भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 750 में से

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सृष्टिकी असत्यता और एकमात्र अखण्ड ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन * १०६३


उन्होंने वासनाओंसे व्यग्र मनको ग्रहण नहीं किया है और वे जाग्रत्-कालमें जाग्रत्‌को भी स्वप्न समझते हैं; क्योंकि उन्हें सत्यस्वरूप आत्माका बोध हो चुका है।

जैसे पता लगानेपर मृगतृष्णाका जल मिथ्या सिद्ध होता है, उसी प्रकार बारंबार इन्द्रियोंके सम्पर्कमें आनेपर भी यह दृश्य-प्रपञ्च तत्त्वज्ञान होते ही मिथ्या सिद्ध हो जाता है। जैसे प्रज्वलित अग्निमें घी और इन्धन सब विलीन होकर एकरूप हो जाते हैं, वैसे ही विज्ञानकालमें जगत्, मन और द्रष्टा आदि सब एकमात्र ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाते हैं। जाग्रत्‌को स्वप्नवत् मिथ्या समझ लेनेपर वह अपनी दृढ़ताको छोड़ देता है और अत्यन्त कोमल बन जाता है। तात्पर्य यह कि उसके मिथ्यात्वका दृढ़ निश्चय हो जाता है। देश, कालरूप निमित्तके बिना ही जाग्रत् और स्वप्नका निर्माण करके यथास्थित बोधस्वरूप साक्षी चेतन आत्मा ही जगत्‌के रूपमें घनीभावको प्राप्त-सा हुआ है। इस प्रकार विचारके द्वारा जब जाग्रत् भी क्षणभङ्गुर या मिथ्या सिद्ध हो जाता है, तब स्वतः क्षीण होने लगता है और उसके प्रति होनेवाली वासना उसी प्रकार घटने लगती है, जैसे वर्षाका जल शरत्कालमें क्षीण होने लगता है। विवेकी 'पुरुषकी दृष्टिमें अत्यन्त तुच्छताको प्राप्त हुई दृश्य-लक्ष्मी विद्यमान होनेपर भी रुचिकर नहीं लगती। स्वप्नकी भाँति उसे मिथ्या समझ लेनेके कारण वह उसमें रस नहीं लेता है। महामते ! जैसे भ्रम ही से तृष्णार्त पुरुषोंको सामने दिखायी देनेपर भी मृगतृष्णाका मिथ्या जल उनकी प्यास नहीं बुझा सकता, वैसे ही ये असत्य विषय किसी भी ज्ञानी पुरुषके प्रति रुचिकर प्रतीत हो सकते हैं ?

श्रीराम ! जिसे अन्त्य मरण प्राप्त हुआ, उसमें उपादेयबुद्धि कैसे रह सकती है ? भला कौन ऐसा पुरुष है, जो स्वप्नको स्वप्न समझ लेनेपर उसमें प्राप्त हुए सुवर्णको लेनेके लिये दौड़ता हो। जब दृश्य प्रपञ्च स्वप्नके समान मिथ्या समझ लिया गया, तब उसके प्रति होनेवाली आसक्ति दूर हो जाती है तथा द्रष्टा और दृश्यके सम्बन्धमें जो चेतन और जड़ ग्रन्थिरूप क्षोभ प्राप्त हुआ है, उसका उच्छेद हो जाता है। मरुप्रान्तमें जलके समान दीखनेवाला जो भ्रान्तिरूप सम्पूर्ण जगत् है, वह अज्ञानसे ही है। तत्त्वज्ञान होनेपर सब ओर फैले हुए दीपकके प्रकाशके समान यह प्रकाशित हो उठता है और इसकी अन्धकाररूपता दूर हो जाती है। जैसे बादलोंके हट जानेपर केवल स्वच्छ आकाश दिखायी देता है, उसी प्रकार जगत्‌की भ्रान्ति दूर हो जानेपर एक शुद्ध बुद्ध परब्रह्म परमात्माका ही अनुभव हो जाता है।

(सर्ग ५१)


सृष्टिकी असत्यता और एकमात्र अखण्ड ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह जगत् मूढ़ पुरुषकी दृष्टिमें है; इसीलिये उसके मनमें भी है। परंतु जो विवेकी पुरुष है, वह शास्त्रद्वारा निश्चित तथा पूर्वापरसे समन्वित अर्थको ही देखता है और उसीको ग्रहण करता है। शास्त्रनिषिद्ध वस्तु दृष्टिपथमे आ जाय तो भी वह न तो उसकी ओर देखता है और न उसे ग्रहण ही करता है।

सभी प्रकारोंसे युक्त यह जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम जगत् दिखायी देता है, वह सब कल्पके अन्तमें नष्ट हो जाता है। सृष्टिके पहले जो संसारकी सृष्टि नष्ट हो चुकी थी, वही फिर आविर्भूत हुई है—इसका उल्लेख करना असम्भव है; क्योंकि नष्ट हुई वस्तुकी फिर उत्पत्ति कैसे सम्भव हो सकती है। यदि नष्टकी उत्पत्ति होती, तब यह संदेह किया जा सकता कि यह वही है या अन्य ? परंतु हम तो अनुभवपर ध्यान देनेवाले हैं; अतः नष्टकी उत्पत्ति कैसे स्वीकार कर सकते हैं ?

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