संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
धूममालाएँ भ्रमरावलियोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं। उस महाप्रलयकालमें छाती पीट-पीटकर रोती हुई जगल्लक्ष्मीके हृदयस्थलपर रखे हुए हाथकी कलाईमें यह दग्ध हुई पृथ्वी सोनेके कंगन-सी जान पड़ती थी। समुद्र कायके समान दिखायी देते थे, फेन-राशिके विकाससे पुष्ट हो रहे थे तथा सूर्यके प्रतिबिम्बरूपी तिलकसे अलंकृत अपने मुखपर तरङ्गरूपी हाथोंसे आघात करते हुए मानो ( सिर पीट-पीटकर ) रो रहे थे। सुवर्ण-द्रव, निकटवर्ती पर्वत, इन्द्र, कल्पवृक्ष, देवागार तथा गुहागृहोंसे युक्त सुन्दर आकारवाला सुमेरु पर्वत उस समय उसी तरह पिघल गया, जैसे कड़ी धूप होनेपर बर्फ गल जाता है। बाहर-भीतरसे शीतल एवं शुद्ध हिमवान् पर्वत उस प्रचण्ड प्रलयाग्निसे लाखके समान क्षणभरमें पिघल गया। श्रीराम ! उस अवस्थामें भी मलय-पर्वत अपने निर्मल सौरभको नहीं छोड़ सका था; क्योंकि उदारचेता महापुरुष विनाशके समय भी अपने उत्तम गुणका परित्याग नहीं करते हैं। महान् पुरुष स्वयं नष्ट होता हुआ भी दूसरोंको आह्लाद ही प्रदान करता है। किसीको भी दुःख नहीं देता है। ठीक वैसे ही, जैसे चन्दन दग्ध होनेपर भी जीवधारियोंको आनन्द ही देता है।* उत्तम वस्तु कभी अवस्तुता (असत्ता या निकृष्ट अवस्था) को नहीं प्राप्त होती, जैसे सोना प्रलयाग्निसे दग्ध हो जानेपर भी सर्वथा नष्ट नहीं होता है। (सर्ग ७३–७५)
प्रलयकालके मेघोंद्वारा भयानक वृष्टि होनेसे एकार्णवकी वृद्धि तथा प्रलयाग्निका बुझ जाना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब भूमण्डल और पर्वत-समूहका विस्तार अंगार-राशिसे भर गया, सर्वत्र ज्वालामालाओंका समूह छा गया और द्वादश सूर्यों-का तेज सुस्पष्टरूपसे प्रकाशित होने लगा; जब ब्रह्मारूपी प्रस्तररहित सरोवरमें ज्वालारूपी दलोंसे सुशोभित एवं चिनगारीरूप केसरो एवं उल्मुकोंसे युक्त प्रलयाग्निरूपी कमलिनीके वायुप्रधान सर्प एवं पर्वतरूप मूल पातालतक महान् अङ्गाररूपी कीचड़में मग्न हो गये, तब आकाशको सचरणके योग्य देख मशकमें पानी ढोनेवाले ऊँटोंकी सेनाके समान कल्पान्तकालिक संवर्तक नामवाले मेघोंके समूह जो काजलकी भाँति काले थे, गर्जन-तर्जन करते हुए निकट आ गये। फिर तो वहाँ प्रबल प्रचण्ड धार वृष्टि होने लगी। आकाशमें वज्रकी कठोर गड़गड़ाहट सुनायी देने लगी, मानो सारा ब्रह्माण्ड फूटा और फटा जा रहा हो। जैसे दावानलके प्रज्वलित होनेपर सारे वनमें भीषण लपटें छा जाती हैं, उसी प्रकार आकाशरूपी वनमें विद्युत्का प्रकाश छा जानेके कारण वह वर्षा बड़ी भयावनी जान पड़ती थी। पृथ्वी चटचट शब्दके साथ टूटने लगी, उसकी अङ्गारराशियाँ फूट-फूटकर बुझने लगीं। मेघोंकी गर्जनाओंके साथ ही बढ़ती हुई घोर वृष्टिसे लोक-लोकान्तर धराशायी होने लगे। अंगारयुक्त जगत्रूपी गेहमें विलास करनेवाली वह वृष्टि वरतीकी ज्वालारहित वाष्प-शोभासे सत्कृत हुई। उस शोभाने प्रकट होकर मानो सखीकी भाँति उसकी अगवानी की।
तदनन्तर जब पृथ्वी, जल, तेज और वायु—इन चारो महाभूतोंमें परम विक्षोभ उत्पन्न हो गया, तब उस महाप्रलयकी वेलामें तीनों लोक ऐसे जान पड़ते थे, मानो तमालके वन उड़ रहे हों। सारी त्रिलोकी भस्ममेघ, धूम-मेघ, महाकल्पान्तकारी मेघ, वाष्परूपी मेघ तथा ऊपर छाये हुए जलकणरूपी मेघ—इन पाँच प्रकारके मेघोंसे आच्छादित हो रही थी। आकाशमें लगातार खम्भोंके समान मोटी मूसलधार वृष्टि हो रही थी, कल्पान्तकाली
* तस्यामपि दशायां तु मलयोऽमलसौरभः। आसीत्त्यजत्युदारात्मा न नाशेऽप्युत्तमं गुणम् ॥
नश्यन्नपि महान् ह्लादं न खेदं सम्प्रयच्छति। चन्दनं दग्धमप्यासीदानन्दायैव जीवताम् ॥
(निर्वाण-प्रकरण उ० ७५ । ५१-५२)