संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन * ५९३
आगको बुझा देनेवाली उस अन्धाधुंध वर्षासे ढम-ढमकी घनी घोर आवाज हो रही थी। उस समय सारे समुद्र नदियोंके समूहोंद्वारा, जिनमें गङ्गा एक छोटी तरङ्ग-सी जान पडती थी, भरे जा रहे थे। आकाशवर्ती भयानक मेघोंकी ही भाँति वे सरिताएँ भी अपनी जलराशिसे समुद्रोंको परिपूर्ण कर रही थीं। पर्वतोंका आधारपीठ भूतल जीर्ण-शीर्ण होकर खण्ड-खण्ड हो चुका था, इसलिये उन पर्वतोंके तटप्रान्त गल गये थे। इधर उन्हें प्रलय-कालकी वायु उड़ा रही थी। इस अवस्थामें उन लुढ़कते हुए पर्वतोंके गिरनेसे संसारके सारे समुद्र उनके द्वारा संकीर्ण-से हो रहे थे। समुद्रकी तरङ्गोंद्वारा ऊपर फेंके गये प्रस्तरखण्डोंसे बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देनेवाली प्रलयवायु समुद्रकी गर्जनाके समान भीषण एवं गम्भीर घोष करती हुई त्रिलोकीकी सारी दिशाओंके तटप्रान्तको नष्ट-भ्रष्ट किये देती थी। प्रचण्ड वायुके टकरानेसे पर्वत-समूहोंकी गुफाओंमें जो भौंय-भाँयकी आवाज उठ रही थी, उससे सारा संसार व्याप्त हो गया था। लोकपालोंके नगर झोंके खा-खाकर चक्कर काटते हुए सब ओर गिर रहे थे। बड़े-बड़े पर्वतोंके विस्तृत भाग नष्ट हो गये थे।
उस समय धूम और भस्मके बादल प्रकट होने लगे, पानीकी बाढ़से जनपद और नगरोंके समूह प्रणाशी होने लगे। ऊँची-ऊँची तरङ्गे उठने लगीं और भूतल तथा पर्वत डूबने लगे। भँवरोंमें पड़कर घर्घर-ध्वनि करने-वाले और आपसमें टकराकर एक दूसरेको विदीर्ण कर देनेके लिये उद्यत ऊँचे-ऊँचे पर्वत समुद्रमें बिखरे पत्तोंके समान चक्कर काट रहे थे। घूमते हुए सैकड़ों धूमकेतुओंके उत्पात उठ रहे थे। इससे इस जगत्की ओर देखना अत्यन्त कठिन हो गया था। सातवें पातालतकका सारा संसार अपने स्थानसे च्युत हुए द्वीपों और सागरोंसहित भूमण्डलके बड़े-बड़े खण्डों और लुढ़कते हुए अन्य पाताल-मण्डलोंसे पूर्ण-सा जान पड़ता था। नीचे सातवें पातालतक, मध्यमें भूमण्डल एवं पर्वतोंतक और ऊपर आकाश-मण्डलतक एकार्णव बना हुआ सारा जगत् प्रलय-वायुसे परिपूर्ण हो गया था।
( सर्ग ७६-७७ )
बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब वायु, वर्षा, हिम और दूसरे-दूसरे उत्पातोंके आगमनसे भूमण्डल नष्ट-भ्रष्ट हो गया, तब समुद्रके जलका वेग इस तरह बढ़ने लगा जैसे कलियुगमें राजाका वेग। वह एकार्णव आकाश-गङ्गा-के प्रवाहमें पड़ी हुई मेघधाराओके गिरनेसे वेगपूर्वक बढ़ने लगा। तत्काल प्रकट हो मेरु और मन्दराचलके समान प्रकाशित होनेवाली सहस्रों सरिताओने भी उसे बढ़ानेमें योग दिया। इस प्रकार जलसे भरे होनेके कारण वह एकार्णव उच्चताके अभिमानसे युक्त हो गया। उसने बड़े-बड़े पर्वतोंको सूखे तिनकोंके समान पकड़कर अपनी विस्तृत भँवरोंमें डाल दिया। वे वहीं चक्कर काटने लगे। उस एकार्णवने ऊँची उठती हुई उत्ताल तरङ्गोंके अग्रभागसे सूर्यमण्डलको भी निगल लिया। प्रचण्ड वायुके द्वारा उत्पन्न किये गये अपूर्व जल-प्रवाहरूपी कुद्ध पर्वतोसे युक्त हुआ वह महार्णव महान् घुर्घुर और भयानक घर्घर ध्वनिका साथ अपने विशाल वेगको बढ़ाता जा रहा था। तरङ्गाट-तरङ्गों-के वारंबार एक-दूसरेसे टकरानेके कारण उसकी उच्चता बढ़ती जा रही थी और वह ऊपर-नीचे लाखों योजनोंतक फैले हुए उच्चतम पदार्थोंको भी आत्मसात् करता जा रहा था। पंखयुक्त पर्वतोंके समान उठी हुई अगण्य तरङ्ग-समूहरूपी भुजाओंद्वारा वह महासागर पुष्कर और आवर्तक नामक कल्पान्तकारी मेघोंका मानो आलिङ्गन कर रहा था। त्रिलोकीको अपना ग्रास बनाकर पूर्णतः तृप्त हो धीमे स्वरमें गीत-सा गा रहा था और उपद्रवरूपी कल्मषसे