया कि 'मैं ब्रह्माजीकी पत्नी हूँ।' इस भावनाको लेकर यह स्वयं ही अत्यन्त दुःख उठा रही है और वह भी व्यर्थ। यही सारे जगत्‌के भीतर वासना बनकर बैठी हुई हैं। (सर्ग ६९)


पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्‌की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्‌में जानेके लिये प्रेरित करना

अन्य जगत्‌के ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! (मैने अपने संकल्पसे कल्पित दो परार्ध वर्षोंकी आयु बिता दी) अब चिदाकाशरूप मैं निरतिशयानन्दरूप, ब्रह्माकाशमयी परम कैवल्यरूपा स्थितिको प्राप्त करना चाहता हूँ, इसीसे यहाँ मेरी वासनाद्वारा रचे गये इस संसारमें नित्य, नैमित्तिक, दैनन्दिन और आत्यन्तिक ये चारो प्रकारके प्रलय उपस्थित हो गये हैं। मुनीश्वर ! इस महाप्रलयकालमें अब मैने इसे त्याग देने—इस वासनाका मूलोच्छेद करके इसे अपनी सत्तासे गिरा देनेके उद्योग- का निश्चित रूपसे आरम्भ कर दिया है, इसीसे यह विरसताको प्राप्त अर्थात् विनाशोन्मुख हो गयी है। जब मैं चित्ताकाशरूपताको त्यागकर आदि चेतनाकाशरूप महाकाश होने जा रहा हूँ, तब यहाँ महाप्रलयका आना और वासनाका विनाश होना अवश्यम्भावी है। यही कारण है कि यह विरस होकर मेरे मार्गकी ओर दौड रही है। भद्र, ऐसा कौन उदारबुद्धि प्राणी है, जो अपने जन्मदाताका अनुसरण न करता हो ? आज यहाँ चारो युगोंका विनाश उपस्थित है, अन्तिम कल्प, अन्तिम मन्वन्तर तथा अन्तिम कलियुगकी समाप्तिका समय आ गया है, इसलिये आज ही प्रजा, मनु, इन्द्र तथा देवताओंका यह अन्तकाल आ पहुँचा है। आज ही यह कल्पका अन्त, महाकल्पका अन्त, मेरी वासनाका अन्त और मेरे देहाकाश- का भी अन्त होनेवाला है। ब्रह्मन् ! इसीलिये यह वासना अब क्षीण होनेको उद्यत है, जब कमलोंसे भरा हुआ सरोवर ही सूख रहा हो, तब गन्धलेश कहाँ ठहर सकती है ? केवल अभिमान ही जिसका शरीर है, ऐसी इस वासनाको स्वभावतः स्वयं ही आत्मदर्शनकी इच्छा होती है। आत्मसाक्षात्कारके लिये किये गये धारणाभ्यास- रूप योगसे इसने अन्य ब्रह्माण्डमें जाकर वहाँ आपके जगत्‌का दर्शन किया, जहाँ धर्म आदि चारो वर्गोंके अनुष्ठानमें लगी हुई स्वतन्त्र प्रजा निवास करती है। आकाशमें विचरती हुई इस विद्याधरीने उसी सिद्धिकी सामर्थ्यसे लोकालोक पर्वतके शिखरकी शिला देखी, जो इसके अपने जगत्‌की आधारभूत है तथा हमारी दृष्टिमें केवल आकाशरूप ही है। जिस जगत्रूपी पर्वतपर यह जगत् है और जिसमे उसकी शिलारूपता है, उस तथा हमारे जगद्रूप पदार्थोंमें ऐसे-ऐसे अनेक दूसरे जगत् भी हैं। यह जगत्रूपी भ्रान्ति जिनकी समझमें आ गयी अर्थात् जिनकी दृष्टिमें यह चेतनाकाशके साथ एकरूपताको प्राप्त हो गयी, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते