संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ आदि दिखाना * ६२९
गाँवोंमें जो विलासलक्ष्मी लक्षित होती है, वह ब्रह्माजीके वैभवशाली राज्योंमें भी कहाँ सुलभ है ?
देखिये, स्फटिक मणिके खम्भोंकी राशियोंके समान सुरम्य एवं मोटी धारसे गिरनेवाले निर्झर-सलिलसे सुशोभित इस ग्रामगुफामें ये मोरनियाँ कैसा नृत्य कर रही हैं। जहाँ निर्झरोंसे झरते हुए जलका कलकल नाद फैल रहा है, ऐसे इस पर्वतीय ग्रामके कुञ्जोंमें विलासिनी मयूरियों और फूलोंके भारसे झुकी हुई लताएँ भी नाच रही हैं।
(अब मेघके व्याजसे किसी ऐसे दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, जो दान करते समय पात्रापात्र और गुण-अवगुणका विचार न करता हो, इसे अन्योक्ति कहते हैं—) मेघ ! तुम्हारा शील-स्वभाव श्रीमानोंके समान है, आशय (हृदय) महान् (उदार) है। तुम आतप (संताप) को हर लेते हो। तुम्हारी आकृतिसे ही उच्चता और गम्भीरता व्यक्त होती है। तुम पर्वतों (अथवा राजाओं) के शिरोभूषण हो और भूतलके लिये रसके एकमात्र आधार हो। इस प्रकार तुममें बहुतसे गुण हैं, परंतु यह एक ही बात हमारे हृदयको छेदे डालती है कि तुम हर्षसे वर्षा (दान) करते समय ऊसर भूमियोंमें, ताल-तलैयोंमें और वहाँके कँटीले वृक्षोंमें भी उसी तरह जलका विभाजन करते हो, जैसा सुन्दर उपजाऊ खेतोंमें किया करते हो (योग्यता-अयोग्यताका कोई विचार नहीं करते हो)।
(अब दान देनेके पूर्व दान लेनेवालोंके प्रति कठोर और कटुवचन सुनानेवाले दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, यह भी मेघान्योक्ति ही है—) जलद ! तुम प्रतिदिन समुद्र और गङ्गा आदि उत्तम तीर्थोंकी जलराशिसे स्नान करते हो, ऊँचे स्थानपर बैठे हो, शुद्ध होकर वनभूमिमें निवास करते और मुनियोंके समान मौनव्रतका आश्रय लेते हो। यद्यपि शरत्-कालमें सब कुछ लुटाकर तुम खाली हो जाते हो तो भी तुम्हारे शरीरपर अत्यन्त उत्तम उज्ज्वल कान्ति ही लक्षित होती है। परंतु ऐसे होकर भी जो तुम जलदानके लिये ऊपर उठकर बिजलीके साथ वज्रसी गड़गड़ाहट पैदा करते हो, यह क्या है ? तुम्हारा ऐसा तुच्छ आचरण क्यों होता है !
अयोग्य स्थानमें पड़ जानेपर सारी अच्छी वस्तु भी बुरी हो जाती है। देखो न, मेघरूपी दूषित स्थानको पाकर श्वेत जल भी काला हो गया है। अहो ! मेघने जलकी वर्षा की और उस जलसे सारी पृथ्वी आप्लावित हो गयी। जैसे धनाढ्य पुरुष अपने दीन-दुखी प्रेमियोंको धन-दौलतसे पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार जलने भूतपर मुरझायी हुई खेतीको हरी-भरी एवं पुष्ट कर दिया। यह कितने हर्षकी बात है।
• (शूरवीर और कायरमें अन्तर बतानेवाली अन्योक्ति—) सिंह और कुत्ता दोनोंमें समानरूपसे पशुता विद्यमान है—दोनों पशु जातिके ही जीव हैं परंतु मेघगर्जन आदिसे होनेवाले कोलाहलको सिंह और ही प्रकारसे सहता है और कुत्ता और ही प्रकारसे। सिंह उस कोलाहलको सुनकर मनमें क्षोभ या भयका अनुभव नहीं करता। वह उपेक्षासे आँखें बंद करके सहन करता है। परंतु कुत्ता मेघ-गर्जनको सुनकर मन-ही-मन भयसे काँप उठता है और भयसे ही आँखें बंद करके उस कोलाहल-को सहन करता है।
(कुत्ते-जैसे स्वभाववाले मनुष्यको लक्ष्य करके कही गयी अन्योक्ति—) सदा अपवित्र रहनेवाले कुत्ते ! तू अपने प्रियजनों (सजातीय कुत्तों) के ही निकट आने-पर भौं-भौं किया करता है। तेरा सारा समय गली-कूचोंमें मारे-मारे फिरनेमें ही व्यतीत होता है। मालूम होता है तुझे अपनी चित्तवृत्तिके ही अनुरूप मानकर किसी मूर्खने तुझको अपने इन दुर्गुणोंकी शिक्षा दे दी है। जीवके कर्मोंकी विषमतावश विषम जगत्की रचना करनेवाले विधाताने अपनी पुत्री देवशुनी सरमाके पुत्ररूप अपने
६३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
दौहित्र कुत्तेमें उसके अनुरूप सभी धर्मोंका एकत्र दर्शन करानेके लिये निम्नाङ्कित सब बातें एक साथ ही रच डालीं। वे सब बातें इस प्रकार हैं—अपने ही बनाये हुए कूड़े-करकटके अपवित्र गड्ढेमें रहना, गूह और पीव खाना, जहाँ सबकी दृष्टि पड़ती हो, ऐसी सड़कों या खुली जगहोंमें कुत्सित मैथुनकी इच्छा तथा सबसे निन्दनीय शरीर। इन सबको विधाताने कुत्तोंके ही हवाले कर दिया।
किसीने कुत्तेसे पूछा—'तुझसे बढ़कर नीच कौन है?' ऐसा प्रश्न करनेवालेसे कुत्तेने हँसकर कहा—'जो मूर्खता (अज्ञान), अपवित्र देहादिका अभिमान तथा अन्धता (विचाररूपी दृष्टिसे वञ्चित होना)—इन दुर्गुणोंका एवं अशुभ वस्तुका सेवन करता है, वह मुझसे भी अधिक नीच है।' प्रश्न करनेवालेने फिर पूछा—'तुझमें कौन-से ऐसे गुण हैं, जिसके कारण तुझे मूर्खसे अच्छा समझा जाय?' कुत्तेने उत्तर दिया—'शूरता, स्वाभाविक स्वामिभक्ति और धृति (थोड़ेमें ही संतोष कर लेनेकी क्षमता)—ये सुन्दर गुण जो मुझमें हैं, लाखों प्रयत्न करके ढूँढ़नेपर भी मूर्खके पास नहीं पाये जा सकते।' कुत्ता सदा अपवित्र वस्तु खाता है, अपवित्र विष्ठाके ढेरमें ही सदा रमता है, नेवले, चूहे आदि जीवित प्राणियोंको भी चुपचाप खा जाता है और निर्बल बकरीके बच्चे आदिको भी बिना किसी अपराधके ही काट खाता है तथा कुतियाके साथ मैथुनमें प्रवृत्त होनेपर सब लोग आकर उसे ढेले मारते हैं। विधाताने संसारमें बेचारे असमर्थ कुत्तेको जन्मभर दुःख भोगनेके लिये ही रचा है।
(कोई अनुचर शिवलिङ्गपर बैठे हुए कौएकी ओर राजाका ध्यान आकृष्ट करता हुआ कहता है—) शिव-लिङ्गके ऊपर बैठकर काँव-काँव करता हुआ यह कौआ अपने आपको ही दृष्टान्तरूपसे दिखाकर कहता है—'लोगो! अधोगतिमें डालनेवाले जितने पातक हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है शिव-सम्पत्तिका उपभोग। इस महान् पातकमें स्थित हुए मुझ कौएको प्रत्यक्ष देखो।'
नीच कौए! तू सदा कानोंको कटु प्रतीत होनेवाली काँव-काँवकी आवाज किया करता है और इसके द्वारा तूने मीठी बोली बोलनेवाले हंस आदिके गुणोंको कवलित कर लिया है—मिटा दिया है। अब सरोवरके भीतर कीचड़में घूमता हुआ जो तू अपनी कठोर बोलीसे भ्रमरों-के मधुर गुञ्जारको छिपाये देता है, यह मेरे सिरपर बाणोंके प्रहारकी-सी वेदना पैदा करता है।
कौआ सरोवरमें आनेपर भी जो नरकसमूह (गन्दी चीजों) को ही खाता है और कमलकी नालको छोड़ देता है, इस विषयमें आपको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये। जिसको जिस वस्तुके खानेका अभ्यास है, उसे सदा वही स्वादिष्ट प्रतीत होती है।
नाना प्रकारके वन-पुष्पोंके केसर लग जानेसे कौएका शरीर सफेद-सा दिखायी देने लगा। इतनेसे ही लोगोंने उसे हंस समझ लिया; किंतु जब उसने सड़े-गले कीड़ों-मकोड़ोंको निगलना आरम्भ किया, तब उसका असली रूप पहचानमें आ गया—सबने जान लिया कि यह कौआ है।
कौओंके झुंडमें बैठा हुआ कोकिल मौन, चेष्टा, विहार, रूप-रंग और आकार-प्रकारमें कौओके साथ पूरी समानता रखनेपर भी मीठी बोलीके द्वारा दूरसे ही पहचान लिया जाता है कि यह कौआ नहीं, रुचिर कान्तिवाला कोकिल है—ठीक उसी तरह, जैसे मूर्खोंके बीचमें बैठे हुए पण्डितकी पहचान हो जाती है। अपनी आकृतिसे ही भव्य गुणोंको सूचित करनेवाले सभी पुरुष अनुरूप आन्तरिक चमत्कारसे ही विख्यात हो जाते हैं।
भैया कोकिल! इस समय यह मधुर कलरव करनेसे कोई लाभ नहीं। इससे तुम्हारा बहुमूल्य गुण नहीं प्रकट हो रहा है। किसी विशाल वृक्षकी कन्दराके भीतर जीर्ण-शीर्ण पत्तोंसे ढके हुए खोखलेमें चुपचाप बैठे रहो। यह कर्ण-कटु काँव-काँवकी रट लगानेवाले कौओंसे भरा हुआ शिशिरका
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ * ६३१
समय है। सखे ! इस समय यह वसन्तका उत्सव नहीं है।
यह कोयलका बच्चा अपनी माता काकीको छोड़कर जो चला गया, यह एक आश्चर्यकी बात है। फिर यह काकी माँ, जो इस बच्चेको चोंच और पंजोंसे मार रही है, यह दूसरा आश्चर्य है। मै इन बातोंपर क्षणभर ज्यों ही सोच-विचार करने लगा, त्यों ही यह कोयलका बच्चा भी अपनी माँके समान बढ़नेके लिये उत्साहसे सम्पन्न हो गया। यह तीसरा आश्चर्य दृष्टिगोचर हुआ। वास्तवमें स्वभाव-सुभग भाग्यशाली पुरुष जिस दिशामें आता है, वही उसके लिये माहात्म्यदायिनी बन जाती है।
(सर्ग ११४-११६)
सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ
विपश्चित्के सहचरोंने कहा—राजन् ! देखिये, यहाँ सामने पर्वतके शिखरपर जो सुन्दर सरोवर है, उसमें कह्लार, कमल और उत्पलोंकी नालके लिये छलकते हुए विचित्र कलरव करनेवाले हंस आदि पक्षी सब ओर फैले हुए हैं। इससे वह सरोवर ऐसा जान पड़ता है, मानो नक्षत्रोंसहित आकाश ही उसमें प्रतिबिम्बित हो रहा है। यह सरोवर इस पृथ्वीपर कमलासन ब्रह्माजीका गृह-सा जान पड़ता है। इसमें जो सहस्रदल-कमल खिले हुए हैं, उनकी नालें बहुत ऊपरतक उठी हुई हैं और उनके कोशस्थलोंमें सुन्दर शोभाका भार लिये राजहंस बैठे हुए हैं (ब्रह्मलोकमें भी यही विशेषता है)। इसके सिवा ब्रह्माजीके भवनमें भ्रमरोंके समान काली इन्द्रनीलमणिकी चौकीपर ब्राह्मणलोग विराजमान होते हैं। इस सरोवरमें काले-काले भौंरे ही इन्द्रनीलमणिकी चौकी हैं। उनसे संयुक्त फूलोंपर बैठे हुए पक्षियोंके समूह ही ब्राह्मण-वृन्दका स्थान ग्रहण किये हुए हैं।
पवित्र-हृदयके समान निर्मल कमलोंसे भरा हुआ और हृदयको अत्यन्त आह्लाद प्रदान करनेवाला यह स्वादिष्ट' जलसे परिपूर्ण सरोवर सत्संगके समान सुशोभित होता है। सत्संग भी हृदयारविन्दको पवित्र करनेवाला, मनको आनन्द देनेवाला, अत्यन्त सरस और मधुर होता है। हेमन्तऋतुमें सरस सारसोंसे युक्त यह सरोवर कुहासेसे ढक जानेके कारण कुछ-कुछ दिखायी देता है। बर्फसे ढके रहनेके कारण इसकी श्यामता दूर हो गयी है। यह सफेद-सा दीखने लगा है। अतएव बर्फके बादल-सा जान पड़ता है। इसके जलविन्दुओंको छूकर बहनेवाली वायु बड़ी कठोर जान पड़ती है।
राजन् ! जैसे यह दृश्यजगत् ब्रह्मसे भिन्न नहीं है—विकार आदिसे रहित ब्रह्मरूप ही है, तथापि ब्रह्मसे पृथक्-सा प्रतीत होता है, उसी तरह इस जलमें जो तरङ्ग आदि हैं, वे जलसे भिन्न नहीं हैं तो भी उससे पृथक्-से स्थित हैं। हाय ! अपने ही जलसे बहाये जाकर चक्राकार भँवर प्रकट करनेवाले इन जलाशयोंकी एकके बाद दूसरीके क्रमसे उठनेवाली तरङ्ग-परम्परा बडी विषम है। (इसका दूसरा अर्थ यों समझना चाहिये—) जिनका अन्तःकरण जड या मूढ़ है, वे अपने ही अज्ञानसे संसारके प्रवाहमें बहते हैं और अपने लिये शुभाशुभ कर्मोंके चक्रका निर्माण करते हैं। उनके मनोरथरूपी तरङ्गोंकी परम्परा संकटमें डालनेवाली होती है।
जलमें उत्पन्न होनेवाले कमल, उत्पल आदिके संसर्गसे जीर्ण हुए इस सरोवरकी उपमा विविध जड योनियोंके सम्बन्धसे जर्जर हुए देहधारी जीवके मनसे दी जाती है। सरोवरमें कमल आदिकी तथा मनमें भिन्न-भिन्न योनियोंके शरीरोंकी जर्जर-दशापर्यन्त जो तरङ्गैं (विषय-भोगोंकी अभिलाषाएँ) उठती हैं, उनके वेगसे व्याप्त इच्छा-द्वेष आदि वृत्तियोंके परिवर्तनोंकी भाँति जो असंख्य कमल प्रकट होते हैं, उन्हें कौन गिन सकता है ?
६३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अहो ! जड अथवा जलके संगमका कैसा विचित्र प्रभाव है कि मुकुलावस्थामें कमल भी अपने सौन्दर्य, सौगन्ध्य और माधुर्यादि गुणोंको दोषोंकी तरह गलेके भीतर छिपाये रखता है तथा कुरूप काँटोंको सबके सामने प्रकट करके दिखाता है (यह कुसंगतिका फल है)। जो गुण कमलके तन्तुओंकी भाँति छिद्रयुक्त (सदोष), कमजोर, सूक्ष्म, छिपाये हुए, जडतासे संयुक्त और अधिक होनेपर भी सारहीन हों, उनसे कोई लाभ नहीं है।
भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें विराजमान, सौन्दर्य-माधुर्यकी देवी भगवती लक्ष्मी भी शोभाके लिये ही हाथमें कमल धारण करती हैं; कमलकी इससे बढ़कर प्रशंसा और क्या हो सकती है ?
जो भ्रमर कमलोंके मधुर मकरन्दके मद और आमोद-से मतवाले हो उन्हीं कमलोंपर गुञ्जारव करते हैं, वे अन्य फूलोंके रसास्वादनसे संतुष्ट हुए दूसरे भौरोंका मानो उपहास करते हैं।
अरे भ्रमर ! तू नाना प्रकारके फूलोंके रसका आस्वादन करता हुआ समस्त पर्वतोंके लताकुञ्जोंमें जो प्रतिदिन चक्कर लगाता रहता है, उससे आजतक संतुष्ट क्यों नहीं हो रहा है ? जान पड़ता है तेरा हृदय शुद्ध नहीं, दूषित है। मालूम होता है अबतक तुझे वनोंसे सारतत्त्व नहीं प्राप्त हुआ (तभी तो तुझमें असंतोष बना रहता है)।
मधुप ! तू कमलकुलके मकरन्दका आस्वादन करनेमें प्रवीण है; अतः कमलोंसे भरे हुए सरोवरमें ही चला जा। मकरन्दसे पुष्ट हुए अपने इस शरीरको बेरोंकी झाड़ियोंमें इनके कण्टकरूपी आरोंसे विदीर्ण न कर।
हंस ! तुम जलकाक, बगुले और कौए आदि हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए इस तालाबमें सदा अकेले न रहा करो। आपत्तिकालमें भी समान शील, अवस्था और भाषावाले स्वजनवर्गके साथ रहना ही अच्छा फल देने-वाला होता है। (सर्ग ११७)
बगुले, जलकाक, मोर और चातकसे सम्बन्ध रखनेवाली अन्योक्तियाँ
अब राजाके सहचर-सहचरियोंने कहा—राजन् ! देखिये, बगुला प्रायः गुणहीन होता है, तो भी इसमें एक गुण अवश्य है, यह 'प्रावृट्-प्रावृट्' कहकर सदा वर्षाकालका स्मरण दिलाता है।
ओ बगुले ! तालाबमें बैठनेपर तू अपनी सफेद पाँखों-से हंस-सा ही जान पड़ता है, परंतु मेरी एक सलाह मान ले—जलकाकोंके साथ मैत्री, प्राणिवधकी क्रूरता और कर्णकटु वाणी—इन दोषोंको त्यागकर तू स्पष्ट रूपसे हंस बन जा। (तू अपनेमें रूप-रंगके साथ गुण भी हंसोंके ही संचित कर।)
'इस तरह स्वार्थके लिये लोगोंका गला घोंटा जाता है' इस बातको अपने व्यवहारसे दिखाता हुआ मद्गु (जलकाक) मेरा गुरु बन गया है—ऐसा कहकर दुष्ट लोग उसकी प्रशंसा करते हैं।
गर्दन ऊँची किये और सुन्दर सफेद पंख फैलाये बगुलेको आकाशमें उड़ता देख लोगोंने जाना कि यहाँ हंस ही आ गया, किंतु जब वह तलैयामें उतरकर कीचड़-भरे जलसे मछली पकड़ने लगा तो सब लोगोंको निश्चय हो गया कि यह बगुला ही है।
जो बहुत समयतक अपनी अत्यन्त चपलताका परिचय दे चुके थे, वे ही बगुले जब मछलियोंको पकड़नेके लिये तपस्याका ढोंग रचने लगे—तपस्वीकी तरह ध्यान लगाकर बैठे; तब वहाँ इसी स्वभाववाले धूर्तोंको अन्धकारकी प्रतीक्षामें ध्यान लगाकर बैठा देख तटपर खड़ी हुई एक चतुर नारीको बड़ा विस्मय हुआ।
बगुला, जलकाक और अन्यान्य हिंसक जलजन्तु सदा एक ही स्थानमें रहते हैं तो भी मूर्ख और विद्वानोंकी बुद्धिके समान इनकी बुद्धिका एक-दूसरेसे मेल नहीं है।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * वायु, ताड़, पलाश, कनेर, कल्पवृक्ष, वनस्थली और चम्पकवनका वर्णन * ६३३
वह देखिये, खञ्जनकी चोंचमें पड़ा हुआ कीट किट-किटा रहा है। यह उसके पूर्वसंचित पाप या दुर्भाग्यकी पताका है, जो ऊँचे स्थानमें फहरा रही है।
मोरका हृदय ऊँचा और उदार होता है। वह जब इन्द्रसे जलकी याचना करता है, तब इन्द्र उसके उसी गुणसे संतुष्ट होकर वर्षाद्वारा सारी पृथ्वीको जलसे भर देते हैं।
ये मोर स्तन पीनेवाले बच्चोंकी तरह मेघोंका अनुसरण करते हैं। इससे यह अनुमान होता है कि मलिनका पुत्र मलिन ही होता है।
सत्पुरुषोंके हृदयकी भाँति निर्मल महान् सरोवरको छोड़कर मोर मेघका थूका हुआ पानी क्यों पीता है? मेरी समझमें इसका एक ही कारण है, स्वाभिमानी मयूर किसीके सामने सिर झुकाना नहीं चाहता। मेघका पानी पीते समय उसका सिर ऊँचा रहेगा; किंतु सरोवरका जल पीते समय उसके सामने नतमस्तक होनेका भय है।
राजन् ! देखिये, जिनके पङ्खरूपी मेघ सुशोभित हो रहे हैं तथा जो अपने पङ्खोंके कान्तिमान् चन्द्रचिह्नोंको कम्पित कर रहे हैं, वे मोर वर्षा ऋतुके बच्चोंकी भाँति नाच रहे हैं।
चकित चातक ! तुम गरममें वनप्रान्तके भीतर सूखे वृक्षके खोखलेमें रहनेका जो आग्रह दिखा रहे हो, इससे तुम्हारा अत्यन्त अभिमान सूचित हो रहा है। यह अभिमान दावानलमें जल जानेकी सम्भावनासे दूषित है, अतः तुम्हारे लिये सुखद नहीं हो सकता। भैया ! मेरी सलाह मानो तो कदली-वनके निकटवर्ती शीतल हरित तिनकोंको चरो, नहरोंके पानी पीओ और कदली वनमें विश्राम करो। (मेघसे बरसते हुए जलके सिवा दूसरे किसी जलको नहीं पीऊँगा, इस दुराग्रहको छोड़ दो।)
ओ मयूर ! यह समुद्रकी जलराशिसे भरे हुए पेटवाला और आकाशमें ऊपर उठनेकी इच्छावाला जलधर (मेघ) नहीं है। दावानलसे जले हुए वनवृक्षोंके खोखलेके अग्रभागसे प्रकट होनेवाली धूममालाका मण्डल है, जो इस पर्वतसे अभी-अभी ऊपरको उठा है।
(सर्ग ११८-११९)
वायु, ताड़, पलाश, कनेर, कल्पवृक्ष, वनस्थली और चम्पकवनका वर्णन करते हुए सहचरोंका महाराजसे राजाओंकी भेंट स्वीकार करके उन्हें विभिन्न मण्डलोंकी शासन-व्यवस्था सौंपनेके लिये अनुरोध करना तथा विपश्चितोंका अग्निसे वरदान प्राप्त करके दृश्यकी अन्तिम सीमा देखनेके लिये उद्यत होना
सहचर कहते हैं—राजन् ! यहाँ पुष्प-परागोंसे विभूषित नाना प्रकारकी वायु बह रही है, जो केलेकी कलियोंके स्वच्छ गुच्छको विकसित करनेमें विशेष निपुण हैं।
यह ताड़का पेड़ खम्भेकी तरह सीधा खड़ा है; अतः इसपर किसीका चढ़ना कठिन है। इसीलिये यह किसी याचकको किंचिन्मात्र भी न तो फल देता है और न पत्ता ही। इसकी यह ऊँची आकृति भी याचकोंकी अभिलाषाको पूर्ण न कर सकनेके कारण रूपहीन ही है—शोभा नहीं पाती है।
राजन् ! जो गुणहीन जड़ (वृक्ष अथवा उदारता आदि गुणोंसे रहित मूर्ख) हैं, उनके लिये राग (शृङ्गार) ही शोभावर्द्धक होता है। वह फूला हुआ पलाशका पेड़ राग—फूलोंके शृङ्गारसे ही वनमें राजाकी भाँति सुशोभित होता है।
भैया ! आओ, मैंने कुछ और ही समझा था; परंतु यह कनेर है, विकारका ही भाजन है। इसे देख मनमें यह सोचकर विषाद होता है कि कहाँ-से-कहाँ मैं इसके पास आ गया। इसमें सुगन्ध तो नाममात्रको नहीं है। गुणहीन जन्तुकी भाँति इसका अनुसरण करनेसे क्या लाभ होगा ?
६३४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पृथ्वीनाथ ! देखिये, कल्पवृक्षोंके वनकी शीतल छायामें विश्राम करते हुए ये सिद्ध और विद्याधररूप पथिक वीणा आदि वाद्योंके साथ गीत गा रहे हैं। देखिये न, वनमें इस कल्पवृक्षके एक-एक पत्तेपर देव-सुन्दरियाँ विश्राम करती, गाती और हँसती हैं !
उदार बुद्धिवाले ! ये सिद्ध, विद्याधर आदि नन्दनवनमें भी वैसा आनन्द नहीं पाते हैं, जैसा कि इन शुद्ध, शान्त, नीरव वनस्थलियोंमें पाते हैं। ये रमणीय और निर्जन वनस्थलियाँ मुनिके विरागी चित्तको और विषयीके रागी हृदयको समानरूपसे आनन्द प्रदान करती हैं।
देखिये, खिले हुए चम्पाके वन जब हवासे हिलते हैं, तब जलते हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते हैं । उस अवस्थामें वहाँसे दूर मँडराते हुए भ्रमर और छाये हुए मेघ धूममालाके समान प्रतीत होते हैं।
महाराज ! देखिये, क्षार समुद्रके तटका यह भूभाग उपहार हाथमें लेकर आये हुए राजाओंसे भर गया है और उन सबका कोलाहल यहाँ व्याप्त हो गया है, जो बड़ा भला मालूम होता है।
देव ! पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तरके क्षार सागरतक इस जम्बूद्वीपमें जो नरेश इस भयंकर युद्धसे जीवित बच गये हैं, उन सबके मस्तकपर अपने चरण रखनेका अनुग्रह कीजिये तथा भिन्न-भिन्न जनपदोंके भूभागकी प्रत्येक दिशामें चिरकालिक रक्षाके लिये नीतिशास्त्रके अनुसार क्षमापूर्वक योग्य व्यक्तियोंको शान्त चित्तसे शासन-व्यवस्थाका अधिकार दीजिये। तत्पश्चात् अस्त्र-शस्त्र और अनुपम सेनाओंका बँटवारा कर दीजिये।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उन चारों विपश्चितोंने समुद्रतटकी भूमिपर बैठकर राज्यका यह सारा प्रयोजन (मण्डलकी सीमा बाँधने आदिका कार्य) सिद्ध किया। इतनेमें ही मेघमालाके समान काली रात आयी और सब ओर फैल गयी। तत्पश्चात् वे सभी विपश्चित् जो दिनका कार्य पूरा कर चुके थे, सोनेके लिये अपनी शय्याओंपर आरूढ़ हुए। वे नदियोंके प्रवाहकी भाँति बहुत दूर समुद्रतक चले आये थे। इसलिये मन-ही-मन आश्चर्यसे चकित हो इस प्रकार विचार करने लगे—'यह सब ओर फैली हुई दृश्य-जगत्की शोभा कितनी विस्तृत होगी ? इस जम्बूद्वीपके बाद खारे पानीका समुद्र है। उसके बाद प्लक्षद्वीपकी भूमि है। तत्पश्चात् क्षार समुद्रसे दुगुना बड़ा इक्षुरसका समुद्र है। उसके बाद कुशद्वीप है। तदनन्तर सुराका सागर है। इसी प्रकार क्रमसे सात समुद्र और सात द्वीपोंके बाद अन्तमें क्या होगा ? फिर उसके बाद भी क्या होगा ? यह दृश्यरूपिणी माया न जाने कितनी बड़ी और कैसी होगी ? इसलिये हमलोग भगवान् अग्निदेवसे प्रार्थना करें। उनके वरदानसे हम अनायास ही इन सम्पूर्ण दिशाओंका अन्तिम सीमातक अवलोकन कर सकेंगे।' ऐसा सोचकर यथास्थान बैठे हुए वे सब विपश्चित् एक साथ ही भगवान् अग्निका आवाहन करने लगे। तब भगवान् अग्निदेव इन चारोंके समक्ष साकार होकर प्रकट हुए और बोले—'पुत्र ! मुझसे वर माँगो।'
विपश्चित् बोले-देव ! सुरेश्वर ! हम इस पञ्चभूतात्मक दृश्यजगत्का अन्त देखना चाहते हैं, जहाँतक इस देहसे जाना सम्भव हो सके, वहाँतक इस देहसे, जहाँ यह न जा सके वहाँ मन्त्रके प्रभावसे संस्कारयुक्त किये गये इसी शरीरसे, तथा जहाँ इस संस्कारयुक्त शरीरकी भी गति न हो सके, वहाँ मनसे जाकर हम दृश्य जगत्का अन्त देखें। जो जिस रूपमें मनसे प्रत्यक्ष होनेयोग्य तथा जाननेयोग्य हो उन सभी पञ्चभूतात्मक पदार्थोंका हम दर्शन कर सकें—यह उत्तम वर आप हमें दें। प्रभो ! सिद्ध योगी अपने योगके प्रभावसे जहाँतक जा सकते हों, वहाँतकका मार्ग हम इसी शरीरसे तै करें। जहाँ योगियोंकी भी पहुँच न हो, उस अगम्य दृश्यको हम मनसे ही देखें। सिद्ध योगियोंके गम्य मार्गपर चलते समय हमारी मृत्यु न
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश * ६३५
हो तथा जिस मार्गमें देहका रहना सम्भव ही न हो, वहाँ हमारा मन ही यात्रा करे।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उनके इस प्रकार वर माँगनेपर 'ऐसा ही होगा' यों कहकर अग्निदेव सहसा एक ही क्षणमें अदृश्य हो गये, मानो बडवानलरूपसे समुद्रमें जानेके लिये उन्हें जल्दी लगी रही हो। इस तरह वर देकर अग्निदेव चले गये। तत्पश्चात् रात्रि आयी और कुछ देर ठहरकर वह भी चली गयी। इसके बाद सूर्यदेव आये। साथ ही उन विपश्चितोंके हृदयमें विशाल समुद्रको लाँघनेकी इच्छा भी आयी। (सर्ग १२०-१२१)
चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश और प्रत्येक दिशामें उनकी पृथक्-पृथक् यात्राका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तत्पश्चात् प्रातः-काल मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंके मना करनेपर भी वे चारों विपश्चित् हठपूर्वक नीतिशास्त्रके अनुसार पृथ्वीके राज्यविभाग और उनके शासनकी भलीभाँति पूरी व्यवस्था करके दिगन्तके दर्शनकी अतिशय उत्कण्ठासे भर गये, मानो उनके शरीर-पर किसी ग्रहका आवेश हो गया हो। उस समय उनका सारा परिवार रोते हुए मुखसे करुणाजनक क्रन्दन कर रहा था। उन चारोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और स्वयं आसक्ति-शून्य होनेके कारण अभिमान, ईर्ष्या, लोभ, शत्रुओंके पराभवकी इच्छा, राज्य, स्त्री एवं पुत्र आदिको त्यागकर वे यह कहते हुए चल दिये कि 'हमलोग समुद्रके पार जा दिगन्तका दर्शन करके अभी क्षणमें लौटे आ रहे हैं।'
अग्निदेवकी प्रसन्नतासे प्राप्त मन्त्रकी शक्तिसे पाँचों भूतोंपर विजय प्राप्त करके वे उत्तम सिद्ध हो गये थे। अतः उस समय उन्होंने पैदल ही समुद्रमें प्रवेश किया। वे चारों विपश्चित् प्रत्येक दिशामें समुद्रके भीतर प्रविष्ट होकर स्थलकी ही भाँति जलमें भी पैरोंसे ही चलने लगे। जलके भीतर भूपृष्ठकी भाँति तरङ्गसमूहों-पर पैर रखकर अकेले-ही-अकेले जानेको उद्यत वे चारों विपश्चित् अपनी सेनासे बहुत दूर निकल गये। वे एक-एक पग चलकर जब महासागरके भीतर प्रवेश करने लगे, तब तटपर खड़े हुए उनके सम्बन्धी उन्हें तबतक देखते रहे, जबतक कि वे शरत्कालके आकाशमें प्रविष्ट हुए मेघ-खण्डोंके समान अदृश्य नहीं हो गये। यद्यपि उन्हें चञ्चल गजराजोंके समान उठी हुई तरङ्गमालाओंसे टकराना पड़ता था, तथापि वे तटपर बने हुए पथरीले परकोटोंके समान अपना धैर्य नहीं छोड़ते थे। वे चारों विपश्चित् समुद्रकी जलराशिमें आगे बढ़ने लगे। जलके मगर उनके सहचर (साथी) थे। वे शौर्यसम्पन्न नाकों और केकड़ोंसे व्याप्त भँवरोंमें चारों ओरसे घिर जाते थे। बीचमें जानेपर बहु-संख्यक मेघोंके समान रूपवाली और व्यक्ताव्यक्त किरण-राशिसे सुशोभित होनेवाली भ्रान्त मुक्तामणयों तथा वृक्षों-की लताके समान दीखनेवाली जलमय तरङ्गोंके जलकण-रूपी फूलोंद्वारा वे पग-पगपर अपने शरीरको विभूषित एवं सुशोभित करते जा रहे थे।
उन चारों विपश्चितोंमेंसे जो पश्चिम दिशाका अन्त देखनेके लिये प्रस्थित हुआ था, वह अपनेको अमर मानने-वाले एक मत्स्यके द्वारा निगल लिया गया । वह मत्स्य मत्स्यावतारधारी भगवान् विष्णुके कुलमें उत्पन्न हुआ था और उसका वेग झेलमकी प्रखर धारमें बहनेवाली नौकाके समान तीव्र था। किंतु उस मत्स्यके लिये उस राजाको पचाना बड़ा कठिन काम था। इसलिये क्षीरसागरमें पहुँचकर उसने उसे उगल दिया; तब वह क्षीरसागरको लाँघकर दूर दिगन्तमें चला गया।
दक्षिण दिशाका अन्त देखनेके लिये चला हुआ विपश्चित् जब इक्षुरसके समुद्रमें पहुँचा, तब उसके तटवर्ती यक्षनगरमें निवास करनेवाली एक यक्षिणीने, जो वशीकरण विद्यामें अत्यन्त निपुण थी, उसे देखा। देखकर अपने विद्याके बलसे आकृष्ट करके उसे अपना प्रेमी बना लिया।
सं० यो० व० अं० २२—
६३६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पूर्व दिशाकी चरम सीमा देखनेके लिये आगे बढ़ा हुआ विपश्चित् जब गङ्गाजीके मुहानेपर पहुँचा, तब उसने एक मगरपर आक्रमण किया, जो उसे निगल जानेके लिये उद्यत था। उसने उस मगरको गङ्गामें खींचकर चीर डाला, तब गङ्गाने विपश्चित्को पीछे लौटाकर कान्यकुब्ज नगरमें छोड़ दिया।
उत्तर दिशाका अन्त देखनेके लिये चले हुए विपश्चित्ने उत्तर कुरुदेशमें श्रीउमा-महेश्वरकी आराधना करके अणिमा आदि सिद्धियोंको प्राप्त कर लिया। उस सिद्धिके कारण दिगन्तमें मरणका भय उसे बाधा नहीं पहुँचाता था। मार्गमें कितने ही मगर और जलहस्ती उसे निगलते और उगलते गये, किंतु उस सिद्धिके प्रभावसे ही उसके शरीरको कोई क्षति नहीं पहुँची। वह बहुतसे द्वीप-द्वीपान्तरों और कुलपर्वतोंको लांघता हुआ आगे बढ़ गया।
पश्चिम दिशामें गये हुए विपश्चित्को जिसकी अङ्ग-कान्ति कुशके ही समान थी, कुशद्वीपमें पक्षिराज गरुड़ने अपनी पीठपर बिठा लिया और बड़े वेगसे अनेक समुद्रोंके पार पहुँचा दिया।
पूर्व दिशावाला विपश्चित् कान्यकुब्ज देशसे चलकर जब क्रौञ्चद्वीपके एक पर्वतपर गया, तब वहाँ वनके भीतर रहनेवाला कोई राक्षस उसे निगल गया। परंतु उस राजाने राक्षसकी अँतड़ियोंको काटकर उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया।
दक्षिण दिशाकी ओर गया हुआ विपश्चित् दक्षके शापसे क्षणभरमें यक्ष हो गया। फिर सौ वर्षोंके बाद शाकद्वीपमें उसे उस शापसे छुटकारा मिला।
उत्तर दिशाका यात्री विपश्चित् छोटे-बड़े नदी-नाले और समुद्रोंको बड़े वेगसे लांघता हुआ स्वादिष्ठ जलवाले महासागरके उस पार सुप्रसिद्ध सुवर्णमयी भूमिमें जा पहुँचा, किंतु वहाँ एक सिद्धके शापसे शिला हो गया। तदनन्तर सौ वर्षके बाद अग्निदेवके अनुग्रहसे उस सिद्धने विपश्चित्को शापसे मुक्त कर दिया। इससे वह बहुत प्रसन्न हुआ।
पूर्वका यात्री विपश्चित् आठ वर्षोंतक नारियलके वृक्षोंसे भरे हुए एक देशके निवासियोंका राजा होकर रहा। वह बड़ा धर्मात्मा था। इसलिये उसे वहाँ अपने पूर्व-जन्मकी स्मृति हो आयी। वह नारियलके फलोंसे जीवन-निर्वाह करने लगा। मेरु पर्वतके उत्तर एक कल्पवृक्षका वन था, जिसमें एक अप्सराके साथ उसने दस वर्षोंतक निवास किया।
पश्चिम जानेवाला विपश्चित् पक्षियोंपर विश्वास जमाने—उन्हें वशमें कर लेनेकी विद्याका मर्मज्ञ था (अतएव पहले गरुड़ने उसे पीठपर बिठाकर समुद्रके पार पहुँचा दिया था)। फिर वह शाल्मलीद्वीपके सुविख्यात सेमलके वृक्षपर एक मादा पक्षीके घोंसलेमें उसके साथ क्रीड़ा करता हुआ कई वर्षोंतक रहा। फिर कोमल लता-वल्रियोंसे अलंकृत मन्दराचलपर मन्दार वृक्षोंके निकुञ्ज-भवनमें मन्दरी नामवाली एक किन्नरीने विपश्चित्की एक दिन सेवा की।
तत्पश्चात् पूर्व दिशाके विपश्चित्ने क्षीरसागर-तटवर्ती वनके भीतर कल्पवृक्षोंकी वनश्रेणियोंमें नन्दनवनकी देवियों-अप्सराओंके साथ कामासक्त होकर सत्तर वर्ष व्यतीत किये।
(सर्ग १२२-१२३)
विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जब वे सभी विपश्चित् एक चैतन्यमय थे और उन सबका शरीर भी एक ही था, तब शरीर एक होते हुए उनकी इच्छाएँ विभिन्न कैसे हो गयीं !
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन * ६३७
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! जैसे स्वप्नावस्थामें चित्त स्वयं अपनेमें ही स्वप्न-दृष्ट पदार्थोंके रूपमें नाना प्रकारका हो जाता है, उसी तरह एक चैतन्य घनाकाश सर्वव्यापी अखण्ड होते हुए भी मायावश भिन्न-सा बन जाता है । इसलिये जिस विपश्चित्के समक्ष जो वस्तु आयी, वह उसीमे तन्मयताको प्राप्त होकर उसीके वशमें हो गया । एक देशमें स्थित रहते हुए भी योगी सर्वत्र व्याप्त होकर तीनों कालोंमें सब काम करते और सब पदार्थोंका अनुभव करते हैं। दसों दिशाओंमें स्थित वे विपश्चित् यद्यपि वास्तवमें एक चैतन्यमय थे, तथापि उन्होंने अज्ञानवश वैसा ही व्यवहार किया, जिससे उन्हें सुख-दुःख आदिकी प्राप्ति हुई । जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने भूमिपर शयन किया, द्वीप-द्वीपान्तरोंमें सुख-दुःखका उपभोग किया, वन-श्रेणियोंमें विहार किया, मनुष्यलोकी यात्रा की, पर्वतनात्राओंमें निवास किया, सागर-कुक्षियोंमें भ्रमण किया, अनेक द्वीपोंमें विश्राम किया, मेघमालाओंसे आच्छादित पर्वत-शिखरोंपर गुप्तरूपसे वास किया, सागरमालाओंमें जन्म धारण किया तथा ओषधियोंमें, जलतरङ्गोंमें, पर्वतों और समुद्रोंके तटोंपर एव नगरोंमें विविध क्रीड एँ कीं ।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! एक देशमें स्थित रहते हुए भी योगीलोग चारों ओर व्याप्त होकर तीनों कालोंमें सम्पूर्ण कार्य कैसे करते हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! इस जगत्में अज्ञानियोंकी दृष्टिमें जो स्थूल वस्तु है, उससे हम ज्ञानियोंका कोई प्रयोजन नहीं है; किंतु ज्ञानियोंकी दृष्टिसे जो चिन्मात्र वस्तु है, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो । तत्त्वज्ञोंकी दृष्टिसे चिन्मात्र सत्तासामान्यके अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु है ही नही । दृश्यके अत्यन्ताभावका ज्ञान होनेपर सृष्टि और प्रलयकी दृष्टिका विनाश होनेके पश्चात् चिन्मात्र सत्तासामान्यमें निरन्तर विश्रामको प्राप्त हुए सर्वेश्वरका यहाँ सर्वदा सर्वत्व और सर्वात्मत्व ही वर्तमान है । ऐसी दशामें भला बताओ तो सही, कौन कैसे कहाँ कब और क्योंकर उसका निरोध कर सकता है ? वह सर्वव्यापी सर्वात्मा जब जहाँ जिस रूपमें प्रकट होना चाहता है, तब वहाँ उसी रूपमें प्रकट हो जाता है; क्योंकि उस सर्वात्मामें कौन-सी वस्तु नहीं है ? तुम ऐसा समझो कि अतीत, वर्तमान और भविष्य, स्थूल-सूक्ष्म, दूर निकट तथा निमेष और कल्प आदि जितनी वस्तुएँ हैं, वे सब की सब अपने स्वरूपका त्याग किये बिना ही सत्तासामान्य-स्वरूप सर्वात्मामें सर्वदा ही वर्तमान हैं । किंतु वास्तवमें मायासे उल्लासको प्राप्त हुआ यह दृश्य-प्रपञ्च न उत्पन्न हुआ है और न निरुद्ध हुआ है; बल्कि ज्यों-का-त्यों स्थित है ।
महाबाहु श्रीराम ! वे विपश्चित् पूर्णतया प्रबुद्ध नही थे, बल्कि बोधदृष्टि तथा अबोध-दृष्टिके मध्यमें वे दोलायमान-से स्थित थे । उन अर्धबुद्ध विपश्चितोंमें चारों ओरसे नित्य मोक्ष तथा बन्धनके लक्षण दृष्टिगोचर होते थे । उस पूर्वोक्त संशयग्रस्त धारणासे युक्त होनेके कारण वे विपश्चित् परब्रह्म-प्राप्त योगी न थे, किंतु धारणासे प्राप्त हुए सिद्धिवाले धारणा-योगी थे । राजीवनोचन राम ! जिन्हें परम ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है तथा जिनमें अविद्याका लेशमात्र भी नहीं है, वे विपश्चित् यदि ऐसे ज्ञानयोगी होते तो क्या वे अविद्याकी ओर दृष्टिपात करते ? वे तो अग्निदेवके वरदानसे सिद्धिप्राप्त धारणा-योगी थे । उनमें अविद्या वर्तमान थी, इसी कारण वे आत्मविचारहीन थे । जीवन्मुक्तोंका भी शरीर देहधर्मसे युक्त रहता है; किंतु उस शरीरके भीतर जो उनका चित्त है वह अचल ही रहता है अर्थात् उसमें देहधर्म नहीं व्याप्त होते । अतः जीवन्मुक्त पुरुषके शरीरको चाहे टुकड़े-टुकड़े करके काट डाला जाय अथवा उसे राजसिंहासनपर बैठाया जाय—इस प्रकारकी रोने और हँसनेकी दोनों अवस्थाओंमें उसे न तो कुछ दुःखका अनुभव होता है और न सुखका ही ।
६३८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जीवन्मुक्त पुरुषोंका शरीर आदि आत्मस्वभावसे कभी पृथक् नहीं है। इसीलिये जीवन्मुक्त पुरुष मरा हुआ भी मरता नहीं, रोता हुआ भी रोता नहीं और हँसता हुआ भी हँसता नहीं अर्थात् वह मरणादि अवस्थाओंमें हर्ष-शोकसे युक्त नहीं होता। तथापि व्यवहारकालमें अज्ञानी और ज्ञानी जीवन्मुक्तके आचरण प्रायः एक-से ही होते हैं। प्रह्लाद, बलि, वृत्र आदि यद्यपि वीतराग जीवन्मुक्त ही थे पर उनके व्यवहार रागियोंके-से होते थे। हाँ, बन्धन तथा मोक्षका कारण तो वासना और वासनाशून्यता ही है।
(सर्ग १२४-१२५)
मरे हुए विपश्चितोंके संसारभ्रमणका तथा उत्तरदिशागामी विपश्चित्के भ्रमणका विशेषरूपसे वर्णन
श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! तदनन्तर वे विपश्चित् उन दिगन्तोंमें तथा द्वीपों, सागरों, काननों और पर्वत-भूमियोंमें जाकर क्या करते हुए निवास करते रहे ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! उनमेंसे एक विपश्चित् क्रौञ्चद्वीपके सीमा-भूत पर्वतके पश्चिमी तटपर एक हाथीद्वारा दाँतों एवं गण्डस्थलोंसे उस पर्वतकी शिलापर कमलकी तरह पीस डाला गया। दूसरे विपश्चित्को, जिसका शरीर क्षत-विक्षत हो गया था, एक राक्षसने आकाशमार्गसे ले जाकर समुद्रवर्ती वडवानलमें झोंक दिया, जिससे वह वहीं जलकर भस्म हो गया। तीसरेको एक विद्याधर इन्द्र-सभामें ले गया। वहाँ उसने इन्द्रको प्रणाम नहीं किया, जिससे इन्द्रने कुपित होकर उसे शाप दे दिया। उस शापसे वह जलकर भस्म हो गया। चौथा कुशद्वीपकी सीमापर स्थित पर्वतकी तलहटीमें बहनेवाली नदीके कछारमें बड़ी सावधानीसे जा रहा था, परंतु किसी महाबली मगरने उसके आठ टुकड़े कर दिये, जिससे वह मर गया। इस प्रकार वे चारों भूपाल (विपश्चित् ) दिगन्तोंमें जाकर मृत्युको प्राप्त हो गये। मृत्युके पश्चात् उन विपश्चितोंकी संवित्ने पूर्व-संस्कारवश आकाशात्मा बनकर आकाशमें ही पृथ्वीमण्डलको देखा फिर दृश्य और दर्शनके मध्यमें, भूमण्डलका अनुभव ही जिसकी आकृति है, उस अविद्याकी निष्ठा—इयत्ताको देखनेके लिये वे द्वीप-द्वीपान्तरोंमें भटकते रहे।
राघव ! उनमें जो विपश्चित् पश्चिम दिशाकी ओर चला था, वह सातों द्वीपों तथा सातों महासागरोंको लाँघकर घनभूमि (पूर्वोक्त स्वर्णमयी भूमि) में जा पहुँचा। वहाँ उसे भगवान् जनार्दनके दर्शन हुए। फिर उन्हीं भगवान्से अनुपम ज्ञान (ब्रह्मविद्या) प्राप्त करके वह उसी स्थानमें पाँच वर्षतक समाधिस्थ हुआ बैठा रहा। तदनन्तर वह देहका परित्याग करके निर्वाणको प्राप्त हो गया। पूर्व दिशामें गया हुआ विपश्चित् पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके निकट अपने शरीरको स्थापित करके उसमें चन्द्रत्वकी भावना करता रहा। चिरकालके बाद जब उसका पूर्वशरीर नष्ट हो गया, तब वह चन्द्रलोकमें स्थित हो गया। राजकुमार राम ! दक्षिण दिशागामी विपश्चित् शाल्मलीद्वीपमें जाकर अपने शत्रुओंकी जड़ उखाड़ करके आज भी वहाँ राज्य कर रहा है। और उत्तर दिशाको प्रस्थान करनेवाला विपश्चित् सप्तमाम्बुधि—स्वादूदक-सागरमें जा पहुँचा, जिसमें चञ्चल एवं विशाल तरङ्गें किलोल कर रही थीं। वहाँ उसने एक मगरके पेटमें एक हजार वर्षतक निवास किया। उस समय वह उसी मगरके पेटका मांस खाकर जीवन-निर्वाह करता था। इस प्रकार जब वह मगरराज मर गया, तब वह उसके पेटसे निकलकर दूसरे मगरकी तरह समुद्रसे बाहर आया। तदनन्तर हिमके समान स्वच्छ जलसे भरे हुए उस सागरकी अस्सी हजार योजनकी विस्तारवाली घनी भूमिको लाँघकर वह दस हजार योजनके विस्तारवाले एक विशाल मैदानमें जा पहुँचा, जिसकी भूमि स्वर्णमयी थी और मध्यभाग बहुत बड़ा
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका वर्णन * ६३९
था। उसमें देवतालोग विहार करते थे। वहीं उसकी मृत्यु हो गयी। उस भूमिमें देवगणोंके मध्य मरनेसे उस विपश्चित्को उसी प्रकार उत्तम देवत्वकी प्राप्ति हो गयी, जैसे अग्निके बीच पड़ा हुआ काष्ठ क्षणभरमें ही अग्नि-रूप हो जाता है। फिर वह एक प्रधान देवता होकर उस लोकालोक पर्वतपर गया, जो भूमण्डलरूपी वृक्षका थाला-सा स्थित है।
रामभद्र ! उसका दिगन्तदर्शनरूपी पूर्वसंस्कार उसे पूर्णतया अभ्यस्त था ही, अतः वह उस उत्कृष्ट निश्चयसे प्रेरित होकर ज्यों ही आगे बढ़ा, त्यो ही उस लोकालोक-गिरिके शिखरसे अन्धकारमय गर्तमें जा गिरा। वहाँ उसने देखा कि पर्वत-शिखर-सरीखे विशालकाय मांसभक्षी पक्षी उसके उस देव-शरीरको नोच-नोचकर खा रहे हैं और पूर्वचिन्तित दिगन्तदर्शनके कार्यमें उसका मनोमय शरीर ही प्रसार कर रहा है; क्योंकि जहाँ उसकी मृत्यु हुई थी, वह प्रदेश परम पावन था। इसी कारण उस निर्मल हृदयवाले विपश्चित्को अपने सूक्ष्म शरीरमें आधिभौतिकताका बोध तो नहीं हुआ, परंतु मनके व्यापारसे रहित शान्त स्थितिरूप उत्तम बोधकी प्राप्ति नहीं हुई। उसे तो आतिवाहिक शरीरका ही विशेषरूपसे ज्ञान था, इसी कारण उसने अपने मनको आगे बढ़ते हुए देखा। आतिवाहिकके ज्ञानसे उसे गर्भवास-तुल्य अन्धकार दीख पड़ा। उस अन्धकारकी समाप्तिपर ब्रह्माण्डकटाहरूपी भूखण्ड दृष्टिगोचर हुआ, जो वज्र-सदृश सारवान्, स्वर्णमय और करोड़ों योजन विस्तारवाला हैं। उसके बाद उसे उस भूखण्डसे आठगुना विस्तारवाला जल मिला, जो ब्रह्माण्डकटाहकी भूमिके समान समुद्रकी पीठकी भाँति स्थित था। उसे पार करनेके बाद वह एक तेजयुक्त स्थानमें जा पहुँचा, जो प्रलयाग्निकी घनीभूत लपटोंके पिण्डीभूत कोटरके समान चमकीला था और जहाँ बहुत-से सूर्य अपना प्रकाश फैला रहे थे, जिससे वह अत्यन्त भीषण लग रहा था। उस तैजस आवरणमें वह दाह-शोक आदिसे रहित मनोमय देहसे विचरण कर रहा था। इतनेमें उसे ऐसा भान हुआ कि वह वायुरूप आवरणमें आ पहुँचा। उस समय उसे यह ज्ञात हुआ कि मेरा सूक्ष्म आत्मा ही ले जाया जा रहा है और वह चित्तमात्र आत्मा किस प्रकार ले जाया जा रहा है—यह भी मालूम हुआ। ऐसे ज्ञानके बलसे उस धीरात्माने उस वायुसागरको पार किया। उसके बाद वह उससे भी दसगुने विस्तृत शून्य स्थानमें जा पहुँचा। उसे लाँघकर वह असीम महान् आकाशमें प्रविष्ट हुआ। जिसमें सब कुछ विलीन होता है, जिससे सब कुछ आविर्भूत होता है तथा जो कुछ नहीं हैं और सब कुछ है, उस महान् आकाशमें मनोमय देहसे भ्रमण करता हुआ वह बहुत दूर चला गया। वहाँ उसने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, तथा जगत् देखा। फिर संसारकी रचनाएँ, सृष्टियाँ और दिशाएँ दृष्टिगोचर हुईं। तत्पश्चात् पर्वत, आकाश, देवता-मनुष्य और पञ्चमहाभूतोंके अन्तमें घनीभूत आकाश दीख पड़ा। पुनः जगत्, दिशाएँ, आकाश और दूसरी अव्यवस्थित सृष्टियाँ परिलक्षित हुईं। यों दीर्घकालसे विहार करता हुआ वह आज भी वहाँ स्थित है। चिरकालसे अभ्यस्त हुए अपने जगत्-सत्यतारूप निश्चयसे वह विरत नहीं हो रहा है; क्योंकि अविद्याका अन्त तो है नहीं किंतु जब उसकी सत्यता जान ली जाती है, तब वह भी ब्रह्मरूप हो जाती है। वास्तवमें तो पूर्णात्मा ब्रह्ममें अविद्या है ही नहीं। यह दृश्य है, यह अविद्या है, यह तो उसकी कल्पना है। राघव ! वह विपश्चित् आज भी तत्त्वज्ञान न होनेके कारण उन पूर्वदृष्ट स्थानोंमें ही तथा उन्हींके सदृश अन्य सृष्टियों तथा वनखण्डोंमें अपनी वासनाकी उत्कटताके कारण चिरकालसे दूर-से-दूर बार-बार भ्रमण कर रहा है।
(सर्ग १२६-१२८)
६५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शेष दो विपश्चितोंके वृत्तान्तका वर्णन तथा मृगरूपमें श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त हुए एक विपश्चित्का राजसभामें लाया जाना
श्रीरामजीने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! अब यह बतलाइये कि एक विपश्चित् तो भगवत्कृपासे मुक्त हो गया और दूसरा अभीतक अविद्यामें भ्रमण कर रहा है। शेष चन्द्रलोक और शाल्मलिद्वीपमें निरुद्ध हुए उन दोनों विपश्चितोंकी फिर क्या दशा हुई ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! उन दोनों विपश्चितोंमेंसे एक चिरकालसे अभ्यस्त हुई वासनाओंके वशीभूत होकर अनेक प्रकारके शरीरोंसे द्वीप-द्वीपान्तरोंमें भ्रमण करता हुआ उत्तर-दिग्वर्ती विपश्चित्की ही गतिको प्राप्त हुआ। उसीकी तरह परमाकाशरूपी खोखलेमें क्रमशः ब्रह्माण्डके आवरणोंका परित्याग करके लाखों सृष्टियोंको देखता हुआ वह आज भी उसी तरह स्थित है। उन दोनोंमेंसे जो दूसरा था, उसकी चन्द्रमाके निकट अपने शरीरको रखकर अभ्यास करनेके कारण चन्द्रमृगमें पूर्णतया आसक्ति हो गयी, जिससे वह प्रतिमास चन्द्रमा-के साथ भ्रमण करनेवाली देहोंसे युक्त हो गया । तदनन्तर उनका परित्याग करके वह पर्वतपर मृगरूपमें स्थित है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चारों विपश्चितोंकी एक ही वासना थी, फिर वह उत्तम अधम फल प्रदान करनेवाली भिन्न-भिन्न कैसे हो गयी ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुवीर ! प्राणीकी भलीभाँति अभ्यस्त हुई वासना देश, काल और क्रियाके वशसे कोमल और अत्यन्त परिपाकवश दृढ़मूल होती है। उनमें जो कोमल है, वह अन्यरूपताको प्राप्त होती है, किंतु जो बद्धमूल है, उसमें शीघ्र अन्यरूपता नहीं होती। देश, काल और क्रिया आदिकी जो एकता है, वही वासनाकी एकता है। उन दोनोंमें भिन्नता आ जानेपर जो बलवती होती है, उसीकी विजय होती है । इस प्रकार वे विपश्चित् एक साथ उत्पन्न होकर शरीर-भेदसे चार रूपों-में हो गये । उनमेंसे आदिके दोको तो अविद्याने आकृष्ट कर लिया, एक वासनाके वशीभूत होकर मृग बन गया और एककी मुक्ति हो गयी ।
श्रीराम ! इस प्रकार उन विपश्चितोंका सारा वृत्तान्त मैंने स्पष्टरूपसे तुम्हें कह सुनाया। यह अविद्या कारण ब्रह्मकी भाँति अनन्त ही है; क्योंकि वह तद्रूप ही है। यों वे अज्ञानी विपश्चित् उस ब्रह्माण्ड-मण्डपके अंदर भटकते रहे, परंतु उन्हें अविद्याका ओर छोर नहीं मिला। यह अनन्तरूपा अविद्या ब्रह्मरूप ही है; क्योंकि वह ब्रह्ममयी है। इसीलिये जबतक इसका यथार्थ ज्ञान नहीं हो जाता, तभीतक इसकी सत्ता है; तत्त्वज्ञान हो जानेपर तो इसका अस्तित्व ही मिट जाता है। इसी कारण वे विपश्चित् परब्रह्माकाशमें अत्यन्त दूर पहुँचकर अविद्याद्वारा कल्पित कतिपय अन्य संसार-रूपोंमें भटकते रहे। उनमेंसे एक मुक्त हो गया, एक मृग बन गया। शेष दो अपने प्राक्तन प्रबल संस्कारके वशीभूत होकर आज भी कहीं भटक रहे हैं।
श्रीरामजीने पूछा—मुनिवर ! यह तो आपने हमारे लिये महान् आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुनाया है । मेरे ऊपर आपकी विशेष अनुकम्पा है । अच्छा, अब यह बतलानेकी कृपा कीजिये कि वे विपश्चित् जिन लोकोंमें उत्पन्न हुए थे, वे यहाँसे कितनी दूर हैं और वे कितनी दूरीपर कैसे लोकोंमें भ्रमण कर रहे हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे दोनों विपश्चित् जिन लोकोंमें स्थित हैं, वे लोक प्रयत्नपूर्वक विचार करनेपर भी मेरी बुद्धिके विषय नहीं हुए । हाँ, मृग-योनिको प्राप्त हुआ तीसरा विपश्चित् जिस लोकमें स्थित है, वह संसार सम्भवतः हमारी बुद्धिमें है। वह विपश्चित्,
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके ध्यानसे उत्पन्न हुई अग्निमें मृगके प्रवेशका वर्णन * ६४१
जिसकी बुद्धि तत्त्वतकके संसार-भ्रमणसे खिन्न नहीं हुई थी, भ्रान्तिवश बहुत-से लोकोंमें भ्रमण करके उस ब्रह्माण्डमें किसी पर्वतकी कन्दरामें मृगयोनिमें उत्पन्न हुआ ।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि ऐसी बात है तो यह बतलाइये कि वह किस दिशामें, किस मण्डलमें, किस पर्वतपर, किस वनमें मृगरूपसे स्थित है ? वहाँ वह क्या करता है ? शस्यश्यामला भूमिमें निवास करता हुआ कैसे दूब चरता है ? बुढ़ापेके समान शिथिल ज्ञानवाला वह अपने उस उत्कृष्ट विपश्चित्-जन्मका कब स्मरण करेगा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! त्रिगर्तराजने जिस क्रीडामृगको तुम्हें भेंटरूपमें प्रदान किया है और जो तुम्हारे क्रीडामृगागार (अजायबघर) में विद्यमान है, उसीको तुम वह विपश्चित् समझो । तब श्रीरघुनाथजीकी आज्ञासे बालकोद्वारा लाया गया वह मनोहर मृग उस विशाल राजसभामें प्रविष्ट हुआ । फिर तो सभी सभासद् टकटकी लगाकर उसकी ओर देखने लगे । वह शरीरसे तगड़ा था और उसका चेहरा भी प्रसन्न था । वह अपने शरीरकी चित्तियोंसे तारारूपी बिन्दुओंसे युक्त आकाशकी विडम्बना कर रहा था, नील कमलरूपी नेत्रोंको बारंबार गिरानेसे सुन्दरी नायिकाओंके चञ्चल कटाक्षोंका तिरस्कार कर रहा था । उसके दर्शनके लिये लालायित हुई सभाका अनादर करनेवाले अपने मनोऽभिराम चकित कटाक्षोंसे खम्भोंमें जड़ी हुई मरकतमणिकी नीली कान्तिको तृण समझकर उसे खानेकी इच्छासे वह चञ्चलतापूर्वक इधर-उधर दौड़ लगा रहा था, क्षणभरमें अपने कान, नेत्र और गर्दनको ऊपर उठा लेता और फिर तुरंत ही नीचे कर लेता—यों अपनी चपलतासे सभासदोंको कौतूहलमें डाल रहा था । इस प्रकार राजा, मुनि और मन्त्रियोंसहित सभी लोग उस मृगको देखकर 'भगवान्की माया अनन्त है' यों कहते हुए बहुत देरतक आश्चर्यमें डूबे रहे । (सर्ग १२९)
श्रीवसिष्ठजीके ध्यानसे उत्पन्न हुई अग्निमें मृगके प्रवेशका तथा उसके विपश्चित्-देहकी प्राप्तिका वर्णन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! तदनन्तर श्रीरामने वसिष्ठजीसे पूछा—'मुने ! किस उपायद्वारा प्राक्तन विपश्चित्-देहकी प्राप्ति होकर इस विपश्चित्के दुःखका अन्त होगा ?'
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रामभद्र ! जैसे आगमें डाल देनेसे सुवर्ण अपने निर्मल रूपको प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार इस विपश्चित्के लिये भी अग्नि ही शरण है । उसमें प्रवेश करनेसे यह मृग अपने पूर्व विपश्चित्-देहको प्राप्त हो जायगा । यह सब मै अभी करता हूँ और तुमलोगोंको कौतुक दिखलाता हूँ । यह मृग अभी तुमलोगोंके सामने आगमें प्रवेश करेगा ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! उत्तम विचारवाले मुनिवर श्रीवसिष्ठने वहाँ यों कहकर अपने कमण्डलुके जलसे विधिपूर्वक आचमन करके इन्धनरहित ज्वालापुञ्जरूप अग्निका ध्यान किया । उनके ध्यान करते ही सभाके मध्यभागसे अग्निकी लपटें लपलपाने लगीं । उन ज्वालाओंका आकार अङ्गारसे रहित था, उनमें इन्धनका भी सम्पर्क नहीं था; धूम और कज्जलका तो नाम-निशान नहीं था । वे निर्मल ज्वालाएँ धक्-धक् करके धधक रही थीं । उनकी परम मनोहर कान्ति फैल रही थी और वे स्वर्ण-मन्दिर-सी सुन्दर लग रही थीं । खिले हुए पलाशका-सा तो उनका आकार था और वे संध्याकालीन मेघकी-सी रंगवाली प्रकट हुई थीं । उस ज्वालासमूहको देखकर सभासद्गण तो दूर हट गये थे, परंतु पूर्वजन्मके भक्तिभावसे आदरसहित देखते हुए उस मृगको उनके दर्शनसे परम हर्ष हुआ । उस अग्निका अवलोकन करनेसे उस मृगका पाप क्षीण हो गया और उस अग्निमें
६४२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रवेश करनेके लिये उसकी इच्छा जाग्रत् हो उठी। फिर तो वह तुरंत ही सिंहकी तरह उछलकर दूरतक पीछे हट गया। इसी बीचमें मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ध्यानमग्न होकर विचार करने लगे और अपने दृष्टिपातोंसे मृगका पाप नष्ट करते हुए अग्निदेवसे यों बोले—
‘ऐश्वर्यशाली हव्यवाहन ! इस मनोहर मृगकी पूर्वजन्मकी भक्तिका स्मरण करके इसपर कृपा कीजिये और इसे विपश्चित् बना दीजिये।’ राजसभामें वसिष्ठ-मुनिके यों कहनेपर वह मृग दूरसे दौड़कर उसी प्रकार अग्निमें प्रवेश कर गया, जैसे वेगपूर्वक छोड़ा गया बाण अपने लक्ष्यमें प्रविष्ट हो जाता है। उस ज्वालासमूहमें प्रविष्ट हुए उस मृगका शरीर दर्पणमें प्रतिबिम्बकी भाँति संध्याकालीन मेघमें विश्रान्त हुआ-सा स्पष्ट दीख रहा था। तदनन्तर सभासदोंके देखते-देखते ही वह मृग ज्वालाओंके बीचमें मनुष्यके रूपको प्राप्त हो गया। ज्वालाओंके अंदर वह पुण्याकृति पुरुष दिखायी पड़ा। वह स्वर्ण-सा कान्तिमान् था। उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग कमनीय थे, जिनसे वह बड़ा ही सुन्दर लग रहा था।
तदुपरान्त वह ज्वाला-पुञ्ज वायुके झोंकेसे बुझे हुए दीपकके समान उस सभाके मध्यसे ऐसे अदृश्य हुआ, जैसे आकाशसे सायंकालके मेघ विलीन हो जाते हैं। फिर तो वहाँ देवालयकी दीवारोंके टूट जानेपर उसके मध्य स्थित देव-प्रतिमाके समान तथा परदेके अंदरसे बाहर निकले हुए नटकी तरह केवल वह पुरुष ही खड़ा रह गया। वह परम शान्त था। उसके गलेमें रुद्राक्षकी माला शोभा पा रही थी, कंधेपर स्वर्णमय यज्ञोपवीत लटक रहा था और शरीर अग्नितापसे निर्मल हुए वस्त्रोंसे आच्छादित था। इस प्रकार वह तुरंत ही उदित हुए चन्द्रमाके समान भला लग रहा था। सूर्यकी प्रभा-सरीखा वह परमोत्कृष्ट आभासे युक्त था। उसके शरीरकी कान्ति देखकर सभासदोंके मुखसे बरवस निकल पड़ा— ‘अहो ! कैसी अद्भुत भा (शोभा) है!’ इसलिये वह ‘भास’ नामसे विख्यात हुआ। तत्पश्चात् वह भास वहीं ध्यानमग्न होकर बैठ गया और मन-ही-मन अपने पूर्वजन्मोंके सम्पूर्ण वृत्तान्तोंका स्मरण करने लगा। उस समय सारे सभासद् आश्चर्यचकित होकर चुपचाप बैठे थे। तबतक भास दो ही घड़ीमें अपने सम्पूर्ण वृत्तान्तोंका स्मरण करके उन पूर्वजन्मोंकी स्मृतिसे लौट आया और उसका ध्यान भङ्ग हो गया। उसने उठकर क्रमशः सारी सभापर दृष्टिपात किया। फिर हर्षपूर्वक वसिष्ठजीके निकट जाकर उन्हें प्रणाम किया और यों कहने लगा— ‘ब्रह्मन् ! आप ज्ञान-सूर्यरूपी प्राण प्रदान करनेवाले हैं, आपको मेरा प्रणाम है।’ तब वसिष्ठजी भी उसके सिरपर हाथ फेरते हुए यो बोले—‘राजन् ! चिरकालके बाद आज तुम्हारी अविद्याका सर्वथा विनाश हो जाय।’ तदनन्तर जब वह ‘श्रीरामजीकी जय हो’ यो कहता हुआ उनके चरणोंमें प्रणाम कर रहा था, उसी समय राजा दशरथ अपने आसनसे कुछ उठकर उससे हँसते हुए-से बोले।
श्रीदशरथजीने कहा—भो राजन् ! आपका स्वागत है। आप अनेक जन्मरूपी संसारमें भ्रमण करनेसे थक गये हैं। अतः आइये, यहाँ इस आसनपर विराजिये और विश्राम कीजिये।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महाराज दशरथके यो कहनेपर वह भास नामक विपश्चित् विश्वामित्र आदि सभी मुनियोंको प्रणाम करके आसनपर बैठ गया।
तब श्रीदशरथजी बोले—अहो ! खेद है, जैसे जंगली हाथी आलानमें बँधे रहनेके कारण दुःख भोगता है, उसी तरह इस विपश्चित्ने भी चिरकालतक अविद्याके वशीभूत होकर दुःखका अनुभव किया है। अहो ! अज्ञानसे उत्पन्न हुई दुर्दृष्टिकी कैसी विषम गति है ! यह आकाशमें ही अनेक सृष्टियोंके आडम्बर-भ्रमका
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * प्राणियोंकी उत्पत्तिके दो भेद * ६४३
दर्शन कराती है। यह कम आश्चर्यका विषय नहीं है, जो सर्वव्यापक आत्मामें ये कितने संसार फैले हुए हैं, जिनमें यह विपश्चित् चिरकालतक भ्रमण करता रहा। अहो ! अपने स्वाभावरूप विभवसे सम्पन्न इस चेतन आत्माके संकल्पकी, जो वस्तुतः शून्य है, कैसी अद्भुत महिमा है। यह शून्य होते हुए भी परमात्मघनरूपी आकाशके अंदर इस प्रकारके अनेकों जगत्के रूपमें प्रतीत होता है।
तदनन्तर श्रीविश्वामित्रजीके द्वारा पूछे जानेपर विपश्चित् भासने अपने देखे हुए विभिन्न दृश्यों, स्थानों, लोकों तथा प्राणियोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। (सर्ग १३०-१३५)
प्राणियोंकी उत्पत्तिके दो भेद, मच्छरके मृगयोनिसे छूटकर व्याधरूपसे उत्पन्न होनेपर उसे एक मुनिका ज्ञानोपदेश
उपर्युक्त प्रसङ्गमें ही विपश्चित् भासने आकाशसे एक विशाल शवके गिरनेकी कथा सुनायी। तदनन्तर अग्निदेवके साथ हुए अपने संवादकी चर्चा करते हुए भासने कहा कि मेरे पूछनेपर अग्निदेवताने शवका आदिसे अन्ततक पूरा वृत्तान्त मुझे सुनाया और यह कहा कि 'वह शव मच्छरकी योनिको प्राप्त हुआ था। उस अतिक्षुद्र शरीरवाले स्वेदज मच्छरकी आयु केवल दो ही दिनोंकी हुई। उसका शरीर इतना हल्का था कि वह फूँक मारनेसे ही उड़ जाता था।' इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजीके मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हुई, तब उन्होंने श्रीवसिष्ठजीसे पूछा।
श्रीरामजीने पूछा—प्रभावशाली गुरुदेव ! इस जगत्में क्या समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति योनिसे ही होती है अथवा अन्य किसी प्रकारसे भी सम्भव है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति दो प्रकारसे होती है—एक ब्रह्ममय और दूसरी भ्रान्तिज। उन दोनोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। पूर्वजन्मके अनुभवसे बद्धमूल हुए शरीरतादात्म्यके भ्रमवश प्राणियोंकी जो उत्पत्ति होती है, वह भ्रान्तिज कही जाती है; क्योंकि वह दृश्यके सङ्गसे होती है। नित्यमुक्त ब्रह्माको कभी भी जगद्-भ्रान्ति तो होती नहीं, फिर भी वह सृष्टिके आदिमें चतुर्विध जीवरूपसे जो स्वयं अपने संकल्पसे उत्पन्न होता है, उसका वह जन्म ब्रह्ममय कहा जाता है। वह योनिज नहीं होता। श्रीराम ! उस मच्छरने जगद्भ्रान्तिके वश जन्म धारण किया था। वह ब्रह्म-विवर्तसे नहीं उत्पन्न हुआ था। अब (अग्निके द्वारा कहा गया) उसका अगला वृत्तान्त विपश्चित्से सुनो।
(अग्निने आगे कहा—) उसने पृथ्वीपर ईखके झुरमुटों, हरी-हरी घासोंपर तथा मूँज-कास आदिके अंबारोंमें गूँजते हुए दूसरे मच्छरोंके साथ स्वयं भी गूँजते एवं क्रीड़ा करते हुए अपनी आयुका आधा दिन पूरा-का-पूरा भोग-विलास में व्यतीत कर दिया। फिर वह बाल-लीलावश अपनी एक मच्छरीके साथ हरी-हरी घासोंके मध्यभागरूपी हिंडोलेपर बहुत देरतक झूला झूलता रहा। झूलनेके परिश्रमसे थककर जब वह वहीं कहीं विश्राम कर रहा था, तबतक हरिणके खुराग्ररूपी पर्वतके गिरनेसे चकनाचूर हो गया। प्राणत्याग करते समय उसकी दृष्टि हरिणके मुखपर लगी थी, इसलिये पूर्व भावनाके अनुसार बाह्य और आभ्यन्तर इन्द्रियोंको ग्रहण करके वह मृगयोनिमें पैदा हुआ। वह हरिण वनमें घूम रहा था कि एक व्याधने उसे अपने धनुषद्वारा मार डाला। मरते समय उसकी दृष्टि व्याधके मुखपर लगी थी, इसलिये अगले जन्ममें वह व्याध होकर पैदा हुआ। वह व्याध अनेक वनोंमें घूमता-घामता किसी सुखद तपोवनमें जा पहुँचा। वहाँ वह विश्राम कर रहा था कि उसकी मुनिसे भेंट हो गयी। तब मुनि उसे ज्ञानोपदेश करने लगे—
६५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
रे व्याध ! तू क्यों भ्रममें पड़ा है ? इस क्षणभङ्गुर संसारमें अपने दीर्घकालव्यापी दुःखके लिये धनुषसे इन मृगोंको क्यों मारता है ? अहिंसा-अभयदान आदि शास्त्रमर्यादाका पालन क्यों नहीं करता ? अरे पुत्र ! वायुसे टकराये हुए मेघमण्डलमें लटकते हुए जलकी बूँदकी भाँति आयु विनाशी है। भोग बादलोंकी घटाके मध्य कौंधनेवाली बिजलीकी तरह चञ्चल हैं। जवानीके भोग-विलास जलके वेगके समान चपल हैं। शरीर क्षण-विध्वंसी है; अतः इस संसारसे भयभीत होकर तू निर्वाणकी ही खोज कर।'*
तब व्याधने पूछा—'मुनिराज ! यदि ऐसी बात है तो बताइये कि दुःखका पूर्णतया विनाश करनेके लिये जो न कठोर हो और न कोमल हो—ऐसा कौन-सा व्यवहारक्रम हो सकता है ?
मुनिने कहा—'व्याध ! तू इसी समय बाणोंसहित इस धनुषको सदाके लिये त्याग दे और मुनिके-से आचरणका आश्रय लेकर दुःखरहित हो यहीं निवास कर।'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रामभद्र ! उक्त मुनिके यों उपदेश देनेपर उसने धनुष और बाणोंका परित्याग करके मुनियोंका-सा आचरण अपना लिया। फिर बिना माँगे जो कुछ मिल जाता था, उसीपर जीवन-निर्वाह करते हुए वह वहीं रहने लगा। कुछ ही दिनोंमें सारासारकी विवेक-शीलताने उस मौनीके मनमें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे पुष्प गन्धद्वारा मनुष्योंके हृदयमें अपना स्थान बना लेता है।
तदनन्तर व्याधद्वारा किये गये प्रश्नके उत्तरमें मुनिने धारणाके अभ्याससे परकाय-प्रवेशद्वारा देखे गये स्वप्नका, दो जीवोंके सम्मेलनसे दुगुने विश्वदर्शनका, एकता होनेपर एक विश्वके दीखनेका, विस्तारपूर्वक प्रलयदर्शनका, प्रलय-सागरके हटने, गाँवमें ब्राह्मणरूपमें स्थिति, दूसरेके शरीरसे बाहर निकलने आदिका वर्णन करनेके पश्चात् कहा।
मुनि बोले—'व्याध ! सृष्टिकी उत्पत्तिका वस्तुतः कोई कारण नहीं है। अतः उसकी उत्पत्तिका अभाव स्पष्ट है। इसलिये सृष्टि शब्द और उसका अर्थ दोनों ही सर्वथा नहीं हैं। ऐसी स्थितिमें कहाँ शरीर है, कहाँ हृदय है, कहाँ स्वप्न है, कहाँ जल आदि है, कहाँ ज्ञान है, कहाँ अज्ञान है और कहाँ जन्म-मरण आदि है ? वास्तवमें तो वह निर्मल चिन्मात्र ही है, जिसकी अपेक्षा आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होते हुए भी उसी प्रकार स्थूल लगता है जैसे परमाणुओंके निकट पर्वत। वह चिदाकाश अपने आकाशरूप शरीरके नियममें स्वभावतः जो कुछ संकल्प करता है, उससे वह अपनेको जगद्रूपसे जानता है। जैसे स्वप्नमें केवल चेतन जीव ही नगररूपसे प्रतीत होता है, वास्तवमें वहाँ नगर आदि कुछ भी नहीं है, वैसे ही आत्माकाशमें शान्त, अखण्ड, अप्रत्यक्ष चिन्मात्र ही जगद्रूपसे भासित होता है। जैसे नेत्रोंमें तिमिर रोग हो जानेसे प्रकाशमय आकाशमें धुँआँ-सा दीख पड़ता है, उसी तरह चिद्रूपी दृष्टिमें अज्ञानरूपी तिमिर रोगके कारण जगत्का भान होता है। परन्तु वस्तुतः न भान है न अभान, न प्रतिभासिक जगत् है न व्यावहारिक तथा भूताकाश भी नहीं है; बल्कि केवल निराकार, अनादि, अनन्त, अद्वितीय चिदाकाश ही है। जिस हेतुसे कारणके बिना स्वप्नमें केवल शुद्ध द्रष्टा ही भासित होता है, उसी हेतुसे जाग्रत्में भी कारणका अभाव है और उसमें न द्रष्टा है न दर्शन। जैसे एक काल सृष्टि और प्रलय—दोनों रूपोंमें व्याप्त है अथवा बीज अङ्कुरसे लेकर पुष्प-फलपर्यन्त सभी अवस्थाओंमें वर्तमान है, उसी प्रकार ब्रह्म सर्वव्यापी है। जो एककी दृष्टिमें महान् दीर्घालरूप है, वही दूसरेकी
* आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलम्वाम्बुवद्भङ्गुरं
भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामनीचञ्चलाः ।
लोला यौवनलालना जलरयः कायः क्षणापायवान्
पुत्र त्रासमुपेत्य संसृतिवगान्निर्वाणमन्विष्यताम् ॥
( नि० प्र० उ० १३६ । ३३ )
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन * ६४५
दृष्टिमें निर्मल आकाश-सा दीखता है। यह बात स्थिर-स्वप्न, संकल्प और भ्रम आदि अवस्थाओंमें देखी गयी है। जैसे आत्मा एक निर्मल चिदाकाशस्वरूप होकर स्वप्नमें जाग्रत्की तरह प्रतीत होता है, उसी तरह जाग्रन्मय स्वप्नमें भी भासित होता है। दोनों अवस्थाओंमें उसकी जरा-सी भी अन्यथाप्रतीति नहीं होती। अतः व्याध ! समस्त मनोव्यापारका त्याग कर देनेपर तुम जैसा रहते हो, वही तुम्हारा निरामय स्वरूप है, तुम वस्तुतः बाहर-भीतर सर्वत्र अनन्त आत्मारूपसे निरन्तर स्थित हो।
ब्रह्मा आदि जो स्वयंभू अपने-आप उत्पन्न होनेवाले हैं, वे सृष्टिके आदिमें स्वयं ही प्रकट होते हैं; क्योंकि उनके शरीर ज्ञानमात्रस्वरूप होते हैं। अतः उनके जन्म और कर्म नहीं होते। उनकी दृष्टिमें न संसार है, न द्वैत है और न कल्पनाएँ हैं। विशुद्ध ज्ञानस्वरूप शरीरवाले वे सदा सर्वात्मारूपसे स्थित रहते हैं। सृष्टिके आरम्भकालमें जैसे परब्रह्मस्वरूप ब्रह्मा आदि प्रकट होते हैं, उसी तरह सैकड़ों-हजारों दूसरे जीव भी प्रकट होते हैं; किंतु जो अज्ञानी हैं, वे अपनेको ब्रह्मसे भिन्न मानते हैं। वे असात्त्विक जीव इस जड दृश्यमय द्वैत प्रपञ्चको सत्य समझकर ही पहले मृत्युको प्राप्त हुए थे। अतः अब उनका कर्मसहित पुनः जन्म दिखायी देता है; क्योंकि उन्होंने स्वयं ही अचेतन देहात्मरूप होकर अवस्तुका आश्रय ग्रहण किया है। सर्वात्मरूप चेतनकी निर्मलता स्वाभाविक है। नित्य ब्रह्म स्व-स्वभावमें ही स्थित है। जिसे वह परमात्म-स्वरूप ज्ञात हो गया है, उसका वह कर्म नष्ट हो जाता है। तब जिसका अस्तित्व ही नहीं है, उसके विनाशमें कठिनाई ही कौन-सी है। जबतक पाण्डित्यकी—परमात्मस्वरूपके ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो जाती, तभीतक माया संसारभयको उत्पन्न करनेमें समर्थ होती है। पाण्डित्य वही है, जिससे पुनः इस संसारचक्रमें पतन नहीं होता। इसलिये विशुद्ध ज्ञानसे भरपूर उस पाण्डित्यकी प्राप्तिके लिये अविराम प्रयत्न करना चाहिये। इसके सिवा अन्य किसी उपायसे तुम्हारा यह संसार-भय नष्ट नहीं हो सकता।
(सर्ग १३६–१४२)
पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन
मुनि बोले—व्याध ! जो परमधामरूपी गन्तव्य स्थानके मार्गके ज्ञाता हैं तथा जिन्हें आत्मज्ञानका पूर्णबोध है, ऐसे पण्डित जिस गतिको प्राप्त होते हैं, उसके सामने इन्द्रका ऐश्वर्य जीर्ण-शीर्ण तृणके समान तुच्छ है। मुझे तो पाताल, भूतल और स्वर्गलोकमें कहीं भी ऐसा सुख अथवा ऐश्वर्य नहीं दीख रहा है; जो पाण्डित्यसे बढ़कर हो। जैसे ज्ञान हो जानेसे मालामें सर्पकी भ्रान्ति तुरंत मिट जाती है, वैसे ही ज्ञानीकी दृष्टिमें यह अविद्यात्मक दृश्य-प्रपञ्च क्षणमात्रमें ब्रह्मरूपमें परिणत हो जाता है। ब्रह्मका जो प्रतिभास है, वही यह जगत् कहा जाता है। इसी कारण ये पृथ्वी आदि पञ्चभूत कहाँ हैं और इनका कारण कहाँ है अर्थात् जगत्की उत्पत्तिमें इन कारणोंकी अपेक्षा नहीं है। जैसे स्वप्नद्रष्टाको स्वप्नमें दीखनेवाले मनुष्योंकी स्थिति काल्पनिक है, वास्तविक नहीं है, उसी तरह जाग्रत्स्वरूप स्वप्नमें दीखनेवाले मनुष्योंकी स्थिति भी पूर्वकामनाके अनुसार कल्पित है, यथार्थ नहीं है।
व्याध ! जैसे स्वप्नावस्थामें तुम्हारे अन्तःकरणके संकल्पमें नगर दीखता है, वैसे ही ब्रह्मके संकल्पमें यह सृष्टि वर्तमान है और जैसी कार्यकारणता तुम्हारे स्वप्नकालमें कही गयी है, वैसी ही कार्यकारणता यहाँ भी है।
यद्यपि यह सम्पूर्ण जगत् असत् है, तथापि स्वप्नकी तरह इसका अनुभव होता है। यदि 'जगत् नहीं है' यों कहा जाय तो पूर्ण चेतन ही इस रूपमें
६४६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विकसित होता है। जैसे हमलोगोंका यह जगत् है, वैसे ही आकाशमें अन्य प्राणियोंके लाखों जगत् हैं; परंतु उनकी परस्पर अनुभूति नहीं होती। सरोवर, सागर और कूपमें पृथक्-पृथक् निवास करनेवाले मेढकोंको अपने-अपने निवासस्थानका ही अनुभव रहता है, उन्हें परस्पर एक-दूसरेके दृश्यादिका कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। जैसे एक ही घरमें सैकड़ों मनुष्योंके सैकड़ों स्वप्न-नगर होते हैं, उसी प्रकार आकाशमें बहुत-से जगत् भासित होते हैं; परंतु अज्ञानियोंके अनुभवमें आनेसे ही उन आकाशीय जगर्तोंकी सत्ता है और ज्ञानियोंके अनुभवका विषय न होनेसे वे असत् हैं। जैसे एक घरमें सैकड़ों मनुष्योंके सैकड़ों स्वप्न-नगर विकसित होते हैं और नहीं भी होते, उसी तरह आकाशमें जगत् है और नहीं भी है।
यह भुवन चिन्मात्रमें स्थित है। 'त्वम्', 'अहम्' आदि रूप जगत् भी चिन्मय है। इस न्यायसे उत्पन्न न होता हुआ भी जगत् परमाणुके अंदरतक चला जाता है अर्थात् अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। मै परमाणुरूप हूँ, अतः समस्त जगत्के आकारमें स्थित हूँ। इसी कारण मैं सर्वत्र यहाँतक कि परमाणुके अंदर भी विद्यमान हूँ। यह चिदाकाशरूप मैं चिन्मात्र परमाणु होकर जगद्रूपसे जहाँ स्थित रहता हूँ, वहीं तीनों लोकोंको देखता हूँ। मेरे अन्तरात्मामें तीनों लोकोंका जैसा रूप विकसित होता है, वैसा बाहर नहीं होता; क्योंकि कहीं भी किसीने उसे देखा नहीं है। स्वप्न अथवा जाग्रतमें जब-जब अथवा जहाँ-जहाँ जगत्का जो भान होता है, वह बाह्य एवं आभ्यन्तर-सहित समस्त दृश्य चेतन आत्माका भान ही है। जब स्वप्नमें प्राणीका विस्तृत जगत् भासित होता है, तब वह चिदणुरूप आत्माका ही भान होता है और वह स्वप्न-स्थानरूपसे होता है।
(सर्ग १४३-१४४)
मुनिका व्याधके प्रति बहुत-से प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःखकी प्राप्तिके निमित्तका निरूपण करना
इस प्रकार स्वप्न, सुषुप्ति आदिके भेदोंका वर्णन करके मुनिने पुनः कहा—'व्याध ! यद्यपि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय स्वरूपवाला आत्मा आकाररहित होकर भी सर्वाकार है, कल्पनाओंसे शून्य होते हुए भी सृष्टिरूपी शरीर धारण करनेवाला है और शून्यरूप दृश्यात्मक चित्-शरीरसे शून्याकाशको व्याप्त करके स्थित है, तथापि यह आकाशात्मक चिन्मात्र अपने शुद्ध चिदाकाशस्वरूपसे कभी भी तनिक भी भिन्न नहीं है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, लोकान्तर और मेघ आदि भूत-भौतिक पदार्थों-सहित यह दृश्यजगत् सृष्टिके आदिमें भी कारणका अनुभव न होनेसे केवल चिदात्मक ही है। वास्तवमें यह नाम-रूपसे रहित और बोधस्वरूप ही है; क्योंकि अन्ततो-गत्वा मनोलय हो जानेपर यह सारा-का-सारा शुद्ध ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही रह जाता है, कोई अन्य वस्तु नहीं।'
व्याधने पूछा—मुने ! प्रलय आदि सैकड़ों महावृत्तान्तों-से जिसकी अनेकों सृष्टियाँ समाप्त हो चुकी हैं, ऐसे आपका उन-उन लोकोंमें कैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसका रहस्य बतलाइये।
मुनिने कहा—सदाचारकी स्पृहा रखनेवाले साधुस्वभाव व्याध ! खगगत किसी प्राणीके ओजमें स्थित होनेपर उस प्राणीके हृदयस्थित ओजमें जो अपूर्व वृत्तान्त घटित हुआ, उसे सुनो। उस समय वहाँ मेरा आत्मज्ञान-सम्बन्धी सारा चमत्कार विस्मृत हो गया और वर्ष-ऋतुरूप काल धीरे-धीरे व्यतीत होने लगा। मेरा आत्म-चिन्तन छूट गया और बुद्धि पुत्र-कलत्र आदिमें अनुरक्त हो गयी। इस प्रकार उस गृहस्थाश्रममें रहते मेरे सोलह वर्ष बीत गये। तदनन्तर किसी समय एक सम्मान्य विद्वान् मुनि अतिथिरूपसे मेरे घर पधारे।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मुनिका बहुत-से प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःख-प्राप्तिका निमित्त बताना * ६४७
वे मननशील तथा अगाध ज्ञानसम्पन्न थे। उनकी तपस्या बड़ी उग्र थी। मैने उनका भलीभाँति आदर-सत्कार किया। तात! जब वे भोजन करके संतुष्ट हो आसनपर शयन करने लगे, तब मैने जनताके सुख-दुःखके क्रमका विचार करके उनसे यों प्रश्न किया—'भगवन्! चूँकि आप महाज्ञानी हैं। जगत्की सारी गतिविधियाँ आपको विदित हैं। आपमें क्रोध तो लेशमात्र भी नहीं दीखता तथा सुखमें आपकी तनिक भी आसक्ति नहीं है; अतः यह बतानेकी कृपा कीजिये कि जैसे शरत्कालमें फलार्थी पुरुषोको धान आदिकी प्राप्ति होती है, वैसे ही कर्मशील जीवोंके अपने शुभाशुभ कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। तो क्या ये सारी प्रजाएँ एक साथ ही अशुभ कर्म करती हैं, जिनके फलस्वरूप दुर्भिक्षादि सभी दोष इन्हें एक साथ ही प्राप्त होते हैं? यदि दुर्भिक्ष एवं अनावृष्टि आदि उपद्रव सबके लिये एक-से ही होते हैं तो इसका क्या रहस्य है तथा किस-किसके दुष्कर्म समान होते हैं?' मेरा यह प्रश्न सुनकर वे मुनि मेरी ओर देखकर मुस्कराये और अमृत-प्रवाहकी तरह सुन्दर एवं प्रशंसनीय वचन बोले।
समागत मुनिने कहा—साधो! यह तो बतलाओ, अन्तःकरणके पूर्णतया विवेकसम्पन्न होनेपर इस दृश्यका जो सत् या असत्रूप कारण है, उसे किससे जानते हो। तुम कौन हो और इस जगत्में कहाँ स्थित हो—यों अपने आत्माका पूर्णरूपसे स्मरण करो। मैं कहाँ हूँ? यह दृश्य क्या है? क्या सार है? क्या असार है? यह सब स्वप्नमात्र ही प्रतीत होता है। इसे तुम क्यों नहीं समझते हो? मैं तुम्हारे लिये स्वप्न-पुरुष हूँ और तुम मेरे लिये स्वप्न-पुरुषके तुल्य हो। यह जगत् निराकार अनिर्वचनीय अनादि और कल्पनारहित है। यह चिन्मात्ररूपी काँचकी चमकके समान स्थित है। इस सर्वव्यापक चिन्मात्रका स्वाभाविक रूप ही ऐसा है कि यह जहाँ जैसा समझता है, वहाँ वैसा ही हो जाता है। जब यह वस्तुओंके सकारणत्वकी कल्पना करता है, तब सब कुछ सकारण है और जब अकारणत्वकी कल्पना करता है, तब सभी कुछ अकारण है। साधुपुरुष! जैसे बहुत-से वृक्षोंपर एक साथ बिजली गिरती है, वैसे ही कुछ प्राणियोंके कतिपय दुष्कर्म रहनेपर एक साथ ही दुःख आदिके पहाड़ टूट पड़ते हैं। कर्मोंकी कल्पनासे जीवात्माको अपने कर्मोंका फल भोगना पड़ता है, परंतु जब वह कर्मोंकी कल्पनासे उन्मुक्त हो जाता है, तब उसे कर्मफलका भोग नहीं प्राप्त होता। स्वप्नमय नगरकी भाँति इस जगत्में सहकारी कारण आदि कोई भी कारण नहीं है। इसलिये वह अनादि, चेतन, अजर, मङ्गलमय परब्रह्म ही है। यह स्वप्नवत् जगद्भ्रम कोई बिना कारणके प्रतीत होता है और कोई कारणके साथ। वास्तवमें तो यह मिथ्या ही है।
महामते! ये सारी सृष्टियाँ पहलेसे इसी तरह अकारण ही प्रवृत्त होती आ रही हैं। जैसे आकाशमें देरतक देखते रहनेसे नेत्रोंके सामने चक्राकार गोले दीखने लगते हैं, वैसे ही जगत्मे ये ढेर-की-ढेर सृष्टियाँ चक्कर काटती रहती हैं। चित्-शक्तिने ही अपनेमें 'मैं ही अमुक हूँ' यों जिस-जिस भावात्मक रूपकी स्वतः कल्पना की, वह आज भी वैसा ही स्थित है। पुनः वही चित् उससे भी उत्कृष्ट दूसरे महान् यत्नसे उसे अन्यथा करनेमें भी समर्थ है। विद्वान्-द्वारा जहाँ कारणकी कल्पना की जाती है, वहाँ तो कारणकी सारता रहती है और जहाँ उसकी कल्पना नहीं की जाती, वहाँ कारणहीनता ही है। यह विस्तृत जगत् पहले बवंडरकी तरह असत् ही आभासित हुआ और उस समय जैसा भान हुआ वैसा ही आज भी स्थित है। कुछ लोग अपना शुभ-अशुभ पुण्य-पापरूप कर्म मिला-जुलाकर करते हैं, अतः उन्हें उनका फल भी उसी तरह सम्मिश्रित रूपमें मिलता है।
(सर्ग १४५—१४९)
६४८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
मुनिके उपदेशसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति, पूर्वदेहमें गमनकी असमर्थताके विषयमें प्रश्न करनेपर देह आदिके भस्म होनेके प्रसंगमें मुनिके आश्रम और दोनों शरीरोंके जलने तथा वायुद्वारा उस अग्निके शान्त होनेका वर्णन
मुनिने कहा—व्याध ! उस समय उन मुनिने इस प्रकारकी युक्तिसे मुझे ऐसा ज्ञानोपदेश किया, जिससे तत्काल ही ज्ञेय-तत्त्व मेरी बुद्धिमें बैठ गया। जिन मुनिने यह चन्द्रोदयके समान मनोहर वचन कहा था, वे ही ये मुनिवर तुम्हारे बगलमें बैठे हैं। (उक्त मुनिको दिखाकर कहा—) उनकी ओर दृष्टिपात करो। ये मूर्तिमान् यज्ञके समान हैं। इन्हें दृश्यके पूर्वापरका पूर्ण ज्ञान है। ये ही मेरे अज्ञानका विनाश करनेवाले हैं। यद्यपि मैने इनसे कहनेके लिये प्रार्थना नहीं की थी, तथापि इन्होंने ही मुझसे यह बात कही थी।
अग्नि बोले—विपश्चित् ! उन मुनिकी वह बात सुनकर वह व्याध उस समय विचारने लगा कि यह स्वप्नसृष्टि प्रत्यक्ष कैसे हो गयी। यों सोचकर उसे महान् विस्मय हुआ।
तब व्याधने कहा—मुने ! भव-तापका अपहरण करने-वाले आपने अभी-अभी जो बात मुझसे कही है, वह तो महान् आश्चर्यजनक है और मेरे मनमें नहीं बैठ रही है। मुनिवर ! स्वप्नमें जिनका आपने अपने उपदेशक-रूपसे वर्णन किया था, उन्हींकी जाग्रत्में प्रत्यक्षता बतला रहे हैं और मै भी उन्हें प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। इसीलिये मै इसे परम विस्मयकी बात मानता हूँ।
मुनि बोले—महाभाग व्याध ! तदनन्तर यहाँ मेरी कौन-सी विस्मयजनक घटना घटी, उसका मै संक्षेपमें वर्णन करता हूँ; सुनो। सहसा उतावली मत करो। तुम्हारे समीप बैठे हुए इन मुनिवरने उस समय वहाँ मुझे ज्ञानोपदेश करनेके लिये वैसा वर्णन किया था और मै उन महात्माकी उस वाणीसे तुरंत ज्ञानसम्पन्न हो गया। तत्पश्चात् उनकी वाणीके प्रभावसे मुझे अपने पहलेके अनादिसिद्ध सन्मात्ररूप निर्मल स्वभावका स्मरण हो आया, फिर तो मेरे हृदयमें यह भावना जाग उठी कि मै ही वह मुनि था। ऐसा ध्यान आते ही प्रचुर आश्चर्यवश स्नान किये हुएकी तरह मेरा हृदय आर्द्र हो गया। मै विषय-भोगकी आसक्तिसे इस-अवस्थाको प्राप्त हो गया हूँ—ठीक उसी तरह जैसे अज्ञानी पथिक मार्गके परिश्रमसे पीड़ित होकर जलके लिये मिथ्याभूत मृगतृष्णा-के पीछे दौड़ता है। अहो ! आश्चर्य है, बढ़ते हुए इस मिथ्याज्ञानने, जो सर्वार्थशून्य है, मुझे यह किस दशाको पहुँचा दिया। वास्तवमें तो न मैं हूँ, न यह स्त्री है, न यह घर है और न यह भ्रम ही है—यह सब कुछ मिथ्या है, फिर भी सद्-सा प्रतीत होता है। यह महान् आश्चर्य है। अच्छा, अब इस विषयमें मुझे क्या करना चाहिये। मेरे अंदर बन्धनको तोड़ डालनेमें समर्थ जो ग्रहाकार वृत्तिरूप अङ्कुर है, वह भी काट डालने योग्य है, अतः तबतक मै उसीका परित्याग करता हूँ। यों सोच-विचारकर मैने वहाँ उन मुनिसे इस प्रकार कहा—'मुनीश्वर ! मैं अपने आश्रमस्थित मुनि-शरीरका तथा जिस शरीरको देखनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ, उसका भी निरीक्षण करनेके लिये जाता हूँ।'
यह सुनकर वे मुनिवर उस समय ठाठकर हँस पड़े और मुझसे कहने लगे—'वे दोनों शरीर अब हैं कहाँ। वे तो अब बहुत दूर चले गये। अथवा वृत्तान्तज्ञ ! तुम स्वयं ही जाओ और उस वृत्तान्तको देखो। वहाँ घटित हुई घटनाको जब तुम यथार्थरूपसे देख लोगे, तब स्वयं ही जान जाओगे।' मुनिके यों कहनेपर मैने अपने उस प्राक्तन मुनि-शरीरका स्मरण करके वहाँ जानेकी इच्छासे इस स्वप्नकल्पित रूपका परित्याग कर दिया और चिदात्मारूप अपने जीवको प्राणके द्वारभूत पवनसे संयुक्त