संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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और यही पितामह ब्रह्मा है। यही चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, वायु, मेघ और महासागर है। यही भूत, भविष्य और वर्तमान काल है। जो वस्तु है और जो नहीं है, वह सब परमाकाशरूप परमात्मा ही है।
श्रीराम! मैने जिस चिन्मय परमाकाशस्वरूप परमात्माका वर्णन किया है, वही श्रुतियोंमें शिव कहा गया है और वही प्रलयकालमें रुद्र होकर नृत्य करता है। विद्वानों और पुण्यात्माओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! उस रुद्रदेवकी जो आकृति बतायी गयी है, वह वास्तवमें उसकी आकृति नहीं है। उस समय सच्चिदानन्दघनरूप आकाश ही उस आकारमें स्फुरित होता है। तत्त्वदृष्टिसे मैने वह आकृति उस समय शान्त चेतनाकाशरूप ही देखी। मैने ही उसे यथावत्रूपसे जाना। दूसरा कोई पुरुष जो तत्त्वदृष्टिसे रहित है उसे उस रूपमें नहीं देखता है। जैसे सुवर्ण ही विभिन्न आकृतियोसे सुशोभित होनेवाले कटक-कुण्डल आदि अलङ्कारोके रूपमें स्थित होता है, वैसे ही सत्वरूप चेतन ब्रह्म ही अपने स्वभावसे रुद्ररूप धारण करके विराजमान होता है। जो चिद्घन परमात्माका स्पन्द है, वही भगवान् शिवका स्पन्द (स्फुरण) है। वही हम लोगोके सामने वासनावश नृत्यरूपके रूपमें प्रकाशित होता है। अतः प्रलयकालमें वे भगवान् शिव भयंकर आकृतिवाले रुद्र होकर जो वेगपूर्वक नृत्य करते है, उसे सच्चिदानन्दघन परमात्माका अपना सहज विलास ही समझना चाहिये। (सर्ग ८२-८३)
शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! अब यह बताइये कि जो काली नृत्य करती है, उसका क्या स्वरूप है ? तथा वह जिन सूप, फाल, कुदाल और मूसल आदि वस्तुओकी माला धारण करती है, उनका स्वरूप क्या है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे जो भैरव या रुद्र बताये गये हैं, उन्हींको चेतनाकाश-स्वरूप शिव कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पन्दशक्ति है, उसे काली समझो। वह शिवसे भिन्न नहीं है। जैसे वायु और उसकी गति-शक्ति एक हैं, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता या दाहक-शक्ति एक ही हैं, वैसे ही सच्चिदानन्दघन शिव और उनकी स्पन्दशक्ति (क्रियाशक्ति)-रूपा माया दोनो सदा एक ही हैं। जैसे गतिशक्तिसे वायु और उष्णताशक्तिसे अग्नि ही लक्षित होते हैं, उसी प्रकार अपनी स्पन्दशक्तिके द्वारा निर्मल चिदानन्दघन शान्तस्वरूप शिवका ही प्रतिपादन होता है। स्पन्दन या मायाशक्तिके द्वारा ही शिव लक्षित होते हैं, अन्यथा नहीं। शिवको ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्त-स्वरूप शिवका वर्णन बड़े-बड़े वाणीविशारद विद्वान् भी नहीं कर सकते। मायामयी जो स्पन्दनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिवकी इच्छा कही जाती है। वह इच्छा इस दृश्याभास-रूप जगत्का उसी तरह विस्तार करती है, जैसे साकार-पुरुषकी इच्छा काल्पनिक नगरका निर्माण करती है। इस प्रकार शिवकी इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म-शिवकी वह मायामयी स्पन्दनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत्का निर्माण किया करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभासके द्वारा उदीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है। वही जीनेकी इच्छा-वाले प्राणियोंका जीवन है। वह स्वयं ही जगत्के रूपमें परिणत होनेके कारण समस्त सृष्टिकी प्रकृति (उपादान) है। दृश्याभासोंमें अनुभूत होनेवाले उत्पाद्य, आप्य, संस्कार्य और विकार्यरूपी चार प्रकारके फलोंका सम्पादन करनेके कारण वही क्रिया भी कहलाती है। ब्रह्माण्डरूप धारण करनेवाली वह शक्ति या काली प्रलयकालमें जब समुद्र आदिके जलसे भीगी होती है, तब वडवाग्निकी शिखाके समान तपनेवाले ग्रीष्मऋतुके