संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दौहित्र कुत्तेमें उसके अनुरूप सभी धर्मोंका एकत्र दर्शन करानेके लिये निम्नाङ्कित सब बातें एक साथ ही रच डालीं। वे सब बातें इस प्रकार हैं—अपने ही बनाये हुए कूड़े-करकटके अपवित्र गड्ढेमें रहना, गूह और पीव खाना, जहाँ सबकी दृष्टि पड़ती हो, ऐसी सड़कों या खुली जगहोंमें कुत्सित मैथुनकी इच्छा तथा सबसे निन्दनीय शरीर। इन सबको विधाताने कुत्तोंके ही हवाले कर दिया।
किसीने कुत्तेसे पूछा—'तुझसे बढ़कर नीच कौन है?' ऐसा प्रश्न करनेवालेसे कुत्तेने हँसकर कहा—'जो मूर्खता (अज्ञान), अपवित्र देहादिका अभिमान तथा अन्धता (विचाररूपी दृष्टिसे वञ्चित होना)—इन दुर्गुणोंका एवं अशुभ वस्तुका सेवन करता है, वह मुझसे भी अधिक नीच है।' प्रश्न करनेवालेने फिर पूछा—'तुझमें कौन-से ऐसे गुण हैं, जिसके कारण तुझे मूर्खसे अच्छा समझा जाय?' कुत्तेने उत्तर दिया—'शूरता, स्वाभाविक स्वामिभक्ति और धृति (थोड़ेमें ही संतोष कर लेनेकी क्षमता)—ये सुन्दर गुण जो मुझमें हैं, लाखों प्रयत्न करके ढूँढ़नेपर भी मूर्खके पास नहीं पाये जा सकते।' कुत्ता सदा अपवित्र वस्तु खाता है, अपवित्र विष्ठाके ढेरमें ही सदा रमता है, नेवले, चूहे आदि जीवित प्राणियोंको भी चुपचाप खा जाता है और निर्बल बकरीके बच्चे आदिको भी बिना किसी अपराधके ही काट खाता है तथा कुतियाके साथ मैथुनमें प्रवृत्त होनेपर सब लोग आकर उसे ढेले मारते हैं। विधाताने संसारमें बेचारे असमर्थ कुत्तेको जन्मभर दुःख भोगनेके लिये ही रचा है।
(कोई अनुचर शिवलिङ्गपर बैठे हुए कौएकी ओर राजाका ध्यान आकृष्ट करता हुआ कहता है—) शिव-लिङ्गके ऊपर बैठकर काँव-काँव करता हुआ यह कौआ अपने आपको ही दृष्टान्तरूपसे दिखाकर कहता है—'लोगो! अधोगतिमें डालनेवाले जितने पातक हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है शिव-सम्पत्तिका उपभोग। इस महान् पातकमें स्थित हुए मुझ कौएको प्रत्यक्ष देखो।'
नीच कौए! तू सदा कानोंको कटु प्रतीत होनेवाली काँव-काँवकी आवाज किया करता है और इसके द्वारा तूने मीठी बोली बोलनेवाले हंस आदिके गुणोंको कवलित कर लिया है—मिटा दिया है। अब सरोवरके भीतर कीचड़में घूमता हुआ जो तू अपनी कठोर बोलीसे भ्रमरों-के मधुर गुञ्जारको छिपाये देता है, यह मेरे सिरपर बाणोंके प्रहारकी-सी वेदना पैदा करता है।
कौआ सरोवरमें आनेपर भी जो नरकसमूह (गन्दी चीजों) को ही खाता है और कमलकी नालको छोड़ देता है, इस विषयमें आपको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये। जिसको जिस वस्तुके खानेका अभ्यास है, उसे सदा वही स्वादिष्ट प्रतीत होती है।
नाना प्रकारके वन-पुष्पोंके केसर लग जानेसे कौएका शरीर सफेद-सा दिखायी देने लगा। इतनेसे ही लोगोंने उसे हंस समझ लिया; किंतु जब उसने सड़े-गले कीड़ों-मकोड़ोंको निगलना आरम्भ किया, तब उसका असली रूप पहचानमें आ गया—सबने जान लिया कि यह कौआ है।
कौओंके झुंडमें बैठा हुआ कोकिल मौन, चेष्टा, विहार, रूप-रंग और आकार-प्रकारमें कौओके साथ पूरी समानता रखनेपर भी मीठी बोलीके द्वारा दूरसे ही पहचान लिया जाता है कि यह कौआ नहीं, रुचिर कान्तिवाला कोकिल है—ठीक उसी तरह, जैसे मूर्खोंके बीचमें बैठे हुए पण्डितकी पहचान हो जाती है। अपनी आकृतिसे ही भव्य गुणोंको सूचित करनेवाले सभी पुरुष अनुरूप आन्तरिक चमत्कारसे ही विख्यात हो जाते हैं।
भैया कोकिल! इस समय यह मधुर कलरव करनेसे कोई लाभ नहीं। इससे तुम्हारा बहुमूल्य गुण नहीं प्रकट हो रहा है। किसी विशाल वृक्षकी कन्दराके भीतर जीर्ण-शीर्ण पत्तोंसे ढके हुए खोखलेमें चुपचाप बैठे रहो। यह कर्ण-कटु काँव-काँवकी रट लगानेवाले कौओंसे भरा हुआ शिशिरका