भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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५६६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सातों समुद्रोंमें क्षीर आदिके भेदसे सात प्रकारके जल हैं उसी प्रकार सात प्रकारके रूपोंको धारण करनेवाले जीवोंके भेदको आप वर्णन करनेकी कृपा करें ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! किसी प्राचीन कल्पके किसी जगत्में कहींपर कुछ जीव सुषुप्ति-अवस्था-में स्थित थे । वे अपने प्राणयुक्त शरीरोंके कारण जीवित ही थे । उनमें जो लोग स्वप्न देख रहे थे, उनके स्वप्न-सदृश ही इस जगत्‌को समझना चाहिये और उन्हीं जीवोंको 'स्वप्नजागर' कहा जाता है । उन सोये हुए जीवोंका जो अपने-आप प्रकट हुआ स्वप्न-प्रपञ्च है, वही कभी-कभी जब हमलोगोंका विषय बन जाता है, तब हमलोग उनके 'स्वप्ननर' कहलाते हैं । चिरकाल-के पश्चात् जब उनका वह स्वप्न जाग्रत्-रूप हो जाता है, तब उनके स्वप्नके वे जीव 'स्वप्न-जाग्रत्' कहे जाते हैं । वास्तवमें वे उनके स्वप्नमें ही स्थित हैं । इस स्वप्न-प्रपञ्चके समाप्त होनेपर यदि ज्ञान हो गया, तब तो वे तत्त्वज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाते हैं और यदि ज्ञान न हुआ तो गाढ निद्राके वशीभूत होकर वे सङ्कल्पानुसार उसी प्रकारके दूसरे शरीर धारण कर लेते हैं और उसी तरहका दूसरा कल्पित जगत्कल्प देखते हैं; क्योंकि कल्पनाभासरूपी आकाशकी कहीं निरवकाशता नहीं रहती । चिरकालके अभ्याससे जिन जीवोंका जागराभिमान घनीभूत संकल्परूपमें है तथा जिनके मनकी चेष्टाएँ भी संकल्पमें ही हैं, वे जीव 'संकल्पजागर' कहलाते हैं । वे संकल्परूपका उपशमन हो जानेपर पुनः पूर्ववत् अथवा उससे भी विलक्षण व्यवहार करने लगते हैं, अतः उनके शरीरमें हमलोग 'संकल्प-पुरुष' रूपसे स्थित माने जाते हैं । जो विशाल आत्मावाले प्रधान पुरुष ब्रह्माके रूपसे अवतीर्ण हुए हैं और पहलेके उत्पत्तिकालरूप स्वप्नसे रहित हैं, वे 'केवलजागर' कहे गये हैं । पुनः वे ही जीव जब प्रौढ होकर जन्मान्तरोंमें जन्म धारण करते जाते हैं और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिमें विचरते रहते हैं, तब 'चिरजागर' कहलाते हैं। वे चिरजागर जीव ही जब पापरूप दुष्कर्मोंके आवेशसे जड-स्थावररूपमें प्रकट होते हैं और जाग्रत्-अवस्थामें भी घनीभूत अज्ञानसे परिपूर्ण हो जाते हैं, तब 'घनजागर' कहे जाते हैं । जो शास्त्रार्थचिन्तन और सत्सङ्गके द्वारा उपदेश ग्रहण करके ज्ञानसम्पन्न हो गये हैं और जाग्रत्‌को भी स्वप्न-सरीखे देखते हैं, वे 'जाग्रत्स्वप्न' कहलाते हैं । जिन्हें यथार्थज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है और जो परमपदमें विश्राम कर चुके हैं, तुरीय भूमिकाको प्राप्त हुए वे जीव 'क्षीणजाग्रत्' कहे जाते हैं।

( सर्ग ४८–५० )

दृश्य जगत्‌की असत्ता, सबकी एकमात्र ब्रह्मरूपता तथा तत्त्वज्ञानसे होनेवाले लाभका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! सृष्टिका वास्तवमें कोई कारण नहीं है, इसीलिये न यह उत्पन्न होती है और न नष्ट । जैसा कारण होता है, वैसा ही कार्य उत्पन्न होता है । परंतु जब सृष्टिका कारण ही कल्पित एवं मिथ्या है, तब उससे होनेवाला सृष्टिरूप कार्य भी कल्पित और मिथ्या ही सिद्ध होता है । जैसे प्रशान्त महासागरके भीतर लहर और भँवर आदि उससे अभिन्न रूपमें ही स्थित हैं, उसी प्रकार क्षोभरहित परब्रह्ममें जगत् और चित्त आदि स्थित हैं, जो इस ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं। जैसे अपने भीतर अनेक बर्तनोंको रखनेवाला मिट्टीका लोंदा एक रूपसे ही स्थित रहता है, उसी प्रकार अपने उदरमें अनेक ब्रह्माण्डभाण्डको धारण करनेवाला सर्वात्मा निर्मल ब्रह्म भी एक ही है । जैसे सुवर्ण अपने भीतर कडा, कुण्डल आदि अनेक नाम-रूपवाले आभूषणोंको धारण करता है और उन सबके रूपमें स्वयं ही स्थित होता है, उसी प्रकार सुवर्णस्थानीय ब्रह्म ही दृश्यजगत्‌के रूपमें स्थित है । ज्ञानी पुरुष स्वप्नकालमें स्वप्नको ही जाग्रतरूप जानते हैं; क्योंकि