भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ०] * सिद्धों और सभासदोंद्वारा श्रीवसिष्ठजीको साधुवाद * ६८३


उच्चस्वरसे दिये गये साधुवादकी ध्वनि भी वहाँ गूँजने लगी । इन सबसे ऐसा महान् कोलाहल प्रकट हुआ, जिसने सम्पूर्ण दिशाओंको भर दिया । वह कोलाहल वायुपूरित छिद्रवाले कीचकोंकी मुरली-जैसी ध्वनिके समान मधुर था । सिद्धोंके साधुवादके साथ ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ भी बजने लगीं, जिनकी प्रतिध्वनिसे समस्त पर्वत व्याप्त हो गये । देवताओंकी दुन्दुभियोंके बजनेके साथ ही दिशाओंकी ओरसे फूलोंकी वर्षा होने लगी, जो हिमकी धारावाहिक वृष्टिके समान मनोहर जान पड़ती थी । उसने सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको आच्छादित कर दिया । साधुवादके शब्दोंके साथ देववाद्योंकी ध्वनि तथा पुष्पवृष्टिके घोषका वह मिश्रित शब्द-समुदाय वहाँ बड़ी शोभा पाने लगा । सारा भुवन भारी कोलाहलसे भरकर अद्भुत शोभा पाने लगा । उत्सवसे मतवाला हो उठा । देवताओं और चारणोंसे भर गया तथा भाँति-भाँतिके फूलोंसे अलंकृत होकर राजभवनके समान ही शोभा पाने लगा । धीरे-धीरे दुन्दुभियोंकी तुमुल ध्वनि, सिद्धसमूहोंके साधुवादजनित कोलाहल और पुष्पराशियों एक साथ ही द्युलोक और भूलोकके अन्तरालमें उसी तरह फैलने लगीं, जैसे सागरमें उठी हुई उत्ताल तरङ्गैं तटवर्ती पर्वतके पास पहुँच जाता हैं । देवताओंका वह कोलाहलपूर्ण समारम्भ जब क्षणभरमें शान्त हो गया, तब सिद्धोंके ये वचन कानोंमें सुनायी देने लगे ।

सिद्ध बोले—कल्पपर्यन्त सिद्धपुरुषोंकी अनेकानेक सभाओंमें मोक्षके उपायोंकी सहस्रों बार व्याख्याएँ हुईं और सुनी गयीं, परंतु उनमें जो मोक्षके उपाय बताये गये, वे कोई भी ऐसे नहीं थे । मुनिके इस वाक्य विलाससे—इस महारामायणके श्रद्धाप्रेमपूर्वक श्रवणसे तिर्यग्यो-निके जीव, स्त्रियाँ, बालक और सर्प भी परमानन्दको प्राप्त हुए हैं, इसमें संशय नहीं है । श्रीवसिष्ठजीने नाना प्रकारके दृष्टान्तों, हेतुओं और युक्तियोंद्वारा जैसे श्रीरामचन्द्रजीके प्रति परमात्म-तत्त्वके ज्ञानका वर्णन किया है, वैसे ये साक्षात् अपनी धर्मपत्नी अरुन्धतीजीके प्रति भी करते हैं या नहीं, इसमें संशय है । मुनिवर्णित मोक्ष-उपायके अनुष्ठानसे तिर्यग्यो निके जीव भी दुःख-शोकसे मुक्त हो गये हैं । फिर इस भूतलपर कौन-से ऐसे मनुष्य हैं, जो इसके अनुष्ठानसे मुक्त न होंगे । हम लोग अपने कानोंकी अञ्जलिसे इस ज्ञानामृतका पान करके परम उत्कृष्ट बोध-श्रीको प्राप्त हुए हैं । हमारी सिद्धियों पूर्ण तथा नवीन हो गयी हैं ।

सिद्धोंकी इस बातको सुनते हुए वहाँके लोगोंने आश्चर्यसे चकितनेत्र होकर देखा कि सभाकी भूमि कमल, पारिभद्र, पारिजात, सन्तानक और हरिचन्दन आदि फूलोंकी धारावाहिक वर्षासे भर गयी है । फूलोंके भारसे वहाँका विशाल चँदोवा इस तरह लटक रहा था, मानो जलसे भरा हुआ बादल नीचे झुक आया हो । इस प्रकार उस सभाकी अपूर्व शोभाका दर्शन करते हुए सभासदोंने उस समयके अनुरूप भूरि-भूरि प्रशंसापूर्ण साधुवाद देकर सर्वथा उद्यत हो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके द्वारा साष्टाङ्ग प्रणाम करके नमस्कारयुक्त कुसुमाञ्जलिसे वसिष्ठजीका पूजन किया । सभामें आये हुए राजाओंकी प्रणामपरम्परा जब कुछ शान्त हुई, तब हाथमें अर्घ्यपात्र लेकर राजा दशरथने मुनिकी पूजा करते हुए कहा—

राजा दशरथ बोले—अरुन्धतीनाथ ! गुरुदेव ! आपके सदुपदेशसे प्राप्त हुए बोधस्वरूप, क्षय-वृद्धिरहित, सर्वोत्कृष्ट निरतिशयानन्दमय आत्मवस्तुसे मेरे भीतर परम पूर्णता प्रकट हो गयी है । ब्रह्मन् ! इस भूतलपर तथा स्वर्गमें देवताओंके यहाँ भी ऐसी कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु नहीं है, जो आप पूज्य महापुरुषको कभी पूजनके रूपमें प्राप्त न हुई हो, तथापि मैं अपने लिये अवश्यकर्तव्य इस गुरुपूजनकी विधिको सफल बनानेके लिये अवसरके अनुरूप कुछ प्रार्थना करता हूँ । आप क्षमा करेंगे । मैं पत्नियोंसहित अपने इस शरीरसे, लौकिक और पारलौकिक सुखके लिये संचित किये गये शुभ कर्मसे