संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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जाती है; फिर इस विषयमें विचार ही कौन करे।
विषयोंसे जो दृढ़ वैराग्य और परम उपरति है, वही ध्यान कहलाता है और वही जब भलीभाँति परिपक्व हो जाता है, तब वज्रके समान सुदृढ़ अर्थात् वज्रध्यान हो जाता है। यह जो भोगोंसे वैराग्य है, यही अङ्कुरित होनेपर परम उपरति होकर, ध्यान कहा जाता है और दृढ़ होनेपर उसीकी समाधि संज्ञा होती है। जो दृश्यप्रपञ्चके स्वादसे मुक्त हो गया है और जिसे यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो चुकी है, उस मुनिकी तो अविराम निर्विकल्प समाधि लगी रहती है। जब भोग अच्छे नहीं लगते, तब यथार्थ ज्ञानका उदय होता है और जिसे विषय-भोग रुचिकर नहीं लगते, वह ज्ञानी कहा जाता है। जिस ज्ञानीको अपने स्वभावमें विश्राम प्राप्त हो चुका है, उसका स्वभाव भोगी कैसे हो सकता है; क्योंकि आत्मविरुद्ध स्वभाव ही भोग है, फिर उस स्वभावके क्षीण हो जानेपर भोगिता कहाँसे और कैसे प्राप्त हो सकती है। श्रीराम! साधकको चाहिये कि वह पहले वेदान्त श्रवण करे, फिर स्वाध्याय करे, तत्पश्चात् प्रणव आदिका जप करे। तदनन्तर ध्यान-समाधिमें लीन हो। समाधिसे विरत होनेपर वह थका हुआ साधक पुनः पूर्ववत् श्रवण, पाठ और जपका ही आश्रय ले।
राघवेन्द्र! जो संसारका भार ढोते-ढोते अत्यन्त थक गया है और संकटोंको झेलते-झेलते जिसका शरीर जर्जर हो गया है, अतएव विश्राम करना चाहता है, उसके उस विश्राम-क्रमको सुनो—जैसे पथिक यज्ञ-यूपोंसे दूर हट जाता है, वैसे ही ऐसा पुरुष अज्ञानियोंको दूरसे ही त्याग देता है और तत्त्वज्ञानियोंका अनुगामी होकर स्नान, दान, तप और यज्ञ आदिका अनुष्ठान करता है तथा सदा परोपकारमें तत्पर रहता है, जिससे 'परप्रज्ञानुग' कहा जाता है। वह सभी जनोंका प्रिय तथा शास्त्रानुकूल पवित्र कर्मोंका रसिक होता है और सभीके साथ सौम्य व्यवहार करता है। ऐसे पुरुषकी नवीन संगति, जो नवनीतके समान स्वच्छ, स्नेहमयी, कोमल, मनोहर और सुखदायु होती है, सम्पर्कमें आनेवाले जनको सुख प्रदान करती है। विवेकी पुरुषके चरित्र, जो चन्द्रमाके किरणसमूहकी तरह अत्यन्त शीतल और पवित्र होते हैं, सुननेवाले मनुष्यको पूर्ण रूपसे शीतल कर देते हैं।
सत्पुरुषोंके सङ्गसे जैसी निर्भय शान्ति प्राप्त होती है, वैसी शान्ति राशि-राशि पुष्पोंसे भरे हुए उद्यानखण्डोंमें भी नहीं मिलती। ज्ञानी पुरुषोंकी संगति मन्दाकिनीके जलकी तरह लोगोंके पापोंका प्रक्षालन करके विशुद्धता प्रदान करती है। संसार-सागरसे पार जानेकी इच्छावाले विरक्त ज्ञानी पुरुषोंके समागमसे मनुष्यका हृदय वैसे ही शीतल हो जाता है, जैसे हिम और पुष्पशरोंसे निर्मित घरोंमें निवास करनेपर होता है। क्रमशः किये गये न्यायोचित निष्काम कर्मसे बुद्धि विशुद्ध हो जाती है और बुद्धिके निर्मल होनेपर जैसे स्वच्छ दर्पण प्रतिबिम्बको तुरन्त धारण कर लेता है, वैसे ही मनुष्य शास्त्रोंके अभिप्रायको अपने अन्तःकरणमें यथार्थरूपसे ग्रहण कर लेता है। फिर विवेकी पुरुषके हृदयमें शास्त्रार्थ-रससे सुशोभित उत्तम प्रज्ञा उन्नतिको प्राप्त होती है। जिसका आत्मा साधु-समागमसे शुद्ध तथा शास्त्रार्थ-चिन्तनसे परिमार्जित हो गया है, वह प्राज्ञ पुरुष परम शोभा पाता है, प्राज्ञ पुरुष शास्त्र और सत्पुरुषोंके सङ्गका ऐसा अनुसरण करता है, जिससे इनमें अत्यन्त आसक्ति होकर इन्हींका अनुभव होता रहता है। क्रमशः सज्जनताको प्राप्त करके वह शास्त्रार्थकी भावनासे पूर्णतया भावित हो जाता है। फिर भोगोंका तिरस्कार करके वह पिंजरेसे छूटे हुए सिंहकी तरह शोभा पाने लगता है। भोगोंके पीछे दौड़ना बहुत बड़ा दुर्भाग्य है, इसलिये दिन-पर-दिन उसका त्याग करनेवाले विवेकी पुरुषके द्वारा उसका कुल उसी प्रकार चमकने लगता है, जैसे चन्द्रमासे तारोंका समूह।