संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 742, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * सिद्ध आदिके लोकोंकी संकल्परूपता बताते हुए जगत्को वैसा ही बताना * ६९३
है । ब्रह्म जैसा पहले था, ठीक वैसा ही अब भी है । उसमें किसी प्रकारका विकार नहीं आता । जैसे खममें चिदाकाश अपने स्वरूपसे च्युत हुए बिना ही खमगत पदार्थोंके रूपमें भासित होता है, उसी प्रकार चिदाकाश अपने स्वरूपसे विकृत हुए बिना ही इस विश्वके रूपमें प्रतीत होता है । वह इस विश्व-विवर्तका अधिष्ठान ही है । न तो कारण है और न विकारी है । संकल्पमें चित्त जैसे आकारकी कल्पना करके पर्वत आदिकी लीलासे उदित होता है, वास्तवमें न वह पर्वत है और न वह आकाश है, उसी तरह ब्रह्ममें जगत्की स्थिति है । ब्रह्म ही जगत्के रूपमें प्रतीत होता है, ब्रह्मसे भिन्न जगत्की कोई सत्ता नहीं है । परम बुद्धिमान् जीवन्मुक्त महात्मा सब प्रकारकी चेष्टाओंसे विरत होते हुए भी कठपुतलियोंके समान व्यवहार करते हुए-से प्रतीत होते हैं । जैसे संकल्प-नगर निराकार होता हुआ भी चित्तके समक्ष साकार-सा स्थित होता है, उसी प्रकार ब्रह्ममें स्थित यह जगत् निराकार होनेपर भी साकार-सा दीखता है; परंतु वास्तवमें निराकार ही है । ये तीनों लोक चिरकालसे अनुभूत और अर्थक्रियाकारी होनेपर भी खम-नगरके समान निराकार तथा शून्य ही है । चिरकालसे पुरुषके नित्य अनुभवमें आनेपर भी यह जगत्रूपी पदार्थ उसी तरह कुछ भी नहीं है, जैसे स्वप्नमें ही अपना मरण । स्वप्नमें मरे हुए पुरुषको अपना दाह-संस्कार भी होता दिखायी देता है । वह असत् होकर भी सत्-सा भासित है, उसी तरह परब्रह्म परमात्मामें दीखनेवाला जगत् भी असत् ही है; किंतु भ्रमसे सत्-सा प्रतीत होता है ।
रघुनन्दन ! ब्रह्माकाश चिन्मय होनेके कारण स्वयं ही अपनेको 'मैं अहंकारात्मक समष्टिरूप हिरण्यगर्भ हूँ' ऐसा अनुभव-सा करता है । उसका यह संवेदन ही परमेष्ठी हिरण्यगर्भका स्वरूप है और यह त्रिलोकी उस हिरण्य-गर्भका ही संकल्प है । ऐसी स्थितिमें न तो ब्रह्मा कभी उत्पन्न हुआ और न इस दृश्य जगत्की ही उत्पत्ति हुई । अजन्मा परब्रह्म परमात्मा ही पूर्ववत् जैसे-का-तैसा विराज-मान है । चिदाकाशमें जो जगत्का रूप भासित होता है, वह उसकी प्रातिभासिक सत्ता ही है, पारमार्थिक सत्ता नहीं है । वह मृगतृष्णाके समान मिथ्या ही है । दिखायी देनेपर भी असत् ही है । जगत्के रूपमें यह सूनी ही भ्रान्ति प्रकट हुई है अथवा वह भी प्रकट नहीं हुई है । भ्रान्ति क्या है और कहाँसे आयी है, सर्वत्र सदा सब कुछ निराकार ब्रह्म ही तो है । जगत् ब्रह्मरूपी जलका भँवर है । इसमें द्वैत और एकत्व कैसा ? भँवर और जलमें कहाँ द्वैत है, और जब द्वैत ही नहीं है तब एकता भी कहाँ क्या हुई ? जैसे वायु अपने स्पन्दनको, आग अपनी उष्णताको और पूर्ण चन्द्रमा अपनी शीतलताको जानता है, उसी प्रकार ब्रह्म अपनी सत्ताको स्वयं ही अर्थरूप होकर जानता है । इस प्रकार यह ब्रह्म सदा ही अपने इस स्वरूप-स्फुरणको तथा 'अहम्' आदि अहंकारात्मक समष्टिको जानता है । सृष्टि, उसका अभाव तथा आकाशरूप ब्रह्म सर्वत्र तथा सर्वदा है । अविद्यादृष्टिसे कभी इसका यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ और विद्यादृष्टिसे देखनेपर यह जगत् कभी कुछ रहा ही नहीं । श्रीराम ! बद्ध-पुरुषकी दृष्टिसे ब्रह्म सदा त्रिभुवन-सा भासित होता है । किंतु मुक्तकी दृष्टिसे यह सब शान्त एवं सम ब्रह्म ही है । यहाँ नाना पदार्थोंकी कोई सत्ता नहीं है । आकाशसे कभी वृक्ष और पर्वत नहीं उत्पन्न होते हैं, उसी तरह ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति नहीं होती है । ऐसा निश्चय करके परम शान्त हो जाना चाहिये ।
श्रीरामजी बोले—ब्रह्मन् ! उस परमपदमें अहंभावका भान होनेपर आगे क्या होता है, आप यह जान चुके हैं । अतः आपसे इस विषयको मैं सुनना चाहता हूँ । मुझे सुननेसे तृप्ति नहीं हो रही है ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! परमपदमें अहंभावकी