भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका अपनी परमानन्दमयी स्थिति बताना * ६८५


श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—तदनन्तर उन सबने पुनः मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर तथा ऊँची आवाजमें एक साथ 'आप मुनिनाथको नमस्कार है' यह कहकर आकाशसे सिद्धोंद्वारा छोडे गये नवीन पुष्पाञ्जलि-समूहोंसे वसिष्ठजीको उसी तरह आच्छादित कर दिया, जैसे बादल हिमकी वर्षासे पर्वतको ढक देते हैं । इसी प्रकार रघुनाथजीके अवतारका वृत्तान्त जाननेवाले उन सिद्धोंने राजा दशरथकी तथा चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए लक्ष्मीपति नारायणके अवतार श्रीरामकी भी प्रशंसा की ।

सिद्ध बोले—हमलोग चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए भाइयोंसहित नित्यमुक्त राजकुमार श्रीरामको, जो दूसरे नारायणके समान विराज रहे हैं, नमस्कार करते हैं । चारों समुद्र जिसके लिये खाईके समान हैं, उस सम्पूर्ण भूमण्डलके पालक तथा भूत, भविष्यत् और वर्तमानकालमें भी कभी नष्ट न होनेवाले राजचिह्नोंसे सुशोभित महाराज दशरथको भी हम सिर झुकाते हैं । मुनिसेनाके स्वामी, भूमण्डलके पालक, भगवान् भास्करके समान भूरि तेजस्वी एवं उत्तम यशसे सम्पन्न मुनिवर वसिष्ठको तथा तपोनिधि विश्वामित्रको भी हम प्रणाम करते हैं; क्योंकि इन्हींके प्रभावसे हम सबने भ्रान्तिके विस्तारको भगानेवाली इस परम उत्तम ज्ञानयुक्तिको सुना है ।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—ऐसा कहकर आकाशसे सिद्धोंने पुनः फूलोंकी वर्षा की और प्रसन्नचित्त होकर पुनः चुपचाप सभामें बैठ गये । इसी प्रकार आकाशगामी सिद्धोंने वहाँ उपस्थित हुए जनसमुदायकी पुनः प्रशंसा की तथा सभासदोंने भी प्रचुर स्तुति करते हुए वहाँ उन सब सिद्धोंका पूजन किया । आकाशमें विचरनेवाले मुनीश्वरों, महर्षियों एवं देवताओंने और पृथ्वीपर विचरनेवाले ब्राह्मणों तथा राजाओंने भी पुष्पयुक्त अर्घ्यदानके साथ उच्चवाणीद्वारा वेगपूर्वक वहाँ उपस्थित जनसमुदायकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।

( सर्ग २०० )


गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका पुनः अपनी परमानन्दमयी स्थितिको बताना तथा वसिष्ठजीका उन्हें कृतकृत्य बताकर विश्वामित्रजीकी आज्ञा एवं भूमण्डलके पालनके लिये कहना, श्रीरामद्वारा अपनी कृतार्थताका प्रकाशन

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—तदनन्तर सभामें धीरे-धीरे साधुवादकी ध्वनि शान्त हो गयी, ज्ञानोपदेश पाकर राजालोग अत्यन्त उल्लसित-से दिखायी देने लगे । सब लोगोंका संसारभ्रम दूर हो गया और सभी लोग सत्यका अनुसरण करनेवाले चित्तके द्वारा अपने पूर्व चरित्रका, जो अज्ञानसे कलुषित था, स्वयं ही उपहास करने लगे । सभामें बैठे हुए विवेकी पुरुष चित्तवृत्तिको अन्तर्मुखी करके ज्ञानस्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके अनुभवमें तत्पर हो ध्यानमग्नकी भाँति परम शान्त हो गये । भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी गुरुके आगे उन्हींके दीप्तिमान् मुखपर दृष्टि लगाये हाथ जोडे पद्मासन बाँधे बैठ गये तथा महाराज दशरथ ध्यानस्थ-से होकर अपने भीतर आदि, मध्य और अन्तमें पवित्रता बढ़ानेवाली जीवन्मुक्तकी अलौकिक स्थितिका अनुभव करने लगे ।

उस समय लोगोंके मनोरथका आदर करते हुए मुनिवर वसिष्ठजी अपने भक्त राजा आदिके द्वारा की जानेवाली पूजा ग्रहण करनेके लिये क्षणभर चुपचाप बैठे रहकर फिर शान्त वाणीमें बोले—'कमलनयन श्रीराम ! तुम रघुकुलके आकाशमें चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे हो । बताओ, अब अपनी इच्छाके अनुसार और क्या सुनना चाहते हो ? आज कैसी स्थितिका तुम स्वयं अनुभव करते हो ? यह स्पष्ट-रूपसे कहो । मुनिवर वसिष्ठके इस प्रकार आदेश देनेपर राजकुमार श्रीराम गुरुदेवके मुखकी ओर देखते हुए शान्त, मधुर एवं सुस्पष्ट वाणीमें बोले—

६८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


श्रीरामने कहा—प्रभो ! मैं आपके कृपाप्रसादसे परम निर्मल हूँ। मुने ! मैं अपने-आपमें ही विश्राम-सुखका अनुभव करता हूँ। बाह्य इन्द्रियोंकी दृष्टिसे परे हूँ। मनकी भी मुझतक पहुँच होनी कठिन है। मैं सर्वथा निर्विकार हूँ। जैसे आकाशको मुट्ठियोंसे नहीं बाँधा जा सकता, उसी प्रकार आशाएँ मुझे बाँध नहीं सकती हैं। जैसे सुगन्ध वृक्षगत पुष्पसे ऊपर उठकर आकाशमें पहुँचकर उस पुष्पसे परे हो जाती है, उसी प्रकार मैं देहातीत और सर्वत्र समभावसे स्थित हूँ। जैसे अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध सभी राजा बहुत काम-धन्धेवाले राज्योंमें सुखपूर्वक विचरते हैं, उसी प्रकार मैं हर्ष, विषाद और आशासे रहित, स्थिर, एक तथा समतापूर्ण दृष्टिसे सम्पन्न एवं आत्मनिष्ठ होनेके कारण सर्वत्र निःशङ्क होकर विचरता हूँ। प्रभो ! मैं सर्वोपरि सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ। मुझमें विषयसुखकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। मुझे अपनी इच्छाके अनुसार आज्ञा-पालनके कार्यमें नियुक्त कीजिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे आकाश शान्त आकाशमें विश्राम प्राप्त करता है, उसी प्रकार तुम्हें अत्यन्त सम एवं शीतल आत्मामें पूर्ण विश्राम प्राप्त है। वत्स ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि ज्ञानस्वरूप तुमने अपने बोधके द्वारा रघुकुलकी भूत, भविष्य और वर्तमान परम्पराको पवित्र कर दिया है। राघवेन्द्र ! अब तुम मुनीश्वर विश्वामित्रजीकी याचना पूर्ण करके पिताके साथ इस पृथ्वीका पालन करते हुए सुखसे रहो। सौभाग्यशाली राजकुमार ! तुम-जैसे महापुरुषके साथ रहकर पुत्र, भृत्य, बन्धु-बान्धव, पैदल, रथ, हाथी और अश्वमण्डलसहित समस्त रघुवंशी शरीरसे नीरोग, मनसे निर्भय तथा घरोंमें सुस्थिर लक्ष्मीसे सम्पन्न हो सदा अभ्युदयशाली बने रहें।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—सभामें वसिष्ठजीकी यह बात सुनकर सब राजा तथा अन्य लोग अमृतकी धारासे सींचे हुएकी भाँति मनमें अत्यन्त शीतलता एवं शान्तिका अनुभव करने लगे। कमलनयन श्रीराम अपने मनोहर मुखचन्द्रसे उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे सुधा-भरे चारु चन्द्रमाके उदयसे सम्पूर्ण क्षीरसागर उल्लसित हो उठता है। तत्त्वज्ञानविशारद वामदेव आदि मुनि बड़े आदरसे बोले—'अहो ! भगवान् वसिष्ठने अद्भुत ज्ञानका वर्णन किया'। शान्त अन्तःकरणवाले राजा दशरथ भी प्रसन्नतासे प्रकाशित हो रहे थे। उनके सारे अङ्ग संतोषसे ही हृष्ट-पुष्ट हो गये थे। उनपर ज्ञानकी नयी दीप्ति छा रही थी।

तत्पश्चात् श्रीराम बोले—मुने ! मैं ऐसे परमानन्दमें सदा निमग्न हूँ, जिसके प्राप्त होनेपर फिर किसीको कभी खेद नहीं हो सकता। मैं चिरसुखी हूँ। सदा उदित हूँ एवं सनातन पुरुषार्थस्वरूप हूँ।

(सर्ग २०१-२०२)


मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना और दूसरे दिन प्रातःकाल सबके सभामें आनेपर श्रीरामका गुरुके समक्ष अपनी कृतकृत्यता प्रकट करना

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब इस प्रकार मुनिवर वसिष्ठ तथा श्रीरामचन्द्रजी परस्पर विचार कर रहे थे, उस समय मानो उन दोनोंका संवाद सुननेके लिये भगवान् भास्कर आकाशके मध्यभागमें आ पहुँचे। तुरत ही सम्पूर्ण दिशाओंमें पदार्थसमूहोंको प्रकाशित करनेके लिये श्रीरामकी महामतिके समान धूप तेज हो गयी। कमलोंसे भरे हुए सरोवर उस सभामें बैठे हुए हृदयकमलके खिल जानेसे विकसित आकारसे सुशोभित राजाओंके समान बड़ी शोभा पाने लगे। इतनेहीमें मध्याह्नकालकी सूचना देनेवाले शङ्ख, मुखोंकी स्निग्ध

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना * ६८७


उद्दाम वायुसे पूरित हो प्रलयकालकी प्रचण्ड वायुसे व्याप्त हुए महासागरोंके समान गम्भीर घोष करते हुए बज उठे। उस समय निदाघकी ज्वालाको शान्त करनेके लिये सौभाग्यवती स्त्रियोंद्वारा छिड़के गये कर्पूरमिश्रित जलसे वहाँ नूतन जलदमाला-सी छा गयी। फिर महाराज दशरथ समस्त सामन्तों, भूपालों, परिजनों एवं अङ्गरक्षक सेवकों आदिके साथ सभासे उठे। मुनिवर वसिष्ठ, श्रीराम तथा संसद्के अन्य सदस्य भी उठ गये। राजा, राजकुमार, मन्त्री और मुनि परस्पर एक-दूसरेसे सम्मानित हो बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने निवासस्थानको गये। तत्पश्चात् जब मध्याह्नकालके वाद्योंकी ध्वनि दीवालोंसे टकराकर प्रति-ध्वनित हुई, तब वाक्यप्रयोगमें निपुण मुनिवर वसिष्ठने यह बात कही—'रघुनन्दन ! तुमने सुननेयोग्य सब बातें सुन लीं, ज्ञेय तत्त्वोपदेशको पूर्णरूपसे जान लिया। अब तुम्हारे लिये दूसरी कोई जाननेयोग्य उत्तम बात शेष नहीं है। जैसा मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, जैसा तुम शास्त्रोंसे देखते हो और जैसा स्वयं अनुभव करते हो, उन सबकी एकवाक्यता कर लो। महामते ! अब समयोचित कार्य करनेके लिये उठो। हमलोग भी स्नान करनेके लिये जा रहे हैं। यह हमारे मध्याह्न-कालिक उपासनाका समय व्यतीत हो रहा है। भद्र ! यदि तुम्हें कोई और शुभ प्रश्न पूछना हो तो उसे कल प्रातःकाल पुनः पूछ लेना।'

मुनिनाथ वसिष्ठके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा राजा दशरथने उस सभामें आये हुए समस्त साधुपुरुषों, मुनियों, ब्राह्मणों, राजाओं तथा आकाशचारी देवताओंका भी वसिष्ठ आदिकी बतायी हुई विधिसे श्रीरामके साथ पूजन किया। मणियों और मुक्ताओंकी राशियाँ भेंट कीं, दिव्य पुष्प अर्पण किये, नाना प्रकारके रत्न प्रदान किये, मोतियोंके हार समर्पित किये, प्रेमपूर्वक प्रणाम किया, धन दिया, वस्त्र, आसन, अन्नपान, सुवर्ण, भूमि, धूप, गन्ध और पुष्पमालाएँ प्रदान कीं। इस प्रकार उन प्रशंसनीय भूपालने शास्त्रोक्त रीतिसे उन सभीका पूजन किया। तदनन्तर दूसरोंको मान देनेवाले वे नरेश वसिष्ठ आदि देवर्षियों तथा सभासदोंके साथ उस सभासे उसी प्रकार उठे, जैसे सायंकाल चन्द्रमा आकाशसे उदित होते हैं। मधुर वाणी बोलनेवाले वे दशरथ आदि सब राजा और साधु-मुनि एक दूसरेसे सम्मानित हो परस्पर विदा ले स्नेहयुक्त संतुष्ट हृदयसे अपने-अपने आश्रमोंको गये, मानो सातो लोकोंके निवासी देवता इन्द्रपुरीसे अपने-अपने धाममें जा रहे हों। एक दूसरेका क्रमशः प्रेमपूर्वक समादर करके सब विदा ले अपने-अपने घरमें आये और दिनके आवश्यक कार्यमें लग गये। वसिष्ठ आदि समस्त मुनियों तथा दशरथ आदि राजाओंने दिनके आवश्यक कार्य पूर्ण किये। जब वे सब लोग न्यायसे प्राप्त दैनिक कार्य सम्पन्न कर चुके, तब आकाशपथिक सूर्यदेव क्रमशः आगे बढ़ते हुए अस्ताचलको जा पहुँचे। महामति श्रीराम तथा अन्य लोग रातमें भी वैसी ही ज्ञान-चर्चा करते रहे; इसलिये उनकी वह रात शीघ्र ही व्यतीत हो गयी। फिर अन्धकाररूपी धूल और तारारूपी पुष्पराशियोंके कूड़े-करकटको हटाकर जगत्-रूपी भवनको घरकी तरह साफ-सुथरा बनाते हुए सूर्यदेवका शुभागमन हुआ। तत्पश्चात् राजा, राजकुमार, मन्त्री और वसिष्ठ आदि मुनि फिर राजा दशरथकी सभामें आये, उस समय जब दशरथ आदि नरेश और सुमन्त्र आदि सचिव आसनपर विराजमान मुनिवर वसिष्ठकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे, कमलनयन बुद्धिमान् श्रीराम गुरु और पिताके सामने उपस्थित हो कोमल वाणीमें इस प्रकार बोले—

श्रीरामने कहा—ब्रह्मन् ! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही मैं भी मानता हूँ कि मेरी बुद्धि कृतकृत्य हो रही है। मैं परम निर्वाणस्वरूप एवं शान्त हूँ। मुझे किसी बातकी आकाङ्क्षा नहीं है। जो कुछ

६८८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कहने योग्य बात थी, आपने कह दी और मैंने ज्ञेय तत्त्वको भलीभाँति जान लिया। अब कृतकृत्यताको प्राप्त हुई आपकी यह वाणी विश्राम करे।
(सर्ग-२०३)


श्रीवसिष्ठ और श्रीरामका संवाद, दृश्यका परिमार्जन, सबकी चिदाकाशरूपताका प्रतिपादन, श्रीरामका प्रश्न और उसके उत्तरमें श्रीवसिष्ठद्वारा प्रज्ञप्तिके उपाख्यानका आरम्भ

श्रीवसिष्ठजी बोले—महाबाहो ! तुम फिर मेरी उत्तम बात सुनो; क्योंकि जैसे दर्पण बारंबार पोंछने या परिमार्जित करनेपर अधिक स्वच्छ एवं शोभित होता है, उसी प्रकार बारंबार चर्चा होनेसे भ्रमका निवारण होता है। जिससे बोध शुद्ध होकर निखर उठता है। रूप और नाम—दो ही प्रकारके दृश्य हैं। इनमें पहला अर्थ है और दूसरा शब्द—दोनों ही भ्रम हैं और इनका मार्जन आवश्यक है। अर्थ क्या है ? भ्रमको समझनेका एक संकेत। अर्थकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। एक वस्तुको समझनेके लिये अनेक शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन सबके अर्थ पृथक्-पृथक् होनेपर भी उनसे अनेक वस्तुओंकी उपलब्धि नहीं होती। इस तरह अर्थ-भ्रमका परिमार्जन हुआ। अर्थके बिना शब्द जलके कलकल नादकी भाँति निरर्थक है, अतः वह शब्दताको छोड़कर अर्थरूपताको प्राप्त होता है; इस तरह अर्थभ्रमके मार्जनके साथ उस शब्द-भ्रमका मार्जन भी हो जाता है। वास्तवमें यह दृश्य स्वप्नकी भाँति चेतनका संकल्पमात्र है। जगत्की उत्पत्ति कब और कहाँ हुई है ? जब जाग्रत् ही मिथ्या है, तब स्वप्नकी क्या बात है ! क्योंकि जाग्रत् ही संस्कारद्वारा स्वप्नदृष्ट पदार्थ बनकर स्मरणके समान अपने अर्थभूत वस्तुसे शून्य होकर सामने आता है। इसलिये वह चेतनका संकल्पमात्र होकर दूसरे आकारमें विस्तारको प्राप्त हुआ है। जैसे मुझमें स्वप्न-जगतरूप निर्मल चिदाकाश रूपवान् होता हुआ भी रूपरहित है, उसी प्रकार यह त्रिभुवन भी साकार दीखता हुआ भी निराकार ही है।

श्रीरामने कहा—ब्रह्मन् ! इस प्रकार विचार करनेसे न तो कुछ उत्पन्न हुआ है और न कुछ नष्ट ही हुआ है। यह जगत् जैसेका तैसा चिन्मय ब्रह्म है और अपने आपमें ही स्थित है। जैसे द्रव ही जल है, उसी तरह चेतनमें स्फुरण नामक जो स्वरूपका विस्तार है, वही यह जगत् कहा गया है। सम्यग्दर्शनसे जिसकी बुद्धि प्रबुद्ध हो गयी है, उसकी दृष्टिमें यह जो जगत्का भान है, वह अभानरूप ही है। वास्तवमें सब कुछ शून्य चिदाकाश ही है और वही परमार्थ है। अज्ञानीकी बुद्धिमें यह जगत् जैसा भी प्रतीत होता हो, होता रहे, उसपर हमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! तुमने इस विषयको जैसा समझा है और आगमोंने भी जैसा इसका वर्णन किया है, वह सब ज्यों-का-त्यों ठीक है। अब बताओ, हम यहाँ और क्या वर्णन करें ?

श्रीरामने पूछा—ब्रह्मन् ! बताइये, यह चिन्मय महाकाश ब्रह्माण्डके रूपमें कैसे परिणत हो गया ? इस ब्रह्माण्डकी विशालता कितनी है और यह कबतक रहेगा ?

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप रघुनन्दन ! जिसका बिना किसी कारणके भान होता है, उसका वह भान कुछ भी नहीं है। वास्तवमें परमार्थस्वरूप ब्रह्म ही उस रूपमें दीखता हुआ अपने परमार्थस्वरूपसे ही स्थित है। महामते ! इस विषयमें कभी किसीने अपने उत्तम बोधकी पुष्टिके लिये मुझसे एक महान् प्रश्न किया था। तुम उस उत्कृष्ट एवं महान् प्रश्नको सुनो। त्रिलोकीमें जिसकी बड़ी ख्याति है और जो दोनों ओरसे दो समुद्रोंद्वारा

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * यह जगत् ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्म ही है, इसका विवेचन * ६८९


घिरा हुआ है, वह कुशद्वीप इसी भूतलपर स्थित सात महाद्वीपोंमेंसे एक है। वह भूमण्डलको कंगनके आकारमें घेरकर बसा हुआ है। वहाँ पूर्वोत्तर दिशामें इलावती नामसे प्रसिद्ध एक सुवर्णमयी-सी नगरी है। उस नगरीके पूर्वभागमें एक राजा थे, जिनका नाम प्रज्ञप्ति था। जगत्‌के सारे प्राणी उनमें अनुरक्त थे। वे इस सृष्टिमें दूसरे इन्द्रके समान प्रतिष्ठित थे। एक समय किसी कारणवश मैं प्रलयकालमें आकाशसे गिरे हुए सूर्यकी भाँति उस राजाके समीप जा पहुँचा। उसने पुष्प, अर्घ्य और आचमनीय आदिके द्वारा मेरी पूजा की और पास बैठकर मुझसे बहुत से प्रश्न किये।

( सर्ग २०४-२०६ )


यह जगत् ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्म ही है, इसका विवेचन

राजाके प्रश्नोंके उत्तरमें मैंने कहा—राजन् ! मैं तुमसे स्पष्ट शब्दोंमें तत्त्वज्ञानकी बात बता रहा हूँ, जिससे तुम्हारे सारे संदेह पूर्णतः निर्मूल हो जायेंगे। पहले यह समझ लो कि जगत्‌के सारे पदार्थ सदा ही असत् हैं और सदा ही ये सत् भी हैं; क्योंकि इनकी स्थिति कल्पनाके अनुसार है। जहाँ अमुक वस्तु इस रूपमें ही है, ऐसी निश्चित बुद्धि होती है, वहाँ वह पदार्थ वैसा ही होता है, फिर वह सत् हो या असत्। इस विषयमें आग्रह नहीं है। जैसे स्वप्नमें स्वप्नद्रष्टा चिदात्मा ही स्वप्नगत जगत्‌के आकारमें भासित होता है, उसी प्रकार सृष्टिके आरम्भमें समस्त कारणोंका अभाव होनेसे चिदाकाश ही इस जाग्रत् जगत्‌के आकारमें भासित होता है। इसलिये इस जाग्रत्कालिक जगत्में स्वप्नजगत्‌से भिन्नता क्या है ? इस प्रकार विशुद्ध ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही इस जगत्‌के रूपमें भासित होता है, इसलिये इस जगत्‌में ब्रह्मसे भिन्नता क्या रही ? इस प्रकार निर्विकार परब्रह्म परमात्माकी ही जगत्‌के रूपमें स्थिति होनेके कारण जगत् विशुद्ध ब्रह्म ही है। लोक, वेद और महान् शास्त्रोंद्वारा पूर्वापर विचार करके मैंने यही अनुभव किया है और इस अनुभूति—ज्ञानको ही यहाँ प्रकट किया है। समस्त भूतोंमें नित्य चिदात्मा ही सत्तारूपसे सर्वत्र परिपूर्ण है—इस बातको महात्मा पुरुषोंने भी बारम्बार कहा है; तथापि जगत्की नित्य चैतन्यरूपताका अपलाप ( निराकरण ) करके जो मूढ़ मनुष्य अन्धकारपूर्ण कूपमें रहनेवाले मेढकोंके समान व्यर्थ ही टर्र-टर्र करते हैं; आपाततः वर्तमान नाम-रूपके अनुभवको ही प्रमाण मानकर यह कहते हैं कि संवित् या चेतनता कोई नित्यवस्तु नहीं है। वह शरीरसे ही प्रकट होती है; इसलिये शरीर ही उसका कारण है। दूसरे शब्दोंमें उनका कहना है कि जड़से ही चैतन्यकी अभिव्यक्ति हुई है। ऐसी भ्रान्त धारणासे जो लोग मोहमें पड़े हुए हैं, वे उन्मत्त हैं—पागल हैं और मूर्ख हैं। ऐसे लोग हमलोगोंकी ज्ञानचर्चामें भाग लेने योग्य नहीं हैं। जिनका मस्तिष्क ठीक है, उनमें और पागलोंमें क्या बातचीत हो सकती है! वैसे ही मूर्खों और तत्त्वज्ञानियोंमें संलाप होना कैसे सम्भव है! जिस विद्वत्कथासे सारे संदेहोंका निवारण न हो जाय, वह तीनों लोकोंमें कहीं भी क्यों न हुई हो, उसे मूर्ख-कथा ही समझना चाहिये।

राजन् ! प्रजाजनोंको अपने घरमें रहते हुए भी सम्बन्धशून्य, आकाररहित और दूर देशमें घटित वृत्तान्तोंद्वारा जिस प्रकार शुभाशुभ फलकी प्राप्ति होती है, उसे बताता हूँ, सुनो—ब्रह्म ही अज्ञानवश दृश्य समझ लिया गया है, इसलिये दृश्यके रूपमें प्रतीत होता है और जब उसकी ब्रह्मस्वरूपताका बोध हो जाता है, तब यह सम्पूर्ण दृश्य ब्रह्म ही है, ऐसा अनुभव होने लगता है। इसलिये यह जगत् ब्रह्मसंकल्पनगरके रूपमें स्थित है। संकल्पनगरमें जब जिस-जिस वस्तुके विषयमें जैसा संकल्प किया जाता है, वह-वह वस्तु उस समय वैसी ही आकृति धारणकरके अनुभव-में आने लगती है। जैसे तुम्हारे इस संकल्पगृहमें जो

६९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यह प्रजा है, वह तुम्हारे संकल्पके अनुसार बनी है, उसी तरह ब्रह्मके संकल्पसे सम्पन्न हुए जगत्में यह प्रजा ब्रह्म-संकल्पके अनुसार ही होती है। अपने इस संकल्पनगरमें जैसा तुमने चाहा है, वैसा सब कुछ यहाँ स्थित है और आगे जैसा संकल्प करोगे, वैसा ही सब कुछ देखोगे।

राजन्! चिदाकाशके संकल्प-नगरके भीतर स्थित हुए इस दृश्यजगत्का ऐसा स्वभाव ही है कि यह कभी प्रकट होता है कभी लुप्त हो जाता है और फिर क्षण-भरमें ही प्रकट हो जाता है। बच्चोंके संकल्प-नगरके समान तथा आकाशमें स्थित केशोंके वर्तुलाकार गोले आदिकी भाँति ये सत्-असत्-रूप असंख्य सर्ग चेतना-काशमय परमात्मामें भासित होते हैं। तुम एक संकल्प-नगरका निर्माण करके दूसरे संकल्पके वशीभूत हो स्वयं ही उसी क्षण उसका विनाश कर डालते हो। यह जैसे तुम्हारा अपना स्वभाव है, वैसे ही चिदाकाशके संकल्प-नगरमें जो उन्मज्जन निमज्जन - उन्मेष-निमेष होते हैं, वह ब्रह्मके स्वभावका निर्मल विकास ही है, ऐसा समझो। इसलिये चैतन्यघन, अनादि-अनन्त महाकाश ही त्रिलोकाकाश बना हुआ है। इस कारण वह आज जो कुछ भी करता और सोचता है वह सब उस आचरण-रहित ब्रह्म परमात्माके सत्यसंकल्पसे सैकड़ों योजन दूर और अनेक युगोंके व्यवधानके बाद भी समीप और वर्तमान कालमें किये गये कर्मकी भाँति अपना फल प्रकट करने-वाला होता है। देशान्तर और कालान्तरमें भी जो आवरणशून्य एकमात्र आत्मा है, उसमें देश और काल दोनोंका सदा सांनिध्य रहता है; इसलिये कौन-सा ऐसा कर्म और फल है, जिसे वह न जानता हो। जैसे चमकती हुई मणिमें अपनी कान्तिमे ही दीप्तिविशेषके आविर्भाव-तिरोभावका अनुभव होता है, उसी प्रकार चिदाकाशरूपी मणिमें जगतोंके सृष्टि, प्रलय और विविध फलभोगरूप परिवर्तन अनुभूत होते हैं। शास्त्रके विधि और निषेधसम्बन्धी वचनोंका प्रयोजन है लोकमर्यादाकी रक्षा। वह सर्वव्यापी ब्रह्मके सङ्कल्पमें स्थित है, इसलिये परलोकमें भी जीवको फलकी प्राप्ति करानेवाली होती है। ब्रह्म न कभी उदित होता है, न अस्त। जैसे द्रष्टा, दृश्य आदिकी कल्पनासे युक्त जो तुम्हारा कल्पना-नगर है, वह स्वयं तुम हो, उसी प्रकार ब्रह्मके संकल्पसे प्रकट हुआ जगत् स्वयं ब्रह्म ही है। जब वह जगत्के रूपमें भासित होता है, उस समय 'जगत्की सृष्टि हुई,' ऐसा कहा जाता है; परन्तु यह केवल कहनेके लिये है, वास्तवमें ऐसी बात नहीं है।

चिद्-घन-परमात्माका यह सुस्पष्ट स्वभाव ही है कि वह जिस-जिसका संकल्प करता है, तत्काल ही वे पदार्थ वहाँ अवयवोंसहित प्रकट हो जाते हैं। संकल्प-कल्पित पदार्थ स्वभाववश नानारूपसे स्थित होनेपर भी परब्रह्ममें चिन्मय-रूपसे भासित होते हैं तथा स्वभावतः अनेक आकारवाले होनेपर भी उनका सार-तत्त्व एक ही होता है अर्थात् वे सद्रूपसे एक ही होते हैं। इस प्रकार आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अनन्त शक्तिशाली ब्रह्म किंचित्-अकिंचित् तथा सत्-असत् दोनों रूपोंसे स्थित है। वह सर्वात्मक है, इसलिये प्राणियोंमें और तृण-गुल्म तथा पेड़-पौधे आदिमें, जहाँपर जो वस्तु जैसे और जिस स्वभावसे स्थित है वहाँपर वैसे स्वभावसे युक्त होकर वह स्वयं ही विराजमान है।

राजन्! संकल्प-नगररूप इस जगत्में जो असम्भव हो ऐसी कोई बात नहीं है। वह जगत् अपने संकल्प-कर्ता इस चिदात्मा परब्रह्मसे भिन्न नहीं है। इसलिये तुम सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्म ही समझो।

(सर्ग २०७-२०९)

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा प्रज्ञातिके प्रश्नोंपर श्रीवसिष्ठजीका विचार एवं निर्णय * ६९१


राजा प्रज्ञातिके प्रश्नोंपर श्रीवसिष्ठजीका विचार एवं निर्णय

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राजन् ! यदि ध्यान करनेवाला उपासक आत्मज्ञानके सुखकी अनुभूतिसे वञ्चित होनेके कारण यही चिन्तन करे कि 'मैं इस चन्द्रमामें ही प्रवेश करूँ' तो वह इसीमें प्रवेश करता है। 'मैं चन्द्रमण्डलके सुखसे सम्पन्न होकर चन्द्रमामें प्रवेश करूँ' ऐसा चिन्तन करनेवाला उपासक वैसे ही सुखका भागी होता है, यह निश्चय है। यह उपासक दृढ़ निश्चयके साथ जैसे स्वभावका ध्यान करता है, उसकी अक्षय चेतना वैसे ही स्वभावका अनुभव करती है। जैसे सभी ध्यानकर्ताओंको अपने-अपने संकल्पके अनुसार पृथक्-पृथक् चन्द्रत्वका अनुभव होता है, वैसे ही स्त्रीचिन्तन करनेवाले पुरुषोंको अपनी-अपनी कल्पनाके अनुसार अलग अलग काल्पनिक स्त्रीलाभकी प्रतीति होती है। जो घरसे बाहर न निकलकर भी सातों द्वीपोंका राजा बना बैठा है, उसका वह कल्पनासिद्ध साम्राज्य उसके घरमें ही चिदाकाशके भीतर भासित होता है।

राजन् ! दान, श्राद्ध, तप और जप आदि अमूर्त कर्मोंका परलोकमें जो मूर्तिमान् फल प्रकट होता है वह कैसे सम्भव है, यह बताया जाता है, सुनो। उनकी बुद्धि उन दान आदि सत्कर्मोंके संस्कारसे भावित होती है। अतः वे परलोकमें अमूर्त रहकर ही मूर्तिमान् फलको देखते और अनुभव करते हैं। वह फल चिन्मय स्वरूपसे ही अनुभवमें आता है। मन और ज्ञानेन्द्रियोंसे वेदना और अवेदनाकार भ्रान्ति होती है। इस भ्रान्तिके द्वारा विषयप्राप्तिके लिये वह चिन्मय जीव मनसहित कर्मेन्द्रियोंसे प्रेरित हो सचेष्ट एवं निश्चेष्ट होता है। फिर उस भ्रान्तिकी निवृत्ति होनेपर वह निर्मल, शान्त, चिन्मय आत्मा ही शेष रहता है। इस लोकमें किये गये दानसे परलोकमें चिन्मय संकल्परूप भिन्न-भिन्न फलकी प्राप्ति होती है। उसे संकल्परूप जीव प्राप्त करता है। ऐसा विद्वानोंका कहना है। फिर वह फल परलोकमें क्यों न मिले। इस कल्पनामय संसारमें अकृत्रिम संकल्प ही चिन्मय फलरूप होकर चारों ओर उपलब्ध होता है। भले ही वह दान न करनेके कारण दारिद्र्यजनित दुःखके रूपमें प्राप्त हुआ हो अथवा दान करनेसे ऐश्वर्य-भोगके रूपमें उपलब्ध हुआ हो। वह सब का-सब होता है चिन्मय ही। राजन् ! तुमने जैसा पूछा था, उसके अनुसार यह सब मैंने बता दिया। यह सारा जगत् आकारशून्य तथा चिन्मय ब्रह्मका संकल्पमात्र है।

राजाने पूछा—भगवन् ! सृष्टिके आदिमें जब एक निराकार चिदाकाश ही था, तब उसके द्वारा देहकी कल्पना कैसे सम्भव हुई (क्योंकि शरीरमें ही चैतन्यकी अभिव्यक्ति देखी जाती है, अव्यक्त चैतन्यमें भ्रान्ति आदि नहीं देखी जाती। ऐसी दशामें पहले भ्रान्तिकी सिद्धि हो, तब देहकी सिद्धि हो सकती है और देहकी सिद्धि हो तभी भ्रान्तिकी सिद्धि हो सकती है, यह अन्योन्याश्रय दोष आता है)। तथा शरीरके बिना चैतन्यकी अभिव्यक्ति कैसे सम्भव है !

श्रीवसिष्ठजी बोले—महामते ! तुमने देह शब्दका जो अर्थ समझा है, वह तत्त्वज्ञानीके प्रति उसी तरह असम्भव है, जैसे आकाशमें पत्थरोंका नाचना। तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें जो ब्रह्म शब्दका अर्थ है, वही देह शब्दका भी अर्थ है। इन दोनोंके अर्थमें वैसे ही भेद नहीं है, जैसे अम्बु और अम्बस् शब्दोंके अर्थमें (अम्बु और अम्बस् दोनों जलके ही वाचक हैं, उसी तरह ब्रह्म और देह एक ही अर्थके बोधक हैं)। स्वप्नदेहके समान यह शरीर भी ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं है। यदि कहो कि स्वप्नदेह भी ब्रह्म ही है तो उसे भिन्न-सा मानकर उसका दृष्टान्त क्यों दिया जाता है ? तो इसके उत्तरमें निवेदन है कि यह तुम्हारे समझनेके लिये युक्तिमात्र दी गयी है। वास्तवमें स्वप्नदेहको उससे भिन्न बताना

६९२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अभीष्ट नहीं है; क्योंकि स्वप्न भी ब्रह्म ही है। स्वप्नका तुम्हें अनुभव है, इसलिये उसके द्वारा तुम्हें समझाया जाता है। ‘स्वप्नमें यह शरीर कौन है, ये स्वप्नगत पदार्थ किसके हैं अथवा किसमें स्वप्नबुद्धि है’ इत्यादि रूपसे विचार करके ज्ञानीके द्वारा समझे गये भ्रमरूपी स्वप्नसे अज्ञानीको बोध कराया जाता है। ब्रह्ममें न जाग्रत् है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति है और न और ही कुछ है। किंतु मन-वाणीसे अगोचर, तुरीय ओंकारस्वरूप परम पुरुषार्थमय, स्वयंप्रकाश चिदाकाश ही इस जगत्‌के रूपमें भासित होता है। आज जो यह विश्व इस तरह भासित-सा होता है, इसे अभासित ही समझो। पहले जिस तरह सच्चिदानन्दघनरूपसे भासित था, उसी तरह वह अब भी अत्यन्त निर्मल है। जाग्रत्, स्वप्न आदि अवस्थाएँ इसमें कदापि नहीं हैं। यह द्वैत-अद्वैत सब कुछ ब्रह्ममय ही है। पूर्ण परब्रह्म परमात्मासे पूर्णका ही प्रसार होता है। अतः पूर्ण परमात्मरूपसे ही यह जगत् स्थित है। न तो कभी इसका भान हुआ है और न अभान। स्फटिक शिलाके घनीभूत मध्यभागकी भाँति यह सदा सच्चिदानन्दघन ही है। लोक, शास्त्र, वेद आदिमें जो वस्तु युक्ति, प्रमाण और अनुभवसे सिद्ध है, वह सिद्ध ही है। वही वस्तु स्वानुभवसे जानी जाती है। अतः परम पुरुषार्थरूपसे फल देती है। अन्य सब वस्तुओंका निराकरण करके जिस एक वस्तुका चिरकालतक चिन्तन किया जाता है, उसीकी अवश्य प्राप्ति होती है। लोकमें सब जगह देखा जाता है कि दूसरी-दूसरी वस्तुएँ भी चिरकालतक चिन्तित या भावित होनेपर अवश्य प्राप्त हो जाती हैं। महात्मन् ! मतिमान् नरेश ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे महान् प्रश्नोंपर विचार करके यह अपना निर्णय बताया है। तुम शीघ्रतापूर्वक इसी मार्गके पथिक बन जाओ तथा मनसे निश्चिन्त, शरीरसे नीरोग और इन्द्रियोंसे वासनाशून्य होकर सर्वश्रेष्ठ हो जाओ।

(सर्ग २१०)


सिद्ध आदिके लोकोंकी संकल्परूपता बताते हुए इस जगत्‌को भी वैसा ही बताना और ब्रह्ममें अहम्भावका स्फुरण ही हिरण्यगर्भ है, उसका संकल्प होनेके कारण त्रिलोकी भी ब्रह्म ही है—इसका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इलावती नगरीमें बैठकर राजा प्रज्ञप्तिपर अनुग्रह करनेका जो मेरा प्रयोजन था, उसे पूरा करके उस राजाद्वारा सम्मानित मैंने स्वर्गलोकमें जानेके लिये आकाशमार्गका आश्रय लिया।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर और देवताओंके लोक तथा वहाँके निवासी कैसे दिखायी देते हैं ? यह मुझे बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर, देवताओं तथा अन्य अपूर्व महात्मा प्राणियोंके लोकोंको यदि तुम विशेष धारणाओंद्वारा देखनेका प्रयत्न करो तो प्रतिरात, प्रतिदिन, आगे, पीछे, ऊपर और नीचे देख सकते हो और न देखना चाहो तो नहीं देख सकते हो। जैसे सिद्धोंके ये कल्पनालोक हैं, उसी तरह हमारा यह लोक भी काल्पनिक ही है।

सिद्धोंने लोकोंकी रचना करके अपने संकल्पसे उन सबको स्थिर कर लिया है। सारा जगत् सदा निराकार निर्विकार शान्तस्वरूप चिदाकाश ही है। जिसने जैसा दृढ़ निश्चय किया, उसकी दृष्टिमें यह वैसा ही प्रतीत होता है। उससे भिन्न प्रकारका नहीं। जो वस्तु दृढ़ निश्चयसे प्रकाशित होती है, वह चिन्मय स्वभावसे युक्त होनेके कारण प्रकाशरूपसे ही भासित दिखायी देती है। किंतु यह विश्व किसीको दृढ़ निश्चयपूर्वक विदित नहीं है; इसलिये इसमें स्वभावतः चित्सत्ता और स्फूर्तिकी व्याप्ति नहीं है। इसलिये यह सब शून्य और निराकार

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सिद्ध आदिके लोकोंकी संकल्परूपता बताते हुए जगत्‌को वैसा ही बताना * ६९३


है । ब्रह्म जैसा पहले था, ठीक वैसा ही अब भी है । उसमें किसी प्रकारका विकार नहीं आता । जैसे खममें चिदाकाश अपने स्वरूपसे च्युत हुए बिना ही खमगत पदार्थोंके रूपमें भासित होता है, उसी प्रकार चिदाकाश अपने स्वरूपसे विकृत हुए बिना ही इस विश्वके रूपमें प्रतीत होता है । वह इस विश्व-विवर्तका अधिष्ठान ही है । न तो कारण है और न विकारी है । संकल्पमें चित्त जैसे आकारकी कल्पना करके पर्वत आदिकी लीलासे उदित होता है, वास्तवमें न वह पर्वत है और न वह आकाश है, उसी तरह ब्रह्ममें जगत्‌की स्थिति है । ब्रह्म ही जगत्‌के रूपमें प्रतीत होता है, ब्रह्मसे भिन्न जगत्‌की कोई सत्ता नहीं है । परम बुद्धिमान् जीवन्मुक्त महात्मा सब प्रकारकी चेष्टाओंसे विरत होते हुए भी कठपुतलियोंके समान व्यवहार करते हुए-से प्रतीत होते हैं । जैसे संकल्प-नगर निराकार होता हुआ भी चित्तके समक्ष साकार-सा स्थित होता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें स्थित यह जगत् निराकार होनेपर भी साकार-सा दीखता है; परंतु वास्तवमें निराकार ही है । ये तीनों लोक चिरकालसे अनुभूत और अर्थक्रियाकारी होनेपर भी खम-नगरके समान निराकार तथा शून्य ही है । चिरकालसे पुरुषके नित्य अनुभवमें आनेपर भी यह जगत्रूपी पदार्थ उसी तरह कुछ भी नहीं है, जैसे स्वप्नमें ही अपना मरण । स्वप्नमें मरे हुए पुरुषको अपना दाह-संस्कार भी होता दिखायी देता है । वह असत् होकर भी सत्-सा भासित है, उसी तरह परब्रह्म परमात्मामें दीखनेवाला जगत् भी असत् ही है; किंतु भ्रमसे सत्-सा प्रतीत होता है ।

रघुनन्दन ! ब्रह्माकाश चिन्मय होनेके कारण स्वयं ही अपनेको 'मैं अहंकारात्मक समष्टिरूप हिरण्यगर्भ हूँ' ऐसा अनुभव-सा करता है । उसका यह संवेदन ही परमेष्ठी हिरण्यगर्भका स्वरूप है और यह त्रिलोकी उस हिरण्य-गर्भका ही संकल्प है । ऐसी स्थितिमें न तो ब्रह्मा कभी उत्पन्न हुआ और न इस दृश्य जगत्‌की ही उत्पत्ति हुई । अजन्मा परब्रह्म परमात्मा ही पूर्ववत् जैसे-का-तैसा विराज-मान है । चिदाकाशमें जो जगत्‌का रूप भासित होता है, वह उसकी प्रातिभासिक सत्ता ही है, पारमार्थिक सत्ता नहीं है । वह मृगतृष्णाके समान मिथ्या ही है । दिखायी देनेपर भी असत् ही है । जगत्‌के रूपमें यह सूनी ही भ्रान्ति प्रकट हुई है अथवा वह भी प्रकट नहीं हुई है । भ्रान्ति क्या है और कहाँसे आयी है, सर्वत्र सदा सब कुछ निराकार ब्रह्म ही तो है । जगत् ब्रह्मरूपी जलका भँवर है । इसमें द्वैत और एकत्व कैसा ? भँवर और जलमें कहाँ द्वैत है, और जब द्वैत ही नहीं है तब एकता भी कहाँ क्या हुई ? जैसे वायु अपने स्पन्दनको, आग अपनी उष्णताको और पूर्ण चन्द्रमा अपनी शीतलताको जानता है, उसी प्रकार ब्रह्म अपनी सत्ताको स्वयं ही अर्थरूप होकर जानता है । इस प्रकार यह ब्रह्म सदा ही अपने इस स्वरूप-स्फुरणको तथा 'अहम्' आदि अहंकारात्मक समष्टिको जानता है । सृष्टि, उसका अभाव तथा आकाशरूप ब्रह्म सर्वत्र तथा सर्वदा है । अविद्यादृष्टिसे कभी इसका यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ और विद्यादृष्टिसे देखनेपर यह जगत् कभी कुछ रहा ही नहीं । श्रीराम ! बद्ध-पुरुषकी दृष्टिसे ब्रह्म सदा त्रिभुवन-सा भासित होता है । किंतु मुक्तकी दृष्टिसे यह सब शान्त एवं सम ब्रह्म ही है । यहाँ नाना पदार्थोंकी कोई सत्ता नहीं है । आकाशसे कभी वृक्ष और पर्वत नहीं उत्पन्न होते हैं, उसी तरह ब्रह्मसे जगत्‌की उत्पत्ति नहीं होती है । ऐसा निश्चय करके परम शान्त हो जाना चाहिये ।

श्रीरामजी बोले—ब्रह्मन् ! उस परमपदमें अहंभावका भान होनेपर आगे क्या होता है, आप यह जान चुके हैं । अतः आपसे इस विषयको मैं सुनना चाहता हूँ । मुझे सुननेसे तृप्ति नहीं हो रही है ।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! परमपदमें अहंभावकी

६९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ


स्फूर्ति होनेपर उसमें सबसे पहले आकाशसत्ताका अध्यास होता है; फिर दिक्-सत्ता, कालसत्ता और भेद सत्ताका उदय (अध्यास) होता है। जब आत्माको देह आदिमें अहं का भान होता है, तब देहसे भिन्न स्थलमें 'यहाँ मैं नहीं हूँ' इसका भी अवश्य भान होता है। यह देशकृत परिच्छेद कहलाता है। इस रीतिसे आत्मा ही नाना प्रकारका कालकृत और वस्तुक्रुत परिच्छेद स्वीकार करके बिना क्रमके ही द्वैतरूप होकर आकाशमें उदित होता है। फिर इन पूर्वोक्त आकाशात्मक पदार्थभेद-सत्ताओंके नामकरणकी बुद्धि उत्पन्न होती है, जिससे जाति, गुण और क्रिया आदिकी दृष्टिसे इनमें परस्पर भेद किया जा सके। परंतु वास्तवमें वह सब चिदाकाश ही है। इस प्रकार निराकार परमपदमें अहंभावसे देश, काल आदिकी कल्पनाओंके सिद्ध होनेपर अर्थात् उस परब्रह्म परमात्माके देश-कालादि-रूपसे स्थित होनेपर जो यह दृश्य नामक आभासरूप वस्तुकी प्रतीति होती है, वह सब निर्वाध ब्रह्म ही है, जो ब्रह्मसे भिन्न-सा प्रतीत होता है।

रघुनन्दन ! तुम तो समस्त दृश्य पदार्थोंसे मुक्त, सब ओर प्रकाशमान, सर्वस्वरूप, निर्मलस्वभाव, आत्मनिष्ठ, निरतिशय आनन्दमय, परमशान्तचित्त, आकाशके समान मनोहर एव तृणारहित हो। अब तुम धर्मके अनुसार राज्यका पालन करो।

(सर्ग २११-२१३)


सभासदोंका कृतार्थता-प्रकाशन तथा वसिष्ठजीकी आज्ञासे महाराज दशरथका ब्राह्मणोंको भोजन कराना और सात दिनोंतक दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महामुनि वसिष्ठजी जब इतना कह चुके, तब तत्काल ही आकाशसे वर्षा करनेके लिये जलसे भरे हुए मेघके समान गम्भीर घोषके साथ देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। भूतलपर हिमकी वर्षाके समान दिव्य पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी, जिसने समस्त दिग्वधुओंके मुख उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित कर दिये। उस सभामें यथास्थान नीचे बैठे हुए समस्त सभासदोंने वे दिव्य पुष्प लेकर वसिष्ठजीके चरणोंमें पुष्पाञ्जलि अर्पित की और सबने सब प्रकारसे दुःख-शोकको त्याग दिया।

तत्पश्चात् राजा दशरथ बोले—भगवन् ! आपके उपदेशसे हमारी आत्मा परमपदमें सुखपूर्वक प्रवेश पानेके योग्य हो गयी है। हम संसाररूपी अत्यन्त विस्तृत एवं दुर्गम मार्गपर चिरकालसे चलते रहनेके कारण थक गये थे। परंतु आज आपकी उपदेश-वाणीसे शुद्ध हो उस परमपदमें उसी तरह विश्रामका सुख उठा रहे हैं, जैसे शरत्कालके उज्ज्वल मेघ हिमालय आदि पर्वतपर विश्राम करते हैं। पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये अवश्य करने योग्य कर्मोंकी अवधि आज पूरी हो गयी—हमलोग कृतकृत्य हो गये। हमने आपत्तियोंकी चरम सीमा देख ली—अब इनसे पिण्ड छूट गया; क्योंकि हमें ज्ञेय-तत्त्वका सम्पूर्ण रूपसे ज्ञान हो गया और हम परमपदमें विश्राम पा रहे हैं।

श्रीरामजी बोले—मुनीश्वर ! आपकी वाणी सुनकर इतना सुख मिल रहा था, मानो अमृतका अभिषेक प्राप्त हो रहा हो। उसे बारंबार याद करके मैं परम पूजित और शान्त होनेपर भी रह-रहकर हर्षित-सा हो उठता हूँ। अब मुझे न तो कोई कर्मसे प्रयोजन है और न उसे न करने (छोड़ने) से ही। मैं जैसे हूँ, उसी तरह निश्चिन्त हूँ। आपके उस उपदेश-वचनसे विश्राम-सुखका जैसा उपाय प्राप्त हुआ है, वैसा दूसरा कौन होगा, दूसरी दृष्टि भी कैसी होगी? अहो ! हमें विश्रामसुखकी असीम विस्तार-वाली भूमि प्राप्त हो गयी है। आपकी कृपाके बिना मनुष्य इस

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सभासदों का कृतार्थता-प्रकाशन तथा दशरथका दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना * ६९५


ज्ञान-दृष्टिको कैसे जान सकता है ? भला, पुल या जहाजके बिना बालक समुद्रको कैसे पार कर सकता है ?

लक्ष्मणजी बोले—आज मुनिवर वसिष्ठजीकी वाणीसे जो बोध प्राप्त हुआ है, वह अनन्त जन्म-जन्मान्तरोंसे बढ़ी हुई दुर्वासनाओंके कारण उत्पन्न होनेवाले संशयोंका नाशक है तथा जन्म-जन्मान्तरोंसे संचित किये गये सैकड़ों पुण्योंके उत्तम फलको प्रकट करनेवाला है। इस बोधसे विचारके लिये उद्यत हुए मेरे मनमें आज पूर्ण चन्द्रमाके समान आह्लाद प्रदान करनेवाला परमात्मप्रकाश उदित हो गया है। ऐसी निरतिशयानन्द प्रकाशरूप आत्मदृष्टिके प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर भी लोग अपने दुर्भाग्यके कारण सैकड़ों दोषपूर्ण दशाओं द्वारा दुःखी आगसे सूखे काठकी भाँति जलाये जा रहे हैं। यह महान् आश्चर्य है।

श्रीविश्वामित्रजीने कहा—अहो ! हमारे लिये बड़े हर्षकी बात है कि वसिष्ठ मुनिके मुखसे हमें यह परम पवित्र महान् ज्ञान सुननेको मिला, जिससे हमलोग सहस्रों वार गङ्गामें स्नान किये हुएके समान अत्यन्त पवित्र होकर बैठे हैं।

नारदजीने कहा—मैंने ब्रह्मलोकमें, स्वर्गमें और भूतलपर भी आजसे पहले जिसे नहीं सुना था, उस परम तत्त्वज्ञानको सुनकर मेरे दोनों कान पवित्र हो गये।

शत्रुघ्नने कहा—भगवन् ! आपके उपदेशसे मैं परमानन्दमें निमग्न हूँ। शान्त हूँ। परमपदको प्राप्त हो गया हूँ और सदाके लिये परिपूर्ण हूँ। केवल सुखस्वरूपसे स्थित हो गया हूँ।

राजा दशरथ बोले—हमारे अनेक जन्मोंके संचित पुण्यसे ही इन धीर मुनीश्वरने हमको उस परम उत्तम ज्ञानका उपदेश दिया, जिससे हम सभी परम पवित्र हो गये।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब राजाके साथ समस्त सभासद् वहाँ इस तरहकी बातें कह रहे थे, उस समय महर्षि वसिष्ठ ज्ञानसे पवित्र हुई वाणीद्वारा यों बोले—'राजन् ! रघुकुलचन्द्र ! अब मैं जो कहता हूँ, उसे करो। इतिहास-कथा सुननेके पश्चात् ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। इसलिये आज इन ब्राह्मणसमूहोंको सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुएँ देकर इनकी अभिलाषा पूर्ण करो। इससे तुम्हें वेदार्थतुल्य इस महारामायणके श्रवणका पूरा-पूरा तथा अक्षय फल प्राप्त होगा। मोक्षकी उपायभूत कथा-वस्तुकी समाप्ति होनेपर एक तुच्छ एवं दरिद्र मनुष्यको भी अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणका पूजन करना चाहिये। फिर आप-जैसे महाराजके लिये तो कहना ही क्या है ?

मुनिका यह वचन सुनकर राजा दशरथने सहस्रों वेद-वादी ब्राह्मणोंको दूत भेजकर बुलवाया। मथुरामें, सुराष्ट्र देशमें तथा गौड़ देशमें जो ब्राह्मण निवास करते थे, उनके कुलोंसे ब्राह्मणोंको बुलवाकर उन सबका पूजन किया। अधिक-से-अधिक ज्ञान-विज्ञानवाले ब्राह्मणोंको प्रधानता देते हुए भूपालने दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें उनकी रुचिके अनुसार भोजन करानेके पश्चात् दान-दक्षिणा भी दी। इस तरह ब्राह्मणोंका पूजन करके देवताओं, पितरों, राजाओं, पुरवासियों, मन्त्रियों, सेवकों, दीन-दुखियों तथा अन्धोंको भी भोजन एवं दान-मानसे संतुष्ट किया। इस प्रकार संसारकी सीमाके अन्तमें पहुँचे हुए राजा दशरथने उस दिन बड़ा भारी उत्सव किया। महाराज दशरथ अविनाशी परमपदको प्राप्त हो चुके थे। बोधरूपी सूर्यके उदयसे संसाररूपी रात्रिका अन्त हो गया था। इसलिये वे बड़े हर्षसे लगातार सात दिनोंतक महान् उत्सव मनाते रहे। जिसमें दान, भोजन तथा धन-वितरण-का कार्यक्रम निरन्तर चलता रहा।

(सर्ग २१४)

६९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


श्रीवाल्मीकि-भरद्वाज-संवादका उपसंहार, इस ग्रन्थकी महिमा तथा श्रोताके लिये दान, मान आदिका उपदेश

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—मेरे शिष्यशिरोमणि परमबुद्धिमान् भरद्वाज ! इसी प्रकार तुम भी इसी कमनीय तथा निर्मल ब्रह्मात्मदृष्टिका दृढ़तापूर्वक अवलम्बन करके वीतराग संदेहशून्य शान्तचित्त जीवन्मुक्त होकर सुखसे रहो । निष्पाप भरद्वाज ! इस ज्ञानका आश्रय ले तुम्हारी बुद्धि यदि आसक्तिशून्य रही तो घने मोहान्धकारमें पड़ने और मूढ़ होनेपर भी नष्ट नहीं होगी। बेटा भरद्वाज ! तुम्हारी बुद्धि तो स्वाभाविक ही आसक्तिके बन्धनसे मुक्त है । परंतु आज इस मोक्षसंहिताको सुनकर तुम वास्तवमें मुक्ततर हो गये—सर्वश्रेष्ठ जीवन्मुक्त हो गये । इन पवित्र तथा ब्रह्मका प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान करनेवाले मोक्षोपायोंका यदि कोई बालक भी श्रवण कर ले तो वह तत्त्वज्ञानी हो सकता है । फिर तुम-जैसे महात्मा पुरुषके लिये तो कहना ही क्या है ? सत्पुरुषोंकी नीति (शिक्षा)से, उनकी उत्तम सेवासे, उनके सामने प्रश्न करनेसे तथा उनकी उदारतापूर्ण ज्ञानचर्चामें भाग लेनेसे प्रमादशून्य श्रेष्ठ-बुद्धिवाले अधिकारी पुरुष उसी प्रकार ज्ञेय आत्मतत्त्वको जान लेते हैं, जैसे श्रीवसिष्ठजीके सङ्गसे श्रीराम आदिने जाना था। तृणारूपी चर्ममयी रस्सीसे दृढ़तापूर्वक बँधी हुई अज्ञानीके हृदयमें जो देह और इन्द्रिय आदिके प्रति तादात्म्याध्यासरूप तथा पुत्र-कलत्रादिके प्रति ममतारूप ग्रन्थियाँ बद्धमूल हो गयी हैं, वे सब इस मोक्षशास्त्रकी कथाओंपर विचार करते रहनेसे सर्वथा खुलकर एकरसताको प्राप्त हो जाती हैं । बेटा ! दूसरी बहुत-सी बातें कहनेसे क्या लाभ ? इतना ही जान लो कि जो लोग इन महामहिमाशाली मोक्षोपायोंका ज्ञान प्राप्त करेंगे, वे तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठतम होकर फिर कभी संसारबन्धनमें नहीं पड़ेंगे । जो सत्पुरुष इस ग्रन्थको बहुश्रुत विद्वान्‌के सामने स्वयं भलीभाँति विचारकर इसे पूर्णतः समझ लेनेके पश्चात् स्वयं भी सुननेकी इच्छावाले लोगोंको उपदेश देंगे, वे पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होंगे । उन्हें दूसरे वचनोंका आश्रय लेनेकी क्या आवश्यकता है ? जो अर्थानुसंधानकी अपेक्षा न रखकर केवल इसका पारायण करेंगे अथवा जो इस पुस्तकको लिखेंगे तथा जो उत्तम तीर्थक्षेत्रमें व्याख्यानकुशल श्रेष्ठ वक्ताको इसकी कथा कहनेके लिये नियुक्त करेंगे, वे यदि सकामभाववाले होंगे तो राजसूययज्ञके फलसे युक्त हो बारंबार स्वर्गलोकमें जायँगे और यदि निष्काम होकर उक्त कार्य करेंगे तो उत्तम कुलमें जन्म तथा सद्गुरुके मुखारविन्दसे सत्-शास्त्रके श्रवणका सुयोग पाकर तीसरे जन्ममें उसी तरह मोक्ष प्राप्त कर लेंगे, जैसे पुण्यवान् पुरुष धन-सम्पत्तिको पा लेते हैं । पूर्वकालमें अचिन्त्यरूपवाले ब्रह्माजीने मेरेद्वारा रचित इस ग्रन्थपर पूर्ण विचार करके यह बात कही थी कि 'इसमें सत्यस्वरूप ब्रह्मका निर्वचन होनेके कारण यह मोक्षमयी उत्तम संहिता है ।' उन महर्षिकी यह वाणी असत्य नहीं हो सकती । मोक्षोपाय नामक कथात्मक प्रबन्धरूप इस महारामायणकी कथा समाप्त होनेपर उत्तम बुद्धिवाले श्रोताको चाहिये कि वह वक्ताको प्रयत्नपूर्वक सुन्दर भवन देकर अभीष्ट अन्न-पानके दानसे ब्राह्मणोंका पूजन करे । इतना ही नहीं, उन सबको यथाशक्ति मनोवाञ्छित धनकी दक्षिणा आदि भी देनी चाहिये । भरद्वाज ! तुम्हें बोध प्रदान करनेके लिये मैंने सैकड़ों कथा-क्रमोंसे विशाल कलेवर हुए इस निर्मल दृष्टान्तों और युक्तियोंसे सम्पन्न तथा ब्रह्मतत्त्वकी विस्तृत व्याख्यासे युक्त 'महारामायण-शास्त्रको श्रवण कराया है। इसे सुनकर जीते-जी ही समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर ज्ञान, तपस्या और कर्मके फलसे युक्त अक्षय सम्पत्ति प्राप्त करके सदाके लिये पूर्ण परमानन्दमें निमग्न हो जाओ ।

( सर्ग २१५ )

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन * ६९७

अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन, शिष्योंका गुरुजनोंके प्रति आत्मनिवेदन तथा ब्रह्मको एवं ब्रह्मभूत वसिष्ठजीको नमस्कार

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—राजन् ! वसिष्ठजीका श्रीराम आदिके प्रति दिया हुआ यह सदुपदेश मैंने तुमसे कहा—इस ग्रन्थमें बताये हुए तत्त्वमार्गसे चलकर तुम निश्चय ही उस परम पदको प्राप्त कर लोगे ।

राजा अरिष्टनेमिने कहा—भगवन् ! आपकी यह दृष्टि संसार-बन्धनका विनाश करनेवाली है, जिसके पड़ते ही मैं संसार-सागरसे पार हो गया ।

देवदूत बोला—देवाङ्गने ! ऐसा कहकर आश्चर्यसे चकित नेत्रवाले राजा अरिष्टनेमि मुझसे स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें बोले—

‘देवदूत ! आपको नमस्कार है । प्रभो ! आपका भला हो । सत्पुरुषोंकी मैत्री सात पग साथ चलनेसे ही हो जाती है, ऐसा कहा गया है । उसे आपने सत्य कर दिखाया । अब आप देवराजके भवनको लौट जाइये । आपका कल्याण हो । मैं इस मोक्षशास्त्रकी कथाके श्रवणसे परम संतुष्ट एवं आनन्दमग्न हो गया हूँ । मैंने जो कुछ सुना है उसका चिन्तन करता हुआ अब यहीं रहूँगा । मेरी सारी चिन्ता दूर हो चुकी है ।’

भद्रे ! राजा अरिष्टनेमिके ऐसा कहनेपर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । जिसे मैंने पहले कभी नहीं सुना था, वह ज्ञानका सारभूत तत्त्व मुझे सुननेको मिला है । उसीसे मेरा अन्तःकरण इस समय अत्यन्त आनन्दमग्न हो गया है । अमृत पीकर छके हुए पुरुषकी भाँति मैं पूर्णतः तृप्तिका अनुभव कर रहा हूँ । तदनन्तर वाल्मीकिजीसे विदा ले मैं यहाँ तुम्हारे निकट मानो तुम्हें उपदेश देनेके लिये ही चला आया था । निष्पाप देवाङ्गने ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें कह सुनाया । अब मैं यहाँसे इन्द्रभवनको जाऊँगा ।

अप्सरा बोली—महाभाग देवदूत ! आपको नमस्कार है । आपने मुझे जो तत्त्वज्ञान सुनाया है, उससे मुझे बड़ा संतोष प्राप्त हुआ । मैं कृतार्थ हो गयी । मेरा सारा शोक जाता रहा । अब मैं सदा निश्चिन्त रहूँगी । आपका कल्याण हो । आप अपनी इच्छाके अनुसार देवराज इन्द्रके समीप जाइये ।

अग्निवेश्यने कहा—वत्स कारुण्य ! तदनन्तर वह सुरुचि नामवाली श्रेष्ठ अप्सरा गन्धमादनके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर बैठकर देवदूतके मुखसे सुने हुए उसी तत्त्वज्ञानका चिन्तन करने लगी । बेटा ! क्या तुमने वसिष्ठजीका उपदेशरूप यह महारामायण शास्त्र सुना ? (मोक्षका साधन कर्म है या कर्मत्याग, ऐसा जो तुम्हारा संदेह था, क्या वह दूर हो गया ?) उस समस्त उपदेशपर पूर्णतः विचार और निश्चय करके तुम जैसा चाहो, वैसा करो ।

कारुण्य बोला—भगवन् ! इस समय तत्त्वज्ञान होनेसे मेरी स्मृति, वाणी और दृष्टि-सत्ता सभी निर्विषय हो गये हैं । तात्पर्य यह कि अब मेरे लिये इस लोकमें न तो कुछ स्मरणीय रहा, न वर्णनीय रहा और न दर्शनीय ही रह गया । ठीक वैसे ही, जैसे खम और वन्ध्यापुत्रके विषयमें स्मृति, वाणी और दृष्टिके लिये कोई आधार नहीं रह जाता है । मेरे लिये सारी सांसारिक स्थिति वैसी ही हो गयी है, जैसी निर्जल मरुप्रदेशमें मरीचिकाकी । अर्थात् जैसे मृगतृष्णाका जल मिथ्या है, उसी तरह यह दृश्यप्रपञ्च भी मेरे लिये असत् हो गया है । अब मुझे न कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन है; क्योंकि मैं कृतार्थ हो गया, तथापि लोक-संग्रहके लिये न्यायतः प्राप्त कर्म करता रहूँगा । हठद कर्म छोड़ देनेके लिये भी क्या आग्रह है ।

६९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अगस्ति बोले—सुतीक्ष्ण ! ऐसा कहकर अग्निवेश्यका विद्वान् पुत्र कारुण्य, जो कृतकृत्य हो चुका था, वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त हुए कर्मका समय-समयपर यथोचित रीतिसे अनुष्ठान करने लगा। अतः सुतीक्ष्ण ! मोक्षका साधन ज्ञान है या कर्म—ऐसा संशय नहीं करना चाहिये। संशय करनेसे जीव परम पुरुषार्थरूपी स्वार्थसे भ्रष्ट हो जाता है। संशयात्माका विनाश हो जाता है।

अगस्तिमुनिका यह वचन अनेक अर्थोंमें एकताका बोध करानेवाला था। इसे सुनकर सुतीक्ष्णने गुरुदेवको प्रणाम किया और उनके निकट विनयपूर्वक कहा।

सुतीक्ष्ण बोले—भगवन् ! आपकी कृपासे मेरा अज्ञान और उसका कार्यरूप जगत् नष्ट हो गया। मुझे सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। जैसे दीपक रहनेपर उसके प्रकाशके सहारे नट, नर्तक आदि रङ्गमञ्चपर नृत्य-अभिनय आदि क्रियाएँ करते हैं, उसी तरह जिस साक्षी स्वयं-ज्योति नित्य प्रकाश परमात्माके निष्क्रियरूपसे स्थित होनेपर ही सब सचेष्ट मूर्तियाँ अपनी-अपनी चेष्टाओंमें प्रवृत्त होती हैं तथा जैसे सुवर्ण ही कंगन, बाजूबंद, केयूर और नूपुरोंके रूपमें स्फुरित होता है एवं जैसे जलमें तरङ्ग-मालाएँ प्रकट होती हैं, उसी तरह जिससे यह सम्पूर्ण दृश्य स्फुरित होता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यह सम्पूर्ण जगत् है। उस पूर्ण ब्रह्ममें ही यह पूर्ण ब्रह्मरूप जगत् स्थित है। ऐसा विचारकर मेरे समक्ष वर्ण और आश्रमके अनुसार जैसा व्यवहार प्राप्त होता है, उस व्यवहारका अनुसरण करता हूँ। संत-महात्माओंके वचनका कौन उल्लङ्घन कर सकता है। भगवन् ! मैं आपके प्रसादसे ज्ञेय-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करके कृतार्थ हो गया हूँ। गुरुदेव ! आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें भूमिपर दण्डवत् पड़ा हूँ। गुरुका कौन-सा प्रत्युपकार करके शिष्य उनके ऋणसे उऋण हो सकते हैं ? इसलिये शिष्योंको चाहिये कि वे अपने आपको मन, वाणी और शरीरद्वारा गुरुकी सेवामें समर्पित कर दें। यही उनका गुरुके ऋणसे उद्धार है, दूसरे किसी कर्मसे वे उद्धार नहीं पा सकते। स्वामिन् ! मैं आपके कृपाप्रसादसे भवसागरसे पार हो गया हूँ और अपने पूर्ण परमानन्दसे सम्पूर्ण जगज्जालको मैंने पूरित कर दिया है। अब मैं संशयरहित हो गया हूँ। 'यह सारा जगत् ब्रह्म ही है, क्योंकि यह ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता, ब्रह्ममें ही लीन होता और ब्रह्मसे ही जीवन-धारण करता है'—इस प्रकार सामवेदमें श्रुतिके द्वारा जिसका सुस्पष्ट वर्णन किया गया है, उस सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है। जो ब्रह्मानन्दस्वरूप अथवा ज्ञानोपदेशद्वारा ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति करानेवाले, परम सुखद, अद्वितीय ज्ञानमूर्ति, द्वन्द्वोंसे रहित, आकाशसदृश निर्मल, 'तत्त्वमसि' आदि वेदान्त महावाक्योंके लक्ष्यार्थरूप, एक, नित्य, निर्मल, निश्चल, सम्पूर्ण बुद्धि-वृत्तियोंके साक्षी, समस्त भावोंसे परे तथा तीनों गुणोंसे रहित हैं, उन पर-ब्रह्मस्वरूप श्रीवसिष्ठजीको हम नमस्कार करते हैं।

( सर्ग २१६ )

निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध सम्पूर्ण

संक्षिप्त योगवासिष्ठ सम्पूर्ण

क्षमा-प्रार्थना और नम्र निवेदन । ६९९

क्षमा-प्रार्थना और नम्र निवेदन

योगवासिष्ठ महारामायण ग्रन्थका अद्वैत ब्रह्म-प्रतिपादक शास्त्रोंमें बड़े महत्त्वका स्थान है। इसमें बड़ी ही सुन्दर सुबोध युक्तियों, आख्यानों तथा इतिहास-कथाओंके द्वारा जगत्‌की असत्ता एवं एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मसत्ताका प्रतिपादन किया गया है। एक ही तत्त्वका प्रतिपादक होनेसे ग्रन्थमें पुनरुक्ति बहुत अधिक है। इस महान् ग्रन्थका सार 'कल्याण' के विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित करनेके लिये 'कल्याण' के बहुसंख्यक ग्राहकोंका बहुत पुराना आग्रह था। भगवान्‌की कृपासे वह आज पूरा हो रहा है। इसमें तत्त्व-निरूपण तो है ही, साथ-ही-साथ शास्त्रोक्त सदाचार, सत्पुरुष-सङ्ग, त्याग-वैराग्ययुक्त सत्कर्म, वस्तु-विवेक, सद्गुण, आदर्श व्यवहार आदिपर भी बड़ा जोर दिया गया है। 'कल्याण' के सम्मान्य पाठक-पाठिकाओंसे संविनय निवेदन है कि वे अपने जीवनको पवित्र तथा परमात्म-प्राप्तिके योग्य बनानेके लिये इन समस्त सदाचार-सद्गुणोंको विशेषरूपसे ग्रहण करें।

इस महान् ग्रन्थमेंसे सार निकालकर प्रसंग चुननेका सारा कार्य श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने किया है। सुन्दर अनुवादका कार्य करनेवालोंमें प्रधान हैं—पाण्डेय पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम' महोदय और दूसरे हैं पं० श्रीरामाधारंजी शुक्ल शास्त्री। इन्होंने बड़ी ही लगन तथा बुद्धिमानीसे कार्य किया है। यह विशेषाङ्क इन्हीं महानुभावोंके सद्-प्रयासका फल है। हमलोगोंका तो केवल नाममात्र है।

इसमें जो भूलें रही हैं, उनकी सारी जिम्मेवारी हमारी है और उसके लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं। सारग्राही महानुभावोंको इसमें जो कुछ श्रेष्ठ, सुन्दर, भूलसे रहित दिखायी दे, कृपया उसीको ग्रहण करें।

कई प्रकारकी अड़चनें आ जानेके कारण सब प्रकरणोंके चित्र नहीं बन पाये, इसलिये विशेषाङ्कमें चित्र प्रसङ्गानुकूल नहीं लग सके हैं। चित्रोंपर प्रकरण तथा सर्ग छपे हैं, उसीसे देख लेनेकी कृपा करें। इन सब त्रुटियोंके लिये भी क्षमा-प्रार्थना है।

'कल्याण' के सभी ग्राहक-ग्राहिका, पाठक-पाठिका, प्रेमी-प्रचारक, 'कल्याण' से प्रीति तथा सहानुभूति रखनेवाले एवं खास करके 'कल्याण' में प्रकाशित साधन, सद्भाव, सदाचार, नियम आदिको सानन्द स्वयं ग्रहण करने तथा जनतामे उसकी उपादेयता बतलाकर उनका प्रसार करनेवाले सभी श्रेणियोंके महानुभाव एवं महिलाएँ हमारे लिये परम आदरणीय हैं। हम उनका हृदयसे अभिवादन करते हैं, और उन्हें 'कल्याण' परिवारके ही माननीय तथा अभिन्न-हृदय सदस्य मानकर उनसे प्रार्थना करते हैं कि 'कल्याण' के प्रति वे अपना अहैतुक प्रेम, अनुग्रह, सद्भाव सदा बढ़ाते रहें। हमारी स्वभाव-सुलभ तथा प्रमादजनित त्रुटियोंको बताते रहें और अपने निर्मल प्रेमसे ही उन्हें दूर भी करें। वे हमें अपनी सद्भावनासे बल देते रहें जिससे हमारे जीवनकी गति भगवान्‌की ओर लगी रहे और हमें उत्तरोत्तर आगे बढ़नेमें सहायता मिले।

हम अपने उन सभी पूज्यचरण पवित्रहृदय, कृपालु, संतो, महात्माओं, आचार्यों, विद्वानों और लेखक तथा कवि महानुभावों तथा पवित्रहृदया माताओंके श्रीचरणोंमें भक्ति-श्रद्धासहित प्रणाम करते हुए, जानते तथा न जानते हुए बने तथा बननेवाले अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करते हुए उनसे शुभाशीर्वाद चाहते हैं। 'कल्याण' के प्रचार-प्रसारमें हम उन्हींको प्रधान कारण मानते हैं; क्योंकि उन्हींके सद्भावों तथा विचारपूर्ण लेखोंसे 'कल्याण' को सदा शक्ति मिलती रहती है।

इस अङ्कके सम्पादन, चित्रनिर्माण, प्रूफ़-संशोधन आदि कार्योंमें जिन-जिनसे हमें सहायता मिली है, उन सभीके प्रति हम अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

इस विशेषाङ्कमें बहुत-से कृपालु लेखक महानुभावोंके लेख स्थानाभावसे नहीं जा सके हैं, उनसे हम सविनय क्षमा चाहते हैं।

प्रार्थी
हनुमानप्रसाद पोद्दार <br> चिम्मनलाल गोस्वामी } सम्पादक

७०० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरः *


जीवन्मुक्तका स्वरूप और आचार

रह न गया जिसमें किंचित् भी, कहीं, कभी ममताका लेश ।
प्राणि-पदार्थ-परिस्थिति देने लगे सभी समता-संदेश ॥
रहा न जिसमें किसी वस्तु-स्थितिका किंचित्-सा भी अभिमान ।
अहंकारके पूर्ण विलयसे हुआ जिसे पर-तत्त्व-ज्ञान ॥

रहता सदा जगत्में, करता काम सभी विधिके अनुसार ।
पर कुछ भी करता न कभी वह, रहता निर्मल निरहंकार ॥
अभिनय करता यथायोग्य वह सुन्दर नाम-रूप अनुसार ।
पर रहता निर्लेप नित्य वह राग-काम-विरहित अविकार ॥

द्वेष, क्रोध, शोक, भय, चिन्ता, ईर्ष्या, मत्सर, हर्षामर्ष ।
छू सकते न कभी उसको सब, हो अपकर्ष, भले उत्कर्ष ॥
सत्य अहिंसा अपरिग्रह अस्तेय अतुल सब विधि संतोष ।
करुण-हृदय संतत सेवा-रत, शुभ गुणमय जीवन निर्दोष ॥

पर-दुखमें दुखिया-सा होकर यथासाध्य सेवा करता ।
पर-सुखमें कर हर्ष प्रकट, अति अमित मोद मनमें भरता ॥
सुखकी नहीं स्पृहा करता, होता न कभी दुखमें उद्विग्न ।
द्वन्द्वरहित वह रहता निज निर्मल स्व-रूप चिन्मयमें मग्न ॥

कभी न होता किसी जीवका उससे किंचित् भी अपकार ।
सदा सभीके हितमें रहती उसकी बुद्धि-विभूति उदार ॥
पर होते आदर्श सभी उसके विशुद्ध सुन्दर व्यवहार ।
जीवन्मुक्त वही अति पावन परम ज्ञान-विग्रह साकार ॥

शम-दम, परहितरति ईश्वर-गुरु-सेवन उसके सहज स्वभाव ।
पर-वैराग्य सहज शुचि रहता, नहीं भोगका किंचित् चाव ॥
नहीं त्यागमें भी होता वह आग्रहवश कदापि अनुरक्त ।
पूर्ण परात्पर सच्चिन्मय आनन्द रूप रहता अविभक्त ॥

करता सहज रूपसे सारे सदाचार संयुत शुभ कर्म ।
नहीं छोड़ता किसी प्रलोभन-भयसे वह अपना सद्धर्म ॥
पर रहता स्वरूपतः वह नित धर्माधर्म-रहित तत्त्वज्ञ ।
नहीं समझ पाते, उसकी अन्तःस्थितिको बाहरसे अज्ञ ॥


**९—भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्‌की पृथक्‌ सत्ताका खण्डन ... १११**

The provided image is completely blank and contains no text to transcribe.