संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तथा समस्त भृत्यों और सामन्तोंसहित इस विशाल राज्यसे आपकी पूजा करता हूँ । प्रभो ! ये सारी वस्तुएँ निजी आश्रमकी भाँति ही आपके अधीन हैं। आप अपनी अभीष्ट इच्छाके अनुसार मुझे अपनी आज्ञाके पालनमें नियुक्त करें।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—भूपाल ! हम ब्राह्मणलोग प्रणाममात्रसे ही संतुष्ट हैं। केवल प्रणामसे ही हम प्रसन्न हो जाते हैं। वह प्रणाम आपने किया ही है। राज्यका पालन करना आप ही जानते है, यह आपको ही शोभा देता है । अतः यह सब राज्य यहाँ आपके ही अधिकारमें रहे । ब्राह्मण कहाँ भूमण्डलके पालनका भार उठाते हैं ?
राजा दशरथ बोले—मुने ! आपके इस गौरवपूर्ण उपदेशके सामने यह राज्य है ही कितना ! इस तुच्छ वस्तुको अर्पित करते हुए हम विशेष लज्जित हो रहे हैं । अतः भगवन् ! आप जैसा उचित समझें वही करें ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब महाराज दशरथ इस प्रकार कह चुके, तब श्रीराम उन महागुरुके चरणारविन्दोंमें पुष्पाञ्जलि अर्पित करनेके लिये उनके सामने खड़े हुए और नतमस्तक होकर बोले—'ब्रह्मन् ! आपने महाराजको निरुत्तर कर दिया है । प्रभो ! मेरे पास तो प्रणामके सिवा दूसरी कोई सार वस्तु है ही नहीं । अतः मैं यही लेकर आपके इन दोनों चरणोंकी वन्दना करता हूँ' यों कहकर श्रीरामने गुरुके चरणोंमें मस्तक रखकर वन्दना की और अपनी अञ्जलिके फूल उसी प्रकार चढ़ाये, जैसे वन पर्वतके चरणप्रान्तमें अपने पल्लवोंसे ओसके कण समर्पित करता है। उस समय उनके दोनों नेत्र आनन्दके आँसुओंसे भरे हुए थे। व्यवहारनीतिके ज्ञाता सुग्रीवने बड़ी भक्तिके साथ गुरुदेवको वारंवार प्रणाम किया । शत्रुघ्न, लक्ष्मण तथा उन्हींकी तुलनामें आनेवाले जो श्रीरामके दूसरे-दूसरे सखा निकट खड़े थे, उन सबने भी उन्हींकी भाँति शीघ्रतापूर्वक उन मुनीश्वरको प्रणाम किया । दूर खड़े हुए राजाओं, राजकुमारों और मुनियोंने दूरसे ही पुष्पाञ्जलि समर्पण एवं प्रणाम करते हुए वसिष्ठजीकी वन्दना की। उस अवसरपर वहाँ की गयी पुष्पाञ्जलियोंकी वर्षासे आच्छादित मुनिवर वसिष्ठजी उसी तरह दिखायी नहीं देते थे, जैसे हिमकी वृष्टिसे आच्छन्न हो गिरिराज हिमालय दिखायी नहीं देता है।
जब सिद्धोंकी बातें बंद हुईं, नगाड़ोंकी गड़गड़ाहट शान्त हुई, आकाशसे फूलोंकी वर्षा थम गयी और सभाका कोलाहल कम हो गया तथा प्रणाम करनेके अनन्तर श्रीराम आदिके साथ पूजा करनेवाले सभासद् जब शान्त वायुवाले मेघकी भाँति सौम्यभावको प्राप्त हो गये, तब सबका साधुवाद सुनते हुए अनिन्द्यात्मा मुनिनायक वसिष्ठ विश्वामित्र आदिको सम्बोधित करके मधुर वाणीमें बोले— 'गाधिकुलकमल मुनिवर विश्वामित्र, वामदेव, निमि, ऋतु, भरद्वाज,पुलस्त्य, अत्रि, धृष्टि, नारद, शाण्डिलि,भास, भृगु, भारण्ड, वत्स और वात्स्यायन आदि मुनियो ! आपलोगोंने जो मेरा यह तुच्छ भाषण सुना है, इसमें जो कोई बात स्पष्ट नहीं कही गयी हो, दूषित अर्थसे युक्त हो अथवा निरर्थक हो, उसेइस समय कृपा करके आप मुझे बतावें ।'
सभासद् बोले—ब्रह्मन् ! एकमात्र परमार्थ-तत्त्वसे सुशोभित होनेवाले आपके वचनमें कोई दूषित या अनुचित अर्थ होगा, यह आज नयी ही बात हमारे सुननेमें आयी है। अनन्त जन्मदोषसे हमारा जो पाप या मल संचित था, उसे आपने आज यहाँ उसी तरह धो डाला है, जैसे आग सुवर्णके दोषको दग्ध कर देती है । प्रभो ! जैसे आकाशमें फैली हुई शीतल चन्द्रमाकी दीप्तिसे कुमुद विकसित होते हैं, उसी तरह परब्रह्मकी व्याख्या करनेवाली और परमानन्दमयी शीतल आपकी वाणीद्वारा हम सब लोग विकासको प्राप्त हुए हैं । समस्त प्राणियोंको महान् बोध प्रदान करनेवाले, एकमात्र गुरु आप मुनिनायकको ये हम सब लोग प्रणाम करते हैं ।