संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * परमात्मामें सृष्टिभ्रमकी असम्भवता * ५६९
और आदि-अन्तसे रहित है। वह इतना सूक्ष्म है कि उसके भीतर आकाश भी प्रस्तरके समान स्थूल कहा जा सकता है। जिसकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है, उस दृश्य-प्रपञ्चकी सत्ता यहाँ कदापि सम्भव नहीं है। तथा जो सदा स्वानुभवैकगम्य नित्य परमात्मवस्तु है, उसकी सत्ताका निराकरण करनेकी शक्ति किसमें है ? संसार ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण चैतन्यमय ही है। इसमें जो जड आकारकी प्रतीति होती है, वह भ्रमसे ही है। इसलिये सब कुछ एक, अजन्मा, शान्त, द्वैताद्वैतसे रहित तथा निरामय ब्रह्म ही है। पूर्ण परब्रह्म परमात्मासे पूर्णका ही विस्तार हो रहा है। पूर्णमें पूर्ण ही विराज रहा है। पूर्णसे पूर्णका ही उदय हुआ है तथा पूर्णमें पूर्ण ही प्रतिष्ठित है। वह पूर्ण ब्रह्म शान्त, सम, उत्पत्ति-विनाशसे रहित, निराकार, अजन्मा, आकाशकी भाँति व्यापक, विशुद्ध और अद्वितीय है। वह सर्वरूप है और सत्-असत् स्वरूप तथा एक होकर ही सदा स्थित रहता है। सबका आदि वही है। मोक्ष उसका अपना ही स्वरूप है तथा वह उत्कृष्ट ज्ञानरूप है।
'तू', 'मैं' और 'यह जगत्'—इत्यादि जो शब्द हैं, इनका अर्थ ब्रह्म ही है और वह ब्रह्ममें ही विद्यमान है। वह ब्रह्म शान्त, सबमें समानरूपसे ही प्रकाशित होनेवाला तथा सत् है। वह पृथक् स्थित न होकर ही अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित है। समुद्र, पर्वत, मेघ, पृथ्वी तथा विस्फोट आदिसे युक्त होकर भी यह जगत् वास्तवमें अजन्मा तथा काष्ठमौनके समान निष्क्रिय ब्रह्मरूप ही है। उस ब्रह्ममें न तो ज्ञातापन है, न कर्त्तापन है, न जडता है और न भोक्तापन है, न शून्यता है, न अर्थरूपता है और न आकाशरूपता ही है। वह सत्य, घन, अद्वितीय, जन्म आदिसे रहित, सर्वव्यापी, सर्वरूप, शान्त, अनादि, अनन्त तथा एक रूप ही है। मरना-जीना, सत्य-असत्य तथा शुभ और अशुभ जो कुछ भी है, वह सब एकमात्र जन्मरहित चेतनाकाश-स्वरूप है। जैसे लहरोंका समुदाय जलरूप ही होता है, उसी प्रकार सब कुछ ब्रह्म ही है। जन्मनेमें भी परम शान्त चेतनाकाशस्वरूप ब्रह्मका ही रूप यह जगत् है, जो आदि और अन्तमें अव्यक्त तथा मध्यकालमें ही इस प्रकार व्यक्त होता है। जैसे जल ही फेन आदिके रूपमें दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगद्रूपमें भासित होता है। जो उत्पन्न होता है और उत्पन्न है, वह कार्यरूप तथा जो उत्पन्न नहीं होता है और उत्पन्न नहीं है, वह कारणरूप भी उस चेतन परमात्मासे भिन्न नहीं है। अतः इस सृष्टिका ब्रह्मसे भिन्न कोई कारण नहीं है। जैसे प्रयत्नपूर्वक खोज करनेपर भी खरगोशके सींगका पता नहीं आ सकता, वैसे ही इस सृष्टिका वास्तविक कोई कारण नहीं उपलब्ध होता।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जैसे वटबीजके भीतर भावी विशाल वृक्ष विद्यमान होता है, वैसे ही ज्ञानमय परमाणु परमात्मामें यह सारी सृष्टि विद्यमान रहती है, ऐसा क्यों न मान लिया जाय !
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जहाँ बीज है, वहाँ वटवृक्षकी विशाल शाखा हो सकती है; क्योंकि वह सहकारी कारणोंसे उत्पन्न होती और फैलती है; परन्तु जब सम्पूर्ण भूतोंका प्रलय हो जाता है, तब कौन-सा बीज शेष रह जाता है और उसका सहकारी कारण भी क्या रहता है; जिसके सहयोगसे जगत्की उत्पत्ति हो। जो शान्त परब्रह्म है, उसमें जगत्की कल्पना हो सकती है। उसमें तो परमाणुत्वका भी योग नहीं होता, फिर बीजत्व कैसे आ सकता है ? इस प्रकार विचार करनेपर बीजभूत कारणका होना जब सर्वथा असम्भव है, तब जगत्की सत्ता किस प्रकार, किस साधनसे, किस निमित्तसे, कहाँ और क्या हो सकती है, इसलिये जो ब्रह्मरूप परमानन्द है, वही अपने स्वरूपभूत संकल्पसे यह जगद् बनकर स्थित