भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ * ६३१


समय है। सखे ! इस समय यह वसन्तका उत्सव नहीं है।

यह कोयलका बच्चा अपनी माता काकीको छोड़कर जो चला गया, यह एक आश्चर्यकी बात है। फिर यह काकी माँ, जो इस बच्चेको चोंच और पंजोंसे मार रही है, यह दूसरा आश्चर्य है। मै इन बातोंपर क्षणभर ज्यों ही सोच-विचार करने लगा, त्यों ही यह कोयलका बच्चा भी अपनी माँके समान बढ़नेके लिये उत्साहसे सम्पन्न हो गया। यह तीसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ। वास्तवमें स्वभाव-सुभग भाग्यशाली पुरुष जिस दिशामें आता है, वही उसके लिये माहात्म्यदायिनी बन जाती है।

(सर्ग ११४-११६)


सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ

विपश्चित्के सहचरोंने कहा—राजन् ! देखिये, यहाँ सामने पर्वतके शिखरपर जो सुन्दर सरोवर है, उसमें कह्लार, कमल और उत्पलोंकी नालके लिये छलकते हुए विचित्र कलरव करनेवाले हंस आदि पक्षी सब ओर फैले हुए हैं। इससे वह सरोवर ऐसा जान पड़ता है, मानो नक्षत्रोंसहित आकाश ही उसमें प्रतिबिम्बित हो रहा है। यह सरोवर इस पृथ्वीपर कमलासन ब्रह्माजीका गृह-सा जान पड़ता है। इसमें जो सहस्रदल-कमल खिले हुए हैं, उनकी नालें बहुत ऊपरतक उठी हुई हैं और उनके कोशस्थलोंमें सुन्दर शोभाका भार लिये राजहंस बैठे हुए हैं (ब्रह्मलोकमें भी यही विशेषता है)। इसके सिवा ब्रह्माजीके भवनमें भ्रमरोंके समान काली इन्द्रनीलमणिकी चौकीपर ब्राह्मणलोग विराजमान होते हैं। इस सरोवरमें काले-काले भौंरे ही इन्द्रनीलमणिकी चौकी हैं। उनसे संयुक्त फूलोंपर बैठे हुए पक्षियोंके समूह ही ब्राह्मण-वृन्दका स्थान ग्रहण किये हुए हैं।

पवित्र-हृदयके समान निर्मल कमलोंसे भरा हुआ और हृदयको अत्यन्त आह्लाद प्रदान करनेवाला यह स्वादिष्ट' जलसे परिपूर्ण सरोवर सत्संगके समान सुशोभित होता है। सत्संग भी हृदयारविन्दको पवित्र करनेवाला, मनको आनन्द देनेवाला, अत्यन्त सरस और मधुर होता है। हेमन्तऋतुमें सरस सारसोंसे युक्त यह सरोवर कुहासेसे ढक जानेके कारण कुछ-कुछ दिखायी देता है। बर्फसे ढके रहनेके कारण इसकी श्यामता दूर हो गयी है। यह सफेद-सा दीखने लगा है। अतएव बर्फके बादल-सा जान पड़ता है। इसके जलविन्दुओंको छूकर बहनेवाली वायु बड़ी कठोर जान पड़ती है।

राजन् ! जैसे यह दृश्यजगत् ब्रह्मसे भिन्न नहीं है—विकार आदिसे रहित ब्रह्मरूप ही है, तथापि ब्रह्मसे पृथक्-सा प्रतीत होता है, उसी तरह इस जलमें जो तरङ्ग आदि हैं, वे जलसे भिन्न नहीं हैं तो भी उससे पृथक्-से स्थित हैं। हाय ! अपने ही जलसे बहाये जाकर चक्राकार भँवर प्रकट करनेवाले इन जलाशयोंकी एकके बाद दूसरीके क्रमसे उठनेवाली तरङ्ग-परम्परा बडी विषम है। (इसका दूसरा अर्थ यों समझना चाहिये—) जिनका अन्तःकरण जड या मूढ़ है, वे अपने ही अज्ञानसे संसारके प्रवाहमें बहते हैं और अपने लिये शुभाशुभ कर्मोंके चक्रका निर्माण करते हैं। उनके मनोरथरूपी तरङ्गोंकी परम्परा संकटमें डालनेवाली होती है।

जलमें उत्पन्न होनेवाले कमल, उत्पल आदिके संसर्गसे जीर्ण हुए इस सरोवरकी उपमा विविध जड योनियोंके सम्बन्धसे जर्जर हुए देहधारी जीवके मनसे दी जाती है। सरोवरमें कमल आदिकी तथा मनमें भिन्न-भिन्न योनियोंके शरीरोंकी जर्जर-दशापर्यन्त जो तरङ्गैं (विषय-भोगोंकी अभिलाषाएँ) उठती हैं, उनके वेगसे व्याप्त इच्छा-द्वेष आदि वृत्तियोंके परिवर्तनोंकी भाँति जो असंख्य कमल प्रकट होते हैं, उन्हें कौन गिन सकता है ?