संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
,देकर आदर-सत्कार करते हैं । जनताको अपनी ओर खींचते हैं और लोगोंके पाप-ताप हर लेते हैं । वर्षाकालके मेघोंकी भाँति वे स्निग्ध एवं शीतल होते हैं । धीर स्वभाववाले ज्ञानी पुरुष राजाओंके नाशक और देशको छिन्न-भिन्न करनेवाले व्यापक जन-क्षोभको उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे पर्वत भूकम्पको ।
ज्ञानी पुरुष चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर अङ्गवाली गुणशालिनी पत्नीके समान विपत्तिकालमें उत्साह एवं धैर्य प्रदान करते हैं और सम्पत्तिके समय सुख पहुँचाते हैं । साधुपुरुष वैशाख मास या वसन्तके समान अपने सुयशरूपी पुण्यसे सम्पूर्ण दिशाओंको निर्मल बनाते, उत्तम फलकी प्राप्तिमें कारण बनते और कोकिलके समान मीठी वाणी बोलते हैं । आपदाओंमें, बुद्धिनाशके अवसरोंपर भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मरण—इन छः ऊर्मियोंके प्राप्त होनेपर, व्याकुलताकी दशामें तथा घोर संकट आनेपर साधु पुरुष ही सत्पुरुषोंके आश्रयदाता होते हैं । काल-सर्पसे भरे हुए अत्यन्त भयंकर संसार-सागरको सत्संगरूपी जहाजके बिना दूसरी किसी नौकासे पार नहीं किया जा सकता । उपर्युक्त उत्तम गुणोंमेंसे एक भी गुण जिसमें उपलब्ध हो, उसके उसी गुणको सामने रखकर उसमें दीखनेवाले सब दोषोंकी उपेक्षा करके उसका आश्रय लेना चाहिये । सारे कामोंको छोड़कर सत्पुरुषोंका सङ्ग करे; क्योंकि यह सत्संगरूपी कर्म निर्वाधरूपसे इहलोक और परलोक दोनोंका साधक होता है । किसी समय कहीं भी सत्पुरुषसे अधिक दूर नहीं रहना चाहिये । विनययुक्त बर्ताव करते हुए सदा साधुपुरुषोंका सेवन करना चाहिये; क्योंकि सत्-पुरुषके समीप जानेवाले मनुष्यका उसके शान्ति आदि प्रसरणशील उत्तम गुण अनायास ही स्पर्श करते हैं, जैसे सुगन्धित पुष्पवाले वृक्षके निकट जानेसे उसके पुष्प-पराग बिना यत्नके ही सुलभ हो जाते हैं ।
(सर्ग ९८)
सत्का विवेचन और देहात्मवादियोंके मतका निराकरण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो वस्तु शास्त्रीय विचारसे उपलब्ध होती है तथा जिसकी सत्ता हेतुओ और युक्तियोंद्वारा सिद्ध है, वही सत् कही गयी है । शेष सभी वस्तुएँ प्रतीतिमात्र हैं । जो तीनों कालोंमें कभी हुई ही नहीं, वह वस्तु सत् कैसे हो सकती है ? मूर्खोकी दृष्टिमें इस संसारका जैसा स्वरूप है, उसे वही जानता है । हमलोगोंको उसका अनुभव नहीं है । मृग-तृष्णाकी नदीके जलमें जो मछली रहती है, वही उसकी मिथ्या चञ्चल लहरोंके आवर्तन-प्रत्यावर्तनको जानती होगी । तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें तो केवल एकमात्र चेतनाकाश ही बाहर-भीतर, तुम-मैं इत्यादि सब कुछ बनकर प्रकाशित हो रहा है ।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिन लोगोंका यह पक्ष (मत) है कि 'जबतक जीवे, तबतक सुखसे जीवे, मृत्यु अप्रत्यक्ष नहीं है । जो शरीर जलकर भस्म होकर बुझ गया, उसका पुनः आगमन कहाँसे हो सकता है ?' उनके लिये इस संसारमें दुःख-शान्तिका क्या उपाय है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! संवित्का जो-जो निश्चय होता है, वह अपने भीतर अखण्डरूपसे उसीका अनुभव करती है । इस बातका सब लोगोंको प्रत्यक्ष अनुभव है । अन्तःकरणमें नित्य-निरन्तर जैसी बुद्धिका उदय होता है, मनुष्य वैसा ही हो जाता है । यदि संवित्के बोधसे पुरुष दुखी हुआ है तो जबतक यह विरुद्ध बोध रहेगा, तबतक जीव दुःखमय बना रहेगा । यह जगत् सच्चिदानन्दरूप ब्रह्माकाशका स्फुरणमात्र ही है, ऐसी भावना दृढ़ हो जाय तो वह दुःखका बोध कैसे हो सकेगा ? जो जगत् वस्तुतः कूटस्थ अद्वितीय चेतनाकाशरूप