संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * वैराग्यके दृढ़ हो जानेपर पुरुषकी स्थिति * ५६५
बड़ा परमेश्वर है। वेद-सम्मत जो प्रणव है, वह इसी- का बोधक शुभ नाम है। नर, नाग, सुर, असुर—सभी जप, होम, तप, दान, पाठ, यज्ञ और कर्मकाण्डद्वारा नित्य इसीको प्रसन्न करते हैं। वही परमात्मा सर्वत्र विचरण करता है, जागता है और देखता है। इसलिये इसके आँख, कान, हाथ, पैर सर्वत्र व्याप्त* हैं। यही चिन्मय परमात्मा विवेक-दूतको उद्बुद्ध करके उसके द्वारा चित्तरूपी पिशाचको मारकर जीवको अपनी दिव्य अनिर्वचनीय स्थितितक पहुँचा देता है। इसलिये सम्पूर्ण संकल्प-विकल्पोंको, विचारोंको तथा अर्थसंग्रहोंको छोड़कर अपने पुरुषार्थसे स्वयं ही उस चिन्मय परमात्माको प्रसन्न कर लेना चाहिये; क्योंकि इस संसाररूपी रात्रिके घने अन्धकारमें, जिसमें मनरूपी पिशाच घूम रहा है और अज्ञानरूपी काली घटा छायी हुई है, परमात्मा ही पूर्णिमाके चन्द्रमाकी तरह सर्वत्र प्रकाश करता है।
यह संसार एक भीषण समुद्रके समान है। इसका भीतरी भाग मरणरूपी अगाध भँवरोंके कल्लोलोंसे आकुल हो रहा है। यह तृणारूपी तरंगोंसे चञ्चल हो रहा है। इसे अपना मनरूपी प्रचण्ड वायु उद्वेलित कर रही है। यह चराचर भूतरूप जङ्गमोंसे व्याप्त है और इन्द्रिय- रूपी मकरोंसे भरे रहनेके कारण अत्यन्त गहन है। इस समुद्रको पार करनेके लिये विवेक ही महान् जहाज है। इस प्रकार शास्त्रविहित अभीष्ट पूजनसे प्रसन्न हुआ परमात्मा पहले विवेकरूपी पावन दूत भेजकर सत्सङ्ग, शास्त्राभ्यास और परमार्थ वस्तुके उत्तम ज्ञानद्वारा जीवको अनिन्दनीय, निर्मल एवं सर्वोच्च पदतक पहुँचा देता है। हे भद्र ! जिनका विवेक परिपुष्ट हो गया है और
जिन्होंने वासनारूपी मद्यका परित्याग कर दिया है, उन महात्माओंके अंदर कोई अपूर्व ही महत्ता उत्पन्न होती है। वस्तुतः भ्रान्तिके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे वासना और भ्रान्ति अपने-आप निवृत्त हो जाती है। भला स्वप्नका स्वरूपसे ज्ञान हो जानेपर उसमें सत्यत्वकी भावना किसे हो सकती है। वासनाका अभाव ही संसारका उपशमन है। कामना ही महाकाय पिशाचिनी है, इसलिये बुद्धिमान् लोग इसका विनाश करनेमें तत्पर रहते हैं।
पूर्वाभ्यासवश पुरुषोंकी अज्ञानप्रयुक्त उग्रता जैसे-जैसे उत्पन्न हुई रहती है, वैसे-वैसे ही वह ज्ञानके भलीभाँति अभ्यस्त होनेसे समयानुसार धीरे-धीरे विनष्ट भी हो जाती है। ज्ञानी पुरुष ज्ञानयज्ञमें दीक्षित होकर यमनियमरूपी यूपयज्ञस्तम्भको सुदृढ़रूपसे गाड़ देता है और संसारकी असत्ताके अनुभवद्वारा विश्व-विजय करके सर्वस्वत्यागरूप दक्षिणा देकर सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लेता है। उस समय चाहे अंगारोंकी वृष्टि हो, प्रलयकालकी वायु चलने लगे अथवा भूतरूप उपद्रव आकाशमें मच जाय, परंतु ज्ञानी पुरुष अपने स्वरूपमें ही समभावसे स्थित रहता है। पूर्ण वैराग्यसे जिसका मन सर्वथा शान्त हो गया है और जिसने अपने मनको पूर्णतया निरुद्ध कर लिया है, ऐसा पुरुष सदा वज्र-तुल्य सुदृढ़ समाधिमें ही स्थित रहता है। इसके अतिरिक्त उसकी दूसरी स्थिति नहीं होती; क्योंकि बाह्य पदार्थोंसे अत्यन्त वैराग्य हो जानेसे मन जैसा पूर्णरूपसे शान्त होता है, वैसा शान्त वह मन्त्रजप, शास्त्राभ्यास, उपदेश, तप और इन्द्रियनिग्रह आदिसे नहीं होता।
वासनासे रहित हो जानेपर तो सभी जीव मुक्त हैं, परंतु वासनाकी विषमताके कारण ये सूखे पत्तोंकी तरह उड़-उड़कर विभिन्न योनिरूप गड्ढोंमें गिरते हैं।
श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! जैसे दीपकपर रुई
* सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
( गीता १३ । १३ )
'विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्'
इत्यादि श्रुतियाँ भी ऐसा ही प्रतिपादन करती हैं।