संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * ब्रह्म और जगत्की एकताका स्थापन * ५९१
राघवेन्द्र ! वहाँसे मैने दसो दिशाओंमें उदित हो तपते हुए बारह सूर्योंके समुदायको देखा, जिसके प्रचण्ड तेजसे सातों विशाल महासागर काढ़ेकी भाँति खौल रहे थे और उनसे महान् खन्-खन् शब्द प्रकट हो रहा था। समस्त लोकों और नगरोंके भीतरी भाग प्रचण्ड ज्वालाओ तथा अंगारोंसे भर गये थे। आगकी लपटें लाल रंगके गाढ़े कपड़ोंके समूहकी भाँति दिखायी देती थीं, जिन्होने सारे पर्वतोंको सिन्दूरी-रंगका बना दिया था। लोकपालो-के जलते हुए बड़े-बड़े घरोंमें ज्वालाव्याप्त दिशारूपी वस्त्र सुस्थिर विद्युत्की भाँति दीप्तिमान् दिखायी देते थे। नगरोंके समूह कटकट और चटचट शब्दके कोलाहलसे परिपूर्ण हो रहे थे। भूतलसे शिलाके समान घनीभूत दण्डाकार धूम प्रकट करके वे बारह सूर्य समस्त भुवनोंके निवासमण्डपको मानो सहस्रों काँचके खम्भोंसे सुशोभित कर रहे थे। प्राणियोंके निवासभूत नगरोंके धराशायी होने और फटनेसे भयानक चटचट शब्द हो रहे थे। तारे टूट-टूटकर गिर रहे थे। सभी स्थानोंमें अपने-अपने घरोंके भीतर तापसे जलते हुए जन-समुदाय इधर-उधर भाग रहे थे। चीखने-चिल्लानेके साथ मरे-पचे प्राणियोंके दग्ध शरीरोंसे सम्पूर्ण दिशाओंमें दुर्गन्ध फैल रही थी। समुद्रकी तपी हुई जलराशिमें राँधे जाते हुए जलचरोंके समुदाय छटपटा रहे थे। सम्पूर्ण दिशाओंमें फैली हुई आगसे गाँवों और नगरोंका सब कुछ स्वाहा हो गया था। वहाँ कोई रोनेवाला भी नहीं रह गया था। दिग्गजोंके शरीर दग्ध होकर फट गये थे। वे अपने दाँतोंसे दिगन्त पर्वतोंको उठाये हुए ही जल गये थे। पर्वतोंकी गुफाओंमें भरे हुए धूममण्डल उन सूर्योंके कुण्डलोसे जान पडते थे। धराशायी होते हुए पर्वतोंसे पिसकर कितने ही नगरोंके समुदाय चूर-चूर हो गये थे। गिरिराजोंपर निवास करनेवाले गजराजोंको वे सूर्यमण्डल पच-पचकी आवाजके साथ पका रहे थे। संतापसे तप्त होकर उछलते हुए प्राणियोंको देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो उनके निवासभूत समुद्रों और पर्वतोंको भी ज्वर आ गया हो। उन सूर्योंके तापसे हृदय फट जानेके कारण नि स्सार हुए त्रिदशर और उनकी अङ्गनाएँ नीचे गिर रही थीं। दुष्ट लोग जोर-जोरसे रोने-चिल्लानेके कारण थक गये थे और कुछ योगी लोग ब्रह्मरन्ध्रको फोड़कर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हो अमर पद (मोक्ष) में प्रतिष्ठित हो चुके थे। स्वर्गलोकमें जलती हुई ज्वालाओद्गार भूतलसे लेकर पातालतकका भाग खूब तप रहा था। सूखते हुए समुद्रमे निरन्तर पकते हुए भयंकर जलचर उछलते और छटपटाते दिखायी देते थे। जलरूपी इन्धन न मिलनेसे मानो वडवानल उछलकर आकाशमें चला गया था और वहाँ सहस्रो रूप धारण करके मानो गगनाङ्गनाओको पकड़कर नृत्य कर रहा था। महाप्रलयकालका प्रचण्ड अनल ज्वालारूपी पलाश-पुष्पके समान लाल रंगवाले वस्त्रसे सुशोभित हो नटराजकी भाँति ताण्डव नृत्य-सा करनेके लिये उद्यत हुआ था। उन्मुक्त ही मानो उसके लिये पुष्पहार थे। वेगसे फटने हुए बाँस आदिके फट-फट शब्द मानो उसके पैरोंकी धमक थे। वह उद्भट भटकी भाँति वीरोचित शब्द करता हुआ कालरूपी भुजाओको ऊपर उठाये, धूमरूपी केश छिटकाये, जगतरूपी जीर्ण कुटीमें नृत्य कर रहा था। उस समय वनोंके समूह, ग्राम, नगर, मण्डल, द्वीप, दुर्ग, जंगल, स्थल, पृथ्वीके समस्त छिद्र, उसके ऊपरका महान् आकाश, दसों दिशाएँ, द्युलोक तथा उसके ऊपरका भाग-ये सब-के-सब जल रहे थे। गड्ढे, रहट, बाजार. हाट. अट्टालिका और नगरसमूहमे सुशोभित दिशाओंके तटप्रान्त, पर्वतोंके शिखर, सिद्धोंके समूह, पर्वत, मगर, सरोवर, तालाब, तलैया, नदी, देवता, असुर, मनुष्य, सर्प तथा पुरुष-समूह रुद्रदेवके नेत्रोंकी सनसनाती हुई ज्वालाओसे दग्ध हो रहे थे।
अनेक सूर्योंके उदय और अस्त आदिसे विन्ध्याचल भी व्यथित हो उठा था । आकाश अग्निरूपी कमलोसे सुशोभित सरोवरके समान दिखायी देता था ।