भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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६३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अहो ! जड अथवा जलके संगमका कैसा विचित्र प्रभाव है कि मुकुलावस्थामें कमल भी अपने सौन्दर्य, सौगन्ध्य और माधुर्यादि गुणोंको दोषोंकी तरह गलेके भीतर छिपाये रखता है तथा कुरूप काँटोंको सबके सामने प्रकट करके दिखाता है (यह कुसंगतिका फल है)। जो गुण कमलके तन्तुओंकी भाँति छिद्रयुक्त (सदोष), कमजोर, सूक्ष्म, छिपाये हुए, जडतासे संयुक्त और अधिक होनेपर भी सारहीन हों, उनसे कोई लाभ नहीं है।

भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान, सौन्दर्य-माधुर्यकी देवी भगवती लक्ष्मी भी शोभाके लिये ही हाथमें कमल धारण करती हैं; कमलकी इससे बढ़कर प्रशंसा और क्या हो सकती है ?

जो भ्रमर कमलोंके मधुर मकरन्दके मद और आमोद-से मतवाले हो उन्हीं कमलोंपर गुञ्जारव करते हैं, वे अन्य फूलोंके रसास्वादनसे संतुष्ट हुए दूसरे भौरोंका मानो उपहास करते हैं।

अरे भ्रमर ! तू नाना प्रकारके फूलोंके रसका आस्वादन करता हुआ समस्त पर्वतोंके लताकुञ्जोंमें जो प्रतिदिन चक्कर लगाता रहता है, उससे आजतक संतुष्ट क्यों नहीं हो रहा है ? जान पड़ता है तेरा हृदय शुद्ध नहीं, दूषित है। मालूम होता है अबतक तुझे वनोंसे सारतत्त्व नहीं प्राप्त हुआ (तभी तो तुझमें असंतोष बना रहता है)।

मधुप ! तू कमलकुलके मकरन्दका आस्वादन करनेमें प्रवीण है; अतः कमलोंसे भरे हुए सरोवरमें ही चला जा। मकरन्दसे पुष्ट हुए अपने इस शरीरको बेरोंकी झाड़ियोंमें इनके कण्टकरूपी आरोंसे विदीर्ण न कर।

हंस ! तुम जलकाक, बगुले और कौए आदि हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए इस तालाबमें सदा अकेले न रहा करो। आपत्तिकालमें भी समान शील, अवस्था और भाषावाले स्वजनवर्गके साथ रहना ही अच्छा फल देने-वाला होता है। (सर्ग ११७)


बगुले, जलकाक, मोर और चातकसे सम्बन्ध रखनेवाली अन्योक्तियाँ

अब राजाके सहचर-सहचरियोंने कहा—राजन् ! देखिये, बगुला प्रायः गुणहीन होता है, तो भी इसमें एक गुण अवश्य है, यह 'प्रावृट्-प्रावृट्' कहकर सदा वर्षाकालका स्मरण दिलाता है।

ओ बगुले ! तालाबमें बैठनेपर तू अपनी सफेद पाँखों-से हंस-सा ही जान पड़ता है, परंतु मेरी एक सलाह मान ले—जलकाकोंके साथ मैत्री, प्राणिवधकी क्रूरता और कर्णकटु वाणी—इन दोषोंको त्यागकर तू स्पष्ट रूपसे हंस बन जा। (तू अपनेमें रूप-रंगके साथ गुण भी हंसोंके ही संचित कर।)

'इस तरह स्वार्थके लिये लोगोंका गला घोंटा जाता है' इस बातको अपने व्यवहारसे दिखाता हुआ मद्गु (जलकाक) मेरा गुरु बन गया है—ऐसा कहकर दुष्ट लोग उसकी प्रशंसा करते हैं।

गर्दन ऊँची किये और सुन्दर सफेद पंख फैलाये बगुलेको आकाशमें उड़ता देख लोगोंने जाना कि यहाँ हंस ही आ गया, किंतु जब वह तलैयामें उतरकर कीचड़-भरे जलसे मछली पकड़ने लगा तो सब लोगोंको निश्चय हो गया कि यह बगुला ही है।

जो बहुत समयतक अपनी अत्यन्त चपलताका परिचय दे चुके थे, वे ही बगुले जब मछलियोंको पकड़नेके लिये तपस्याका ढोंग रचने लगे—तपस्वीकी तरह ध्यान लगाकर बैठे; तब वहाँ इसी स्वभाववाले धूर्तोंको अन्धकारकी प्रतीक्षामें ध्यान लगाकर बैठा देख तटपर खड़ी हुई एक चतुर नारीको बड़ा विस्मय हुआ।

बगुला, जलकाक और अन्यान्य हिंसक जलजन्तु सदा एक ही स्थानमें रहते हैं तो भी मूर्ख और विद्वानोंकी बुद्धिके समान इनकी बुद्धिका एक-दूसरेसे मेल नहीं है।