भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हो गयी हो । वह बहुत लंबी थी । उसका मुँह विकराल दिखायी देता था । वह इस तरह खड़ी थी मानो आकाशको नापनेके लिये उद्यत हो । अपने बड़े-बड़े घुटनों और भुजाओंके भ्रमणसे वह समस्त दिशाओंको मानो नाप लेना चाहती थी । वह ऐसी दुर्बल थी मानो बहुत कालतक उसे उपवास करना पड़ा हो । उसके विशाल शरीरमें सर्वत्र गड्ढे-ही-गड्ढे दीख रहे थे । वह काजलकी-सी काली और मेघमालाकी भाँति वायुके वेगसे चञ्चल जान पड़ती थी । जब वह बहुत बड़ी और दुर्बल होनेके कारण खड़ी होनेमें भी असमर्थ हो गयी, तब विधाताने मानो उसे नस-नाड़ियोंकी लंबी रस्सियोंसे बाँध दिया ( जिससे वह अच्छी तरह खड़ी रह सके ) । नस-नाड़ियों और अँतड़ियोंकी रस्सियोंद्वारा उसके सिर और हाथ-पैर आदि सभी अङ्ग इस तरह बँधे हुए दिखायी देते थे, मानो मूलसे लेकर शाखाओंके अग्रभागतक सूतोंसे बँधी हुई काँटेदार वृक्षकी झाड़ी हो । अनेक वर्णोंके सूर्यादि देवताओं तथा दानवोंके मस्तकरूपी कमलोंके समूहोंकी माला उसके कण्ठमें शोभा दे रही थी । हुतासे प्रज्वलित तथा निर्मल प्रभासे पूर्ण अग्निकी ज्वाला ही उसके लिये आँचल थी । उसके लंबे-लंबे कानोंमें नाग झूल रहे थे । उसने दो मनुष्योंकी लाशोंको कुण्डलके रूपमें धारण कर रखा था । जैसे सूखी लौकीकी लतामें दो बड़े-बड़े फल लटक रहे हों, उसी प्रकार उसकी छातीमें कुछ-कुछ हिलते हुए काले रंगके दो स्तन दिखायी देते थे, जो बहुत बड़े होनेके कारण जाँघ-तक लटक रहे थे । उसके शरीरको देखकर मैंने यह अनुमान कर लिया कि यह वही कालरात्रि है, जिसके विषयमें साधु पुरुषोंने यह निर्णय किया है कि 'ये भगवती काली हैं।' उसके तीन नेत्र आगकी ज्वालासे परिपूर्ण थे । ललाटप्रान्त इन्द्रनील मणिके समान चमक रहा था । उसकी दोनों ठोढ़ियों गहरी होनेके कारण भयंकर जान पड़ती थीं । वात-स्कन्ध ( प्रवह आदि वायु )-रूपी तागोंमें पिरोयी हुई तारावलियाँ उसके कण्ठदेशमें मुक्ताहारका काम दे रही थीं । वह वर्षा करनेवाले कल्पान्त-कालके मेघोंकी भाँति शोभा पानेवाली भ्रमणशील भुजाओंद्वारा सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको व्याप्त करके खड़ी थी । वे भुजाएँ अपने नखोंकी कान्ति बिखेर रही थीं । हिमालय और सुमेरु पर्वत उसके दोनों कानोंमें चाँदी और सोनेकी बालियाँ बनकर शोभा बढ़ा रहे थे । ब्रह्माण्डरूपी घुँघुरुओंसे बनी हुई विशाल माला उसके कटिभागमें करधनीका काम दे रही थी । शिखर, वन और नगररूपी पुष्पगुच्छोंसे युक्त तथा पुराने नगर, वन, द्वीप और ग्रामरूपी कोमल पल्लवोंसे अलंकृत सातों कुलपर्वत उस भगवती कालीके गलेकी पुष्पमालाएँ बने हुए थे ।

श्रीराम ! उस देवीके अङ्गोंमें मैंने पुर, नगर, ऋतु, तीनों लोक, मास तथा दिन-रातरूपी फूलोंकी मालाएँ देखी थीं । उसके शरीरमें व्यक्त रूपसे स्थित नगर, ग्राम और पर्वत आदि मानो पुनर्जन्म पानेके आनन्दसे उल्लसित हो उसके साथ-साथ नाच रहे थे । कभी-कभी वह नहीं नाचती थी तो भी पर्वत, वन और काननोंसहित नाना आकारवाला सारा जगत्, जो मरकर फिर लौटा था, नाचता ही रहता था । वह कालरात्रि जब चतुराईके साथ नृत्य करने लगती थी, तब चन्द्रमा, सूर्य, दिन और रात उसके नखाग्र-भागकी रेखाओंके भीतर विद्यमान प्रभामें मिलकर घूमते हुए सुवर्ण-सूत्रके समान दीर्घाकार प्रतीत होते थे । जब भगवती कालरात्रिका ताण्डव-नृत्य होने लगता था, तब इन्द्र आदि देवता और असुर अपनी-अपनी अधिकार-प्रवृत्तिसे और-ही-और बनकर वायुसे उड़ाये गये मच्छरोंके समान अथवा अस्थिर विद्युत्के समान आते-जाते दिखायी देते थे । भगवतीके शरीरमें जो सर्ग दिखायी देता था, उसमें सृष्टि-प्रलय, सुख-दुःख, भव-अभव,