संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आकाशको परिपूर्ण करके ऊपरको उठ गया हो। उसके हाथमें त्रिशूल था और उसके तीन नेत्र थे। इन लक्षणोंसे मैने पहचान लिया कि ये भगवान् रुद्र हैं। तब मैने दूरसे ही उन परमेश्वरको नमस्कार किया।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! रुद्रदेवने वैसा भयंकर रूप क्यों धारण किया था ? वे काले और विशालकाय क्यो हुए थे ? उनके पाँच मुख कौन-कौन और कैसे हैं ? वे कैसे और कौन-सी दस भुजाएँ धारण करके वहाँ उपस्थित हुए ? उनके तीन नेत्र कौन-कौन-से थे ? उनका शरीर ऐसा भयंकर क्यों था ? वे अकेले क्यों थे ? वहाँ प्रकट होनेमें उनका प्रयोजन क्या था ? वे किससे प्रेरित होकर आये थे ? उन्होने वहाँ क्या किया था ? और उनकी छाया कौन थी ? ये सब बातें मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे परमेश्वर वहाँ अहंकारके अभिमानीरूपसे रुद्रनामधारी होकर प्रकट हुए थे। उस समय उनकी जो मूर्ति दिखायी दी थी, वह निर्मल आकाशरूपी ही थी। वे महातेजस्वी भगवान् रुद्र आकाशरूपधारी होनेके कारण आकाशके समान ही श्यामवर्णसे युक्त दिखायी देते थे। चेतनाकाशमात्र ही उनका सारभूत स्वरूप है, इसलिये वे आकाशात्मा कहे गये हैं। सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा और सर्वव्यापी होनेके कारण ही वे विशालकाय बताये गये हैं। उन अहंकाररूपी रुद्रकी प्रत्येक शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली जो पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, उन्हींको ज्ञानी पुरुष उन रुद्रदेवके पाँच मुख बताते हैं। इसीलिये ज्ञानेन्द्रियाँ सब ओरसे प्रकाशस्वभाव कही गयी हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) तथा उनके पाँच विषय (बोलना, ग्रहण करना, विचरना, मलत्याग करना और विषयसुखकी उपलब्धि कराना)—ये दस क्रमशः उनकी दाहिनी-बायाँ भुजाएँ हैं। उस प्रलयकालमें सम्पूर्ण भूतोंसे परित्यक्त होकर आकाशमात्र रूपधारी वे रुद्रदेव एक क्षणतक वहाँ सबको विक्षुब्ध करते हुए-से स्थित रहते हैं। फिर कारणभूत अहंकार-शरीरसे रहित हो परम शान्त हो जाते हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण; भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीन काल; चित्त, अहंकार और बुद्धि—ये त्रिविध अन्तःकरण; अ, उ और म्—ये प्रणवके तीन अक्षर तथा ऋक्, साम और यजुष्—ये तीन वेद ही उन भगवान् रुद्रदेवके नेत्ररूपसे स्थित हैं। उन्होंने अपनी मुट्ठीमें त्रिलोकीरूप त्रिशूलको धारण कर रखा है। उस समय समस्त भूतगणोंमें भी उनके सिवा दूसरा कोई स्थित नहीं था। इसलिये वे वहाँ अहंकारात्मक रुद्रके रूपमें देहाभिमानी-से होकर खड़े थे।
श्रीराम ! तदनन्तर मैने देखा, वे परमेश्वर वहाँ उद्यमपूर्वक श्वास-वायुके वेगसे उस महासागरको पी जानेके कार्यमें प्रवृत्त हुए। उनके फैले हुए मुखका भीतरी भाग ज्वालामालाओंसे व्याप्त दिखायी देता था। उनकी श्वास-वायुसे आकृष्ट हुआ महासागर उनके भीतर उसी तरह समा गया, मानो वह बड़वानलमें विलीन हो गया हो। अहंकारस्वरूप भगवान् रुद्र ही कल्पपर्यन्त बड़वानल होकर समुद्रमें निवास करते है और उसका जल पीते रहते हैं। किंतु प्रलयकालमें वे सारे समुद्रको ही पी जाते हैं। जैसे जल पातालमें, साँप बिलमें और पाँचों प्राणवायु प्राणियोंके मुखाकाशमें प्रविष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार वह सारा समुद्र वेगपूर्वक रुद्रदेवके मुखके भीतर एक ही क्षणमें समा गया। उन श्यामरूपधारी रुद्रने थोडी ही देरमें उस जलको इस तरह पी लिया, जैसे सूर्यदेव अन्धकारको और सत्पुरुषोका सङ्ग दोष-समूहको पी जाता—नष्ट कर देता है। तत्पश्चात् ब्रह्मलोकसे लेकर पातालतक सारा स्थान धूलि, धूम, वायु, समुद्र तथा भूतगणोंसे रहित होकर शून्य, सम एवं शान्त आकाशमात्र रह गया। रघुनन्दन ! उस समय वहाँ आकाशके समान निर्मल तथा चेष्टारहित केवल ये