संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 681, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें६३४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पृथ्वीनाथ ! देखिये, कल्पवृक्षोंके वनकी शीतल छायामें विश्राम करते हुए ये सिद्ध और विद्याधररूप पथिक वीणा आदि वाद्योंके साथ गीत गा रहे हैं। देखिये न, वनमें इस कल्पवृक्षके एक-एक पत्तेपर देव-सुन्दरियाँ विश्राम करती, गाती और हँसती हैं !
उदार बुद्धिवाले ! ये सिद्ध, विद्याधर आदि नन्दनवनमें भी वैसा आनन्द नहीं पाते हैं, जैसा कि इन शुद्ध, शान्त, नीरव वनस्थलियोंमें पाते हैं। ये रमणीय और निर्जन वनस्थलियाँ मुनिके विरागी चित्तको और विषयीके रागी हृदयको समानरूपसे आनन्द प्रदान करती हैं।
देखिये, खिले हुए चम्पाके वन जब हवासे हिलते हैं, तब जलते हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते हैं । उस अवस्थामें वहाँसे दूर मँडराते हुए भ्रमर और छाये हुए मेघ धूममालाके समान प्रतीत होते हैं।
महाराज ! देखिये, क्षार समुद्रके तटका यह भूभाग उपहार हाथमें लेकर आये हुए राजाओंसे भर गया है और उन सबका कोलाहल यहाँ व्याप्त हो गया है, जो बड़ा भला मालूम होता है।
देव ! पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तरके क्षार सागरतक इस जम्बूद्वीपमें जो नरेश इस भयंकर युद्धसे जीवित बच गये हैं, उन सबके मस्तकपर अपने चरण रखनेका अनुग्रह कीजिये तथा भिन्न-भिन्न जनपदोंके भूभागकी प्रत्येक दिशामें चिरकालिक रक्षाके लिये नीतिशास्त्रके अनुसार क्षमापूर्वक योग्य व्यक्तियोंको शान्त चित्तसे शासन-व्यवस्थाका अधिकार दीजिये। तत्पश्चात् अस्त्र-शस्त्र और अनुपम सेनाओंका बँटवारा कर दीजिये।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर उन चारों विपश्चितोंने समुद्रतटकी भूमिपर बैठकर राज्यका यह सारा प्रयोजन (मण्डलकी सीमा बाँधने आदिका कार्य) सिद्ध किया। इतनेमें ही मेघमालाके समान काली रात आयी और सब ओर फैल गयी। तत्पश्चात् वे सभी विपश्चित् जो दिनका कार्य पूरा कर चुके थे, सोनेके लिये अपनी शय्याओंपर आरूढ़ हुए। वे नदियोंके प्रवाहकी भाँति बहुत दूर समुद्रतक चले आये थे। इसलिये मन-ही-मन आश्चर्यसे चकित हो इस प्रकार विचार करने लगे—'यह सब ओर फैली हुई दृश्य-जगत्की शोभा कितनी विस्तृत होगी ? इस जम्बूद्वीपके बाद खारे पानीका समुद्र है। उसके बाद प्लक्षद्वीपकी भूमि है। तत्पश्चात् क्षार समुद्रसे दुगुना बड़ा इक्षुरसका समुद्र है। उसके बाद कुशद्वीप है। तदनन्तर सुराका सागर है। इसी प्रकार क्रमसे सात समुद्र और सात द्वीपोंके बाद अन्तमें क्या होगा ? फिर उसके बाद भी क्या होगा ? यह दृश्यरूपिणी माया न जाने कितनी बड़ी और कैसी होगी ? इसलिये हमलोग भगवान् अग्निदेवसे प्रार्थना करें। उनके वरदानसे हम अनायास ही इन सम्पूर्ण दिशाओंका अन्तिम सीमातक अवलोकन कर सकेंगे।' ऐसा सोचकर यथास्थान बैठे हुए वे सब विपश्चित् एक साथ ही भगवान् अग्निका आवाहन करने लगे। तब भगवान् अग्निदेव इन चारोंके समक्ष साकार होकर प्रकट हुए और बोले—'पुत्र ! मुझसे वर माँगो।'
विपश्चित् बोले-देव ! सुरेश्वर ! हम इस पञ्चभूतात्मक दृश्यजगत्का अन्त देखना चाहते हैं, जहाँतक इस देहसे जाना सम्भव हो सके, वहाँतक इस देहसे, जहाँ यह न जा सके वहाँ मन्त्रके प्रभावसे संस्कारयुक्त किये गये इसी शरीरसे, तथा जहाँ इस संस्कारयुक्त शरीरकी भी गति न हो सके, वहाँ मनसे जाकर हम दृश्य जगत्का अन्त देखें। जो जिस रूपमें मनसे प्रत्यक्ष होनेयोग्य तथा जाननेयोग्य हो उन सभी पञ्चभूतात्मक पदार्थोंका हम दर्शन कर सकें—यह उत्तम वर आप हमें दें। प्रभो ! सिद्ध योगी अपने योगके प्रभावसे जहाँतक जा सकते हों, वहाँतकका मार्ग हम इसी शरीरसे तै करें। जहाँ योगियोंकी भी पहुँच न हो, उस अगम्य दृश्यको हम मनसे ही देखें। सिद्ध योगियोंके गम्य मार्गपर चलते समय हमारी मृत्यु न