संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका अपनी परमानन्दमयी स्थिति बताना * ६८५
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—तदनन्तर उन सबने पुनः मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर तथा ऊँची आवाजमें एक साथ 'आप मुनिनाथको नमस्कार है' यह कहकर आकाशसे सिद्धोंद्वारा छोडे गये नवीन पुष्पाञ्जलि-समूहोंसे वसिष्ठजीको उसी तरह आच्छादित कर दिया, जैसे बादल हिमकी वर्षासे पर्वतको ढक देते हैं । इसी प्रकार रघुनाथजीके अवतारका वृत्तान्त जाननेवाले उन सिद्धोंने राजा दशरथकी तथा चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए लक्ष्मीपति नारायणके अवतार श्रीरामकी भी प्रशंसा की ।
सिद्ध बोले—हमलोग चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए भाइयोंसहित नित्यमुक्त राजकुमार श्रीरामको, जो दूसरे नारायणके समान विराज रहे हैं, नमस्कार करते हैं । चारों समुद्र जिसके लिये खाईके समान हैं, उस सम्पूर्ण भूमण्डलके पालक तथा भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालमें भी कभी नष्ट न होनेवाले राजचिह्नोंसे सुशोभित महाराज दशरथको भी हम सिर झुकाते हैं । मुनिसेनाके स्वामी, भूमण्डलके पालक, भगवान् भास्करके समान भूरि तेजस्वी एवं उत्तम यशसे सम्पन्न मुनिवर वसिष्ठको तथा तपोनिधि विश्वामित्रको भी हम प्रणाम करते हैं; क्योंकि इन्हींके प्रभावसे हम सबने भ्रान्तिके विस्तारको भगानेवाली इस परम उत्तम ज्ञानयुक्तिको सुना है ।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—ऐसा कहकर आकाशसे सिद्धोंने पुनः फूलोंकी वर्षा की और प्रसन्नचित्त होकर पुनः चुपचाप सभामें बैठ गये । इसी प्रकार आकाशगामी सिद्धोंने वहाँ उपस्थित हुए जनसमुदायकी पुनः प्रशंसा की तथा सभासदोंने भी प्रचुर स्तुति करते हुए वहाँ उन सब सिद्धोंका पूजन किया । आकाशमें विचरनेवाले मुनीश्वरों, महर्षियों एवं देवताओंने और पृथ्वीपर विचरनेवाले ब्राह्मणों तथा राजाओंने भी पुष्पयुक्त अर्घ्यदानके साथ उच्चवाणीद्वारा वेगपूर्वक वहाँ उपस्थित जनसमुदायकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।
( सर्ग २०० )
गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका पुनः अपनी परमानन्दमयी स्थितिको बताना तथा वसिष्ठजीका उन्हें कृतकृत्य बताकर विश्वामित्रजीकी आज्ञा एवं भूमण्डलके पालनके लिये कहना, श्रीरामद्वारा अपनी कृतार्थताका प्रकाशन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—तदनन्तर सभामें धीरे-धीरे साधुवादकी ध्वनि शान्त हो गयी, ज्ञानोपदेश पाकर राजालोग अत्यन्त उल्लसित-से दिखायी देने लगे । सब लोगोंका संसारभ्रम दूर हो गया और सभी लोग सत्यका अनुसरण करनेवाले चित्तके द्वारा अपने पूर्व चरित्रका, जो अज्ञानसे कलुषित था, स्वयं ही उपहास करने लगे । सभामें बैठे हुए विवेकी पुरुष चित्तवृत्तिको अन्तर्मुखी करके ज्ञानस्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके अनुभवमें तत्पर हो ध्यानमग्नकी भाँति परम शान्त हो गये । भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी गुरुके आगे उन्हींके दीप्तिमान् मुखपर दृष्टि लगाये हाथ जोडे पद्मासन बाँधे बैठ गये तथा महाराज दशरथ ध्यानस्थ-से होकर अपने भीतर आदि, मध्य और अन्तमें पवित्रता बढ़ानेवाली जीवन्मुक्तकी अलौकिक स्थितिका अनुभव करने लगे ।
उस समय लोगोंके मनोरथका आदर करते हुए मुनिवर वसिष्ठजी अपने भक्त राजा आदिके द्वारा की जानेवाली पूजा ग्रहण करनेके लिये क्षणभर चुपचाप बैठे रहकर फिर शान्त वाणीमें बोले—'कमलनयन श्रीराम ! तुम रघुकुलके आकाशमें चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे हो । बताओ, अब अपनी इच्छाके अनुसार और क्या सुनना चाहते हो ? आज कैसी स्थितिका तुम स्वयं अनुभव करते हो ? यह स्पष्ट-रूपसे कहो । मुनिवर वसिष्ठके इस प्रकार आदेश देनेपर राजकुमार श्रीराम गुरुदेवके मुखकी ओर देखते हुए शान्त, मधुर एवं सुस्पष्ट वाणीमें बोले—