भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 664, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 664

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन * ६१७


है, उस जगत्से किसको कैसे दुःखका बोध हो सकता है । जीवकी जैसी दृढ़ भावना होती है, उसीके अनुसार वह सुखी या दुखी होता है, ऐसा निश्चय है । जिनके मतमें चेतनसे शरीरोंकी कल्पना हुई है, वे श्रेष्ठ पुरुष वन्दनीय हैं; परंतु जिनके मतमें शरीरसे चेतनकी उत्पत्ति होती है, उन नराधमोंसे बाततक नहीं करनी चाहिये । ( ऐसे लोग दुःखसे कैसे छूट सकते हैं । )

( सर्ग ९९-१०० )


सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! चिन्मात्र ही पुरुष है, वही इस प्रकार नाना रूपोंमें अवस्थित है । उस चिन्मात्र परम पुरुष परमात्माके सिवा दूसरी किम वस्तुकी सत्ता यहाँ सम्भव हो सकती है ? मेरे सारे अङ्ग चूर-चूर होकर परमाणुके तुल्य हो जायँ अथवा बढ़कर सुमेरु पर्वतके समान विशाल हो जायँ, इससे मेरी क्या क्षति हुई अथवा क्या वृद्धि हुई ? क्योंकि मेरा वास्तविक स्वरूप तो सच्चिदानन्दमय है । हमारे पितामह आदिके शरीर मर गये, किंतु उनका चैतन्य तो नहीं मरा है । यदि वह भी मर जाता तो मृत आत्मावाले उनका तथा हमलोगोंका फिर जन्म नहीं होता । किंतु पुरुष अविनाशी चिन्मय ही है । वह आकाशके समान नित्य है । उसका कभी नाश नहीं होता है । 'मैं नष्ट होता हूँ या मरता हूँ' इस तरहका जो शोक है, वह सर्वथा व्यर्थ है । इसलिये न तो मरण दुःखरूप है और न जीवित रहना सुखरूप । यह सब कुछ नहीं है । केवल अनन्त चेतन परमात्मा ही इस तरह स्फुरित हो रहा है ।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! आदि और अन्तसे रहित परमतत्त्व परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो जानेपर उत्तम पुरुष कैसा—किन-किन लक्षणोंसे सम्पन्न हो जाता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जिसे ज्ञेय वस्तु परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो गया है, ऐसा जीवन्मुक्त श्रेष्ठ पुरुष कैसा होता है तथा वह जीवनपर्यन्त कैसे स्वभावसे युक्त हो किस आचारका पालन करता रहता है, यह बताया जाता है, सुनो । ऐसा पुरुष यदि जंगलमें रहता हो तो वहाँ पत्थर भी उसके मित्र हो जाते हैं । वनके वृक्ष बन्धु-बान्धव और वन्य मृगोंके बच्चे उसके स्वजन बन जाते हैं । यदि वह विशाल राज्यमें रहता हो तो वहाँ जनसमुदायसे भरा हुआ स्थान भी उसके लिये शून्य-सा ही हो जाता है । विपत्तियाँ बड़ी भारी सम्पत्तियों हो जाती हैं और नाना प्रकारके व्यसन ही उसके लिये सुन्दर उत्सव बन जाते हैं । उसके लिये असमाधि भी समाधि है । दुःख भी महान् सुख ही है । वाणीका व्यवहार भी मौन है और कर्म भी अकर्म ही है । वह जाग्रत्-अवस्थामें रहकर भी सुषुप्तिमें ही स्थित है (क्योंकि निर्विकल्प आत्मामें उसकी सुदृढ़ स्थिति है) । वह जीवित रहता हुआ भी देहाभिमानसे शून्य होनेके कारण मृतकके ही तुल्य है । वह समस्त आचार-व्यवहारका पालन करता है, तो भी कर्तृत्वके अभिमानसे रहित होनेके कारण कुछ भी नहीं करता है । वह रसिक होकर भी अत्यन्त विरक्त है । करुणारहित होकर भी सबको अपना बन्धु मानकर सबके प्रति स्नेह रखता है । निर्दय होकर भी अत्यन्त करुणासे भरा हुआ है और स्वयं तृष्णासे शून्य होकर भी पराये हितके लिये तृष्णा रखता है । उसके आचारका सभी अभिनन्दन करते हैं तथापि वह सभी आचारोंसे बहिष्कृत है । शोक, भय और आयाससे शून्य होनेपर भी वह दूसरोंका दुःख देखकर शोकयुक्त-सा दिखायी देता है । उस पुरुषसे जगत्के प्राणियोंको कभी उद्वेग नहीं प्राप्त होता तथा वह भी उनसे कभी उद्विग्न नहीं होता । संसारमें (ब्रह्मा-