संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
अलंकृत अपनी तरङ्गमयी भुजाओंको उठाकर नृत्य-सा करता-जान पडता था। रघुनन्दन ! उस समय न तो आकाश था, न दिगन्त था, न नीचेका लोक था, न ऊपर-का लोक था, न कोई भूतवर्ग था और न कहीं सृष्टि ही थी । सर्वत्र केवल जल-ही-जल दृष्टिगोचर होता था।
रघुनन्दन ! जब तपोलोकपर्यन्त सारा जगत् प्रलय-कालके एकार्णवमें निमग्न हो गया, तब सत्यलोकके निकट आकाशमें स्थित होकर मैंने महान् प्रकाशसे युक्त ब्रह्मलोक-पर उसी प्रकार दृष्टि डाली, जैसे सूर्य प्रातःकाल संसार-पर अपनी प्रभा बिखेरते है । दृष्टि डालते ही समाधिमें अविचलभावसे स्थित हुए परमेष्ठी ब्रह्मा अपने मुख्य-मुख्य परिवारके साथ दिखायी दिये, वे ऐसे जान पड़ते थे मानो पत्थरकी बनी हुई प्रतिमा हो । वहाँ देवताओं तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंका समुदाय भी बैठा था । शुक्र, बृहस्पति, इन्द्र, कुवेर, यम, सोम, वरुण, अग्नि तथा अन्य देवर्षि भी वहाँ देखनेमें आये । देव, गन्धर्व, सिद्ध और साध्योंके नायक भी वहाँ उपस्थित थे । वे सब-के-सब पद्मासन लगाये इस तरह ध्यानमग्न होकर बैठे थे, मानो चित्रमें अङ्कित किये गये हों । वे निष्प्राणके समान वहाँ चेष्टाशून्य होकर बैठे थे। तदनन्तर पूर्वोक्त बारह सूर्य भी उसी स्थानपर आये और उन्हीं लोगोंकी भाँति पद्मासन लगाकर ध्यानमें मग्न हो गये । इसके बाद दो ही घड़ीमें मैंने अपने सामने बैठे हुए ब्रह्माजीको इस अवस्थामें देखा। वे ब्रह्मका चरम साक्षात्कार प्राप्त करके अविद्याकल्पित सारे प्रपञ्चका बाध हो जानेसे निद्रारहित ( प्रबोधको प्राप्त ) हो गये थे। जैसे जगा हुआ पुरुष स्वप्नमें देखे गये पदार्थसमूहको बाधित और केवल अपनेको ही अवशिष्ट देखता है, वैसे ही वे आत्मावशिष्ट दिखायी दिये । फिर, ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके परिवारके जितने लोग थे, उन सबको मैंने वहाँ वैसे ही तिरोहित पाया, जैसे तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंकी वासना तत्त्वज्ञानसे बाधित होकर अदृश्य हो जाती है। जैसे स्वप्नसे जगा हुआ पुरुष अपने सामनेके स्वप्नगत नगरको नहीं देखता है, वैसे ही मैंने वहाँ किसीको भी नहीं देखा । उस समय वह ब्रह्मलोक तथा उनका ब्रह्माण्ड, जो ब्रह्माजीके सङ्कल्पसे ही बना था, निर्जन वन-सा सूना हो गया । जैसे भूतलपर अकस्मात् कोई भयङ्कर दुर्घटना होनेसे कोई नगर सर्वथा नष्ट हो गया हो, वही दशा उस ब्रह्माण्डकी हुई थी । तदनन्तर आकाशमें स्थित हुए मैंने ध्यान लगाकर यह जाना कि सभी लोग ब्रह्माजीके समान ही नाम-रूपका परित्याग करके निर्वाण-पदको प्राप्त हो गये हैं। वासनाका लय हो जाने-पर वे सब-के-सब अपने विशुद्ध ब्रह्मरूपमें स्थित हो जाने-के कारण अदृश्य हो गये थे । जैसे जगे हुए पुरुषोंके स्वप्नलोक उनके स्वप्नरूपमें ही लीन हो जानेसे दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। जैसे स्वप्नमें अपना शरीर आकाशमें उड़ता दिखायी देता है, किंतु जागनेपर वह वासना शान्त हो जानेके कारण कुछ भी नहीं दीखता है, इसी प्रकार जाग्रत्-कालमें भी वासना रहनेपर ही शरीर दिखायी देता है । तत्त्वज्ञानके द्वारा वासनाका सर्वथा क्षय हो जानेपर कुछ भी नहीं दिखायी देता । वासनाका क्षय होनेसे द्रष्टा, दृश्य और दर्शनरूपी रोग शान्त हो जाता है, वासनाकी सत्ता रहनेपर ही यह सृष्टिनामक पिशाची प्रकट होती है।
रघुनन्दन! सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माको सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न होती है । तदनन्तर पूर्वकालकी जगत् वासनाओं-का जगद्रूपमें उद्भव होता है । इसलिये वासनाकी शान्ति-को निर्वाण समझना चाहिये और वासनाकी सत्ताको ही संसाररूपी भ्रम जानना चाहिये । चित्तकी वृत्तिको जगा-कर बहिर्मुख कर देनेसे बन्धन होता है और उसे परमात्मामें लीन कर देनेपर निर्वाण प्राप्त होता है । चित्तवृत्तिका जागरण ही संसाररूपी शिशुको प्रकट करनेवाला गर्भाशय है । उससे उत्पन्न हुआ यह जगत् असत् होकर भी सत्के समान भासित होता है। चित्तके संकल्पका जाग्रत्