संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका वर्णन * [ ५६३
राघव ! जिन्होंने तीनों लोकोंको तृण-तुल्य समझ लिया है, उनकी प्रशंसा महात्मालोग वैसे ही करते हैं, जैसे स्वर्गलोकमें स्वर्गवासी कल्पवृक्षका गुण गाते हैं। ऐसा पुरुष भूतलपर उदित हुए चन्द्रमाके समान होता है, अतः जिनके नेत्र विस्मयसे उत्फुल्ल हो गये हैं ऐसे साधु-महात्मा सौहार्दवश उसका दर्शन करनेके लिये आते हैं। भोगोंके प्रति उसकी आदरबुद्धि सदाके लिये नष्ट हो जाती है। इसलिये न्याययुक्त भोगोंके प्राप्त होनेपर भी वह उनका आदर नहीं करता। तदनन्तर जैसे स्वास्थ्य चाहनेवाला व्यक्ति वैद्यका आश्रय ग्रहण करता है, उसी प्रकार सर्वोत्कृष्ट कल्याणकी प्राप्तिके लिये वह स्वयं ही सत्सङ्ग करता है। उस सत्सङ्गके परिणामस्वरूप उसकी बुद्धि परम उदार हो जाती है, जिससे वह अत्यन्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें प्रविष्ट हुए गजराजकी तरह शास्त्रार्थ-चिन्तनमें निमग्न हो जाता है। जैसे सूर्यदेव अन्धकारमग्न प्राणीको अपने निकट आनेपर अपने प्रकाशसे पूर्ण कर देते हैं, वैसे ही सज्जन पुरुष अपने सम्पर्कमें आये हुए मनुष्यको विपत्तियोंसे उबारकर दैवी सम्पत्तियोंसे युक्त कर देता है।
जो विवेकी है, उसकी बुद्धि पहलेसे ही दूसरेका धन ग्रहण करनेसे विरत रहती है; क्योकि उसे प्रारब्धानुसार प्राप्त हुए अपने ही धनसे संतोष रहता है तथा पर-धनके ग्रहणसे विरत एवं संतोषामृतसे परिपूर्ण हुआ वह क्रमशः अपने स्वार्थोंकी भी उपेक्षा कर देना चाहता है। वह याचकको तृण और शाक आदि जो कुछ अपने पास मौजूद रहता है, वह सब दे देता है। यहाँतक कि उसी अभ्यासयोगसे वह अपना शरीर भी दे डालता है। विवेकी पुरुषको चाहिये कि पहले वह पर-धनके ग्रहणसे यत्नपूर्वक विरत हो जाय। जब इसका पूर्णतया अभ्यास हो जाय, तब उसे विवेकबलसे स्वार्थोंसे आसक्ति हटा लेनी चाहिये।
श्रीराम ! जैसे सरोवर वर्षाके जलसे ही भरता है, उसी तरह मनुष्यका अन्तःकरण संतोषसे ही परिपूर्ण होता है। जैसे वसन्त ऋतुके आगमनसे सुन्दर पुष्पोंसे लदे हुए वृक्षोंसे वन लहलहा उठता है, वैसे ही सन्तुष्ट पुरुष संतोषसे ही गम्भीर, शीतल, मनोहर, प्रसन्न और रसशालिनी ओजस्विताको पाकर शोभित होने लगता है। किंतु जो असन्तुष्ट है और सदा धनके लिये लालायित रहता है, उसकी प्रकृति दीन हो जाती है और वह पादपीठ (खड़ाऊँ या पनही) की रगड़से पिसे हुए कीड़ेकी भाँति चेष्टा करता रहता है तथा एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता रहता है। जो धनके लोभी होते हैं, उनकी आकृति विकृत हो जाती है। उन्हें क्षुब्ध समुद्रमें गिरे हुए तथा लहरोंके धपेड़ोंसे व्याकुल हुए जीवोंकी भाँति कभी स्वस्थ स्थिति प्राप्त नहीं होती। अर्थसम्पत्ति और नारी—ये दोनों ही उत्ताल तरङ्गोंकी तरह क्षणविध्वंसी हैं और सर्पके फनकी छत्रछायाके समान हैं, अतः कौन विद्वान् उनमें मन लगायेगा। धनके उपार्जन और रक्षणमें जो यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं, उन्हें जानता हुआ भी जो मूढ़ धनकी अभिलाषा करता है, वह मनुष्य होते हुए भी पशु-तुल्य है; अतः उसका स्पर्शतक नहीं करना चाहिये।* जो संतोषरूपी हँसुएसे मनके बाह्य इन्द्रिय-व्यापारोंको और आन्तरिक संकल्प आदिको दृढ़तापूर्वक काट डालता है, उसका क्षेम—ज्ञानवैराग्य उत्पत्तिके स्थान हृदय—प्रकाशित हो उठता है। पुरुषको चाहिये कि पहले संसारसे विरक्ति प्राप्त करे। विरक्त हो जानेपर सत्पुरुषोंका सङ्ग और शास्त्रोंका अभ्यास करे। शास्त्रोंके अर्थोंकी दृढ़ भावना उसके अन्तःकरणमें हो। तब वहीं उसे मनोज्ञ सुख होगा और इस प्रकार दृढ़तासे परमार्थतत्त्वकी प्राप्ति होती है। (सर्ग ४६-४७)
* सम्पदः प्रमदाश्चैव तरङ्गोत्तुङ्गभङ्गुराः। कस्तास्वभिरमेत्प्राज्ञः फणिच्छत्रोपमासु च ॥
अर्थोपार्जनरक्षाणां जानन्नपि कदर्यताम्। यः स्पृहयति मूढात्मा नरो नन्वेष न संस्पृशेत् ॥
(नि० प्र० उ० ४७ । ४, ५-६)