भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 750 में से

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्ति * ५९९

इच्छा-अनिच्छा, विधि-निषेध, जन्म-मरण एवं भ्रम आदि विभिन्न प्रकारके भाव कभी सदा एक साथ और कभी पृथक्-पृथक् रूपसे सुशोभित होते थे । सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त देवी कालरात्रि चैतन्य-शक्तिरूपा जगन्मयी, अनन्त एवं विशाल आकाशकोशके सदृश विशुद्ध शरीरवाली है । वह देवी ( सूप ) कुदाल, ओखली, चटाई, फाल, घट, पिटारी, मूसल, डोल या बाल्टी, बटलोई और खम्भे—इत्यादि वस्तुओंको भी फूलके समान मानकर उनकी माला धारण करके नृत्य करती थी । (सर्ग ८१)


रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्म-सत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! जब प्रलयकालमें सब कुछ नष्ट हो गया, तब वह देवी कालरात्रि अपने किस शरीरसे नाच रही थी ? सूप, फाल और घट आदिसे ( जो उस समय नष्ट हो चुके थे ) उसका माला धारण करना क्या है ? यदि ये सब वस्तुएँ थीं ही तो फिर त्रिलोकीका नाश क्या हुआ ? और यदि त्रिलोकी नष्ट हो गयी थी तो कालीके शरीरमें इन सब वस्तुओंकी स्थिति क्यों और कैसे सम्भव हुई ? निर्वाणको प्राप्त हुआ जगत् फिर आकर नाचने कैसे लगा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वास्तवमें न वह पुरुष था, न वह स्त्री थी, न वह नृत्य हुआ न वे दोनों रुद्र और काली वैसे विशेषणोंसे युक्त ही थे । उनके आचार-व्यवहार भी वैसे नहीं थे और उनकी वे आकृतियाँ भी नहीं थीं । जो कारणोंका भी परम कारण है,—वह अनादि, चिन्मय आकाशस्वरूप, अनन्त, शान्त, प्रकाशरूप, अविनाशी, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दघन, शिवस्वरूप साक्षात् ब्रह्म ही भैरव ( रुद्र ) के आकारमें दिखायी देता था । जगत्का नाश हो जानेपर उस रुद्रदेवके रूपमें स्थित हुआ वह चेतनाकाशस्वरूप परमात्मा ही था । चेतन होनेके कारण वह परमात्मा अपने चैतन्यस्वभाव वैभवको छोड़कर नहीं रह सकता । जैसे सुवर्ण कटक-कुण्डल आदिके रूपमें अवस्थित होता ही है, वह उन आकृतियोंका सर्वथा त्याग करके नहीं रहता, उसी प्रकार परमात्मा भी लीलाके लिये उमा, महेश्वर आदि सगुणरूप धारण करता ही है। वह अपने लीला-स्वभावको सर्वथा छोड़ नहीं सकता । बुद्धिमान् रघुनन्दन ! तुम्हीं बताओ, सुवर्ण कटक-कुण्डल आदि आकृतियोंको क्यों नहीं धारण करेगा ? क्योंकि वह उसका स्वभाव है। इसी प्रकार ब्रह्म भी सङ्कल्पद्वारा एकसे अनेक रूपमें प्रकट होता है, यह उसका श्रुतिप्रसिद्ध स्वभाव है। कोई भी पदार्थ अपने स्वभावके बिना कैसे रह सकता है ?

रघुनन्दन ! जन्म, मरण, माया, मोह, मन्दता, अवस्तुता, वस्तुता, विवेक, बन्ध, मोक्ष, शुभ, अशुभ, विद्या, अविद्या, निराकारता, साकारता, क्षणकाल, दीर्घकाल, सत्, असत्, सदसद्भाव, मूर्खता, पाण्डित्य, देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कलना, केलि, कल्पना, रूप आदि विषयोंका बाह्य इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण, उन्हीं विषयोंका मनके द्वारा चिन्तन, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, तेज, जल, वायु, आकाश तथा पृथिवी आदिके रूपमें जो यह दृश्य-प्रपञ्च फैला हुआ है, यह सब शुद्ध, निरामय चेतनाकाशरूप परमात्मा ही है । यह अपनी शुद्ध चिदाकाशरूपताका परित्याग न करता हुआ ही सर्वरूप होकर स्थित है । मैंने जिस चिन्मय परमाकाशका वर्णन किया है, वह परमात्मा ही यहाँ शिव कहा गया है। यह सनातन पुरुष है । यही विष्णुरूपसे स्थित होता है

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