भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण * ५९५


होना ही बन्धन बताया गया है और उसे भुलाकर—आत्मामें लीन करके अपने चैतन्य-स्वरूपका अनुभव करना ही मोक्ष कहा गया है। रघुनन्दन ! बन्ध, मोक्ष आदिकी सारी शङ्काएँ छोड़कर निर्वाणरूप, वासनाशून्य, अनन्त, अनादि, विशुद्ध, केवल बोधस्वरूप, द्वैताद्वैतसे रहित, परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप हुए आकाशके समान विशद अन्तःकरणसे युक्त, बन्धनमुक्त तथा शान्तभावसे स्थित रहना चाहिये।
( सर्ग ७८-७९ )


ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण, अहंकाराभिमानी रुद्रदेवका आविर्भाव, उनके अवयवों तथा आयुधका विवेचन, उनके द्वारा एकार्णवके जलका पान तथा शून्य ब्रह्माण्डकी चेतनाकाशरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस तरह ब्रह्मलोकके वे सभी निवासी जैसे बत्ती जल जानेसे दीपक बुझ जाते हैं, वैसे ही वासनाका नाश होनेसे अदृश्य हो गये। ब्रह्माजीके ब्रह्मलीन हो जानेपर पूर्वोक्त बारह सूर्य अपनी प्रभासे प्रकाशित हो पृथ्वी आदि जगत्‌की भाँति उस ब्रह्मलोकको भी जलाने लगे । ब्रह्माजीके लोकको दग्ध करके उन्हींकी भाँति ध्यानपरायण हो वे भी तैलरहित दीपककी भाँति शान्त हो गये—निर्वाण पदको प्राप्त हो गये । तदनन्तर जैसे रातमें अन्धकार भूमण्डलको व्याप्त कर लेता है, वैसे ही उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त उस एकार्णवकी बाढ़ने विधाताके उस लोकको भी जलसे आप्लावित कर दिया । इस प्रकार जब ब्रह्मलोकपर्यन्त वह सारा ब्रह्माण्ड एकार्णवके जलसे परिपूर्ण हो गया, तब वे कल्पान्तकारी मेघ छिन्न-भिन्न हो उस जलराशिमें ही विलीन हो गये ।

इसी बीचमें मैने वहाँ एक भयङ्कर रूप देखा, जो आकाशके मध्यभागसे प्रकट हुआ था । उसे देखकर मै कुछ डर गया । उसकी आकृति कल्पान्तकालिक जगत्‌के समान काली थी । उसने सारे आकाशको व्याप्त कर रखा था और देखनेमें ऐसा जान पडता था, मानो कल्पभरकी सारी रातोंका एकत्र संचित हुआ अन्धकार ही देह धारण करके खडा हो गया हो । वह प्रातःकालके एक लाख सूर्योंका प्रकाशमान तेज अकेले ही धारण करता था । उसके तीन नेत्र थे, जो तीन सूर्योंके समान दिखायी देते थे और सुस्थिर विद्युत्‌-समूहके समान भयंकर जान पडते थे । उन नेत्रोंकी प्रभासे उसका मुखमण्डल अत्यन्त देदीप्यमान दिखायी देता था । वह पुरुष अपने अङ्गोंसे ज्वालापुञ्ज बिखेर रहा था । उसके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे । उसने अपने हाथमें एक त्रिशूल ले रखा था । उस अनन्त आकाशमें उसका वह विशाल शरीर व्याप्त हो रहा था । वह पुरुष आगेकी ओर बढा आ रहा था । आकाशके समान विशाल और मेघके समान श्याम शरीरको धारण करके वह खडा था । एकार्णवमें डूबे हुए ब्रह्माण्डसे बाहर आकाशमें उसकी स्थिति थी । वह ऐसा प्रतीत होता था मानो आकाश हाथ-पैर आदि शरीरको धारण करके दृष्टिपथमें आ रहा हो । अपनी नासिकासे निकली हुई साँसके आने-जानेसे वह उस एकार्णवको कम्पित किये दे रहा था । वह अपने बाहुदण्डसे क्षीरसागरको विक्षुब्ध कर देनेवाले भगवान् विष्णुके समान जान पडता था । ऐसा लगता था, मानो उस कल्पान्तकालीन महासागरकी जलराशि ही पुरुषरूप धारण करके खडी हो गयी हो अथवा जिसका कोई कारण नहीं, वह सबका कारणभूत अहंकार ही मूर्तिमान् होकर आ गया हो या कुलपर्वतोंका समूह ही अपने पंखसमूहोंद्वारा उडनेकी लीला करता हुआ समस्त