संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
५९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आकाशको परिपूर्ण करके ऊपरको उठ गया हो। उसके हाथमें त्रिशूल था और उसके तीन नेत्र थे। इन लक्षणोंसे मैने पहचान लिया कि ये भगवान् रुद्र हैं। तब मैने दूरसे ही उन परमेश्वरको नमस्कार किया।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! रुद्रदेवने वैसा भयंकर रूप क्यों धारण किया था ? वे काले और विशालकाय क्यो हुए थे ? उनके पाँच मुख कौन-कौन और कैसे हैं ? वे कैसे और कौन-सी दस भुजाएँ धारण करके वहाँ उपस्थित हुए ? उनके तीन नेत्र कौन-कौन-से थे ? उनका शरीर ऐसा भयंकर क्यों था ? वे अकेले क्यों थे ? वहाँ प्रकट होनेमें उनका प्रयोजन क्या था ? वे किससे प्रेरित होकर आये थे ? उन्होने वहाँ क्या किया था ? और उनकी छाया कौन थी ? ये सब बातें मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे परमेश्वर वहाँ अहंकारके अभिमानीरूपसे रुद्रनामधारी होकर प्रकट हुए थे। उस समय उनकी जो मूर्ति दिखायी दी थी, वह निर्मल आकाशरूपी ही थी। वे महातेजस्वी भगवान् रुद्र आकाशरूपधारी होनेके कारण आकाशके समान ही श्यामवर्णसे युक्त दिखायी देते थे। चेतनाकाशमात्र ही उनका सारभूत स्वरूप है, इसलिये वे आकाशात्मा कहे गये हैं। सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा और सर्वव्यापी होनेके कारण ही वे विशालकाय बताये गये हैं। उन अहंकाररूपी रुद्रकी प्रत्येक शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली जो पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, उन्हींको ज्ञानी पुरुष उन रुद्रदेवके पाँच मुख बताते हैं। इसीलिये ज्ञानेन्द्रियाँ सब ओरसे प्रकाशस्वभाव कही गयी हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) तथा उनके पाँच विषय (बोलना, ग्रहण करना, विचरना, मलत्याग करना और विषयसुखकी उपलब्धि कराना)—ये दस क्रमशः उनकी दाहिनी-बायाँ भुजाएँ हैं। उस प्रलयकालमें सम्पूर्ण भूतोंसे परित्यक्त होकर आकाशमात्र रूपधारी वे रुद्रदेव एक क्षणतक वहाँ सबको विक्षुब्ध करते हुए-से स्थित रहते हैं। फिर कारणभूत अहंकार-शरीरसे रहित हो परम शान्त हो जाते हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण; भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीन काल; चित्त, अहंकार और बुद्धि—ये त्रिविध अन्तःकरण; अ, उ और म्—ये प्रणवके तीन अक्षर तथा ऋक्, साम और यजुष्—ये तीन वेद ही उन भगवान् रुद्रदेवके नेत्ररूपसे स्थित हैं। उन्होंने अपनी मुट्ठीमें त्रिलोकीरूप त्रिशूलको धारण कर रखा है। उस समय समस्त भूतगणोंमें भी उनके सिवा दूसरा कोई स्थित नहीं था। इसलिये वे वहाँ अहंकारात्मक रुद्रके रूपमें देहाभिमानी-से होकर खड़े थे।
श्रीराम ! तदनन्तर मैने देखा, वे परमेश्वर वहाँ उद्यमपूर्वक श्वास-वायुके वेगसे उस महासागरको पी जानेके कार्यमें प्रवृत्त हुए। उनके फैले हुए मुखका भीतरी भाग ज्वालामालाओंसे व्याप्त दिखायी देता था। उनकी श्वास-वायुसे आकृष्ट हुआ महासागर उनके भीतर उसी तरह समा गया, मानो वह बड़वानलमें विलीन हो गया हो। अहंकारस्वरूप भगवान् रुद्र ही कल्पपर्यन्त बड़वानल होकर समुद्रमें निवास करते है और उसका जल पीते रहते हैं। किंतु प्रलयकालमें वे सारे समुद्रको ही पी जाते हैं। जैसे जल पातालमें, साँप बिलमें और पाँचों प्राणवायु प्राणियोंके मुखाकाशमें प्रविष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार वह सारा समुद्र वेगपूर्वक रुद्रदेवके मुखके भीतर एक ही क्षणमें समा गया। उन श्यामरूपधारी रुद्रने थोडी ही देरमें उस जलको इस तरह पी लिया, जैसे सूर्यदेव अन्धकारको और सत्पुरुषोका सङ्ग दोष-समूहको पी जाता—नष्ट कर देता है। तत्पश्चात् ब्रह्मलोकसे लेकर पातालतक सारा स्थान धूलि, धूम, वायु, समुद्र तथा भूतगणोंसे रहित होकर शून्य, सम एवं शान्त आकाशमात्र रह गया। रघुनन्दन ! उस समय वहाँ आकाशके समान निर्मल तथा चेष्टारहित केवल ये
६१- श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना, वसिष्ठजीका मनोमय देहसे सिद्धादि लोकोंमें भ्रमण करना, श्रीवसिष्ठजीका अपनी सत्यसङ्कल्पताके कारण सबके दृष्टिपथमें आना, व्यवहारपरायण होना तथा 'पार्थिव वसिष्ठ' आदि संज्ञाओंको प्राप्त करना, पाषाणोपाख्यानकी समाप्ति और सबकी चिन्मय ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
निर्वाण-प्रकरण उ० ] ❖ रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन ❖ ५९७
चार पदार्थ ही दिखायी देते थे—एक तो वे नील गगनकी-सी आकृतिवाले भगवान् रुद्र ही दिखायी देते थे, जो आकाशके मध्यभागमें बिना किसी आधारके स्थित थे। दूसरा ब्रह्माण्ड-सदनका निचला भाग था, जो सातों पातालोंसे भी नीचे बहुत दूर दृष्टिगोचर होता था। वह पृथ्वी और आकाशके तल-भाग-सा जान पड़ता था। तीसरा पदार्थ था, ब्रह्माण्डमण्डलके ऊपरका भाग, जहाँ अत्यन्त दूर होनेके कारण दृष्टि नहीं पहुँचती थी; अतएव वह दुर्लक्ष्य आकाशके समान नीला जान पडता था। ब्रह्माण्डके वे ऊर्ध्व और अधोभाग अत्यन्त दूर होनेके कारण एक दूसरेसे विलग थे। उन दोनोंके बीचमें जो अनादि, अनन्त और विस्तृत ब्रह्मके समान निर्मल आकाश था, उसीको उस समय मैने चौथे पदार्थके रूपमें देखा था। इन चारोंके सिवा दूसरी कोई वस्तु यहाँ मेरे देखनेमें नहीं आयी।
पार्थिव पदार्थोंका वह भाग, जो ब्रह्माण्ड-कपाल कहलाता है, कमठदलके समान स्थित है। जल आदि वस्तुएँ आधाररूपसे आश्रय लेनेके लिये उसीकी ओर दौडती हैं, जैसे बच्चे अपनी माँकी ओर दौड़े जाते हैं। जैसे प्याससे प्राणी जलकी ओर भागे जाते हैं, उसी प्रकार वे जलादि पदार्थ ब्रह्माण्ड नामक महाशरीरके निकटतम भागकी ओर दौड़ते हैं। जैसे शरीरसे जुडे हुए हाथ-पैर आदि अवयव अपनी अत्यन्त दृढ़ संयोगकी स्थितिको नहीं छोड़ते हैं, वैसे ही तैजस आदि पदार्थ भीतरसे ब्रह्माण्ड-शरीरका ही आश्रय ले अपनी स्थितिको नहीं छोड़ते हैं।
इस ब्रह्माण्डको यद्यपि किसीने धारण नहीं किया है तथापि वह परमात्माकी अचिन्त्य धारणात्मिका शक्तिसे अच्छी तरह धारित ही है। उसीके कारण यह पतनोन्मुख होनेपर भी गिरता नहीं है। यह सारा जगत् आकाररहित होनेपर भी खमनगरके समान साकार दिखायी देता है। जैसे चैतन्य शक्तिका प्रकाश होता है, वैसा ही यह जगत् भी स्थित है। जैसे आकाशमें श्यामता और शून्यता है, जैसे वायुमें गतिशीलता है, उसी तरह चेतनाकाश परमात्मामें यह जगत् स्थित है।
(सर्ग ८०)
रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! तदनन्तर उस समय उस महाकाशमें मैने देखा, भगवान् रुद्र मत्त-से होकर अखण्ड ताण्डवमें प्रवृत्त हो रहे हैं। उनकी आकृति बहुत दूरतक फैली हुई थी। उनका शरीर आकाशके समान ही व्यापक दिखायी देता था। उनका आकार बहुत बड़ा था। उन्हें देखकर ऐसा लगता था, मानो एकार्णवका जल ही तत्काल देह धारण करके खड़ा हो गया हो। इसके बाद मुझे दिखायी दिया कि उनके शरीरसे छाया-सी निकल रही है, जो ताण्डव-नृत्यमें उनका अनुकरण एवं अनुसरण करनेवाली है। उस समय मेरे मनमें यह प्रश्न उठा कि द्वादश सूर्योंके विद्यमान न रहनेपर जब आकाशमें महान् अन्धकार छा रहा है, तब यह छाया कैसे स्थित हुई है ? मै इस प्रकार विचार कर ही रहा था कि वह तत्काल नृत्य करती हुई शीघ्रतापूर्वक उनके आगे जाकर खड़ी हो गयी। उसका शरीर भी बहुत विस्तृत था तथा वह भी अपने तीन नेत्रोंसे सुशोभित हो रही थी। उसका रंग घोर काला था। वह बहुत ही दुर्बल थी। उसके अङ्गोंमें नस-नाड़ियोंके जाल सुस्पष्ट दिखायी देते थे। वह जरासे जर्जर हो रही थी। आकृति विशाल थी, मुखपर आगकी ज्वालाएँ व्याप्त थीं। वनके चञ्चल पत्र-पुष्प आदि मुकुट बनकर उसके मस्तककी शोभा बढ़ाते थे। वह कोयलेके समान काली थी मानो काली रात्रि ही उसका रूप धारण करके आ गयी हो, अन्धकारलक्ष्मी ही मूर्तिमती
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हो गयी हो । वह बहुत लंबी थी । उसका मुँह विकराल दिखायी देता था । वह इस तरह खड़ी थी मानो आकाशको नापनेके लिये उद्यत हो । अपने बड़े-बड़े घुटनों और भुजाओंके भ्रमणसे वह समस्त दिशाओंको मानो नाप लेना चाहती थी । वह ऐसी दुर्बल थी मानो बहुत कालतक उसे उपवास करना पड़ा हो । उसके विशाल शरीरमें सर्वत्र गड्ढे-ही-गड्ढे दीख रहे थे । वह काजलकी-सी काली और मेघमालाकी भाँति वायुके वेगसे चञ्चल जान पड़ती थी । जब वह बहुत बड़ी और दुर्बल होनेके कारण खड़ी होनेमें भी असमर्थ हो गयी, तब विधाताने मानो उसे नस-नाड़ियोंकी लंबी रस्सियोंसे बाँध दिया ( जिससे वह अच्छी तरह खड़ी रह सके ) । नस-नाड़ियों और अँतड़ियोंकी रस्सियोंद्वारा उसके सिर और हाथ-पैर आदि सभी अङ्ग इस तरह बँधे हुए दिखायी देते थे, मानो मूलसे लेकर शाखाओंके अग्रभागतक सूतोंसे बँधी हुई काँटेदार वृक्षकी झाड़ी हो । अनेक वर्णोंके सूर्यादि देवताओं तथा दानवोंके मस्तकरूपी कमलोंके समूहोंकी माला उसके कण्ठमें शोभा दे रही थी । हुतासे प्रज्वलित तथा निर्मल प्रभासे पूर्ण अग्निकी ज्वाला ही उसके लिये आँचल थी । उसके लंबे-लंबे कानोंमें नाग झूल रहे थे । उसने दो मनुष्योंकी लाशोंको कुण्डलके रूपमें धारण कर रखा था । जैसे सूखी लौकीकी लतामें दो बड़े-बड़े फल लटक रहे हों, उसी प्रकार उसकी छातीमें कुछ-कुछ हिलते हुए काले रंगके दो स्तन दिखायी देते थे, जो बहुत बड़े होनेके कारण जाँघ-तक लटक रहे थे । उसके शरीरको देखकर मैंने यह अनुमान कर लिया कि यह वही कालरात्रि है, जिसके विषयमें साधु पुरुषोंने यह निर्णय किया है कि 'ये भगवती काली हैं।' उसके तीन नेत्र आगकी ज्वालासे परिपूर्ण थे । ललाटप्रान्त इन्द्रनील मणिके समान चमक रहा था । उसकी दोनों ठोढ़ियों गहरी होनेके कारण भयंकर जान पड़ती थीं । वात-स्कन्ध ( प्रवह आदि वायु )-रूपी तागोंमें पिरोयी हुई तारावलियाँ उसके कण्ठदेशमें मुक्ताहारका काम दे रही थीं । वह वर्षा करनेवाले कल्पान्त-कालके मेघोंकी भाँति शोभा पानेवाली भ्रमणशील भुजाओंद्वारा सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको व्याप्त करके खड़ी थी । वे भुजाएँ अपने नखोंकी कान्ति बिखेर रही थीं । हिमालय और सुमेरु पर्वत उसके दोनों कानोंमें चाँदी और सोनेकी बालियाँ बनकर शोभा बढ़ा रहे थे । ब्रह्माण्डरूपी घुँघुरुओंसे बनी हुई विशाल माला उसके कटिभागमें करधनीका काम दे रही थी । शिखर, वन और नगररूपी पुष्पगुच्छोंसे युक्त तथा पुराने नगर, वन, द्वीप और ग्रामरूपी कोमल पल्लवोंसे अलंकृत सातों कुलपर्वत उस भगवती कालीके गलेकी पुष्पमालाएँ बने हुए थे ।
श्रीराम ! उस देवीके अङ्गोंमें मैंने पुर, नगर, ऋतु, तीनों लोक, मास तथा दिन-रातरूपी फूलोंकी मालाएँ देखी थीं । उसके शरीरमें व्यक्त रूपसे स्थित नगर, ग्राम और पर्वत आदि मानो पुनर्जन्म पानेके आनन्दसे उल्लसित हो उसके साथ-साथ नाच रहे थे । कभी-कभी वह नहीं नाचती थी तो भी पर्वत, वन और काननोंसहित नाना आकारवाला सारा जगत्, जो मरकर फिर लौटा था, नाचता ही रहता था । वह कालरात्रि जब चतुराईके साथ नृत्य करने लगती थी, तब चन्द्रमा, सूर्य, दिन और रात उसके नखाग्र-भागकी रेखाओंके भीतर विद्यमान प्रभामें मिलकर घूमते हुए सुवर्ण-सूत्रके समान दीर्घाकार प्रतीत होते थे । जब भगवती कालरात्रिका ताण्डव-नृत्य होने लगता था, तब इन्द्र आदि देवता और असुर अपनी-अपनी अधिकार-प्रवृत्तिसे और-ही-और बनकर वायुसे उड़ाये गये मच्छरोंके समान अथवा अस्थिर विद्युत्के समान आते-जाते दिखायी देते थे । भगवतीके शरीरमें जो सर्ग दिखायी देता था, उसमें सृष्टि-प्रलय, सुख-दुःख, भव-अभव,
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्ति * ५९९
इच्छा-अनिच्छा, विधि-निषेध, जन्म-मरण एवं भ्रम आदि विभिन्न प्रकारके भाव कभी सदा एक साथ और कभी पृथक्-पृथक् रूपसे सुशोभित होते थे । सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त देवी कालरात्रि चैतन्य-शक्तिरूपा जगन्मयी, अनन्त एवं विशाल आकाशकोशके सदृश विशुद्ध शरीरवाली है । वह देवी ( सूप ) कुदाल, ओखली, चटाई, फाल, घट, पिटारी, मूसल, डोल या बाल्टी, बटलोई और खम्भे—इत्यादि वस्तुओंको भी फूलके समान मानकर उनकी माला धारण करके नृत्य करती थी । (सर्ग ८१)
रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्म-सत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! जब प्रलयकालमें सब कुछ नष्ट हो गया, तब वह देवी कालरात्रि अपने किस शरीरसे नाच रही थी ? सूप, फाल और घट आदिसे ( जो उस समय नष्ट हो चुके थे ) उसका माला धारण करना क्या है ? यदि ये सब वस्तुएँ थीं ही तो फिर त्रिलोकीका नाश क्या हुआ ? और यदि त्रिलोकी नष्ट हो गयी थी तो कालीके शरीरमें इन सब वस्तुओंकी स्थिति क्यों और कैसे सम्भव हुई ? निर्वाणको प्राप्त हुआ जगत् फिर आकर नाचने कैसे लगा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वास्तवमें न वह पुरुष था, न वह स्त्री थी, न वह नृत्य हुआ न वे दोनों रुद्र और काली वैसे विशेषणोंसे युक्त ही थे । उनके आचार-व्यवहार भी वैसे नहीं थे और उनकी वे आकृतियाँ भी नहीं थीं । जो कारणोंका भी परम कारण है,—वह अनादि, चिन्मय आकाशस्वरूप, अनन्त, शान्त, प्रकाशरूप, अविनाशी, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दघन, शिवस्वरूप साक्षात् ब्रह्म ही भैरव ( रुद्र ) के आकारमें दिखायी देता था । जगत्का नाश हो जानेपर उस रुद्रदेवके रूपमें स्थित हुआ वह चेतनाकाशस्वरूप परमात्मा ही था । चेतन होनेके कारण वह परमात्मा अपने चैतन्यस्वभाव वैभवको छोड़कर नहीं रह सकता । जैसे सुवर्ण कटक-कुण्डल आदिके रूपमें अवस्थित होता ही है, वह उन आकृतियोंका सर्वथा त्याग करके नहीं रहता, उसी प्रकार परमात्मा भी लीलाके लिये उमा, महेश्वर आदि सगुणरूप धारण करता ही है। वह अपने लीला-स्वभावको सर्वथा छोड़ नहीं सकता । बुद्धिमान् रघुनन्दन ! तुम्हीं बताओ, सुवर्ण कटक-कुण्डल आदि आकृतियोंको क्यों नहीं धारण करेगा ? क्योंकि वह उसका स्वभाव है। इसी प्रकार ब्रह्म भी सङ्कल्पद्वारा एकसे अनेक रूपमें प्रकट होता है, यह उसका श्रुतिप्रसिद्ध स्वभाव है। कोई भी पदार्थ अपने स्वभावके बिना कैसे रह सकता है ?
रघुनन्दन ! जन्म, मरण, माया, मोह, मन्दता, अवस्तुता, वस्तुता, विवेक, बन्ध, मोक्ष, शुभ, अशुभ, विद्या, अविद्या, निराकारता, साकारता, क्षणकाल, दीर्घकाल, सत्, असत्, सदसद्भाव, मूर्खता, पाण्डित्य, देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कलना, केलि, कल्पना, रूप आदि विषयोंका बाह्य इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण, उन्हीं विषयोंका मनके द्वारा चिन्तन, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, तेज, जल, वायु, आकाश तथा पृथिवी आदिके रूपमें जो यह दृश्य-प्रपञ्च फैला हुआ है, यह सब शुद्ध, निरामय चेतनाकाशरूप परमात्मा ही है । यह अपनी शुद्ध चिदाकाशरूपताका परित्याग न करता हुआ ही सर्वरूप होकर स्थित है । मैंने जिस चिन्मय परमाकाशका वर्णन किया है, वह परमात्मा ही यहाँ शिव कहा गया है। यह सनातन पुरुष है । यही विष्णुरूपसे स्थित होता है
६२- परमपदके विषयमें विभिन्न मतवादियोंके कथनकी सत्यताका प्रतिपादन
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और यही पितामह ब्रह्मा है। यही चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, वायु, मेघ और महासागर है। यही भूत, भविष्य और वर्तमान काल है। जो वस्तु है और जो नहीं है, वह सब परमाकाशरूप परमात्मा ही है।
श्रीराम! मैने जिस चिन्मय परमाकाशस्वरूप परमात्माका वर्णन किया है, वही श्रुतियोंमें शिव कहा गया है और वही प्रलयकालमें रुद्र होकर नृत्य करता है। विद्वानों और पुण्यात्माओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! उस रुद्रदेवकी जो आकृति बतायी गयी है, वह वास्तवमें उसकी आकृति नहीं है। उस समय सच्चिदानन्दघनरूप आकाश ही उस आकारमें स्फुरित होता है। तत्त्वदृष्टिसे मैने वह आकृति उस समय शान्त चेतनाकाशरूप ही देखी। मैने ही उसे यथावत्रूपसे जाना। दूसरा कोई पुरुष जो तत्त्वदृष्टिसे रहित है उसे उस रूपमें नहीं देखता है। जैसे सुवर्ण ही विभिन्न आकृतियोसे सुशोभित होनेवाले कटक-कुण्डल आदि अलङ्कारोके रूपमें स्थित होता है, वैसे ही सत्वरूप चेतन ब्रह्म ही अपने स्वभावसे रुद्ररूप धारण करके विराजमान होता है। जो चिद्घन परमात्माका स्पन्द है, वही भगवान् शिवका स्पन्द (स्फुरण) है। वही हम लोगोके सामने वासनावश नृत्यरूपके रूपमें प्रकाशित होता है। अतः प्रलयकालमें वे भगवान् शिव भयंकर आकृतिवाले रुद्र होकर जो वेगपूर्वक नृत्य करते है, उसे सच्चिदानन्दघन परमात्माका अपना सहज विलास ही समझना चाहिये। (सर्ग ८२-८३)
शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! अब यह बताइये कि जो काली नृत्य करती है, उसका क्या स्वरूप है ? तथा वह जिन सूप, फाल, कुदाल और मूसल आदि वस्तुओकी माला धारण करती है, उनका स्वरूप क्या है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे जो भैरव या रुद्र बताये गये हैं, उन्हींको चेतनाकाश-स्वरूप शिव कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पन्दशक्ति है, उसे काली समझो। वह शिवसे भिन्न नहीं है। जैसे वायु और उसकी गति-शक्ति एक हैं, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता या दाहक-शक्ति एक ही हैं, वैसे ही सच्चिदानन्दघन शिव और उनकी स्पन्दशक्ति (क्रियाशक्ति)-रूपा माया दोनो सदा एक ही हैं। जैसे गतिशक्तिसे वायु और उष्णताशक्तिसे अग्नि ही लक्षित होते हैं, उसी प्रकार अपनी स्पन्दशक्तिके द्वारा निर्मल चिदानन्दघन शान्तस्वरूप शिवका ही प्रतिपादन होता है। स्पन्दन या मायाशक्तिके द्वारा ही शिव लक्षित होते हैं, अन्यथा नहीं। शिवको ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्त-स्वरूप शिवका वर्णन बड़े-बड़े वाणीविशारद विद्वान् भी नहीं कर सकते। मायामयी जो स्पन्दनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिवकी इच्छा कही जाती है। वह इच्छा इस दृश्याभास-रूप जगत्का उसी तरह विस्तार करती है, जैसे साकार-पुरुषकी इच्छा काल्पनिक नगरका निर्माण करती है। इस प्रकार शिवकी इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म-शिवकी वह मायामयी स्पन्दनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत्का निर्माण किया करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभासके द्वारा उदीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है। वही जीनेकी इच्छा-वाले प्राणियोंका जीवन है। वह स्वयं ही जगत्के रूपमें परिणत होनेके कारण समस्त सृष्टिकी प्रकृति (उपादान) है। दृश्याभासोंमें अनुभूत होनेवाले उत्पाद्य, आप्य, संस्कार्य और विकार्यरूपी चार प्रकारके फलोंका सम्पादन करनेके कारण वही क्रिया भी कहलाती है। ब्रह्माण्डरूप धारण करनेवाली वह शक्ति या काली प्रलयकालमें जब समुद्र आदिके जलसे भीगी होती है, तब वडवाग्निकी शिखाके समान तपनेवाले ग्रीष्मऋतुके
६३- तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्सङ्गका महत्त्व
निर्वाण-प्रकरण उ०] * शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन * ६०१
प्रचण्ड सूर्य आदिकी ज्योतियोंसे सुखायी जाती है; इसलिये उसे 'शुष्का' भी कहते हैं। दुष्टोपर स्वभावतः अत्यन्त क्रोध करनेके कारण वह 'चण्डिका' कही गयी है। उसकी अङ्गकान्ति उत्पल-नील कमलके समान है; इसलिये उसका नाम 'उत्पला' भी है। एकमात्र जयमें प्रतिष्ठित होनेके कारण उसे 'जया' कहा गया है। सिद्धियोंका आश्रय होनेसे वह 'सिद्धा' कही गयी है। चूँकि जया है, इसीलिये 'जयन्ती' भी है। विजयका आधारभूत होनेसे उसे 'विजया' कहा गया है। अत्यन्त पराक्रमके कारण वह 'अपराजिता' नामसे प्रसिद्ध है। उसका निग्रह करना किसीके लिये भी दुष्कर कार्य है, अतः उसका नाम 'दुर्गा' है। ओंकारकी सारभूता शक्ति होनेसे वह 'उमा' कही गयी है। अपने मन्त्रका गान या जप करनेवालोंके लिये त्राणकारक तथा परमपुरुषार्थरूप होनेके कारण उस देवीका नाम 'गायत्री' है। जगत्के प्रसवकी भूमि होनेसे उस जगज्जननीका नाम 'सावित्री' है। स्वर्ग और अपवर्गके साधनभूत कर्म उपासना एव ज्ञानमयी दृष्टियोंका प्रसार करनेके कारण उस देवीको 'सरस्वती' कहा गया है। पार्वतीरूपमें उस देवीके अङ्ग और शरीर अत्यन्त गौर हैं, इसलिये वह 'गौरी' कहलाती है। वह महादेवजीके आधे शरीरमें संयुक्त है (अतएव भगवान् शिवको 'अर्धनारीश्वर' कहते हैं)। सुप्त और जाग्रत् जितने भी त्रिभुवनके प्राणी हैं, उनके हृदयमें नित्य-निरन्तर अकारादि मात्राओंसे रहित शब्दब्रह्म (प्रणव) के नादका उच्चारण होता रहता है। वह नाद अर्धमात्रास्वरूप होनेसे 'इन्दुकला' कहलाता है। वह इन्दुकला ही 'उमा' है। शिव और शिवा (रुद्र और काली) दोनों ही आकाशरूप हैं। अतः उनका शरीर काला दिखायी देता है (इसीलिये उन्हें काल-भैरव और काली कहते हैं)।
स्पन्दन (स्फुरण) मात्र ही जिसका एक स्वरूप है, वह भगवती काली 'क्रियाशक्ति' है। वही 'दान दे', 'स्नान करे' और 'अग्निमें आहुति दे' इत्यादि विधि-वाक्योंद्वारा विहित दान, स्नान और यज्ञ आदि श्रेष्ठ शरीर धारण करती है। वास्तवमें वह अनादि, अनन्त चिति-शक्ति है और अपनी इच्छासे ही अपनेमें सम्पूर्ण वैदिक क्रियारूपसे प्रकाशित होती है। वह आकाश-रूपिणी है। वही स्पन्दन (स्फुरण) रूप धर्मवाली कान्तिमती दृश्य लक्ष्मीके रूपमें प्रकट होती है। उस काली देवीके जो नाना प्रकारके अभिनय और नृत्य हैं, वे ही ब्रह्माजीकी सृष्टिमें ये जन्म, जरा और मरणकी रीतियाँ हैं। वह नील कमलिनीके समान कान्तिवाली होनेके कारण 'काली' कहलाती है। वही 'क्रियाशक्ति' एवं 'ब्रह्माण्डकालिका'¹ कही गयी है। वह अपने ही अवयवभूत इस दृश्य लक्ष्मीको हृदयमें धारण करती है।
रघुनन्दन जैसे शून्यता आकाशका अङ्ग है, गतिशीलता वायुका अङ्ग है, चाँदनीमें खिलनेवाले कुमुद आदि पुष्प चाँदनीके अङ्ग हैं, उसी तरह क्रिया एवं दृश्य-जगत् चितिशक्तिके अङ्ग हैं। वास्तवमें उसका स्वरूप शिव, शान्त, आयासरहित, अविनाशी एवं निर्मल समझना चाहिये। उसमें थोड़ी-सी भी निश्चलता या चेष्टाशीलता नहीं है। इसलिये चितिशक्तिके खजानेमें मौजूद सारी सृष्टिपरम्पराएँ आत्माकी सत्यताके कारण ही सत्य प्रतीत होती हैं। वह भी उसीको, जो उनकी भावना करता है। दूसरेके लिये वे सब-की-सब असत्य ही हैं। भूत, भविष्यत् और वर्तमानके जितने भी संकल्प तथा स्वप्नके नगरसमूह हैं, वे सब सत्य ही हैं, अन्यथा वह परब्रह्म सर्वरूप है, यह कथन कैसे ठीक हो सकता है? अन्य देशोंमें स्थित जो पर्वत, ग्राम आदि हैं, वे वहाँ जानेसे दूसरेको भी उपलब्ध होते हैं, उसी तरह कोई योगसिद्ध पुरुष यदि परकायप्रवेश-सिद्धिके द्वारा स्वप्नद्रष्टाके हृदयमें जाकर उसका मनरूप होकर देखे तो वह उसके स्वप्नगत पदार्थोंको उपलब्ध कर सकता है। जैसे गाढ़ निद्रामें
१. ब्रह्माण्डरूपी बीजकोशोंका निर्माण करनेवाली।
६०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
सोये हुए पुरुषको उठाकर एक स्थानसे दूसरे स्थानपर रख दिया जाय तो भी उसके शरीरके लुढ़के होनेपर भी उसका स्वप्नगत नगर नहीं लुढ़कता है; वैसे ही नृत्य करती हुई कालरात्रिके शरीरके चालित होनेपर
भी उसके भीतर सोया हुआ जगत् न तो चालित होता और न लोटता है। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब होता है, उसी तरह कालीके शरीरमें जगत्की स्थिति है।
(सर्ग ८४)
प्रकृतिरूपा कालरात्रिके परमतत्त्व शिवमें लीन होनेका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो तत्त्वज्ञ नहीं हैं, उनकी दृष्टिमें वह चितिशक्ति ही क्रिया-रूप है। वह अनामय (निर्विकार) है तथापि स्वभावसे ही नृत्य करती है। उस क्रिया-रूपा चिति-शक्तिके कुदाल और पिटारी आदि आभूषण हैं। जैसे वायुकी गति या चेष्टा वायुसे भिन्न नहीं है, वैसे ही शिवस्वरूप परमात्माकी इच्छा-स्वरूपा वह कालरात्रि उससे भिन्न नहीं है। जैसे वायुके भीतरकी चेष्टा वायुरूप ही है; अतएव उसे चेष्टा नहीं भी कह सकते हैं, वैसे ही शिवकी इच्छा शिवके स्वरूपसे भिन्न नहीं है, अतएव शिवरूप ही है। इसलिये वह अनिच्छा ही है। इस दृष्टिसे शिवमें इच्छाका अभाव है।
वह कालरात्रि जब उस महाकाशमें नृत्य कर रही थी, उस समय उसने प्रेमावेशवश स्वयं अपने आवरणकारी अंशको हटाकर निकटवर्ती शिवका वैसे ही स्पर्श कर लिया, जैसे समुद्रजलकी रेखा अपने नाशके लिये ही वडवानलका स्पर्श कर लेती है। परम कारणरूप शिवका स्पर्श होते ही वह कालरात्रि धीरे-धीरे क्षीण होकर अव्यक्त भावको प्राप्त होने लगी। पहले तो वह अपने विशाल आकारका परित्याग करके पर्वताकार बन गयी। फिर नगराकार होकर विचित्र कल्पना-रूप पल्लवसे सुशोभित वृक्षके समान सुन्दरी बन गयी। इसके बाद उस आकारको भी छोड़कर वह व्योमाकार हो शिवके ही स्वरूपमें वैसे ही प्रविष्ट हो गयी, जैसे नदी अपने वेगको शान्त करके महासागरमें मिल जाती है। तदनन्तर शिवासे रहित हो वे शिवस्वरूप परमात्मा एकाकी शिवरूपमें ही शेष रह गये। उस पूर्ववर्णित आकाशमें वे सर्वसंहारकारी रुद्र सारे उपद्रवोंकी शान्ति होनेपर अकेले शान्तभावसे स्थित हुए।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! शिवजीका स्पर्श प्राप्त होते ही वह परमेश्वरी शिवा क्यों शान्त हो गयी ? यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वह शिवा परमेश्वर शिवकी इच्छारूपा प्रकृति कही गयी है। वही जगन्मायाके नामसे विख्यात है। वह परमेश्वर शिवकी स्वाभाविक स्पन्द-शक्ति है। वे परमेश्वर प्रकृतिसे परे पुरुष कहे गये हैं। वायु भी उन्हींका स्वरूप है। वे शिवरूप-धारी शान्त परमात्मा शरत्कालके आकाशकी भाँति निर्मल एव परम शान्तिमान् हैं। स्पन्दन (स्फुरणा या चेष्टा) मात्र ही जिसका स्वरूप है, वह परमेश्वरकी इच्छारूपा चिति-शक्ति भ्रमरूपिणी प्रकृति है। वह तभीतक इस संसारमें भ्रमण करती है, जबतक कि नित्य-तृप्त, निर्विकार, अजर, अनादि, अनन्त एवं अद्वैत परमात्मा शिवका साक्षात्कार नहीं कर लेती। यह प्रकृति एकमात्र चैतन्यधर्मिणी है। अतः उसे चिति-शक्ति ही समझना चाहिये। यह चिति देवी जब शिवका स्पर्श करती है, तब पूर्णतः शिवस्वरूप ही हो जाती है। जैसे नदी समुद्रका स्पर्श करते ही अपने नाम और रूपको त्यागकर उसके भीतर समा जाती है, वैसे ही प्रकृति पुरुषका स्पर्श प्राप्त करते ही उसके भीतर एकताको प्राप्त हो अपनी प्रकृति-रूपताका परित्याग कर देती
६५- सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन
निर्वाण-प्रकरण उ०] * रुद्रदेवका ब्रह्माण्डखण्डको निगलकर निराकार चिदाकाशरूपसे स्थित होना * ६०३
है। उस समय प्रकृति चिति—निर्वाण-रूप परम पदको प्राप्त हो तद्रूप बन जाती है, जैसे नदी समुद्रमें मिलकर समुद्ररूप हो जाती है। रघुनन्दन ! वह चिति शक्ति तभीतक मोहवश इन व्याकुल सृष्टिपरम्पराओ और उनकी जन्म आदि दशाओमें भ्रमण करती रहती है, जबतक कि परब्रह्म परमात्माका दर्शन नहीं कर लेती। उनका दर्शन कर लेनेपर वह तत्काल उन्हींमें समा जाती है। (सर्ग ८५)
रुद्रदेवका ब्रह्माण्डखण्डको निगलकर निराकार चिदाकाशरूपसे स्थित होना तथा वसिष्ठजीका उस पाषाण-शिलाके अन्य भागमें भी नूतन जगत्को देखना और पृथ्वीकी धारणाके द्वारा पार्थिव जगत्का अनुभव करना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जब मै खडा-खड़ा वह सब देख रहा था, तब मुझे दिखायी दिया कि वे भगवान् रुद्र तथा ब्रह्माण्डके वे दोनो खण्ड या कपाल चित्र-लिखितके समान निश्चेष्ट हैं। तदनन्तर एक ही मुहूर्तमें आकाशके बीच रुद्रदेवने ब्रह्माण्डके उन दोनो खण्डोंको अपनी सूर्यरूपिणी दृष्टिसे उसी तरह देखा, जैसे द्युलोक और भूलोकको देख रहे हों। फिर पलक मारते-मारते उन दोनों ब्रह्माण्डखण्डोंको अपनी श्वास-वायुके द्वारा खींचकर उन्होने पाताल-गुफाके समान मुँहमें डाल लिया । इस प्रकार ब्रह्माण्डखण्डरूपी दुग्धसार तथा मिष्टान्नराशिको अपना ग्रास बनाकर वे भगवान् रुद्र उस समस्त आकाशमे चिदाकाशरूप होकर अकेले ही रह गये। तदनन्तर वे एक ही मुहूर्तमें बादलके समान हल्के और छोटे हो गये। फिर छड़ीके समान और उसके बाद बित्ते भरके हो गये। तत्पश्चात् जिन्हें वैसे विशाल रूपमें देखा गया था, वे रुद्र मुझे काँचके टुकड़ेकी एक कणिकाके समान दिखायी दिये। इसके बाद मैने आकाशसे दिव्यदृष्टिद्वारा देखा, वे परमाणुके बराबर हो गये थे। परमाणुरूप होनेके पश्चात् वे अदृश्य हो गये । इस तरह भरे-पूरे जगत्से लेकर रुद्र-शरीरतक वह सारा महान् आरम्भ मेरे देखते-देखते शरत्कालके मेघखण्ड-की भाँति विलीन हो गया। श्रीराम ! जैसे भूखा हिरन छोटे-से पत्तेको निगल जाता है, उसी प्रकार भगवान् रुद्रने जब इस प्रकार आवरणोंसहित समस्त ब्रह्माण्डको उदरस्थ कर लिया, तब दृश्यरूपी मलसे रहित केवल चेतनाकाश-रूप शान्त परमात्मा परब्रह्म ही शेष रह गया। उसका न कहीं आदि है न अन्त। चिन्मय आकाशमात्र ही उसका स्वरूप है। रघुनन्दन ! इस तरह मैने पाषाण-खण्डके कोटरमें दर्पणमें दीखनेवाले प्रतिबिम्बकी भाँति उस महान् विभ्रमरूप ब्रह्माण्ड एवं उसके महाप्रलयका दृश्य देखा था।
तदनन्तर उस विद्याधरोका, उस शिलाका तथा उस संसारभ्रमका स्मरण करके मै वैसे ही आश्चर्य-चकित हो गया, जैसे कोई गाँवका रहनेवाला गँवार पहले-पहल राजद्वारपर पहुँचकर विस्मयसे विमुग्ध हो जाता है। इसके बाद मैंने पुनः उस सुवर्णशिलाको ध्यानसे देखना आरम्भ किया। फिर तो मुझे कालीके शरीरमें स्थित हुए संसारकी भाँति उसमें सर्वत्र नूतन सर्ग दृष्टिगोचर होने लगे। वह घनीभूत मण्डलाकार सुवर्णमयी विस्तृत पाषाणशिला एकरूपमें ही स्थित थी और सन्ध्याकालके मेघकी भाँति परम सुन्दर दिखायी देती थी। इसके बाद मैंने आश्चर्यचकित हो उस शिलाके दूसरे भागके विषयमें भी उसी परादृष्टिसे विचार करना आरम्भ किया। विचार करते-करते देखता हूँ तो उस शिलाका दूसरा भाग भी उसी तरह जगत्के आरम्भसे ठसाठस भरा हुआ है। वहाँ पूर्ववत् एक छिद्र (आकाश) में नाना पदार्थोंसे सुन्दर संसार बसा हुआ था। उस शिलाके जिस-जिस प्रदेशको मैंने देखा, वहाँ-वहाँ दर्पणमें प्रतिबिम्बकी भाँति मुझे निर्मल जगत्का दर्शन हुआ।
६०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
रघुनन्दन ! तदनन्तर चेतनाकाशस्वरूप निर्विकार अनन्त एवं सर्वव्यापी ब्रह्मरूपसे स्थित हुए मैंने जब समाहित-चित्त होकर देखा तो अपने शरीरके भीतर ही मुझे सृष्टिरूपी वृक्ष एक अङ्कुरके रूपमें स्थित दिखायी दिया। जैसे डेहरीके भीतर रखा हुआ बीज वर्षाके जलसे भीग जानेपर अङ्कुरित हो जाता है, उसी प्रकार मेरे भीतर सृष्टि-बीज अङ्कुरित हुआ था। जैसे बीजके भीतर विद्यमान अङ्कुर सींचनेसे विकसित हो ऊपरकी ओर निकल आता है, उसी प्रकार मूर्त, अमूर्त, जड और चेतन सभी वस्तुओंमें जगत् विद्यमान है। जैसे सुषुप्तावस्थासे स्वप्नावस्थाको प्राप्त हुए चिन्मात्र पुरुषकी अपनी ही चेतनासे स्वप्नजगत्की दृश्य-लक्ष्मीका विकास होता है अथवा जैसे स्वप्नावस्थाके हट जानेपर जगे हुए पुरुषके समक्ष जाग्रत्-कालका दृश्य-प्रपञ्च विकासको प्राप्त होता है, उसी तरह जिसने सृष्टिके आरम्भमें अपने स्वरूपका पृथक् रूपसे अनुभव किया है, ऐसे आत्मामें इस सृष्टिका उदय होता है। हृदयाकाशमें उदित हुआ यह सर्ग चेतनाकाशसे पृथक् नहीं है।
तदनन्तर पृथ्वीकी धारणासे युक्त होकर मैं ध्यान करने लगा। पृथ्वीकी धारणा करनेपर उसके अभिमानी जीवकी स्वरूपता प्राप्त करके मैं द्वीप, पर्वत, तृण और वृक्षादिरूपी देहसे युक्त हो वहाँके जगत्का अनुभव करने लगा। मैं सम्पूर्ण भूमण्डल बन गया। नाना प्रकारके वन और वृक्ष मेरे शरीरके रोम हो गये। नाना प्रकारकी रत्नावलियाँ मेरे शरीरमें व्याप्त थीं और अनेकानेक नगर मेरे लिये आभूषणका काम दे रहे थे। पृथ्वीका रूप धारण करके मैं नदी, वन, समुद्र, दिगन्त, पर्वत तथा द्वीप नामक प्राणियोंके भोग्यस्थलों और जंगल-समूहोंसे व्याप्त हो गया। नाना प्रकारके पदार्थोंकी श्रेणियोंसे भरे हुए अनेकानेक मण्डल-कोश दृष्टिगोचर होने लगे तथा मैं लता, सरोवर, सरिता और कमलसमूहोंसे सुशोभित होने लगा।
(सर्ग ८६-८७)
श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त हुए अनुभवका उल्लेख
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! अब यह बताइये कि उस समय आपने विभिन्न भूभागोंके भीतर कहीं ब्रह्माण्डोंके दर्शन किये थे या नहीं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! पहले शिलामें जैसे सम्पूर्ण जगत् देखा गया था, वैसे ही उस समय भूमण्डलके सभी स्थानोंमें मुझे जगत्का जाल-सा बिछा हुआ दिखायी दिया। वह सारा दृश्यमय प्रपञ्च द्वैतमय होता हुआ भी वास्तवमें शान्त अद्वैत ही है। सभी स्थानोंमें जगत् है और सर्वत्र सबके आधाररूपसे ब्रह्म विराजमान है। अतः सब कुछ परम शान्त चिदाकाश-स्वरूप ब्रह्म ही है और सभी अनेक प्रकारके आरम्भोंसे परिपूर्ण हैं। रघुनन्दन ! यद्यपि यह दृश्य 'सत्' और 'अहम्' इत्यादि रूपसे अनुभवमें आता है, तथापि उसका अस्तित्व परमार्थ-दशामें है ही नहीं और यदि है तो वह सब अजन्मा—निर्विकार ब्रह्म ही है।
मैंने धारणाद्वारा पृथ्वीका रूप धारण करके जैसे वहाँ नाना प्रकारके जगत् देखे थे, वैसे ही जलतत्त्वकी धारणासे जलरूप होकर वहाँ भी वैसे ही जगत्का दर्शन किया। जैसे काट-छाँटकर स्वच्छ किये गये इन्द्रनीलमणिके समान नील वर्णवाले भगवान् विष्णु शेषनागके अङ्गोंपर भगवती लक्ष्मीजीके साथ विश्राम करते हैं, उसी प्रकार श्याम-शरीरवाले मैंने भी बादलोंके आसनोंपर विद्युन्मयी वनिताके साथ विश्राम किया। रसरूप होनेके कारण मैंने जिह्वासम्बन्धी एक-एक अणुके साथ रहकर उत्तम अनुभव प्राप्त किया, जिसे मैं अपने शरीरका नहीं केवल ज्ञानरूप आत्माका, ही
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त अनुभव * ६०५
अनुभव मानता हूँ। जलकणका' रूप धारण करके हवाके रथपर चढ़कर मैंने आकाशकी निर्मलगलियोंमें सुगन्धकी भाँति विचरण किया। जलकी समता प्राप्त करा देनेवाली उस जलमयी धारणाके द्वारा अजड होकर भी जड (जल)- सा बनकर तथा समस्त पदार्थोंके भीतर ज्ञातारूपसे रहता हुआ भी दूसरोंके द्वारा अज्ञात होकर रहा।
रघुनन्दन ! तत्पश्चात् मैं तेजस्तत्त्वकी बढ़ी हुई धारणाके द्वारा चन्द्रमा, सूर्य, तारा और अग्नि आदि विचित्र अवयवोंसे युक्त तेज बन गया। तेजके सदा सत्त्व-प्रधान होनेके कारण मैं प्रकाशरूप बनकर चमक उठा। संसारमें जितने भी रूप हैं, वे सब प्रकाशके ही अङ्ग हैं। अतः सदा प्रकाशकी गोदमें शयन करनेवाले शुक्ल, कृष्ण और अरुण आदि समस्त वर्णोंका मैं स्वरूपदाता पिता हो गया। अपने तेजःस्वरूपसे मैं दिग्वधुओंके लिये स्वच्छ दर्पण बन गया।-रात्रिरूपी कुहरेको नष्ट करनेके लिये वायु- स्वरूप हो गया। चन्द्रमा, सूर्य और अग्निका तो जीवन- सर्वस्व ही था। मैं स्वर्गलोकके लिये कुंकुमका आलेप बन गया। मैं तेज बनकर सुवर्ण आदि सुन्दर वर्ण (रंग) बन गया, मनुष्य आदिमें पराक्रम हो गया, रत्न आदिमें चकाचौंध पैदा करनेवाली कान्ति बन गया और वर्षाऋतुमें विद्युत्का प्रकाश हो गया। तेजकी धारणासे तेजोमय होकर मैं उन वृत्र आदि असुरोंके मस्तकपर वज्रका प्रहार बन गया; जो अपने थप्पड़से शत्रुओंका सिर फोड़ डालते थे। साथ ही सिंह आदिके हृदयमें पराक्रम बनकर बैठ गया। रणाङ्गणमें निर्भय विचरण करानेवाला जो उद्भट पराक्रम वीरपुरुषोंके भीतर प्रसिद्ध है, वह भी मैं ही बन गया। वह भी साधारण पराक्रम नहीं, अपितु जो कठोर लोह- कवचोंको तोड़नेवाले खड्गोंके परस्पर आघातोंसे उत्पन्न हुई टंकारध्वनिसे अत्यन्त पटु तथा महान् आडम्बरसे युक्त हो। सूर्यरूप होकर मैंने दसों दिशाओंमें फैले हुए किरणरूपी हाथोंसे जगतरूपी पक्षीको, जिसके बड़े- बड़े पर्वत अङ्ग थे, पकड़ लिया। उस समय मुझको यह सारा भूतल एक छोटेसे गाँवके समान दिखायी दिया। चन्द्रमाके रूपमें प्रकट होनेपर मेरा आकार अमृतसे भरी हुई झीलके समान हो गया। मैं द्युलोकरूपी सुन्दरीका मुख बन गया। निशारूपिणी निशाचरीके हास्य-सा लगने लगा और रात्रिमें यत्र-तत्र प्रवेश करनेवाले पुरुषोंके लिये प्रकाश-दीपका काम देने लगा। मैंने अग्नि बनकर दावानलकी ऐसी ज्वाला फैलायी, जिससे लकड़ियोंका तत्काल विदारण हो जाता था और मेरी दुर्निवार दीप्ति बढ़ जाती थी। बड़े-बड़े काष्ठोंके फूटने और फटनेसे अत्यन्त कठोर शब्द उत्पन्न होते थे। यज्ञाग्नि बनकर मैंने हविष्यादिका भी कल्याणकारी कार्य सम्पन्न किया। कहीं लोहार आदिकी प्रयोगशालाओंमें मैंने तप्त लोहपिण्ड आदिमें रहकर हथौड़े आदिसे ताड़ित होनेपर उन ताड़नकर्ताओंको जलानेके लिये आगकी चिनगारियाँ प्रकट की थीं।
श्रीरामजीने पूछा—मानदाता मुने ! उस अवस्थामें आपको सुखका अनुभव हुआ या दुःखका ? यह मुझे मेरी जानकारीके लिये बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा--रघुनन्दन ! जैसे सोया हुआ पुरुष चेतन होता हुआ भी जडताका अनुभव करता है, वैसे ही चेतनाकाश अपने संकल्पसे दृश्यभावको प्राप्त होकर जडताका-सा अनुभव करता है। जब ब्रह्म अपनेको पृथ्वी आदिके रूपमें समझता है, तब मृतकी भाँति जड-सा बनकर स्थित रहता है। इसका जो सचिदानन्दात्मक यथार्थ स्वभाव है, उसका कभी अन्यथाभाव नहीं होता।
(सर्ग ९०-९१)
सं० यो० व० अं० २१—
६०६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
धारणाद्वारा वायुरूपसे स्थित हुए वसिष्ठजीका अनुभव
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर मैं जगत्को देखनेके कौतूहलसे धीर-चित्तवृत्तिके द्वारा वायुमयी विस्तृत धारणा करके वायुरूप हो गया और लतावल्लीरूपिणी ललनाओंको नचाने लगा। कमल, उत्पल और कुन्द आदि पुष्पसमूहोंकी सुगन्धका संचय करके उसकी रक्षा करने लगा। नन्दनवनमें मेरा आना-जाना अत्यन्त मधुर और उदार होता था; क्योंकि वहाँ बड़ी मधुर सुगन्ध सुलभ होती थी। चन्द्रमण्डलमें जो श्रेष्ठ अमृत है, उसका चिरकालतक उपभोग करके पूर्णरूपसे घिरे हुए मेघोंकी घटारूप शय्यापर सोकर तथा कमलवनोको कम्पित करके मैं प्राणियोंके श्रमका निवारण किया करता था। आकाशरूपी पुष्पका मैं ही सौरभ था। अतएव उसके गुणभूत सभी शब्दोंका मैं सहोदर भाई बन गया। प्राणियोंके अङ्गों और उपाङ्गोंमें प्रेरक बनकर उनकी नाड़ीरूप नालियोंमें जलसा हो गया था। मैं सुगन्धरूपी रत्नोंका लुटेरा, विमानरूपी नगरोंकी आधारभूमि, दाहरूपी अन्धकारका निवारण करनेके लिये चन्द्रमा तथा शीतरूपी चन्द्रमाकी उत्पत्तिके लिये क्षीरसागर था। एक ही क्षणमें मैं समस्त पर्वतोंको उखाड़कर फेंकनेमें समर्थ था। वायुरूप बनकर मैंने छः प्रकारकी क्रियाएँ करते-करते प्रलयपर्यन्त कभी भी विश्राम नहीं लिया। मेरे वे छः कर्म इस प्रकार थे। हिम और घी आदिको जमा देना—उसका पिण्ड बनाना, कीचड़ आदिको सुखाना, मेघ आदिको धारण करना, तृण आदिमें हलचल पैदा करना, सुगन्धको इधर-उधर ले जाना तथा ताप हर लेना।
श्रीराम ! इस प्रकार उस समय पृथ्वी आदि पाँच भूतोंका रूप धारण करके मैने उस त्रिलोकीरूप कमलके उदरमें भलीभाँति विहार किया। पृथ्वी, जल, वायु और तेजके समूहरूप वृक्षोंके शरीरोंमें निवास करते हुए मैंने मूल-जालके द्वारा पृथ्वीका रस पीया और उसके स्वादका अनुभव किया। अमृतसे पूर्ण घनीभूत अङ्गवाले तथा चन्दन-द्रवके समान शीतलता आदि गुणोंसे सुशोभित चन्द्रबिम्बोंपर जो बर्फकी बनी हुई शय्याओंके समान थे, मैंने अच्छी तरह लोट-पोट किया है। उपभोगके बाद बचा हुआ पुष्परस भ्रमरको देते हुए मैंने सभी दिशाओं और सभी ऋतुओंमें समस्त वनसमूहोंके भीतर नाना प्रकारकी सुगन्धोंसे परिपूर्ण पुष्पराशियोंका अच्छी तरह सेवन किया है। कुमुद, कह्लार और कमलोंसे पूर्ण नलिनी-वनमें मैंने मधुर बोली बोलनेवाली हंसियोंके साथ लीला-पूर्वक कोमल कलकल नाद किया है। रघुनन्दन ! मेरी कृपासे प्रसन्न हुए सूर्य आदि देवताओंने शरीरसे कृष्ण, रक्त, श्वेत, अश्वेत, पीत एव हरित वर्णोंसे हरे वृक्षोंकी भाँति मेरे शरीरमें स्थिति प्राप्त की थी। समुद्रोंसे घिरी हुई तथा सात द्वीपोंके कारण मानो सात रूप धरनेवाली इस भूमिको मैने अपनी कलाईमें कंगनकी भाँति धारण कर लिया था। श्रीराम ! समस्त ब्रह्माण्डरूप होनेके कारण यद्यपि सारे पाताल मेरे चरण बन गये थे, मैं भूतलको उदरके रूपमें धारण कर रहा था और आकाश मेरा मस्तक था, तथापि मैंने अपनी परम सूक्ष्म चिन्मात्रस्वरूपताका कभी त्याग नहीं किया था। इस प्रकार चिदाकाशरूपसे स्थित हुए मैंने भूमि, जल, अग्नि और वायुका स्वरूप धारण किया। जैसे प्रसिद्ध चिति शक्ति स्वयं ही स्वप्नमें नगर आदिका रूप धारण करती है, उसी प्रकार मेरेद्वारा भूमि आदिका स्वरूप-धारण माया शक्तिका विस्तार ही था। (सर्ग ९२)
निर्वाण-प्रकरण उ०] * कुटीमें लौटनेपर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन * ६०७
कुटीमें लौटनेपर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन, उनके संकल्पकी निवृत्तिसे कुटीका उपसंहार, सिद्धका नीचे गिरना और वसिष्ठजीसे उसका अपने वैराग्यपूर्ण जीवनका वृत्तान्त बताना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार धारणाके द्वारा सिद्ध हुए पृथ्वी आदिके रूपसे जगत्-शरीरका अवलोकन करनेके बाद पूर्वोक्त कौतुकदर्शनके संकल्प और प्रयत्नसे निवृत्त हो मैं पुनः पहलेके समाधि-स्थान आकाश-कुटीके प्रदेशकी ओर लौट आया । वहाँ आनेपर देखता हूँ कि मेरा अपना शरीर कहीं भी स्थित नहीं दिखायी देता है । वहाँ अपने सामने बैठे हुए किसी दूसरे ही सिद्धपुरुषको मैं देख रहा हूँ, जो अकेला है । वह सिद्ध समाधिनिष्ठ होकर बैठा था और अभीष्ट परम पदको प्राप्त हो चुका था । उसने पद्मासन बाँध रखा था । वह परम शान्त था और समाधिमें चित्तके स्थिर हो जानेसे उसका शरीर हिलता-डुलता नहीं था । भस्मनिर्मित त्रिपुण्ड्रकी रेखाओंसे युक्त, सौम्य तथा समान विस्तारवाले कंधोंसे उसकी ग्रीवा बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी । उसका मन उदार ब्रह्मतत्त्वमें विश्राम ले रहा था । इसलिये उसका शरीर सुस्थिर और मुख अत्यन्त प्रसन्न था । उस प्रसन्न मुखसे सुशोभित उसके मस्तककी जो निश्चल अवस्था थी, उसके कारण वह सिद्ध बड़ा सुन्दर दिखायी देता था । नाभिके निकट उत्तानभावसे रखे हुए उसके दोनों हाथोंकी शोभा दो प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाके समान जान पड़ती थी । उन हाथोंकी शोभाके रूपमें मानो हृदय-कमलके प्रकाश ही बाहर प्रकट हो गये हों—ऐसा जान पड़ता था । उन कर-कमलोंकी प्रभासे वह सिद्धपुरुष प्रकाशित हो रहा था । उसके दोनों नेत्रोंकी पलकें बंद थीं। उसकी बाह्येन्द्रियोंके सारे व्यापार क्षीण हो गये थे । विक्षोभसे रहित तथा पूर्णरूपसे शान्त, अन्तःकरणरूपिणी गुफाको उसने अपनी धीर मनोवृत्तिके द्वारा इस तरह धारण कर रखा था, मानो समस्त उत्पातोंसे रहित शान्त आकाशको धारण किया हो । उस कुटीमें जब मैंने अपना शरीर नहीं देखा और सामने उस मुनिको ही देखा, तब मैंने अपने शुद्ध चित्तके द्वारा वहाँ यों विचार किया ।
"जान पड़ता है ये कोई महान् सिद्ध महात्मा हैं, जो मेरी ही तरह सोच-विचारकर एकान्त महाकाशमें विश्राम लेनेकी इच्छासे इस दिगन्तमें आ पहुँचे हैं । 'मैं समाधिके योग्य एकान्त स्थान पा जाऊँ, इस चिन्तामें ही पड़कर ये सत्यसंकल्पशाली महात्मा इधर आये हैं और इन्हें यह कुटी दिखायी दी है । उसके बाद दीर्घकालतक जब मैं नहीं लौटा हूँ, तब मेरे पुनः आगमनकी बात इनके ध्यानमें नहीं आयी है और इन्होंने शवरूपमें पड़े हुए मेरे शरीरको यहाँसे हटाकर स्वयं इस कुटियामें आसन जमा लिया है । मेरा वह शरीर तो अब नष्ट हो गया । अतः अब इस आतिवाहिक देहसे ही मैं अपने सप्तर्षिलोकको चलूँ'—ऐसा निश्चय कर मैं ज्यों ही वहाँसे चलनेको उद्यत हुआ, त्यों ही मेरे पूर्वसंकल्पका क्षय हो जानेसे वह कुटी अदृश्य हो गयी और वहाँ केवल आकाशमण्डल रह गया । फिर तो समाधिमें स्थित हुए वे सिद्धबाबा निराधार होकर नीचेकी ओर गिरने लगे ।
मैंने पहले यह संकल्प किया था कि जबतक मैं यहाँ रहूँ, तबतक यह कुटी भी रहे, परंतु अब वह संकल्प क्षीण हो जानेसे कुटिया नष्ट हो गयी और सिद्ध महात्मा क्षण-भरमें वहाँसे गिर पड़े । तब सुजनता या कौतुकवश मैं उन गिरते हुए सिद्धपुरुषके साथ उस मनोमय (आतिवाहिक) शरीरसे ही आकाशसे भूतलकी ओर चला । गिरते समय उनका पैर पूर्ववत् पृथ्वीसे जा लगा और
६०८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मस्तक ऊपरकी ओर ही उठा रहा। वे पद्मासन लगाये हुए ही वहाँ गिरे थे। उनके प्राणने अपान वायुको ऊपरकी ओर खींच रखा था। इसीलिये वे पहले जिस प्रकार बैठे थे, उसी अवस्थामें आकाशसे नीचे आ गये। वे सिद्धपुरुष इतने ऊँचेसे गिरनेपर भी समाधिसे जगे नहीं; क्योंकि चित्तके परमात्मामें दृढ़तापूर्वक लगे रहनेके कारण वे अचेतन-से हो रहे थे। साथ ही उनका कोई अङ्ग भी भग्न नहीं हुआ; क्योंकि वे योगके प्रभावसे रूईके ढेरकी भाँति बहुत ही हल्के बन गये थे। तब मैंने उन्हें समाधि-से जगानेके लिये प्रयत्न आरम्भ किया और बादलका रूप धारण करके आकाशमें गर्जन-तर्जनके साथ वर्षा आरम्भ कर दी। ओले और वज्र गिरने लगे। जैसे बादल या वर्षा मोरको जगाती है, उसी प्रकार मैंने अपने बुद्धि-कौशलसे उस दिगन्तमें उन सिद्धपुरुषको जगाया। समाधिसे जागनेके बाद उनके समस्त अङ्गोंकी शोभा प्रकाशित होने लगी और उनके नेत्र भी विकसित हो उठे। उस समय वे ऐसे लगते थे, मानो वर्षाकालमें धारावाहिक वृष्टिसे विकसित हुआ कमलोंका वन हो। समाधिसे जागनेपर मैंने उनसे शुद्ध भावसे पूछा—'मुनीश्वर ! आप कहाँ हैं और यह क्या कर रहे हैं? आप कौन हैं? इतनी दूरीसे आप नीचे गिरे हैं, फिर भी आप अपने चित्तमें उसका अनुभव क्यों नहीं कर रहे हैं?' मेरे इस प्रकार पूछनेपर उन्होंने मेरी ओर देखा। फिर अपनी पूर्वगतिका स्मरण करके वे मुझसे उसी तरह सुन्दर वचन बोले, जैसे चातक मेघसे बोलता है।
सिद्धने कहा—ब्रह्मन् ! जबतक मैं अपने वृत्तान्तका स्मरण न कर लूँ, तबतक आप मेरे उत्तरके लिये प्रतीक्षा कीजिये। मैं आपसे अपना सारा पिछला वृत्तान्त कहूँगा।
इतना कहकर उन्होंने अपने पूर्व वृत्तान्तको शीघ्र ही स्मरण कर लिया। इसके बाद वे चन्द्रमाकी किरणोंके समान शीतल एवं मनोहर वाणीमें मुझसे बोले।
सिद्धने कहा—ब्रह्मन् ! इस समय मैने आपको पहचान लिया है। अतः प्रणाम करता हूँ। अबतक ऐसा न करनेसे मेरेद्वारा जो अपराध बन गया है, इसे आप क्षमा करें; क्योंकि क्षमा सत्पुरुषोंका स्वभाव है। मुने ! जैसे कमलोंमें भौंरा भ्रमण करता है, उसी प्रकार मैंने सुदीर्घकालतक भोगरूपी सुगन्धसे पूर्ण मोहकारक देवोद्यान-भूमियोंमें चिरकालतक भ्रमण किया है। तदनन्तर चित्तरूपी जल-तरङ्गोंके हिलोरोंसे युक्त दृश्य-रूपिणी नदीमें उसके मण्डलाकार आवतों (भँवरों) द्वारा निरन्तर बहाये जाते हुए मैने दीर्घकालके बाद विवेकका आविर्भाव होनेपर संसारसे उद्विग्न हो इस तरह विचार किया—'अहो ! इस संसारमें शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्धमात्रको छोड़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; अतः इतने ही मात्रमें—ऐसे तुच्छ विषय-भोगमें मै क्यों रमण करूँ ? विषयोंमें विषोंकी विषमता भरी है, सुन्दरी स्त्रियों कामरूप मोहको ही देनेवाली हैं तथा राग सरस पुरुषको भी विरसता प्रदान करनेवाले हैं; इनमें लोटनेवाला कौन पुरुष नष्ट नहीं हुआ ? इस शरीरमें शीघ्र प्राप्त होनेवाली जीर्ण-शीर्ण वृद्धावस्था एक विशाल बगुलीके समान है। वह यही सोचती रहती है कि मैने इस जीवनरूपी कीचड़ या सेवारमें बहुत बड़ी मछली पा ली है। इसी भावसे वह इस शरीरको तत्काल उदरस्थ कर लेना चाहती है। यह शरीर समुद्रमें दीखनेवाले बुलबुलेके समान शीघ्र ही नष्ट हो जानेवाला है। यह सामने स्फुरित होता हुआ ही सहसा दीपशिखाके समान बुझकर अदृश्य हो जाता है।
'यह जीवन एक महानदी है। इसमें नाना प्रकारके विक्षेप बड़ी-बड़ी लहरोंके समान हैं। काल-चक्र ही इसमें भँवर बनकर उठता है। जन्म और मरण ही इसके दो ऊँचे और विशाल तट हैं तथा इसमें सुख-दुःखकी छोटी-छोटी तरङ्गें उठती रहती हैं।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * कुटीमें लौटकर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन * ६०९
यौवनका उल्लास ही इसकी कीचड है। वृद्धावस्थाके सफेद केश ही इसके धवल फेन हैं। कभी काकतालीय संयोगसे इसमें सुखके बुद्बुद भी उठ जाते हैं। व्यवहार ही इसके महाप्रवाहकी रेखा है। इसमें नाना प्रकारके जड-रव (मूर्खोंके कोलाहल) ही जलरव (जलकी ध्वनि) हैं। राग-द्वेषरूपी बादल इसे बढ़ाते रहते हैं तथा भूतलपर इसका शरीर सदा ही चञ्चल रहता है। लोभ और मोहके महान् आवर्त इसमें उठते रहते हैं। पात और उत्पातसे इसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार यह जीवन नामक नदी शब्दमात्रसे तो अत्यन्त शीतल है; परंतु वास्तवमें त्रिविध तापोंसे अत्यन्त संतप्त रहा करती है। यह महान् खेदका विषय है। संसाररूपी नदीके जलस्थानीय जो इष्ट, मित्र, पुत्र आदिके समागम और धन है, उनमें पहले-पहलेके तो चले जाते हैं और नये-नये आते रहते हैं। (इस प्रकार यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है।) यहाँ जो पदार्थ प्राप्त हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। अतः उन क्षणभङ्गुर पदार्थोंसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। जब प्राप्त हुई वस्तुओंकी यह दशा है, तब जो नये पदार्थ प्राप्त होते हैं, उनपर भी यहाँ कैसे आस्था हो सकती है? संसारमें जितनी नदियाँ हैं, उन सबका जल उद्गमस्थानसे आता और समुद्रकी ओर जाता रहता है। परंतु इस शरीररूपी नदीका जो आयुरूपी जल है, वह केवल जाता ही है, फिर आता नहीं । भयंकर शत्रुभूत विषयरूपी चतुर चोर चारों ओर विचरते रहते हैं, वे विवेकरूपी सारा धन हर ले जाते हैं। अत मुझे निरन्तर जागते रहना चाहिये। यहाँ मैं सो कैसे रहा हूँ? आज यह हुआ, कल यह होगा, यह इसका है और यह मेरा है—इस प्रकार संकल्प-विकल्प करता हुआ मनुष्य बीती हुई आयु और आयी हुई मौतको नहीं जान पाता है। यह कैसी आश्चर्यकी बात है! खूब खा-पी लिया, अनन्त वनभूमियोंमें विचरग कर लिया और बहुत-से सुख-दुःख भी देख लिये। अब यहाँ और क्या करना या पाना शेष रह गया है? मैंने ऊँचे शिखरोंवाले मेरु पर्वतकी उद्यान-भूमियोंमें अच्छी तरह भ्रमण किया। लोकपालोंके श्रेष्ठ नगरोंमे भी मैं घूम लिया। परंतु वहाँ भी कौन-सा स्वाभाविक सुख प्राप्त हुआ?
'धन, मित्र, सुख और भाई-बन्धु कोई भी कालग्रस्त मनुष्यकी रक्षा नहीं कर सकते। मनुष्यका जीवन धूलि-राशिके समान अस्थिर है, उसकी स्थिति सुदृढ नहीं है। जैसे पर्वतशिखरोपर गिरा हुआ वर्षाका जल प्रतिक्षण व्यर्थ नष्ट होता है, वैसे ही भीतरसे विषयोंमें आसक्त मनुष्य क्षण-क्षणमें क्षीण हो अन्तमें पुरुषार्थशून्य रहकर ही अस्त (मृत्युको प्राप्त) हो जाता है। कोई भी भोग मेरे मनको नहीं लुभा रहे हैं। यहाँके वैभव भी मुझे सुन्दर नहीं लगते हैं। यह जीवन भी मदमत्त युवतीके कटाक्षपातकी भाँति चञ्चल एव क्षणभङ्गुर है। मुने! यहाँ कहाँ, किसको, किस तरह और किस उपायसे आश्वासन प्राप्त हो। पापिनी मृत्यु आज या कल मस्तकपर पैर रख ही देगी अथवा माथेपर विपत्तिका पहाड़ डाल ही देगी। यह शरीर एक दिन पत्तेके समान झड़ जानेवाला है। जीवनकी स्थिति भी जीर्ण-शीर्ण ही है। बुद्धि अधीरतासे ग्रस्त हैं और विषयोंके रस नीरस हो गये हैं। नीरस विषय और उनके मनोरथ मेरी विस्तृत आयुको ले बीते। इनसे मेरे लिये कोई चमत्कारजनक पुरुषार्थ नहीं सिद्ध हुआ। आज मेरा मोह मन्द पड गया है। इस शरीरका इस जगत्मे कोई उपयोग नहीं है। विषयोंमें आस्था या आसक्ति न करना ही ऊँची स्थिति है और जीवनके प्रति आस्था रखना ही सबसे अधम अवस्था है। अहो! यह सम्पत्ति क्या मिली, विपत्ति ही सिरपर आ पडी है, जो भारी मोहमे डालनेवाली है। विवेकी पुरुषको सदा ऐसा ही मानना चाहिये और इस संसारमे कभी आसक्त नहीं होना चाहिये।
**१—तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरामचन्द्रजीका स्वागत (प्रसंग वैराग्य-प्रकरण सर्ग ४)** ... **४८**
६१० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जैसे समुद्रपत्नी सरिताएँ भूतलपर अपने शरीरको आन्दोलित करती हुई समुद्रकी ओर दौड़ रही हैं, उसी प्रकार जनता विषयोंकी ओर दौड़ी जा रही है। यहाँ आयु ही उत्पात-वायु है। मित्र ही बड़े भारी शत्रु हैं। बन्धु ही बन्धन हैं और धन ही बड़ी भारी मौत है। सुख ही अत्यन्त दुःख है। सम्पत्तियाँ ही भारी विपत्तियाँ हैं। भोग ही संसारके महान् रोग हैं तथा रति ही भारी अरति (दुःख) है। यहाँका सुख केवल दुःख देनेके लिये है और जीवन भी मृत्युकी धरोहर है। अहो ! यह मायाका विस्तार कितना दुःखद है !* विषय-सेवनरूप जो भोग हैं, उन्हें सर्पोंका फन ही समझना चाहिये; क्योंकि वे थोडा-सा भी स्पर्श होनेपर डँस ही लेते हैं। किंतु विचार-दृष्टिसे देखनेपर प्रतिक्षण विनाश-शील ही हैं। जो भोगोंकी अभिलाषासे उनके प्रति तृष्णा बाँधे बैठे हैं, उन लोगोंका उसी तरह पग-पगपर अपमान होता है, जैसे बन्धन-स्तम्भमें बँधे हुए जंगली हाथियोंका हुआ करता है।
'सम्पत्तियाँ और युवती स्त्रियाँ ये तरङ्गोंकी गोदके समान क्षणभङ्गुर हैं। इतना ही नहीं, वे सर्पके फनकी छाया हैं। कौन विवेकी पुरुष उनमें आसक्त होगा ? जो आरम्भमें रमणीय प्रतीत होनेवाले किंतु अन्तमें अत्यन्त नीरस सिद्ध होनेवाले विषयभोगोंमें रमते हैं, वे नरकोंमें ही गिरते हैं†। धन राग-द्वेषादि द्वन्द्व दोषोंसे आक्रान्त हैं। उनका उपार्जन करना भी अत्यन्त कठिन होता है तथा प्राप्त हो जानेपर भी वे स्थिर नहीं रहते हैं। अतः वे अधम पुरुषोंके लिये ही सेवन करने योग्य हैं। जो आरम्भमें मधुर लगती है, परंतु अन्तमें दुःख ही देनेवाली है, वह लक्ष्मी (लौकिक सम्पत्ति) जगत्को मोहमें ही डालती है*। उसका विलास क्षणभरके लिये ही होता है। कोई महान्-से-महान् पुरुष क्यों न हों, उनके जीवनमें भी एक दिन मृत्यु अवश्य उपस्थित होगी। देहधारियोंकी आयु शाखाके अग्रभागमें लटकी हुई ओसकी बूँदके समान शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है। जरा अवस्थाको प्राप्त होते हुए पुरुषके केश पक जाते हैं, दाँत भी टूट जाते हैं। उसकी और सब वस्तुएँ भी जीर्ण होकर क्षीण हो जाती हैं। परंतु एकमात्र तृष्णा ही ऐसी है जो जीर्ण नहीं होती है, वह नित्य नयी ही बनी रहती है।† हाथकी अञ्जलिमें रखे हुए जलकी भाँति यह जीवन शीघ्र ही स्खलित हो जाता है। वह नदीके प्रवाहकी भाँति चला जाता है और लौटता नहीं है। इस जगत्में जो रमणीय जान पड़ते हैं, उन पदार्थोंमें मैंने अरमणीयता देखी है। स्थिर वस्तुओंमें भी अस्थिरताका दर्शन किया है और सत्य दीखनेवाले पदार्थोंमें भी मुझे असत्यता दिखायी दी है। इसीलिये मैं यहाँसे विरक्त हो उठा हूँ। मनके सर्वथा वासनाशून्य हो जानेपर जब परमात्मामें विश्रान्ति प्राप्त होती है, उस समय जो आनन्द मिलता है, वह पाताल, भूतल और स्वर्गके भी किन्हीं भोगोंमें नहीं मिल सकता।'
मुने ! इस तरह दीर्घकालतक विचार करनेसे अब अहंकारशून्य हो मैंने अपनी बुद्धिके द्वारा स्वर्ग और
* उत्पातवायुरेवायुर्मित्राण्येवातिशत्रवः ।
बान्धवो बन्धनान्येव धनान्येवातिनैधनम् ॥
सुखान्येवातिदुःखानि सम्पदः परमापदः ।
भोगा भवमहारोगा रतिरेव परारतिः ॥
आपदः सम्पदः सर्व्वाः सुखं दुःखाय केवलम् ।
जीवितं मरणायैव बत मायाविजृम्भितम् ॥
(निर्वाणप्रकरण उ० ९३ । ७१-७३)
† आपातरमणीयेषु रमन्ते विषयेषु ये ।
अत्यन्तविरमान्तेषु पतन्ति निरयेषु ते ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८०)
* आपातमात्रमधुरा दुःखपर्यवसायिनी ।
मोहनायैव लोकस्य लक्ष्मीः क्षणविलासिनी ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८२)
† जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
क्षीयते जीर्यते सर्वं तृष्णैवैका न जीर्यते ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८६).
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना * ६११
अपवर्गसे भी विरक्ति प्राप्त की है। इस कारण मै भी आपकी ही भाँति चिरकालतक एकान्तमें विश्रामके लिये आकाशके इस स्थानतक आया और यहाँ मुझे आपकी कुटी दिखायी दी। आपकी ही यह कुटी है और आप पुनः यहाँ पधारेंगे, यह बात उस समय मैंने नहीं सोची थी। यह सब तो मुझे आज ही ज्ञात हुआ है।
उस समय तो अनुमानसे मैंने यही जाना था कि यह कोई सिद्धपुरुष था, जो यहाँ अपना शरीर त्यागकर निर्वाण पदको प्राप्त हो गया है। भगवन् ! यही मेरा वृत्तान्त है और यह मै आपके सामने उपस्थित हूँ। मैंने सब बातें आपको बता दीं। अब आप जैसा उचित समझें, करें। (सर्ग ९३)
श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना, वसिष्ठजीका मनोमय देहसे सिद्धादि लोकोंमें भ्रमण करना, श्रीवसिष्ठजीका अपनी सत्य-संकल्पताके कारण सबके दृष्टिपथमें आना, व्यवहारपरायण होना तथा 'पार्थिव वसिष्ठ' आदि संज्ञाओंको प्राप्त करना, पाषाणोपाख्यानकी समाप्ति और सबकी चिन्मयब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तत्पश्चात् मैंने सिद्धसे इस प्रकार कहा—'महात्मन् ! मैंने भी तो आपके विषयमें कोई विचार नहीं किया, इसीसे उस कुटीको आकाशमें स्थिर नहीं कर दिया। उसे स्थिर कर दिया होता तो आपकी स्थिति भी सुस्थिर हो गयी होती। आपको इस प्रकार नीचे नहीं गिरना पड़ता (अतः हम दोनोंसे परस्पर अपराध हुए हैं, इसलिये दोनों ही दोनोंको क्षमा कर दें)। उठिये, अब हम दोनों सिद्धलोकोंमें चलकर पूर्ववत् निवास करें।' तदनन्तर हम दोनों गुलेलसे फेंके गये दो पत्थरकी गोलियोंके समान एक साथ ही तीव्र गतिसे आकाशमें उड़े। उस समय हमारी स्थिति दो तारोंके समान हो रही थी। ऊपर जाकर हम दोनोंने एक दूसरेको प्रणामपूर्वक विदा किया। फिर वे सिद्ध महात्मा अपने अभीष्ट स्थानको चले गये और मैं अपने अभीष्ट स्थानमें आ गया।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! आपका वह शरीर तो पृथ्वीपर गिरकर धूलके परमाणुओंमें मिल गया होगा ! फिर आप किस शरीरसे सिद्ध लोकोंमें विचरे ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! हाँ, मुझे याद आ गया। उसके बादका मेरा वृत्तान्त सुनो। जगत्रूपी गृहमें, सिद्धोंके समूहोंमें तथा लोकपालोंकी पुरियोंमें भ्रमण करते हुए मुझ वसिष्ठकी आत्मकथा इस प्रकार है—एक दिन मैं इन्द्रपुरीमें गया, परंतु वहाँ स्थूल शरीरसे रहित हो आतिवाहिक (सूक्ष्म) देहसे गये हुए मुझको न तो किसीने देखा और न पहचाना ही। मनका मनन ही एकमात्र मेरा स्वरूप था। मैं पृथ्वी आदिसे सर्वथा रहित था। संकल्प-कल्पित पुरुषकी भाँति मेरा कोई दृश्य आकार नहीं था। मुझसे किसीका स्पर्श न होनेके कारण मैं घट-पट आदि पदार्थोंका अवरोधक नहीं था। जगत्के पदार्थ-समुदाय भी मुझे कहीं आने-जानेसे रोक नहीं पाते थे। मैं अपने अनुभवकी ओर ही उन्मुख था अर्थात् अपना अनुभव ही मेरा शरीर था तथा अपने समान स्थितिवाले मनोमय पुरुषोंके साथ ही मै व्यवहार करता था।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! यदि देहरहित एवं आकाशस्वरूप होनेके कारण आप किसीको दिखायी नहीं देते थे तो उस सिद्धने आपको उस सुवर्णमयी भूमिमें कैसे देखा था ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मुझ-जैसा ज्ञानयोग-से सिद्ध हुआ पुरुष संकल्पकल्पित पदार्थोंका जिस तरह अवलोकन करता है, उस तरह असंकल्पित पदार्थोंको
६१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
नहीं ग्रहण करता; क्योंकि उसका शरीर सत्यसंकल्पमय होता है। निर्मल अन्तःकरणवाला सूक्ष्म शरीरधारी पुरुष भी लौकिक व्यवहारोंमें मग्न होनेपर क्षणभरमें ही अपना सूक्ष्म शरीर भूल जाता है। उस समय मैंने यह संकल्प किया था कि यह सिद्धपुरुष मुझे देखे। इसलिये उसने मुझे देखा; क्योंकि वह मेरे संकल्पित अर्थका भाजन था। परस्पर सिद्ध एवं विरुद्ध मनोरथवाले दो सिद्धोंमें जो अधिक शुद्ध अन्तःकरणवाला और पुरुषोचित प्रयत्नसे युक्त होता है, वही अपने अभीष्ट-साधनमें विजयी होता है। जब मैं सिद्धसमूहों तथा लोकपालोंकी पुरियोंमें भ्रमण कर रहा था, उस समय व्यवहार-समूहोंके प्राप्त होनेसे मुझे अपनी आतिवाहिकता विस्मृत हो गयी थी—मैं अपने सूक्ष्म शरीरको भूल गया था। जब ऐसी स्थिति आ गयी, तब मैं उस महाकाशमें दूसरोंके साथ व्यवहार करनेमें प्रवृत्त हुआ। परंतु मेरा रूप ऐसा चञ्चल था कि वहाँ मुझे कोई देख नहीं पाता था। उस समय न तो मुझे सूर्य, चन्द्रमा तथा इन्द्र आदि देख पाते थे और न देवता, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर एवं अप्सराओंकी ही मुझपर दृष्टि पड़ती थी। वे लोग मेरी बाततक नहीं सुन पाते थे। यह सब सोचकर किसीके हाथ बिके हुए सत्पुरुषकी भाँति मैं मोहमें पड़ गया—किंकर्तव्यविमूढ-सा हो गया। इसके बाद मैंने सोचा, 'मैं तो सत्यकाम हूँ। जो भी संकल्प करूँगा—सत्य होगा', यह बात ध्यानमें आते ही मैंने संकल्प किया—'ये देवतालोग मुझे देखें'। ऐसा संकल्प होते ही उस देवलोकमें मेरे सामने रहनेवाले सभी देवता मुझे तत्काल देखने लगे, जैसे नगरमें आये हुए इन्द्रजालमय वृक्षको सभी दर्शक शीघ्र ही देखने लगते हैं। तत्पश्चात् देवताओंके घरोंमें मेरा सब व्यवहार चलने लगा। मैं अपने यथोचित आचारका पालन करता हुआ निःसंकोच वहाँ रहने लगा जिन लोगोंको मेरे वृत्तान्तका ज्ञान नहीं था, उनमेंसे जिन्होंने सर्वप्रथम मुझे अपने आँगनमें आविर्भूत हुआ देखा, उन लोगोंने
पृथ्वीसे ही मेरी उत्पत्तिकी कल्पना करके मुझे 'पार्थिव वसिष्ठ' कहा—फिर इसी नामसे लोकमें मेरी प्रसिद्धि हुई। जो लोग आकाशमें रहते थे, उनमेंसे जिन महानुभावोंने मुझे आकाशमें भगवान् सूर्यदेवकी किरणोंसे प्रकट हुआ देखा, उन्होंने लोकमें 'तैजस् वसिष्ठ' नाम देकर मुझे प्रसिद्ध किया तथा जिन आकाशवासी सिद्धोंने वायुसे मेरा प्राकट्य देखा, उन्होंने मुझे 'वात-वसिष्ठ' की संज्ञा दी तथा जिन मुनीश्वरोंने मुझे जलसे उठते देखा, उन्होंने मुझे 'वारिवसिष्ठ' नाम दिया। इस प्रकार दृष्टिभेदसे मेरी यह जन्मपरम्परा कल्पित हुई है। तभीसे लोकमें मैं कहीं पार्थिव, कहीं जलमय, कहीं तैजस् और कहींपर मारुत-वसिष्ठ नामसे विख्यात हुआ।
इस तरह कहीं आकाश आदि पञ्चभूतरूपसे स्फुरित होनेपर भी मैं एकमात्र चिन्मय स्वभाववाला निराकार, चेतनाकाशरूप परब्रह्म ही हूँ तथा तुमलोगोंके बीच उपदेश आदि व्यवहारकी सिद्धिके लिये स्थूल आकारसे युक्त भी दिखायी देता हूँ। जैसे जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानी पुरुष सारा व्यवहार करता हुआ भी ब्रह्माकाशरूपसे ही स्थित रहता है, उसी तरह विदेहमुक्त भी ब्रह्मरूपसे ही स्थित होता है। किंतु जिस पुरुषकी बुद्धि संसारवासनावश देह और इन्द्रियके द्वारा भोगनेयोग्य अयोग्य वस्तु—विषयभोगमें आसक्त होती है तथा जिसके मनमें कभी मोक्षकी आकाङ्क्षा नहीं जाग्रत् होती, वह मन्दबुद्धि मानव मनुष्य नहीं, कुत्ता अथवा कीड़ा है* (क्योंकि वह भोगरूपी गंदी चीजको पसंद करता है, मनुष्य तो वही है जो मोक्षके लिये प्रयत्नशील है)। श्रीराम ! चित्तका सर्वथा शान्त एवं शीतल होना मोक्ष है तथा उसका संतप्त होना ही बन्धन है। ऐसे मोक्षमें भी लोगोंकी
* ससारवासनामावरूपे सक्ता नु यस्य धीः ।
मन्दो मोक्षे निराकाङ्क्षी स श्वा कीटोऽथवा जनः ॥
(नि० प्र० उ० ९५ । २६)
कल्याण
राजा बलि और शुक्राचार्य
(उपशम-प्रकरण सर्ग ४५-४६)
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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना * ६१३
रुचि नहीं हो रही है। अहो ! यह संसार कितना मूढ़ है ? यह मानव-समुदाय स्वभावसे ही विषयोंके वशीभूत है । इसीलिये एक दूसरेकी स्त्री और धनका अपहरण करनेके लिये लोलुप हो रहा है। जब वह मुमुक्षु होकर शास्त्रोंके अर्थका विचार करता है, तब यथार्थ दृष्टि ( तत्त्व-साक्षात्कार ) प्राप्त करके सदाके लिये सुखी हो जाता है ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब वसिष्ठ मुनि इतना उपदेश दे चुके, तब वह दिन बीत गया। भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये । इधर उस राज-सभाके लोग सायंकालिक कृत्यके हेतु स्नान करनेके लिये मुनिवर वसिष्ठको नमस्कार करके उठ गये तथा रात बीतनेपर सूर्यदेवकी किरणोंके उदयके साथ ही फिर उस सभामें लौट आये ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—कर्त्तव्यका ज्ञान रखनेवाले रघुनन्दन ! यह मैंने तुमसे पाषाणोपाख्यान कहा । इस आख्यायिकासे जो विज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, उससे यही समझना चाहिये कि सारी सृष्टियाँ चेतनाकाशमें ही स्थित हैं। यहाँ जो कुछ भी दीखता है, उसे चिन्मय ब्रह्म ही समझना चाहिये । जैसे स्वप्न-दर्शनके समय जो नगर प्रकट होता है, वह अपने चिन्मय स्वरूपसे कदापि भिन्न नहीं है। वस्तुतः यह सृष्टि नहीं है, एकमात्र चैतन्य-शक्ति ही विराज रही है। जैसे सोनेके आभूषणोंमें सोना ही सत्य है, अंगूठी आदिके नाम और आकार नहीं। जैसे स्वप्नमें निर्विकार चिति-शक्ति ही पर्वतके रूपमें प्रकाशित होती है, उसी तरह निराकार ब्रह्म ही सृष्टिके रूपमें भासित हो रहा है। ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यह सारा दृश्य चिन्मय आकाशरूप, अनन्त, अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म ही है। वस्तुतः सहस्रों महाकल्पोंमें भी न तो यह उत्पन्न होता है और न इसका नाश ही होता है। पुरुष चेतनाकाश-रूप ही है। यह जो आप पुरुषोत्तम बैठे हैं, चेतना-काशरूप ही हैं। मैं भी अजर-अमर चेतनाकाश ही हूँ
और ये तीनों लोक चेतनाकाश ही हैं । 'मैं अद्वितीय चिन्मात्र ब्रह्म ही हूँ । ये शरीर आदि मेरे नहीं हैं।' जब ऐसा बोध प्राप्त हो जाता है, तब जन्म-मरण आदि अनर्थ कहाँ रह सकते हैं ? मैं 'चिन्मात्र निर्मल ब्रह्म हूँ।' इस आत्मानुभवको जो स्वयं ही कुतर्कोंद्वारा खण्डित करते हैं वे आत्महत्यारे हैं। उन्हें विपत्तियोंके महासागरमें डूबना पड़ता है। 'मैं आकाशसे भी स्वच्छ, नित्य अनन्त एवं निर्विकार चेतन हूँ, ऐसी दशामें क्या मेरा जीना, क्या मरना अथवा क्या सुख-दुःख भोगना है ? मैं परमाकाशस्वरूप चेतन ब्रह्म हूँ। ये शरीर आदि मेरे कौन होते हैं !' इस तरह विद्वानोंके द्वारा अन्त:करणमें किये गये अनुभवका जो कुतर्कोंद्वारा अपलाप या खण्डन करता है, वह पुरुष आत्मघाती है। उसे बारंबार धिक्कार है। 'मैं स्वच्छ चेतनाकाश हूँ।' जिस पुरुषका यह स्पष्ट अनुभव नष्ट हो गया हो, उसे विद्वान् पुरुष जीवित शव समझते हैं अर्थात् वह जीता हुआ भी मुर्देके समान है। 'मैं ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा हूँ। देह और इन्द्रियाँ मेरी कौन होती हैं।' इस प्रकार अपरोक्षज्ञानके द्वारा जिसने आत्माको उपलब्ध कर लिया है, अविद्या आदि मलोंसे रहित उस विशुद्ध पुरुषको मृत्यु आदि आपदाएँ विमोहित नहीं कर पातीं। जो शुद्ध चिन्मय परमात्माका आश्रय लेकर सुस्थिर हो गया है, उस महापुरुषको मानसिक चिन्ताएँ उसी तरह मोहित नहीं कर पाती हैं, जैसे महान् पत्थरको तुच्छ बाण । जिन पुरुषोंने अपने चिन्मय स्वभावको भुलाकर नश्वर शरीरपर ही आस्था बाँध रखी है, उन्होंने वास्तवमें सुवर्णको त्यागकर भस्मको ही सोना मानकर ग्रहण किया है । 'मैं देहरूप ही हूँ' इस भावनासे पुरुषके बल, बुद्धि और तेजका नाश हो जाता है तथा 'मैं चेतन आत्मा हूँ' इस दृढ़ निश्चयसे उसके बल, बुद्धि और तेजकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है । 'मैं न तो छेदा जाता हूँ और न जलाया ही जाता हूँ; क्योंकि मैं वज्रके समान सुदृढ़ चिन्मय परमात्मा हूँ । मेरी