भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 750 में से

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५७० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

है। यहाँ न तो कोई वस्तु उत्पन्न होती है और न उसका नाश ही होता है, जैसे आकाशमें अवकाश और जलमें द्रवत्व है, उसी प्रकार परमात्मामें सृष्टि स्थित है। (सर्ग ५३-५४)


ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना तथा जगत्‌का ब्रह्मसे अभेद, पाषाणोपाख्यानका आरम्भ—वसिष्ठजीका लोकगतिसे विरक्त हो सुदूर एकान्तमें कुटी बनाकर सौ वर्षोंतक समाधि लगाना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उत्पत्ति, विनाश, ग्रहण, त्याग, स्थूल, सूक्ष्म, चर, अचर आदि सभी पदार्थ सृष्टिके आरम्भ-कालमें उत्पन्न नहीं हुए थे; क्योंकि इनकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं था। जैसे नदियोंकी तरङ्ग-रेखा पहलेकी भाँति आज भी बह रही है, वैसे ही चेतनका संकल्प ही कल्पके आदिसे प्रलयपर्यन्त पदार्थोंके स्वभावका व्यवस्थापक है। पदार्थोंकी रचना दृष्टियोंमें ही प्रकट है। उनकी वास्तविक सत्ता नहीं है। जैसे जल-तरङ्गोंकी शोभा ही नदियोंकी रचना बन गयी है, उसी तरह चेतन आकाशमें विद्यमान चैतन्यरूप बीजकी सत्ता ही उसके भीतर सृष्टिरूपताको प्राप्त हो गयी है अर्थात् सृष्टिकी सत्ता चेतन सत्तासे पृथक् नहीं है। सब प्रकारके भेदज्ञानका निवारण हो जानेपर पुरुषमें जो एक शुद्ध ज्ञानका उदय होता है, तद्रूप ही वह बन जाता है। इसीसे वह मुक्त कहा जाता है। इसलिये उसमें बन्धन और मोक्षकी दृष्टियाँ कैसे रह सकती हैं? चेतन आकाशमें जो यह जगत्-नामक मलिनता प्रतीत हो रही है, पूर्वोक्तरूपसे विचार करनेपर यह निष्कलङ्क एवं निर्वाणरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ यह ब्रह्म व्याप्त न हो। यह जगत् अनेक रूप नहीं है, अपितु आकाशमें शून्यत्व तथा समुद्रमें द्रवत्वके समान ब्रह्मसे अभिन्न ही है।

रघुनन्दन ! चिन्मय आकाश परब्रह्म परमात्मामें सर्वत्र और सदा सब कुछ भलीभाँति विद्यमान है। साथ ही वह सर्वथा स्वच्छ है अर्थात् वह अपनी मलिनतासे ब्रह्मको दूषित नहीं करता है। वैसे ही जैसे सम्पूर्ण आकाशमें नीलरूपसे भासित होनेवाली शून्यता अपने मलसे मलिनता पैदा करके उसे दूषित नहीं करती। श्रीराम ! इस विषयमें पाषाणाख्यान सुना रहा हूँ, सुनो—यह अविद्यारूपी रोगको दूर करनेके लिये रसायन है। पूर्वकालमें मैने ही जो कुछ देखा था, उसीका इस आख्यायिकामें वर्णन है। यह विचित्र होनेके साथ ही इस प्रसङ्गके अनुकूल है। एक समयकी बात है, मै जानने योग्य परमात्म-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेनेके कारण पूर्णकाम हो गया था। इसलिये मेरे मनमें यह इच्छा हुई कि घनीभूत भ्रमसे भरे हुए इस लोकव्यवहारको छोड़ दूँ, तब ध्यानमें एकतान होकर धीरे-धीरे दीर्घकालिक विश्रामके लिये सम्पूर्ण चञ्चलताका त्याग करके मैंने एकान्त स्थानमें रहनेकी अभिलाषा की और शीघ्रतापूर्वक शान्तिकी ओर अग्रसर होने लगा। उस समय मै किसी देवताके स्थानमें स्थित था और जगत्‌की विविध एवं क्षणभङ्गुर गतियोंका अवलोकन कर रहा था। इतनेमें ही मै यह सोचने लगा कि इस लोककी अवस्था बड़ी नीरस है। देखनेमें सुन्दर और परिणाममे विनाशशील होनेके कारण आपातक्रमणीय है, इसलिये मै ऐसा मानता हूँ कि यह कहीं किसीको, किसी भी कारणसे और कभी भी सुख नहीं दे सकती। अतः कौन-सा ऐसा प्रदेश होगा, जो बिल्कुल सूना हो और जहाँ रहनेसे इन पाँचो बाह्य विषयोंकी वेदनाएँ अनुभवमें न आवे? मेरे विचारसे तो यह आकाश ही, जो सब ओरसे सूना होनेके कारण विक्षेपके उपकरणोसे रहित है, मेरी समाधिके लिये अधिक उपयोगी होगा।

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