संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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वैराग्यके दृढ़ हो जानेपर पुरुषकी स्थिति, आत्माद्वारा विवेक नामक दूतका भेजा जाना, विवेक-ज्ञानसम्पन्न पुरुषकी महिमा तथा जीवके सात रूपोंका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! जब संसारसे विरक्ति सुदृढ़ हो जाती है, सत्पुरुषोंका सङ्ग प्राप्त हो जाता है, बुद्धिद्वारा शास्त्रों—'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थका ज्ञान हो जाता है, भोगोंकी तृष्णा नष्ट हो जाती है, विषय नीरस लगने लगते हैं, श्रेष्ठताका उदय हो जाता है, चिन्मय आत्मा प्रत्यक्ष हो जाता है तथा हृदयमें परमात्मप्राप्तिकी पूर्ण श्रद्धा हो जाती है, उस समय विवेकी पुरुष उसी प्रकार धनकी कामना नहीं करता, जैसे लोग अन्धकारको नहीं चाहते और जो सम्पत्ति उसके पास पहलेसे मौजूद रहती है, उसे वह जूठी पत्तलकी तरह त्याग देता है। यद्यपि इन्द्रियोंके भोगरूपी विषय बारंबार उसकी इन्द्रियोंके सम्पर्कमें आते हैं तथापि उसे उनका अनुभव नहीं होता; क्योंकि उसका मन सर्वथा शान्त हो गया रहता है। अतः विवेकी पुरुष एकान्त स्थानोंमें, दिशाओंके छोरोंमें, सरोवरोंपर, काननोंमें, उद्यानोंमें, पुण्य-प्रदेशोंमें अथवा अपने ही घरोंमें, रुचिर वाटिकाओंमें, आयोजित भोजनादि व्यापारोंमें तथा शास्त्रोंके तर्कपूर्ण विचारोंमें आसक्ति न होनेके कारण वहाँ चिरकालतक स्थित नहीं रहता। यदि कहीं वह उन स्थानोंमें कुछ देरतक ठहर गया तो वहाँ भी वह तत्त्वज्ञका ही अन्वेषण करता है; क्योंकि वह विवेकी, पूर्ण शान्त, इन्द्रिय-निग्रही, स्वात्माराम, मौनी और एकमात्र विज्ञानस्वरूप ब्रह्मका ही कथन करनेवाला होता है। इस प्रकार अभ्यासके बलसे वह शान्त विवेकी पुरुष स्वयं ही परम पदस्वरूप परमात्मामें विश्राम प्राप्त कर लेता है।
राघव ! एकमात्र बोधके साथ अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके कारण जहाँ वस्तुतः न बोधता है, न पदार्थ है और न पदार्थोंका अभाव है, उसे परमपद कहते हैं।
जिन्हें परमात्मतत्त्वसाक्षात्काररूप · परम पदमें विश्राम प्राप्त हो चुका है तथा जो मनोलयकी अवस्थाको पहुँच चुके हैं, ऐसे सज्जनोंको विषय उसी प्रकार नहीं रुचते, जैसे हृदयहीन पत्थरोंको दूधके स्वादका अनुभव नहीं होता। जैसे दीपक अन्धकारका नाश कर देता है, वैसे ही निर्मल परमात्मपदमें स्थित ज्ञानी पुरुष अपने हृदयस्थित अज्ञानरूपी अन्धकारको तथा बाहरी राग, द्वेष, भय आदिको दूर हटा देता है। जिसमें तमोगुणका सर्वथा अभाव है जिसके सम्पूर्ण अंश रजोगुणसे रहित हो गये हैं तथा जो सत्त्वगुणको भी लाँघ चुका है, वह मनुष्यरूपमें सूर्य है; अतः उसे प्रणाम करना चाहिये। ये जितने चराचर जीव तथा भूत-प्राणी हैं, वे सब-के-सब स्वेच्छा-नुसार उपहार-सामग्री प्रदान करके निरन्तर उसी परमात्मा-का पूजन करते हैं। इस प्रकार जब अनेक जन्मोंतक यथाभिमत इच्छासे यह परमात्मा पूजित होता है, तब अपने पुजारीपर प्रसन्न हो जाता है। फिर तो प्रसन्न हुआ स्वयंदेवाधिदेव महेश्वररूप परमात्मा पूजककी शुभ कामना-से उसे ज्ञान प्रदान करनेके लिये अपने पावन दूतको तुरंत प्रेरित करता है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! परमेश्वररूप परमात्मा किस दूतको प्रेरित करता है और वह दूत किस प्रकार ज्ञानोपदेश करता है—यह मुझे बतलाइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रामभद्र ! परमात्मा जिस दूतको प्रेरित करता है, उसका नाम विवेक है, वह सदा आनन्द देनेवाला है। वह अधिकारी पुरुषके हृदयरूपी गुफामें वैसे ही स्थित हो जाता है, जैसे आकाशमें चन्द्रमा। वही विवेक वासनायुक्त अज्ञानी जीवको ज्ञान प्रदान करता है और धीरे-धीरे इस संसारसागरसे उद्धार कर देता है। यह ज्ञानरूप अन्तरात्मा ही सबसे