संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ आदि दिखाना * ६२९
गाँवोंमें जो विलासलक्ष्मी लक्षित होती है, वह ब्रह्माजीके वैभवशाली राज्योंमें भी कहाँ सुलभ है ?
देखिये, स्फटिक मणिके खम्भोंकी राशियोंके समान सुरम्य एवं मोटी धारसे गिरनेवाले निर्झर-सलिलसे सुशोभित इस ग्रामगुफामें ये मोरनियाँ कैसा नृत्य कर रही हैं। जहाँ निर्झरोंसे झरते हुए जलका कलकल नाद फैल रहा है, ऐसे इस पर्वतीय ग्रामके कुञ्जोंमें विलासिनी मयूरियों और फूलोंके भारसे झुकी हुई लताएँ भी नाच रही हैं।
(अब मेघके व्याजसे किसी ऐसे दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, जो दान करते समय पात्रापात्र और गुण-अवगुणका विचार न करता हो, इसे अन्योक्ति कहते हैं—) मेघ ! तुम्हारा शील-स्वभाव श्रीमानोंके समान है, आशय (हृदय) महान् (उदार) है। तुम आतप (संताप) को हर लेते हो। तुम्हारी आकृतिसे ही उच्चता और गम्भीरता व्यक्त होती है। तुम पर्वतों (अथवा राजाओं) के शिरोभूषण हो और भूतलके लिये रसके एकमात्र आधार हो। इस प्रकार तुममें बहुतसे गुण हैं, परंतु यह एक ही बात हमारे हृदयको छेदे डालती है कि तुम हर्षसे वर्षा (दान) करते समय ऊसर भूमियोंमें, ताल-तलैयोंमें और वहाँके कँटीले वृक्षोंमें भी उसी तरह जलका विभाजन करते हो, जैसा सुन्दर उपजाऊ खेतोंमें किया करते हो (योग्यता-अयोग्यताका कोई विचार नहीं करते हो)।
(अब दान देनेके पूर्व दान लेनेवालोंके प्रति कठोर और कटुवचन सुनानेवाले दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, यह भी मेघान्योक्ति ही है—) जलद ! तुम प्रतिदिन समुद्र और गङ्गा आदि उत्तम तीर्थोंकी जलराशिसे स्नान करते हो, ऊँचे स्थानपर बैठे हो, शुद्ध होकर वनभूमिमें निवास करते और मुनियोंके समान मौनव्रतका आश्रय लेते हो। यद्यपि शरत्-कालमें सब कुछ लुटाकर तुम खाली हो जाते हो तो भी तुम्हारे शरीरपर अत्यन्त उत्तम उज्ज्वल कान्ति ही लक्षित होती है। परंतु ऐसे होकर भी जो तुम जलदानके लिये ऊपर उठकर बिजलीके साथ वज्रसी गड़गड़ाहट पैदा करते हो, यह क्या है ? तुम्हारा ऐसा तुच्छ आचरण क्यों होता है !
अयोग्य स्थानमें पड़ जानेपर सारी अच्छी वस्तु भी बुरी हो जाती है। देखो न, मेघरूपी दूषित स्थानको पाकर श्वेत जल भी काला हो गया है। अहो ! मेघने जलकी वर्षा की और उस जलसे सारी पृथ्वी आप्लावित हो गयी। जैसे धनाढ्य पुरुष अपने दीन-दुखी प्रेमियोंको धन-दौलतसे पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार जलने भूतपर मुरझायी हुई खेतीको हरी-भरी एवं पुष्ट कर दिया। यह कितने हर्षकी बात है।
• (शूरवीर और कायरमें अन्तर बतानेवाली अन्योक्ति—) सिंह और कुत्ता दोनोंमें समानरूपसे पशुता विद्यमान है—दोनों पशु जातिके ही जीव हैं परंतु मेघगर्जन आदिसे होनेवाले कोलाहलको सिंह और ही प्रकारसे सहता है और कुत्ता और ही प्रकारसे। सिंह उस कोलाहलको सुनकर मनमें क्षोभ या भयका अनुभव नहीं करता। वह उपेक्षासे आँखें बंद करके सहन करता है। परंतु कुत्ता मेघ-गर्जनको सुनकर मन-ही-मन भयसे काँप उठता है और भयसे ही आँखें बंद करके उस कोलाहल-को सहन करता है।
(कुत्ते-जैसे स्वभाववाले मनुष्यको लक्ष्य करके कही गयी अन्योक्ति—) सदा अपवित्र रहनेवाले कुत्ते ! तू अपने प्रियजनों (सजातीय कुत्तों) के ही निकट आने-पर भौं-भौं किया करता है। तेरा सारा समय गली-कूचोंमें मारे-मारे फिरनेमें ही व्यतीत होता है। मालूम होता है तुझे अपनी चित्तवृत्तिके ही अनुरूप मानकर किसी मूर्खने तुझको अपने इन दुर्गुणोंकी शिक्षा दे दी है। जीवके कर्मोंकी विषमतावश विषम जगत्की रचना करनेवाले विधाताने अपनी पुत्री देवशुनी सरमाके पुत्ररूप अपने