संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश * ६३५
हो तथा जिस मार्गमें देहका रहना सम्भव ही न हो, वहाँ हमारा मन ही यात्रा करे।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उनके इस प्रकार वर माँगनेपर 'ऐसा ही होगा' यों कहकर अग्निदेव सहसा एक ही क्षणमें अदृश्य हो गये, मानो बडवानलरूपसे समुद्रमें जानेके लिये उन्हें जल्दी लगी रही हो। इस तरह वर देकर अग्निदेव चले गये। तत्पश्चात् रात्रि आयी और कुछ देर ठहरकर वह भी चली गयी। इसके बाद सूर्यदेव आये। साथ ही उन विपश्चितोंके हृदयमें विशाल समुद्रको लाँघनेकी इच्छा भी आयी। (सर्ग १२०-१२१)
चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश और प्रत्येक दिशामें उनकी पृथक्-पृथक् यात्राका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! तत्पश्चात् प्रातः-काल मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंके मना करनेपर भी वे चारों विपश्चित् हठपूर्वक नीतिशास्त्रके अनुसार पृथ्वीके राज्यविभाग और उनके शासनकी भलीभाँति पूरी व्यवस्था करके दिगन्तके दर्शनकी अतिशय उत्कण्ठासे भर गये, मानो उनके शरीर-पर किसी ग्रहका आवेश हो गया हो। उस समय उनका सारा परिवार रोते हुए मुखसे करुणाजनक क्रन्दन कर रहा था। उन चारोंने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और स्वयं आसक्ति-शून्य होनेके कारण अभिमान, ईर्ष्या, लोभ, शत्रुओंके पराभवकी इच्छा, राज्य, स्त्री एवं पुत्र आदिको त्यागकर वे यह कहते हुए चल दिये कि 'हमलोग समुद्रके पार जा दिगन्तका दर्शन करके अभी क्षणमें लौटे आ रहे हैं।'
अग्निदेवकी प्रसन्नतासे प्राप्त मन्त्रकी शक्तिसे पाँचों भूतोंपर विजय प्राप्त करके वे उत्तम सिद्ध हो गये थे। अतः उस समय उन्होंने पैदल ही समुद्रमें प्रवेश किया। वे चारों विपश्चित् प्रत्येक दिशामें समुद्रके भीतर प्रविष्ट होकर स्थलकी ही भाँति जलमें भी पैरोंसे ही चलने लगे। जलके भीतर भूपृष्ठकी भाँति तरङ्गसमूहों-पर पैर रखकर अकेले-ही-अकेले जानेको उद्यत वे चारों विपश्चित् अपनी सेनासे बहुत दूर निकल गये। वे एक-एक पग चलकर जब महासागरके भीतर प्रवेश करने लगे, तब तटपर खड़े हुए उनके सम्बन्धी उन्हें तबतक देखते रहे, जबतक कि वे शरत्कालके आकाशमें प्रविष्ट हुए मेघ-खण्डोंके समान अदृश्य नहीं हो गये। यद्यपि उन्हें चञ्चल गजराजोंके समान उठी हुई तरङ्गमालाओंसे टकराना पड़ता था, तथापि वे तटपर बने हुए पथरीले परकोटोंके समान अपना धैर्य नहीं छोड़ते थे। वे चारों विपश्चित् समुद्रकी जलराशिमें आगे बढ़ने लगे। जलके मगर उनके सहचर (साथी) थे। वे शौर्यसम्पन्न नाकों और केकड़ोंसे व्याप्त भँवरोंमें चारों ओरसे घिर जाते थे। बीचमें जानेपर बहु-संख्यक मेघोंके समान रूपवाली और व्यक्ताव्यक्त किरण-राशिसे सुशोभित होनेवाली भ्रान्त मुक्तामणयों तथा वृक्षों-की लताके समान दीखनेवाली जलमय तरङ्गोंके जलकण-रूपी फूलोंद्वारा वे पग-पगपर अपने शरीरको विभूषित एवं सुशोभित करते जा रहे थे।
उन चारों विपश्चितोंमेंसे जो पश्चिम दिशाका अन्त देखनेके लिये प्रस्थित हुआ था, वह अपनेको अमर मानने-वाले एक मत्स्यके द्वारा निगल लिया गया । वह मत्स्य मत्स्यावतारधारी भगवान् विष्णुके कुलमें उत्पन्न हुआ था और उसका वेग झेलमकी प्रखर धारमें बहनेवाली नौकाके समान तीव्र था। किंतु उस मत्स्यके लिये उस राजाको पचाना बड़ा कठिन काम था। इसलिये क्षीरसागरमें पहुँचकर उसने उसे उगल दिया; तब वह क्षीरसागरको लाँघकर दूर दिगन्तमें चला गया।
दक्षिण दिशाका अन्त देखनेके लिये चला हुआ विपश्चित् जब इक्षुरसके समुद्रमें पहुँचा, तब उसके तटवर्ती यक्षनगरमें निवास करनेवाली एक यक्षिणीने, जो वशीकरण विद्यामें अत्यन्त निपुण थी, उसे देखा। देखकर अपने विद्याके बलसे आकृष्ट करके उसे अपना प्रेमी बना लिया।
सं० यो० व० अं० २२—